पवित्रता एवं निर्गुणता

श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रो विजयतेतराम् (अर्थ: श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्र विशेष रूप से विजयी हों।)

श्रीमायापुर वामनपुकुर पोस्ट, नदिया
बंगला 11 पौष 1322

[कर्मी और भक्त के पवित्र-अपवित्र-विचार में भेद – अमेध्य (अशुद्ध/अपवित्र) वस्तु भगवान् का नैवेद्य नहीं है – लक्ष-हरिनाम-ग्रहण-विमुख व्यक्ति के प्रदत्त नैवेद्य में भगवत्-प्रीति नहीं है – भगवत्प्रसाद बद्धजीव के भोगने की वस्तु नहीं है – हरिवासर (एकादशी) में महाप्रसाद ग्रहण करने योग्य नहीं है।]

स्नेह विग्रह को—

आपका 27 दामोदर और 27 केशव तारीखों का दो पत्र मुझे यथासमय मिल गया था। पत्र का यथासमय उत्तर नहीं दे सका।

‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ इन दो परिभाषाओं (संज्ञाओं) के संबंध में, कर्मी लोग जिसे ‘पवित्र’ कहते हैं, भक्तों के निकट शायद उसकी पवित्रता न हो; और जो वस्तु कर्मिगण के विचार में ‘अपवित्र’ है, भक्त उसे ‘पवित्र’ मानते हैं।

‘अपवित्र’ शब्द से अमेध्य (अशुद्ध, अभक्ष्य) का अर्थ हो, तो उसे कोई भी भगवान को कभी निवेदित नहीं कर सकता। सात्त्विक वस्तु के अतिरिक्त राजसिक और तामसिक वस्तुएँ भगवान को निवेदित नहीं की जा सकतीं। यदि कोई अपवित्र वस्तु भगवान को निवेदित करता है, तो वे उसे कभी ग्रहण नहीं करते।

यदि कोई अपवित्र वस्तु भगवन्-निवेदित (भगवान को अर्पित की गई) कहकर देने आता है, तो उसे कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि कोई यह जान ले कि अमुक वस्तु भगवान ने ग्रहण नहीं की है, तो भक्त उसे कभी स्वीकार नहीं करता। उस तरह की वस्तु को त्यागने में कोई अपराध नहीं है।

यदि कोई पवित्र सात्त्विक वस्तु अभक्त के द्वारा दी गई है, तो भी यह जानकर उसका त्याग करना चाहिए कि भगवान ने उसे ग्रहण नहीं किया है। जो लोग प्रतिदिन एक लाख नाम ग्रहण नहीं करते, उनके द्वारा दी गई कोई भी वस्तु भगवान् स्वीकार नहीं करते।

विमुख (भगवान से विमुख) जीव के भोगने योग्य पवित्र और अपवित्र दोनों ही वस्तुएँ प्राकृत (भौतिक) हैं। सात्त्विक वस्तुएँ भगवान को अर्पित किए जाने पर भक्तजन उसकी अप्रकृतता (दिव्यता) को समझ पाते हैं; तब वह वस्तु बद्धजीव के भोगने योग्य नहीं रहती, अपितु भगवत्प्रसाद के रूप में सम्माननीय होती है। अपवित्र वस्तु भगवान के अतिरिक्त अन्य मनुष्यों, देवताओं या राक्षसों के भोगने योग्य है। वह प्राकृत और अपवित्र है।

श्री एकादशी तिथि पर भक्तजन श्री महाप्रसाद या श्री महामहाप्रसाद का भी त्याग करके उपवास करते हैं। महाप्रसाद आदि कुछ भी प्रसाद ग्रहण करने से उपवास नष्ट होता है; अतः हरिवासर (एकादशी) का सम्मान नहीं रहता। श्री महाप्रसाद का त्याग ही उपवास या तिथि-पालन है। तथापि असमर्थों के लिए अनुकल्पादि की व्यवस्था (विकल्प) तिथि-सम्मान के प्रतिकूल नहीं है।

नित्य आशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती