“नाम-भजन करनेवाले और अर्चन करनेवाले के लिए उपदेश”
श्रीकृष्णचैतन्यचंद्र की सर्वत्र विजय हो।
श्रीधाम मायापुर, नदिया — चैतन्य युगाब्द ४২৯,
दामोदर मास के चतुर्थ दिन।
[कृत्रिम लीलास्मरण की अपेक्षा, नामस्मरण से ही समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। श्रीनाम ही आत्मा का दिव्य स्वरूप प्रकट करता है।]
(नित्य सिद्धि के पथ पर अग्रसर होने के लिए कृत्रिम लीला-स्मरण की अपेक्षा श्रीहरि-नाम का जाप ही सर्वश्रेष्ठ साधन है। श्रीनाम में ही समस्त सिद्धियों का निवास है। यह श्रीनाम अत्यंत शक्तिशाली है — यह स्वयं ही नाम-जप करने वाले के ह्रदय में अप्राकृत, दिव्य स्वरूप को प्रकट करता है। नाम-जप के प्रभाव से साधक का शुद्ध रूप, उसके गुण और सेवात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होती हैं। श्रीनाम ही अपने दिव्य स्वरूप और गुणों का प्रकाश कर जीव को कृष्ण की ओर आकर्षित करता है। वास्तव में, भक्त के लिए पवित्र और अपवित्र का विवेक, प्राकृत और अप्राकृत की पहचान तथा सेवा-भावयुक्त निर्गुण दृष्टिकोण — यही उसका सच्चा आध्यात्मिक अनुभव और ग्रहण है। यही श्रीनाम की अनन्त महिमा है, जो कृपा करके हृदय में प्रकट होती है।)
मेरे प्रिय *** ,
आप पर श्रीगुरु और भगवान् की विशेष कृपा और आशीर्वाद सदा बरसे।
आपका दामोदर तिथि का पत्र पाकर अत्यंत हर्ष हुआ, विशेषकर यह जानकर आनंद हुआ कि आप श्रीहरिनाम-जप में उत्साहित हैं। श्रीनाम का नित्य स्मरण करते रहने से जब हृदय के अनर्थ दूर हो जाते हैं, तब वही नाम स्वयं ही भगवान् के रूप, गुण और लीला की झलक प्रदान करता है। इसलिए कृत्रिम रूप से लीला, रूप या गुण का ध्यान करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नाम और नामी में कोई भेद नहीं होता—नाम स्वयं श्रीभगवान हैं।
जब अंतःकरण शुद्ध होता है, तब यह सत्य अनुभव में स्वतः प्रकट होता है। यदि आप बिना अपराध श्रीकृष्ण के नाम का उच्चारण करते हैं, तो समझना चाहिए कि उसी नाम में सभी दिव्य सिद्धियाँ निहित हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा से नाम का जप करता है, वह अपने सूक्ष्म शरीर के आवरणों को पार कर अपने दिव्य स्वरूप को प्रकट करता है। श्रीनाम साधक के अंतःकरण में श्रीकृष्ण के अलौकिक स्वरूप को प्रकट करता है, उसके भीतर भगवत्स्वरूप की ओर आकर्षण पैदा करता है, दिव्य गुणों का उदय करता है और अंततः भक्ति की क्रियाओं को उत्पन्न कर भगवान् की लीला में उसका प्रवेश कराता है। नाम-जप मात्र जप नहीं, अपितु संपूर्ण जीवन की सेवा का रूप है—देह, मन और वाणी से किया गया नाम-जप स्वतः एक जीवंत सेवा बन जाता है। श्रीनाम की महिमा, उसका तत्त्व और उसका प्रभाव—इन सबका अनुभव नाम-जप करने वाला साधक हृदय से करता है। शास्त्र का श्रवण, अभ्यास और अध्ययन उस नाम-तत्त्व को जाग्रत करने में सहायक होते हैं, परंतु अंततः अनुभव ही प्रमाण है। निरंतर नाम-जप आपके भीतर सभी दिव्य तत्त्वों को प्रकाशित कर देगा।
जहाँ तक शुद्धता का प्रश्न है, पवित्र और अपवित्र दोनों ही भौतिक गुणों से युक्त होते हैं—परंतु भगवान् की सेवा में अपवित्रता का त्याग आवश्यक है। सात्त्विक पदार्थ पवित्र माने जाते हैं, जबकि रज और तमोगुण वाले पदार्थ अपवित्र होते हैं, और इसलिए हमें रज-तम का परित्याग कर विशुद्ध सत्त्व में स्थिर होकर सेवा करनी चाहिए। केवल बाह्य पवित्रता ही पर्याप्त नहीं होती—वस्तु यदि निर्गुण नहीं है तो भगवान् उसे स्वीकार नहीं करते, क्योंकि सेवा का मुख्य आधार वस्तु नहीं, भाव है। जब हृदय में शुद्ध, दिव्य सेवा-भाव का उदय होता है, तब पवित्र और अपवित्र का भेद भी अप्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि उस समय भगवद्भाव ही प्रधान होता है।
यहाँ सब कुशल है।
कृपया अपने भजन की स्थिति समय-समय पर अवश्य लिखते रहें। श्रीमद् भक्तिविलास ठाकुर जी कुशल से हैं। उनकी भजन-संबंधी समाचारों से हम अत्यंत कृतार्थ होते हैं। ‘श्रीसज्जनतोषणी’ ग्रंथ का नियमित पाठ कीजिए।
आपका सदैव शुभचिंतक —
अकींचन श्रीसिद्धांत सरस्वती।