कर्म, ज्ञान और अन्य इच्छाओं के बीच का अंतर गहराई से समझने योग्य है।

श्री गुरु और श्री गौरांग की जय हो!

श्रीमायापुर, नदिया से…
श्रीचैतन्य संवत ४२९

[“श्रीरूप, उनके अनुगामी भक्तगण एवं श्रीहरिनाम प्रभु से हमें रूप, शक्ति और भक्ति की पात्रता की प्रार्थना करनी चाहिए। साथ ही, कर्मियों, ज्ञानियों और अन्याभिलाषी जनों के मध्य के सूक्ष्म भेद को समझते हुए, युक्त वैराग्य का आश्रय लेना चाहिए।”]

मेरे प्रिय *** —

आपकी ७ बैशाख की तिथि वाला पत्र प्राप्त हुआ, समाचार जानकर हर्ष हुआ।

श्रीमहाप्रभु की कृपा से हम कुशल हैं, परंतु पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप हरिसेवा में अनेक बाधाएँ उपस्थित होती हैं। यदि कोई व्यक्ति अपराधों को त्यागकर सच्चे मन से हरिनाम का आश्रय लेना चाहे, तो हरिनाम करते-करते ही उसके अपराध दूर होने लगते हैं, क्योंकि हरिनाम स्वयं शुद्ध, शक्तिशाली और करुणामय हैं। श्रीमहाप्रभु ने अपनी समस्त आध्यात्मिक शक्ति श्रीरूप गोस्वामी को प्रदान की है, अतः हमें श्रीरूप गोस्वामी और उनके अनुगामी महापुरुषों के चरणों में हृदय से कृपा-शक्ति और सेवा-पात्रता की भिक्षा माँगनी चाहिए, विशेषकर श्रीहरिनाम से उनकी सेवा के लिए उचित योग्यता की याचना करनी चाहिए। हरिनाम ही साधक के अंतःकरण में प्रकट होकर प्रकाशित करते हैं और साधक के ह्रदय में अप्राकृत स्वरूप, गुण व लीलाओं को प्रकट करते हैं।

‘कृष्ण’ के अतिरिक्त किसी भी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा ‘अन्याभिलाष’ कहलाती है और जो जीव भौतिक इच्छाओं से युक्त हैं, वे अन्याभिलाषी कहलाते हैं। शुभकर्म में रत कर्मी और निर्विकार ज्ञान में रत ज्ञानी—ये दोनों भी ईश्वर से भिन्न दृष्टिकोण रखते हैं, किंतु अन्याभिलाषी कुकर्मों या कुटिल ज्ञान में लिप्त रहते हैं, जहाँ भेदभाव और द्वैत की भावना प्रबल होती है। यदि कोई व्यक्ति कृष्ण की सेवा की बुद्धि से, भोग की आसक्ति को त्यागकर वस्तुओं का तदनुकूल प्रयोग करे, तो वह युक्त वैराग्य कहलाता है। पर यदि कोई शास्त्र, श्रीमूर्ति, हरिनाम या वैष्णवों को भी सांसारिक समझता है, तो उसका वैराग्य तुच्छ होता है। सच्चे भक्त वही होते हैं जो युक्त वैराग्य को स्वीकार करते हैं और श्रीमहाप्रभु की इस आज्ञा को स्मरण रखते हैं कि—“क्रमशः मनुष्य भवसागर को पार करता है।”—महाप्रभु की यह आज्ञा भलीभांति समझने का प्रयास करें।

आपका सदैव शुभचिंतक,
अकिंचन श्रीसिद्धांत सरस्वती।