श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
श्रीगौड़ीय मठ, कलकत्ता;
ई० २१ मई, १९२७।
[ **सांसारिक पिता-पुत्र का संबंध स्थूल देह तक सीमित है — वस्तुतः उन दोनों की आत्मा नित्य-कृष्णदास है, उनका नित्य कर्तव्य भगवत्-सेवा है — स्वरूपतः वैष्णव कभी किसी के पुत्र के रूप में अपने-अपने कर्म के छल से इस प्रपंच (संसार) में आते हैं और कर्म द्वारा निर्धारित समय के उपरांत निश्चित स्थान पर चले जाते हैं — जीव स्वरूपतः नित्यानंद प्रभु से आविर्भूत आत्मा है — विष्णु को नित्य पुत्र-भाव में स्थापित करने पर सांसारिक नश्वर पुत्र के अभाव-बोध से मुक्ति मिलती है — श्रीवास का आदर्श।** ]
स्नेहविग्रहेषु—
मैं आज प्रातः पुरी से श्रीमान् परमानंद के साथ श्रीगौड़ीय मठ आया हूँ। स्टेशन पर आते ही सुना कि भगवान् की इच्छा से ‘तोता’ हमें छोड़कर चला गया है। ‘तोता’ को आप अपना पुत्र समझते थे; वास्तव में वह एक कृष्णदास था। वह वैष्णव के गृह में आया था; वैष्णव माता-पिता के नाते आप लोगों ने उसकी सेवा की, और जितनी सेवा उसे ग्रहण करनी आवश्यक थी, उतनी प्राप्त करके वह चला गया। ‘तोता’ ने यह स्थूल शरीर आप लोगों से अवश्य प्राप्त किया था, किंतु वह जीवात्मा वैष्णव थी। उसका नित्य कार्य भगवत्-सेवा है। वैष्णव अपने-अपने कर्म के छल से इस प्रपंच में आते हैं और कर्म द्वारा निर्धारित समय तक भूताकाश (लौकिक आकाश) में वास करते हैं; तत्पश्चात उसकी योग्यता के अनुसार बलदेव प्रभु जहाँ भेजते हैं, वहीं चले जाते हैं। उन बलदेव के भीतर महालक्ष्मी का वास है, और महालक्ष्मी के भीतर साक्षात् भगवान् हैं—अतः ‘तोता’ अपनी उपास्य वस्तु की सेवा करने के उद्देश्य से गया है। जब वह संवित्-विग्रह नित्यानंद प्रभु से उत्पन्न जीवात्मा रूपी वैष्णव है, तब आप यदि विष्णु को पुत्र रूप में स्थापित करना सीख लेंगे, तो आपको कभी किसी अभाव का अनुभव नहीं होगा। ‘तोता’ के भीतर अंतर्यामी रूप से भगवान् विराजमान थे, आपने उन्हीं भगवान् की सेवा की है; अब भी बलदेव की सेवा करते रहें। भूताकाश का वह जड़-पिंड पंचतत्वों में विलीन हो गया है। ‘तोता’ की जीवात्मा शक्ति-शक्तिमान् की सेवा में संलग्न रहेगी। आपका भोग्य-पुत्र अपने भोग्य-पिता के संग से विलग हुआ है। वह भगवान् की भोग्य-वस्तु है, अतः भगवान् के भोग्य रूप में वैष्णव-संबंध ही उसका वास्तविक कार्य है। मेरी भाँति आप माया के बंधन में आबद्ध नहीं हैं, यह जानकर ही भगवान् अपने असीम कृपा-बल से आपको शोकाभिभूत नहीं होने देंगे—यही मेरी धारणा है।
श्रीवास पंडित के पुत्र की कथा का स्मरण कीजिएगा। ‘शोक-शातन’ और ‘श्रीचैतन्यभागवत’ का पाठ करें। महाप्रभु ने जिस समय संन्यास ग्रहण किया था, उस समय उन्होंने अपनी वृद्धा माता, पत्नी विष्णुप्रिया देवी और नवद्वीपवासियों से कहा था कि मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ, जो आप लोगों के साथ विभिन्न लौकिक संबंधों से बंधा था। मेरे चले जाने पर आप लोग मेरे स्थान पर श्रीकृष्ण के साथ उन सभी संबंधों की स्थापना करके मुझे स्वतंत्र रूप से हरि-सेवा करने का अवसर दें। आप भी ‘तोता’ के अभाव में भगवत्-सेवा के लिए अधिक समय निकाल सकेंगे। भगवान् जो कुछ भी करते हैं, मंगल के लिए ही करते हैं। मैं तो स्वयं मायाबद्ध जीव हूँ, इससे अधिक और क्या समझाऊँ।
नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती