श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
श्रीगौड़ीयमठ, कलकत्ता
ई० २७।९।२२
[ वैधभक्त और कर्मजड़ स्मार्तमत का भेद — श्रीगौरसुन्दर द्वारा श्रीहरिनाम प्रचार से पूर्व ही कर्माग्रह और ग्रहण-स्नान आदि में लोगों का आग्रह। ]
स्नेहविग्रहेषु—
आपका ५ आश्विन तारीख का पत्र प्राप्त हुआ। श्रीके* * * को “गौड़ीय” पत्रिका भेज दी गई है। पूर्व प्रकाशित “गौड़ीय” के अंकों के अब मिलने की संभावना नहीं है। यदि कोई संभावना बनती है, तो बाद में आपको सूचित करूँगा।
स्मार्त मत के अनुसार ग्रहण का समय अशुद्ध काल माना जाता है। अशुचि अवस्था में जो कार्य उन्हें नहीं करने होते, वे उन्हें नहीं करते। किंतु सेवापरायण वैधभक्तों को इन सभी प्राकृत (लौकिक) विधियों की उपेक्षा करते हुए, जहाँ तक संभव हो, यथासमय (भगवत्) सेवा करना ही कर्तव्य है। जब तक श्रीगौरसुन्दर ने संसार में भक्ति का प्रचार नहीं किया था, केवल उसी समय भक्तगण ग्रहण काल में स्नानादि करते थे। किंतु महाप्रभु के श्रीनाम-प्रचार के उपरांत हर समय ही हरि-संकीर्तन विहित हो चुका है। उसमें काल-अकाल (शुभ-अशुभ समय) का कोई विचार नहीं है। पुण्य का संग्रह करने के इच्छुक ही काल-अकाल का विचार करते हैं। ग्रहण काल में वैधभक्त गंगास्नान इत्यादि नहीं करते, अर्थात् किसी फल की आकांक्षा रखकर वे कोई कर्म नहीं करते। आज पंजाब-मेल से श्रीराधाकुंड में स्नान हेतु मथुरा मंडल जा रहा हूँ।
नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती