आज श्रीवराह देव की आविर्भाव तिथि है। कल नित्यानंद प्रभु की आविर्भाव तिथि है, आज अधिवास कृत्य है। विशेष भक्ति अनुष्ठान के पहले उसके लिए तैयारी (preliminary preparation) करनी होती है, आज प्राग-प्रस्तुति है, प्रस्तुति का अर्थ है कल नित्यानंद का आविर्भाव होगा उसके लिए आज हृदय से तैयार रहना।
श्रीमद्भागवत के चतुर्थ स्कन्ध में महादेव कहते है,
सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं
यदीयते तत्र पुमानपावृत: ।
सत्त्वे च तस्मिन्भगवान्वासुदेवो
ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते ॥
(श्रीमद्भागवत 4.3.23)
वसुदेव-देवकी को अवलंबन करके वासुदेव का शुभ आविर्भाव हुआ। वसुदेव कौन है? भक्त। देवकी कौन है? वह भी भक्त है। दोनों को अवलंबन करके वासुदेव (श्री कृष्ण) का आविर्भाव हुआ। यहाँ पर महादेव कहते हैं, ‘सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं…’—विशुद्ध चित्त में भगवान का आविर्भाव होता है। विशुद्ध चित्त को ही वासुदेव कहा जाता है, इसलिए आज चित्त को विशुद्ध करना चाहिए, जिससे वराह देव का आविर्भाव हो, नित्यानन्द प्रभु का आविर्भाव हो। इसलिए आज उनके आविर्भाव से पहले तैयारी करनी होगी। अपने चित को पहले मार्जन करना होगा।
भगवान् अधोक्षज वस्तु है। अध: कृतं इन्द्रिय ज्ञानं सः अर्थात् इन्द्रिय-ज्ञान से परे जिनकी अवस्थिति है अर्थात् जो प्राकृत इन्द्रिय,मन, बुद्धि से परे हैं। इन्द्रिय,मन, बुद्धि द्वारा उनको नहीं जाना जा सकता इसलिए इस बात को स्मरण रखकर ‘ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते’—चित्त को शुद्ध करने के लिए उनका चिंतन करना और उनके चरण में शरणागत होना, उनको नमस्कार करना। अपनी चेष्टा से नहीं होगा। चित्त को साफ करने के लिए शरणागत होकर आज की तिथि में उनकी कृपा प्रार्थना करना। श्रीगुरु, वैष्णव, भगवान की कृपा प्रार्थना करते हुए उनकी आराधना करना, उनका नाम लेकर उनको पुकारना अर्थात् हरिनाम करना। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी गुण्डिचा मंदिर मार्जन द्वारा यही शिक्षा दी। जगन्नाथ जब गुण्डिचा मंदिर में जाएँगे, उससे पहले महाप्रभु ने भक्तों को साथ लेकर गुण्डिचा मंदिर को साफ करने को कहा। तृण,घास, मिट्टी इत्यादि सबको साफ करना होगा अर्थात् जितने भी प्रकार की कर्म, ज्ञान, योग इत्यादि की आकांक्षाएँ हैं उन सब को हृदय से साफ करना पड़ेगा। सूक्ष्म-सूक्ष्म और कोई कनक, कामिनी, प्रतिष्ठा इत्यादि कमानायें और जितने भी प्रकार सूक्ष्म कामना रूपी कंकर या धूलिकण है जो भीतर में रह जाते हैं, उसे जल से धोकर उसका चिह्न भी बाकी नहीं रखना। तब जगन्नाथ आकर वहाँ अपना स्थान ग्रहण करते हैं इसलिए पहले गुण्डिचा मंदिर मार्जन होता है। आज गुंडिचा मंदिर मार्जन है। नित्यानंद प्रभु और वराह देव की लीला नित्य है। अनंत ब्रह्मांड है, जिनमें लगातार अनंत लीलाएं चल रही है। बाहर के लोग इस को नहीं समझ के बोलते हैं, This is myth (ये सब काल्पनिक है). They use these kind of words. ये सब प्राचीन समय की बाते हैं, all are fictitious.
यदि कोई अप्राकृत जगत के बारे में यह जान ही नहीं सकता तो वह वहाँ जाएगा कैसे? इस प्रकार का कोई पर जगत भी है, वे लोग ये जानते ही नहीं। उनके शब्द भी इसी प्रकार के हैं। अभी दशावतार लिखते समय मैंने देखा भगवान् के अवतार के लिए वे लोग शब्द प्रयोग करते हैं ‘incarnation’ जिसका अर्थ dictionary में दिया है—body, flesh इत्यादि। अभी भगवान मत्स्य अवतार से प्रकट हुए, मछली रूप से। भगवान कूर्म रूप से प्रकट हुआ, भगवान वराह रूप से प्रकट हुए, अर्थात् अवतरित हुए भगवान का वराह के अंदर में प्रवेश हुआ,ऐसा अर्थ नहीं है। भगवान अनंत है उनकी लीला भी अनंत है। कितनी लीला हम जानते हैं? यह शास्त्रों में कुछ लीलायें वर्णित हैं, किन्तु जो अनंत है, उनके संबन्धित सब कुछ ही अनंत है। हम उसको जानकर समझ लेंगे तब अनंत और अनंत नहीं रहेंगे इसलिए उनका अनंत ब्रह्मांड है, आप सीमा नहीं कर सकते। अनंत बैकुंठ है, अनंत गोलोक- वृंदावन है। ये सब सीमा के अंदर में नहीं है। हम वृंदावन को जान लेंगे, बैकुंठ को जान लेंगे, ऐसा नहीं है। भगवान का स्वरूप अनंत है। भगवान सृष्टि करते हैं? किसलिए?
भगवान ने देखा,ये सब जीव मुझसे आएँ हैं , उनको मैंने अनु-स्वतन्त्रता दी, किन्तु वे मुझे नहीं चाहते वे संसार भोग करना चाहते हैं मैं यदि संसार का निर्माण ना करूँ, तो उन्हें वह भी नहीं मिलेगा इसलिए उन्होंने अनंत ब्रह्मांड की रचना की। आपके चार-पांच बच्चा है, बच्चा के लिए मां-बाप का थोड़ा दुबला भाव रहता है, यदि बच्चा कोई ऐसा वस्तु मांग ले जो उसके लिए अच्छी नहीं है, तो मां-बाप उसे वह चीज नहीं देते। किन्तु बच्चा तब हठ करता है तब अंत में माँ-बाप बच्चे उनकी दुर्बलता होने कारण उनको वह चीज दे देते हैं। भगवान भी ऐसे ही है। भगवान सोचते हैं, यह जीव मुझे नहीं चाहता है, संसार चाहता है अच्छा ठीक है। इसलिए उन्होंने अनंत भोग योग्य योनियाँ सृष्टि की। जीव भगवान को भोग नहीं कर सकता है, वह अपने से निकृष्ट वस्तु को ही भोग कर सकता है।इसलिए भगवान् ने 84 लाख भोग योनियाँ सृष्टि की, इन योनियों में प्रवेश कर जीव जन्म मरण के चक्र में भ्रमण करता हुआ त्रिताप भोग करेगा। मनुष्य योनी में भगवान ने विवेक बुध्धि दी, जिससे वह निर्णय कर सकता है कि उसे भगवान् चाहिए या संसार चाहिए? यदि जीव बोले कि उसे संसार चाहिए तब उसे पशु, पक्षी इत्यादि योनियों में भ्रमण करना पड़ेगा। यदि जीव कहे, “नहीं, मैं आपको चाहता हूँ।” तब भगवान कहते हैं, “नहीं, तुम हृदय से बोलो, धोखा मत दो।”
गौरांग महाप्रभु स्वयं कृष्ण, राधारानी का भाव लेकर प्रकट हुए, वे कहते हैं-
न धनं, न जनं, न सुन्दरीं, कवितां वा जगदीश कामये,
मम जन्मनि जन्मनिश्वरे भवताद् भक्तिर्हैतुकी त्वयि।।
(श्रीचैतन्य चरितामृत अन्त्य 20.29)
कार्तिक व्रत में हम यह प्रतिदिन पाठ करते हैं। हृदय से बोलो, केवल जिह्वा से नहीं। हृदय से बोलो कि मैं धन नहीं चाहता हूँ, बाहर से बोल देते हैं मैं धन नहीं चाहते हूँ किन्तु हृदय में तो धन चाहिए। किन्तु भगवान् तो भावग्राही जनार्दन हैं, भाषाग्राही नहीं हैं। हम क्या भाषा बोलते हैं वे यह देखते नहीं, वे भीतर में क्या है वह देखते हैं। बोलो मैं धन नहीं चाहता हूँ, मैं जन नहीं चाहता हूँ, स्त्री, पुत्र, कन्या इत्यादि नहीं चाहता हूँ, मैं विद्या नहीं चाहता हूँ, मुक्ति नहीं चाहता हूँ, सिद्धि नहीं चाहता हूँ।
“फिर क्या चाहते हो?”
“मैं आपमें अहैतुकी भक्ति चाहता हूँ।”
“ठीक है, तुम हृदय से बोलो फिर देखो मैं देता हूँ कि नहीं”
भगवान कहते हैं कि तुम मुझमें दोष देखते हो किन्तु हृदय से तुम क्या मांगते हो? हृदय से तुम मुझे नहीं मांगते हो, हृदय में तुम कोई और वस्तु मांगते हो मुझे वह देना पड़ता है। हृदय से बोलो। मैं पक्षपाती नहीं हूँ। I am neutral, impartial.
भगवान् ने ध्रुव पर कृपा की, प्रहलाद पर कृपा की, अम्बरीष महाराज पर भी कृपा की और हम पर कृपा नहीं करेंगे? भगवान तो पूर्ण वस्तु है। उनको कोई रिश्वत नहीं दे सकता। इस संसार के किसी जज को रिश्वत देकर तुम अपने पक्ष में कर सकते हो क्योंकि जगत के साधारण व्यक्ति के पास किसी वस्तु का अभाव हो सकता है किन्तु भगवान के पास किसी चीज का अभाव नहीं है। वे पूर्ण वस्तु है । जो तुम दे रहे हो वह भी भगवान का ही है।
तुम क्या दे सकते हो भगवान् को? भगवान के किसी वस्तु का अभाव हो सकता है? जो तुम दोगे वह भी भगवान् के अन्दर ही है, भगवान् से बाहर कुछ हो सकता है? कहने का भाव यह है कि यदि भगवान में किसी चीज का अभाव है तो भगवान, भगवान नहीं रह सकते। भगवान पूर्ण वस्तु है, असीम । उनसे बाहर कुछ नहीं है। तुम हृदय से बोलो, व्यर्थ में भगवान को दोष मत दो।
अभी देखिए, रोने मात्र से अथवा नेत्रों से अश्रु गिरने मात्र से ही भगवान् से प्रेम हो गया, ऐसा नहीं बोला जा सकता।इस सम्बन्ध में एक घटना मुझे स्मरण हो रही है, मैं मेदिनीपुर मठ में गया था वहाँ पर गिरी महाराज, आश्रम महाराज, कृष्ण केशव प्रभु सब थे। यायावर महाराज बहुत अच्छा नृत्य-कीर्तन करते थे। मेदिनीपुर मठ में श्री गुरु गौरांग राधा गोविंद जी के विग्रह हैं, अभी वहाँ एक माता जी मंदिर में आकर बहुत रोने लगे और हम सब ये देखकर आश्चर्य-चकित हो गएँ। हमने सोचा अरे! यह माताजी तो बहुत बड़ी उच्च कोटि की भक्त है। हम लोगों की आंखों से तो भगवान के लिए एक बूंद पानी भी नहीं आता। हमने उनको समझाने का प्रयास किया कि भगवान् आप पर अवश्य ही कृपा करेंगे, चिंता की कोई बात नहीं है, आप रोइए नहीं। बहुत पूछने के बाद माताजी ने कहा आपका यहाँ पर जो पुजारी पूजा करते हैं उनकी दाढ़ी जब हिलती है तो मुझे मेरे घर में एक बकरी थी, उसका स्मरण होता है। उस बकरी की भी ऐसी ही दाढ़ी थी किन्तु वह मर गई, इसलिए मुझे बहुत विरह हो रहा है। पुजारी की दाढ़ी देखकर मुझे उसका स्मरण होता है इसलिए मैं रोती हूँ। यह भगवान के लिए रोना है? हम लोगों का रोना भी इसी प्रकार का है। जब हृदय से रोएंगे तो कृपा मिलेगी।
हृदय से कामनायें दूर होंगी तब हम भगवान् के लिए रोएंगे, और उन कामना, वासना को हृदय से हटाने के लिए कलियुग में साधुसंग में कृष्ण नाम को छोड़कर और कोई सहारा नहीं है।
साधुसंगे कृष्णनाम इए मात्र चाइ
संसार जिनिते आर कोन वस्तु नाइ।।
‘फलेन फल कारण अनुमियते’—फलके द्वारा फलके कारण का अनुमान लगाया जा सकता है। यदि भजन करने से भी उसका वास्तविक फल प्राप्त नहीं नहीं हो रहा है, तो हमारे कार्य में कुछ गड़बड़ है क्योंकि शास्त्र की बात झूठ नहीं हो सकती, हम में ही शरणागति का अभाव है। तदीयत्व बोध (मैं उनका हूँ, यह भाव)का अभाव है। हम जो कर रहे हैं वह विष्णु के लिए नहीं हो रहा है। वेद व्यास मुनि ने बहुत शास्त्र लिखे किन्तु उनको भी शांति नहीं मिली। तुम लोग क्या शास्त्र लिखोगे? कोई साधारण व्यक्ति वेद व्यास मुनि के जैसा कार्य कर सकता है? नहीं कर सकता। अपना जीवन देकर उन्होंने शिक्षा दी। उन्होंने वेद विभाग किया, हम कर सकते हैं? वेदांत लिखें, 18 पुराण लिखें, महाभारत लिखा, गीता लिखी, संसार का कोई व्यक्ति कर सकता है? इतना करने के बाद भी उनके हृदय में शांति नहीं है। उन्होंने इस प्रकार की लीला करके हमको शिक्षा दी। नारद गोस्वामी उनका गुरु है, उन्होंने नारद मुनि को स्मरण किया और वे आएँ।
नारद गोस्वामी ने उनको कहा, “तुमने ऐसा क्या कार्य किया जो तुम्हें शांति प्राप्त हो?”
“मैंने धर्म-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, काम-शास्त्र इत्यादि की रचना की।”
“यह तो तुमने नाशवान वस्तु के लिए व्यवस्था दी।’
“मैंने मुक्ति के लिए भी शास्त्र कि रचना की।”
“यह तो तुमने और भी अधिक घृणित कार्य कर दिया।, तुमने जीवों के लिए कृष्ण-भक्ति, प्रेम भक्ति प्राप्त करने का मार्ग एकदम ही बंद कर दिया, यह तो तुमने जीवों प्रति और भी अधिक हिंसा का कार्य किया। तुमने कृष्ण की महिमा का कीर्तन नहीं किया।”
“मैंने महाभारत अंतर्गत गीता में कृष्ण का महात्मय बताया।”
“नहीं, उससे होगा नहीं क्योंकि वहाँ उद्देश्य कृष्ण प्रीति नहीं है, वह मुक्ति का प्रकरण के अंतर्गत है। कृष्ण-प्रीति छोड़कर अन्य कोई उद्देश्य रहने से भगवान की प्राप्ति होगी नहीं। Absolute is for itself and by itself. (हम लोग ‘It god’ नहीं कहते, भगवान के लिए), Absolute is for Himself and by Himself. भगवान अपने लिए हैं और बाकी समग्र कुछ उनके लिए है। किसी के लिए नहीं है।
आज वराह देव का आविर्भाव है। वे भगवान् के लीला अवतार में से एक है। जयदेव गोस्वामी लिखा दशावतार स्तोत्र में, भगवान् के दस अवतारों के विषय में लिखा। वैसे भगवान एक ही है भगवान कोई तीन चार नहीं है। किन्तु जिस प्रकार पुत्र के ऊपर पिता का स्नेह है रहता है, पुत्र बड़ा foot ball प्लेयर बन जाए, पुत्र बड़ा मैजिस्ट्रेट बन जाए तो पिता गर्व करते है, वे कहते रहते हैं, मेरा पुत्र यह है, मेरे पुत्र ने यह काम किया, इसी प्रकार से जयदेव गोस्वामी है तो कृष्ण भक्त किन्तु उन्होंने भगवान् के विभिन्न अवतारों का महिमा गान किया,
केशव धृत मीन शरीर, जय जगदीश हरे।
केशव धृत शूकर रूप, जय जगदीश हरे।
भक्तों के लिए वराह देव भगवान का आविर्भाव होता है। भगवान् ने ब्रह्माजी को सृष्टि वर्धन करने के लिए आदेश दिया। ब्रह्मा ने अपने शरीर से एक पुरुष और एक स्त्री को सृष्टि किया। पुरुष स्वयंभू मनु और स्त्री सतरूपा। भगवान की आज्ञा थी कि सृष्टि करके उसका वर्धन करना होगा इसलिए ब्रह्मा ने स्वयंभू मनु का शतरूपा से विवाह करवाया। अभी स्वयंभू मनु कहते हैं आपकी आज्ञा है सृष्टि का वर्धन करने के लिए किन्तु पृथ्वी तो रसातल में चली गई है, जल के अन्दर डूब गई है तो सृष्टि करने के बाद सब प्राणी कहाँ रहेंगे? आप पृथ्वी के उद्धार की व्यवस्था कीजिये। ब्रह्माजी सोच में पड़ गए, मैंने तो बहुत समय पहले ही सब जल दूर करके पृथ्वी को स्थापित किया था, पुनः पृथ्वी जल में कैसे चली गई? अभी भी ३ भाग में से २ भाग तो जल ही है। बहुत सोच-विचार करने पर भी ब्रह्माजी इसका तो कोई उपाय नहीं मिला। तब उन्होंने अपने इष्ट देव विष्णु का चिंतन किया, उनसे प्रार्थना कि कि आप मुझे सृष्टि वर्धन करने की आज्ञा दि, आपकी आज्ञा पालन करना मेरा कर्तव्य है किन्तु मेरी मुश्किल यही है कि धरती रसातल में चला गई। जब निष्कपट रूप से कोई सेवा करने की इच्छा करते हैं, ध्यान करते हैं कृपा प्रार्थना करते हैंतो भगवान् इच्छा पूर्ण करते हैं, उस समय तपस्या करना कठिन नहीं था। अब तपस्या कठिन है।ब्रह्मा जी एकदम तपस्या में निमग्न हो गए। भगवान ने उनकी इच्छा जान ली और वे एक अंगूठे के परिमाण के शूकर रूप से उनके नाक से आविर्भूत हुए। नाक से निकलने के साथ-साथ ही वे हाथी के समान विशाल हो गए और वे आकाश में घूम रहे हैं, कोई साधारण शूकर आकाश में कोई घूम सकता है?
किन्तु भगवान तो सर्वशक्तिमान है सब देखते हैं। सब देखकर आश्चर्य -चक्ति हो गएँ, ये कैसा शूकर है? ऐसा तो कभी देखा नहीं। क्या कोई देवता है या स्वयं श्री हरी तो नहीं है? मुनि, ऋषि लोग, जन लोक, सत् लोक, मह: लोक, सब लोक के वासी आश्चर्य से देख रहे हैं। यह कौन एसे घूम रहा है? यह कौन है जिसे देखने से आकर्षण हो रहा है। भगवान को देखने से तो आकर्षण होता ही है। तभी अचानक शूकर रूप भगवान ने गर्जन किया। गर्जन भी ऐसा है जिससे चारों ओर मंगल का विस्तार हो रहा है। भगवान के मुख से गर्जन निकल रहा है ना ।गर्जन सुनकर अब को ज्ञात हुआ कि ये तो हमारे इष्टदेव ही हैं, सब स्तव करने लगे।
अभी ब्रह्माजी का इच्छा पूर्ण करनी है। बादल को पैर से धक्का मारने लगे। धक्का मारते-मारते एकदम जल के अन्दर कूद गएँ। जब जल में गिरे तो समुद्र को एकदम भयभीत हो गया, समुद्र को चीरते हुए वे भीतर में जा रहे हैं।जाते-जाते रसातल में पृथ्वी के पास पहुँच गएँ और पृथ्वी को अपने दांत पर उठा लिया। जैसे अभी आप लोगों ने जयदेव गोस्वामी के कीर्तन में वर्णन सुना।
अभी हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष जो पूर्व जन्म में जय- विजय है। Twin brothers. हिरण्यकशिपु का थोड़ा ऐसा nature है उसको बड़ा मानते है और हिरण्याक्ष को छोटा, किन्तु दोनों जुड़वा है। ये कश्यप ऋषि और दिति के पुत्र हैं। दिति ने अपने पति से पुत्र प्राप्ति के लिए संग करने की कामना की किन्तु वह संध्या का समय था कश्यप ऋषि ने कहा अभी समय ठीक नहीं है, किन्तु दिति द्वारा बार-बार कहने पर कश्यप ऋषि ने उनकी इच्छा पूरी की और तब इन दो असुरों ने जन्म लिया (हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष) ये पुत्र महा असुर हुए। बाद में दिति को पश्चाताप हुआ, क्षमा मांगी, कश्यप ऋषि कहा चिंता की बात नहीं है। यह तो भगवान की ही पहले की व्यवस्था है। जय-विजय, हिरण्यकशिपु – हिरण्याक्ष है। इसके पीछे कोई कारण है किन्तु कश्यप ऋषि दिति को बताया नहीं। कश्यप ऋषि ने कहा इनका जो पुत्र होगा वह भक्त होगा—प्रहलाद। महाभागवत होगा।
दिति अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि मैं चाहती हूँ कि मेरे दोनों पुत्रों का निधन भगवान के हाथों से हो। तब कश्यप कहते हैं—ठीक है, ऐसा ही होगा।
भगवान हैं-हतारी-सुगति-दायक। भगवान अपने भक्तों के साथ ही लड़ाई करते हैं। बाहर के व्यक्ति से क्या लड़ाई होगी? भगवान के साथ लड़ने वाला भगवान के समान तो होना चाहिए न! वीर रस आस्वादन करने के लिए भगवान यह सब लीला करते हैं।
चतुःसन बहुत प्राचीन हैं किन्तु दिखने में छोटे बच्चे के समान हैं तथा नंगे (निर्वस्त्र) होकर विचरण करते हैं। एक बार भ्रमण करते-करते वे वैकुण्ठ पहुंच गए और द्वारपालों, जय और विजय से कहने लगे कि हम अन्दर जाना चाहते हैं। किन्तु द्वारपाल उन्हें अन्दर जाने से मना कर देते हैं। यद्यपि उन्होंने बार-बार अन्दर जाने का प्रयास किया किन्तु जय-विजय ने उन्हें अन्दर जाने नहीं दिया। इससे उन चारों कुमारों को गुस्सा आ गया और द्वारपालों को अभिशाप देते हुए कहा, “आप दोनों का यहाँ रहना उचित नहीं है। इसलिए हम श्राप देते हैं कि आपका यहाँ से पतन हो जाए।” कृष्ण की इच्छा से ही उन्होंने यह श्राप दिया।
अब जय और विजय ने रोना शुरू कर दिया क्योंकि उनका पतन हो रहा है। तब दयावश चतुःसन उनसे बोलते हैं कि तीन राक्षस जन्म के बाद तुम्हें इस श्राप से मुक्ति मिलेगी। इस प्रकार उन्होंने सत्युग में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, त्रेतायुग में रावण और कुंभकरण तथा द्वापरयुग में शिशुपाल और दंतवक्र रूप से असुर योनि में जन्म ग्रहण किया। वे कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं।
कश्यप ऋषि ने तब बोल दिया कि हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की मृत्यु श्रीहरि द्वारा ही होगी। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष छठे मन्वंतर में आए। स्वयंभू मनु, जो कि आदि(प्रथम) मनु हैं और उनकी पत्नी सतरूपा को तो उस समय कोई पुत्र कन्या हुई ही नहीं थी, पृथ्वी रसातल में थी तो सृष्टि का वर्धन आरंभ ही नहीं हुआ था, जब उनके समय में वराहदेव प्रकट हुए थे। तो फिर हिरण्याक्ष का जन्म स्वयम्भू-मन्वन्तर में कैसे हो सकता है?
मैत्रेय ऋषि ने देवल ऋषि के पास इसका वर्णन किया। लघुभागवतामृत में ऐसा लिखा है कि वराह भगवान ब्रह्माजी के एक दिन में दो बार आते हैं। स्वयम्भू-मन्वन्तर के समय वे ब्रह्माजी की नासिका से प्रकट होकर पृथ्वी का उद्धार करने आए। षष्ठम मन्वंतर(चक्षुष् मन्वन्तर) में हिरण्याक्ष वध और पृथ्वी उद्धार एक साथ में हुआ। लघु भागवतामृत के अनुसार प्रचेता का पुत्र था दक्ष और उनकी कन्या थी दिति और दिति के पुत्र थे—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। देवता की माता है, अदिति।
हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के आने के साथ-साथ सब अशुभ घटनाएँ होने लगीं। सब देवता भयभीत हो गएँ। बाद में देवताओं को ज्ञात हुआ कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष ने दिति से जन्म लिया। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु महाबलशाली थे। हिरण्याक्ष इतना शक्तिशाली था कि उसे अपने समान शक्तिशाली कोई दिखाई ही नहीं देता था। वरुणदेव इत्यादि सब उससे भयभीत होकर उसके साथ मल्ल-युध्ध करने से माना कर देते थे। तब उसने विष्णु के पास गया और उनको बहुत गालियाँ देने लगा, “यह कैसा पहलवान है, यह तो सूअर है। इसके साथ क्या लड़ाई करूँगा?” तब दोनों ने गदा लेकर लड़ना आरंभ कर दिया। वराहदेव के हाथ नहीं हैं, तो उन्होंने आगे वाले पैरों से गदा पकड़कर लड़ना आरंभ कर दिया। हिरण्याक्ष ने बहुत प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया किन्तु भगवान् के लिए तो ये फुल के जैसे हल्का है, बाद में उसने अपनी माया का विस्तार किया। बहुत प्रकार के राक्षस-राक्षसी प्रकट हो गए और ‘मार! मार! काट! काट!’—ऐसे कहने लगे।
जब उसने देखा कि इन सब से भी कुछ नहीं हुआ तो उसने अपनी माया का प्रयोग किया और दूर से भगवान पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए। तब भगवान ने सुदर्शन चक्र को बुलाया। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से उसकी सम्पूर्ण माया को समाप्त कर दिया, सुदर्शन के आगमन से सब कुदर्शन समाप्त हो जाएगा। तब हिरण्याक्ष ने भगवान पर अपनी गदा से आघात किया। भगवान से उनकी गदा भूमि पर गिर गई। यह देखकर सभी देवता घबरा गए। जब हिरण्याक्ष ने भगवान पर अपनी गदा से प्रहार किया तो उन्हें लगा मानो किसी फूल ने स्पर्श किया हो।
तब भगवान ने अपने सामने के दो पैरों से उसके कान में ज़ोर से धक्का मारा। हिरण्याक्ष का सिर घूमने लगा और घूमते-घूमते वह उल्टी करने लगा और उसका वध हो गया।
सभी देवता लोग कहते हैं कि हिरण्याक्ष का अहो भाग, अहो भाग, जो उसे भगवान के पादपद्मों का स्पर्श मिला और भगवान का पादपद्म का स्पर्श से उसका सुगति होगा। ऐसा सौभाग्य किसका होगा? शुकदेव गोस्वामी ने भागवत में इसका वर्णन किया। देखने में पैर से मार दिया किन्तु भगवान के पैर से स्पर्श होने से देखने में लगता है कि वह मर गया किन्तु भगवान् के हाथ से मरता नहीं, उसकी सद्गति होती है।
उन्हीं वराह देव की आज आविर्भाव तिथि है। नवद्वीप धाम के कोलद्वीप में वराह देव के एक उपासक थे। भगवान ने पहले उनको वराह रूप से दर्शन दिए और उसके बाद अपना गौरांग रूप दिखाया कि जब मैं मायापुर में प्रकट हो जाऊंगा, तुम यहां पर जन्म ग्रहण करोगे। देवानंद गौड़ीय मठ, कोलद्वीप में वराहमूर्ति स्थापित की गई है। कोल अर्थात् वराह।
अभी हम लोग कहते हैं कि हम कृष्ण भक्त हैं, कृष्ण भक्ति छोड़कर कुछ नहीं करेंगे। किन्तु क्या हमें कृष्ण भक्ति का आस्वादन हुआ? हम लोगों का कौन से भगवान का आस्वादन हुआ? जब हम किसी भी भगवान के पास जाएँगे, तब वहीं रह जाएंगे और इधर-उधर नहीं जा सकेंगे। अभी तो बहुत कुछ बोल रहे हैं। बहुत सिद्धांत दिखा रहे हैं किन्तु मत्स्य भगवान को देखा नहीं, वराह को देखा नहीं, कूर्म को देखा नहीं। श्रील भक्ति ठाकुर जी ने श्रील प्रभुपाद को कूर्म विग्रह की पूजा में नियुक्त किया, जो विग्रह उन्हें भक्ति भवन की भित्ति खोदते समय मिला था।
तत्व में तो एक ही हैं, केवल लीला में अंतर है, रस में अंतर है। यदि किसी को किसी एक अवतार के कोई रस का ज़रा सा भी आस्वादन हो जाए तो उसका संसार बन्धन शेष हो जाएगा। उस रस को कोई छोड़ नहीं सकता। यह केवल गोपियाँ ही कर सकती हैं क्योंकि उन्होंने कृष्ण का माधुर्य आस्वादन किया है। जब उन्होंने कृष्ण के साथ रास लीला की और उसके बाद कृष्ण ने रास लीला से अंतर्धान किया, तब गोपियाँ कृष्ण विरह से व्याकुल होकर रोने लगीं। ‘कृष्ण-कृष्ण’ कहने लगीं। तब पैठा धाम नामक स्थान पर कृष्ण, नारायण रूप से उनके सामने प्रकट हो गए। तब उन्होंने कहा कि हमें नारायण की आवश्यकता नहीं। किन्तु हम लोग नहीं बोल सकते कि मुझे नारायण की आवश्यकता नहीं। इतना सस्ता (आसान) नहीं है।
नारायण को जब देखेंगे तो जिस प्रकार चतुःसन ने ब्रह्मानन्द छोड़ दिया, हम भी नारायण का रूप देखकर कहेंगे कि अब सब प्राप्त हो गया। तब फिर कृष्ण के पास जाना नहीं होगा। गोपियों ने माधुर्य रस का आस्वादन है इसलिए वे यह कह सकती हैं। जब राधा रानी वहां आईं, तब कृष्ण की इतनी चालाकी भी नहीं चली क्योंकि राधा रानी का प्रेम शतकोटि गोपियों से भी अधिक है। उस प्रेम के प्रभाव से दो भुजाएं अंदर चली गईं। गोपियों को तो धोखा दे दिया किन्तु राधा रानी को धोखा नहीं दे पाए।
जो गौरांग महाप्रभु के साथ प्रेम वितरण करने के लिए आए नित्यानंद प्रभु, वे बलदेव के अभिन्न स्वरूप हैं—नित्यानंद प्रभु की कल प्रकट तिथि है। बलदेव, नित्यानन्द रूप से और नन्दनन्दन कृष्ण, गौरांग रूप से आए। एकचक्र धाम में श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु का आविर्भाव हुआ।
उनका मिलन कैसे हुआ? नित्यानंद प्रभु का आविर्भाव एकचक्र धाम में हुआ और वे कृष्ण से मिलने के लिए वृंदावन गए। वृंदावन में ढूंढ-ढूंढ कर कोई जगह में कृष्ण नहीं मिले, तब सब से पूछा हमारा छोटा भाई कहाँ है? व्रज लीला में कृष्ण छोटा भाई है। सब ने कहा, यहाँ पर नहीं है। यहाँ नहीं है तो कहाँ है? वे नवद्वीप में चले गए तब नित्यानन्द प्रभु, नवद्वीप में आए। आकर उन्होंने महाप्रभु के आविर्भाव के बारे में सुना। मैं इतना कष्ट किया, मेरा भाई मुझे भूल गया, मैं छुप कर रहूँगा यह सोचकर वे नंदन आचार्य भवन में छूप कर रहे। अंत में महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर और श्रीवास पण्डित को भेजा किन्तु उनको वे नहीं मिले। महाप्रभु स्वयं उनको ढूंढने के लिए नंदनाचार्य भवन में गए। वहाँ पर कृष्ण-बलराम का मिलन हुआ। बलदेव- नित्यानंद प्रभु रो रहे हैं। जो कृष्ण लीला में बलदेव है वही नित्यानन्द प्रभु है। नंद नंदन कृष्ण है—गौरांग महाप्रभु । इस विषय में हम कल चिंतन करेंगे।