श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
[ श्रीधाम-वृन्दावन के परलोकवासी मधुसूदन गोस्वामी सार्वभौम महाशय के नाम लिखा गया ]
श्रीगौड़ीयमठ, कलकत्ता;
१५ जनवरी, १९२७।
[ श्रीकृष्णचैतन्य मठ का एकान्तिक शुद्धभक्ति-प्रचार — हरि-सेवा कोई अवैध वणिक-वृत्ति (व्यापार) नहीं है — श्रील प्रभुपाद द्वारा श्रीमद् मधुसूदन गोस्वामी महाशय से शुद्धभक्ति-प्रचार हेतु अनुरोध। ]
विपुल-आचार्यसम्मान-पुरःसर-निवेदनम्—
मैं कल ही श्रीधाम-नवद्वीप-श्रीचैतन्यमठ से श्रीगौड़ीयमठ आया हूँ। श्रीधाम से आपके नाम एक पत्र भेजा था, संभवतः आपको प्राप्त हो गया होगा।
मिथ्याभक्तों के मतानुसार जब इंद्रियतर्पण के अतिरिक्त ‘धर्म’ नाम की कोई वस्तु ही नहीं रह गई है, तब क्या शुद्धभक्ति-धर्म का श्रीवृन्दावन आदि तीर्थों में पुनः प्रचार नहीं होना चाहिए? क्या श्रीवृन्दावन के श्रीविग्रहगण केवल जातिगत व्यापारियों के व्यापार की बिक्री-सामग्री (पण्यद्रव्य) मात्र बने रहेंगे? क्या ये सभी अवैध व्यापारी बनियों का धर्म अपनाकर ठाकुर-सेवा के नाम पर और मन्त्र-व्यवसाय के बहाने अपने-अपने स्वार्थ की पुष्टि करते रहेंगे और क्या उसी को ‘धर्म’ मान लिया जाएगा? शुद्धभक्ति-कथा के माध्यम से जगत का हित-साधन हो, क्या यह वर्तमान वृन्दावनवासियों का अभिप्राय नहीं होना चाहिए?
किंतु शुद्धभक्तगण कभी भी मिथ्याभक्ति का अनुमोदन नहीं करते। कलिकाल में भक्ति-मार्ग कंटकाकीर्ण हो चुका है। ऐसी स्थिति में श्रीकृष्णचैतन्यमठ के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है। इस बात को अज्ञानी जन समझ नहीं पा रहे हैं। आप हमारी इन बातों को थोड़ी हिन्दी में—ब्रजबुली में विज्ञापन (इश्तिहार) की भाँति यदि प्रचारित कर दें, तो कदाचित कई लोगों पर कृपा हो सकेगी।
ठाकुर-सेवा कोई बिक्री की वस्तु नहीं है और न ही सेवकगण बनिये हैं; वे भक्त वैष्णव हैं। वे सर्वस्व त्यागकर अपने और जगत के कल्याण के लिए कीर्तनमुख होकर हरि-सेवा कर रहे हैं। बनियों की वस्तु चावल और धान है; ठाकुर-सेवा के बहाने वे पत्थरों के मकान, भवन आदि खड़े करते हैं। उन सब की सहायता से व्यापार करके वे अपना उदर-पोषण करते हैं, ठाकुरबाड़ी क्रय करते हैं, अयोग्य व्यक्तियों द्वारा सेवापराध करवाते हैं, अयोग्य व्यक्ति से मन्त्र-ग्रहण का प्रपंच रचते हैं, भजन का उपदेश लेते रहते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं! इन सभी कार्यों में शुद्धभक्त-सम्प्रदाय की किंचित् भी आस्था नहीं है।
भजन छोड़कर व्यर्थ के विवादों में पड़ना भक्त-सम्प्रदाय का कर्तव्य नहीं है। व्यावहारिक जगत में जिस प्रकार सत्य की दुर्दशा हुई है, उसमें सरलता के स्थान पर कपटता ही ‘धर्म’ के नाम पर चल रही है। अब सच्चे गौर-भक्तगण परमेश्वर के स्वरूप-लक्षण और निष्कपट सत्य का संसार में प्रचार कर जगत को छद्म-वैष्णवता (Pseudo-Vaisnavism) के चंगुल से मुक्त कराना अपना पावन कर्तव्य समझ रहे हैं।
आप अपने जीवन के इस अंतिम पड़ाव में शुद्ध-भक्ति साम्राज्य की स्थापना हेतु अंतिम प्रयास करके वैष्णव-समाज के धन्यवाद के पात्र बनें—यही मेरी प्रार्थना है। ‘Vaisnavism Real and Apparent’ (वास्तविक एवं आभासी वैष्णव-धर्म) ग्रंथ का प्रकाशन हो चुका है। अब तथाकथित वैष्णव-जगत का वास्तविक मंगल-विधान करना परम आवश्यक है। आप एक सुयोग्य मनीषी हैं, आपके द्वारा यह कार्य संपन्न हो सकता है। वंगदेश (बंगाल) का कपटभाव बहुत हद तक उजागर हो चुका है; अतः देश-विदेश में जहाँ-जहाँ भी धर्म का ढोंग चल रहा है, उसका निराकरण होना अत्यंत आवश्यक है।
श्रीहरिजनकिंकर
श्रीसिद्धान्तसरस्वती