श्रीश्रीगान्धर्विका-गिरिधारिभ्यां नमः
श्रीचैतन्यमठ, श्रीधाम मायापुर
ई० ५।८।२६
[ सिद्धांत में आलस्य दूर करने का उपाय — भजन-वृद्धि का मार्ग — कृष्णसेवा, कार्ष्णसेवा (वैष्णवसेवा) और श्रीनामकीर्तन की एकार्थपरकता — पूर्व इतिहास भूलने का सरल उपाय — जड़-प्रतिष्ठा की आशा से मुक्ति का मार्ग — स्वीकार्य और वरणीय क्या है? अनर्थ-निवृत्ति का उपाय — महाजनानुगत्य (महाजनों का अनुगमन) — दुःख-कष्ट में, संपद-विपद में भक्त की चित्तवृत्ति। ]
स्नेहविग्रहेषु—
आपका २१ आषाढ़ का विस्तृत पत्र पाकर समाचार ज्ञात हुआ। मैं उस समय श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र के “श्रीजगन्नाथवल्लभ मठ” में था। तत्पश्चात श्रीभुवनेश्वर और कटक में कुछ दिन रहकर श्रीगौड़ीय मठ आया। आज १०–१२ दिन हुए वहाँ से यहाँ आया हूँ।
आप अकेले ही वाराणसी में मठ की रक्षा कर रहे थे, इसलिए मन ऐसा पत्र लिखने के लिए व्यग्र हुआ, यह मैं समझ सकता हूँ।
“क्रमे क्रमे पाय लोक भवसिन्धुकूल।”
आशाबन्ध (विश्वास), समुत्कंठा, तथा कृष्णसेवा, कार्ष्णसेवा (वैष्णवसेवा) और श्रीनाम-कीर्तन द्वारा ही मंगल होता है। सर्वदा कृष्णार्थ अखिल-चेष्टा-विशिष्ट होने पर माया के विविध प्रलोभन हमें आच्छन्न नहीं कर पाते। सर्वदा श्रवण और कीर्तन करें; महाजन-ग्रंथों एवं “गौड़ीय” पत्रिका का पाठ करें, ऐसा करने पर सिद्धांत-ग्रहण के विषय में आलस्य नहीं रहेगा।
जिन भक्तगणों के संग आप हैं, उनके साथ परस्पर श्रीहरिकथा का संवाद करें; इससे भजन की उन्नति के साथ-साथ अपने दैन्य और हीनता की अनुभूति कर सकेंगे। आप जानते ही हैं कि “सर्वोत्तम स्वयं को हीन मानता है”। आप सब अपने भीतर मंगल की आकांक्षा करें, इससे हमारे भजन की वृद्धि होगी।
कृष्णसेवा, कार्ष्णसेवा और श्रीनाम-कीर्तन—यद्यपि ये तीन पृथक अनुष्ठान प्रतीत होते हैं, तथापि तीनों का तात्पर्य एक ही है।
नाम-संकीर्तन के द्वारा कृष्णसेवा और वैष्णवसेवा दोनों होती हैं।
वैष्णव की सेवा करने से कृष्ण-कीर्तन और कृष्ण-सेवा होती है।
कृष्णसेवा करने से ही नाम-संकीर्तन और वैष्णवसेवा होती है।
इसका प्रमाण यही है—“सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितम्”।
श्रीचैतन्यचरितामृत के पाठ से कृष्णसेवा और नाम-संकीर्तन होता है। सत्संग में श्रीमद्भागवत के पाठ से भी वही फल प्राप्त होता है। श्रीअर्चन में भी ये तीनों कार्य सम्पन्न होते रहते हैं। नाम-भजन में भी यह सब सुचारु रूप से संपन्न होता है।
पूर्व के इतिहास को भजन के अनुकूल विचार में नियोजित करें; अर्थात् प्रतिकूल विषयों को अनुकूलता की पूर्व-अवस्था जानें। प्रतिकूल होने पर जो विपत्ति उपस्थित होती है, वही अगले ही क्षण भजन की अनुकूलता को जन्म देती है। संपूर्ण दृश्यमान जगत की सभी वस्तुएँ कृष्णसेवा की उपादान (सामग्री) हैं। सेवा-विमुख बुद्धि वस्तुओं के विषय में हमारी मति को भ्रष्ट करके हमें भोग में लगा देती है। दिव्य-ज्ञान का उदय होने पर पूरे जगत में कृष्ण-संबंध दिखने लगे, तो प्रतिष्ठा का विषैला फल हमें ग्रसित नहीं कर सकता।
“चंचल जीवन-स्रोत प्रवाहित होकर काल के सागर में दौड़ रहा है।”
इस विवेक के साथ हरि-सेवा की प्रवृत्ति पग-पग पर उपस्थित होती है। अतः जिससे कृष्ण को आनंद मिले, मुझे संतुष्ट चित्त से वही स्वीकार करना कर्तव्य है। कृष्ण यदि मुझे विमुख रखकर ही सुख का अनुभव करते हैं, तो मुझे जो दुःख मिलता है, वही मेरे लिए वरणीय है।
“तुम्हारी सेवा में जो दुःख होता है, वह भी परम सुख है”
यह वैष्णवों की अनुभूति है; इसका अनुसरण करने का यत्न करें। हमारे समस्त अनर्थ जब कृष्णसेवा में प्रयुक्त हो जाते हैं, तब वे ही अर्थ या प्रयोजन रूप में स्थायी मंगल का कारण बन जाते हैं। ठाकुर बिल्वमंगल का पूर्वचरित्र, सार्वभौम की कथा, और प्रकाशानंद के कुतर्क रूपी समस्त अनर्थ अंततः कृष्णसेवामय हो गए थे। अतः बीते हुए अनर्थों के लिए कोई चिंता न करें। वर्तमान के अनर्थ—श्रवण और कीर्तन को प्रबल करने पर स्वतः ही दुर्बल पड़ जाएँगे। हमारा जीवन अल्पकालीन है, अतः मृत्यु पर्यंत निष्कपट भाव से हरि-सेवा करने का यत्न करें। महाजनों का अनुगमन ही हमारे मंगल का एकमात्र सेतु है।
“अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं” श्लोक पर विचार-विमर्श करें। आपका पत्र मैंने श्रीभक्तिविलास ठाकुर को पढ़कर सुनाया है, जिस पर उन्होंने संतोष व्यक्त किया है।
आशा है कि वहाँ सभी भक्त उत्साहपूर्वक श्रीहरिकीर्तन और वैष्णव-सेवा का कार्य कर रहे हैं। सभी को हमारा यथायोग्य आंतरिक अभिवादन कहिएगा।
प्राक्तन कर्म-विपाक के कारण मैं कभी स्वस्थ तो कभी अस्वस्थ हो जाता हूँ। जब मैं सोचता हूँ कि स्वस्थ हूँ, तभी मैं कृष्ण-विमुख हो जाता हूँ और परिणामस्वरूप स्वयं से श्रेष्ठ भक्तों को भी अपने से निकृष्ट समझने लगता हूँ। इसलिए कृष्ण मेरी स्थिति का विचार करके मुझे अनेक प्रकार के दुःख, कष्ट, अस्वस्थता और असुविधाओं में रखते हैं। तब मैं *“तत्तेऽनुकम्पां”* श्लोक का वास्तविक मर्म समझने की चेष्टा करता हूँ। कृष्ण के विषय में प्रमत्त रहने पर जगत के कई लोगों के साथ कलह करने की इच्छा होती है। कृष्णसेवा में व्यस्त रहने पर संसार के लोग मुझ पर आक्रमण करते हैं।
आशा है आप सकुशल हैं।
नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती