श्री रामानुजाचार्य जी का आविर्भाव चैत्र शुक्ल पंचमी तिथि में है।श्रीचैतन्य महाप्रभु को छोड़कर अन्य जितने भी प्रमुख वैष्णव आचार्य हैं, सबका आविर्भाव दक्षिण भारत में हुआ।असम में भी वैष्णवों का आविर्भाव हुआ है किन्तु यहाँ अधिक प्रचार नहीं है।असम में शंकरदेव, माधवदेव, दामोदरदेव, हरिदेव आदि वैष्णव हुए किन्तु उन्होंने आसाम में रहकर ही भागवत धर्म प्रचार किया जबकि श्रीचैतन्य महाप्रभु उत्तर भारत में प्रसिद्ध हुए, वे वृन्दावन आये, उन्होंने दक्षिण भारत में और भारत के विभिन्न स्थानों में प्रचार किया। शंकराचार्य और बाकि सभी आचार्यों का आविर्भाव दक्षिण भारत में हुआ है।
श्रीरामानुजाचार्य जी का आविर्भाव दक्षिण भारत में मद्रास से प्रायः 13 क्रोश (26 मील) दूर पश्चिम दिशा में श्रीपेरेम्बदुर ग्राम में हुआ था। श्रीकेशवाचार्य दीक्षित, विशेष वैष्णव ब्राह्मण और श्री संप्रदाय के प्रधान आचार्य यमुनाचार्य के शिष्य श्रीशैलपूर्ण की छोटी बहन कान्तिमती को अवलम्बन करके रामानुजाचार्य आविर्भूत हुये।। श्रीरामानुजाचार्य जी के बचपन का नाम श्रीलक्ष्मण दीक्षित था, जब शैलपूर्ण पुत्र के दर्शन करने के लिए आए तब उन्होंने उनमें असाधारण महापुरुषोचित लक्षण देखे। पुत्र का दर्शन कर सब आनन्दित हो गये।
ऐसा वहाँ का विचार है कि लक्ष्मण ही श्रीरामानुजाचार्य के रूप में प्रकट हुए हैं, बाद मे उनका नाम रामानुजाचार्य (राम का अनुज) हुआ ।
अपने पिता केशवाचार्य दिक्षित के निर्देश अनुसार उन्होंने 16 वर्ष की आयु मे विवाह किया किन्तु वे भगवत भजन में ही निमग्न थे। उन्होंने ने ऐसी आलौकिक शक्ति दिखाई जो साधारण व्यक्ति मे देखि नहीं जाती। उनका एक शिष्य था कुरैश, वह अत्यंत गुरु-भक्ति परायण था। वेदांत का भाष्य लिखने की इच्छा से रामानुजाचार्य ‘बोधायन वृत्ति’ लाने के लिए अपने शिष्य कुरैश के साथ कश्मीर के शारदा पीठ गए थे। ‘बोधायन वृत्ति’ भाष्य को बोधायन ऋषि ने लिखा है, इस भाष्य में वेदव्यास ऋषि की उत्तर-मीमांसा और जैमिनी मुनि की पूर्व-मीमांसा एकत्रित है। शंकराचार्य के विचार से वेदव्यास ऋषि की उत्तर-मीमांसा और जैमिनी मुनि की पूर्व-मीमांसा दोनों अलग शास्त्र है और रामानुजाचार्य के विचार से ये दोनों मिलकर एक ही शास्त्र है। जब कर्म और कर्म-फल मे निर्भेद आता है, अर्थात् ब्रह्म जिज्ञासा वहाँ उत्तर-मीमांसा समाप्त होता है, दोनों एक ही शास्त्र है।
शारदा पीठ जाकर उन्होंने शारदा देवी से और वहाँ पर केवलाद्वैत-वाद को मानने वाले लोगों से ‘बोधायन वृत्ति’ देने के लिए प्रार्थना की, किन्तु उन लोगों ने देने से मना कर दिया। तब शारदा देवी की कृपा से रामानुजाचार्य को ‘बोधायन वृत्ति’ मिल गयी और वे उसे लेकर वहाँ से निकल गए। कुछ दिन बाद में जब उन लोगों को पता चला कि रामानुजाचार्य ‘बोधायन वृत्ति’ ले गये हैं और अब वे मायावाद विचार का खण्डन करेंगे, इसलिए ‘बोधायन वृत्ति’ को वापिस लाने के लिए उनके पीछे चल पड़े, एक महीने बाद रामानुजाचार्य से मिले और उनसे ‘बोधायन वृत्ति’ को बलपूर्वक छीन कर ले गए।किन्तु कुरैश की इतनी स्मरण शक्ति थी की उसने एक महीने मे सम्पूर्ण ‘बोधायन वृत्ति’ को स्मरण कर लिया – ऐसा कोई साधारण व्यक्ति कर सकता है? जैसे आजकल हम सबकुछ कंप्यूटर मे संग्रह कर के रखते हैं उसी प्रकार उन्होंने अपने हृदय में उसे संग्रह कर लिया था और वही बोधायन वृत्ति को अवलंबन करके रामानुजाचार्य ने विशिष्ट-अद्वैत – वाद सिद्धान्त की स्थापन की । श्री रामानुज सम्प्रदाय चार मुख्य वैष्णव सम्प्रदाय मे से एक है। पद्मपुराण मे लिखा है –
सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते विफल मताः
अथौ कलौ भविष्यन्ति चत्वरासम्प्रदयायेन
श्री, ब्रह्म, रूद्र सनक वैष्णवा क्षितिपावना।
(पद्मपुराण)
सम्प्रदाय का अर्थ संकीर्णता नहीं है, हम लोग उसको संकीर्णता रूप से व्यव्हार करते हैं। सम्प्रदाय का अर्थ क्या है? जिस धारा से ज्ञान सम्यक रूप से प्रदत्त हुआ है, जिस धारा में जो ज्ञान संरक्षित है, और भगवान से आई हुई जो गुरु परम्परा है, उसको ही सम्प्रदाय कहते है।साधारण लोग सम्प्रदाय को संकीर्णता समझते हैं किन्तु ये prostitution of language है। गंगा की धारा से जो धारा से आई है, उस धारा में डूबकी लगाने से गंगा स्नान होगा। अन्य किसी नदी की धारा में डूबकी लगाने से वह गंगा स्नान नहीं होगा। इसी प्रकार भागवत ज्ञान की धारा है और वह धारा भगवान से आती है। इसलिए सम्प्रदाय के बिना लिया हुआ मंत्र निष्फल है, इसप्रकार से कोटि काल तक साधन करने पर भी फल नहीं मिलेगा।
इसी संदर्भ मे श्रोति महाराज ने एक उदाहरण दिया है—व्रज मण्डल परिक्रमा करते समय नन्द-घाट में एक ब्रह्मचारी को कुत्ते ने काट लिया, अभी उसे इंजेक्शन दिलाने मथुरा ले जाना होगा। वह ब्रह्मचारी और जो उसे ले जाएगा, दोनों का मन उदास हो गया क्योंकि उनकी कुछ दिन की परिक्रमा छूट जाएगी। उस समय कहीं से उन्हें पता चला की श्रोति महाराज कुत्ते का विष निकालने का मंत्र जानते है, उन्होंने ये शिक्षा मठ में आने से पहले प्राप्त की थी।
सब लोग उनसे प्रार्थना करने लगे, “आपकी इस योग्यता को आप वैष्णव के उपकार में लगाकर उन दोनों पर कृपा करें नहीं तो उनकी परिक्रमा छूट जाएगी।”
महाराज ने कहा, “मैं ये सब अभी नहीं करता, मठ में आने से पहले करता था। अभी हमें कृष्ण मंत्र जप करना चाहिए, ये सब मंत्र नहीं।
वे लोग महाराज से प्रार्थना करते रहें, “हम लोगों के उपकार के लिए आप कृपा करें, नहीं तो हम 3-4 लोगों की परिक्रमा छूट जाएगी।”
बहुत प्रार्थना करने के बाद वे मान गए।उन्होंने प्लैंकिंग (लम्बा लकड़ी का टुकड़ा), मिट्टी का घड़ा और रेत लाने के लिए कहा। ये सब हमने पहले सुना था—जिनको कुत्ते ने काटा है— उनको ऊपर उठा दिया, मंत्र जप करते हुए रेत को उड़ाते हैं और बिना किसी यन्त्र के मट्टी का घड़ा अपने आप घूमने लगा। विज्ञान क्या बोलेगा? विज्ञान तो विश्वास नहीं करेगा। डेढ़-दो घण्टे तक ये सब करने के बाद, महाराज ने कहा विष निकल गया और वह ब्रह्मचारी ठीक हो गया। सब उनको घेराव करके उन्हें यह शिक्षा को देने के लिए प्रार्थना करने लगे, तब श्रोति महाराज ने कहा, “देखो, ये शिक्षा ऐसे प्राप्त नहीं होती है और ये शिक्षा की तुम लोगों को आवश्यकता भी नहीं है। ये सांसारिक लाभ के लिए है, इससे भगवान की प्राप्ति और नित्य फल नहीं मिलेगा। कुत्ते के विष को निकालने की शिक्षा में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। ये मैंने मठ में आने से पहले किया था और इसको करने के लिए गुरु परम्परा है। उस गुरु परम्परा मे जाना पड़ेगा, तपस्या करनी पड़ेगी, मंत्र पर विश्वास कर गुरु परंपरा को स्वीकार करते हुए मंत्र करने से जब वह मंत्र आपके गुरु से उनके गुरु, उनके गुरु से उनके गुरु उस प्रकार मंत्र सिद्ध पुरुष के पास जाएगा तब उसका फल होगा, केवल मात्र मेरे द्वारा आपको मंत्र बोल देने से वह फलदायी नहीं होगा। उस समय मैंने गुरु परंपरा के अनुगत में तप किया था, किन्तु अब हमें इन सबकी आवश्यकता नहीं है। अभी हमने कृष्ण मंत्र लिया है, इसके लिए तप करो, ये समस्त प्रकार की बीमारी की औषधि है। किसी सांसारिक लाभ के लिए हमें समय नष्ट नहीं करना चाहिए, नहीं तो mental diversion हो जायेगा। ये हमारे लिए ठीक नहीं है और उससे आत्यंतिक मंगल नहीं होगा।
साँप को वशीभूत करने वाला सपेरा भी मंत्र उच्चारण करता है और कभी-कभी मंत्र उच्चारण में उनसे भी भूल होती है। मंत्र उच्चारण में भूल होने पर भी उन्हें फल प्राप्त होता है, क्यों? क्योंकि वे लोग गुरु परम्परा में अनुगत है। जब कोई व्यक्ति गुरु परम्परा में अनुगत हुए बिना मंत्र का सही उच्चारण करेगा तो भी उसे फल प्राप्त नहीं होगा।यथार्थ रूप से मंत्र के उच्चारण से साँप को पकड़ तो लेगा, किन्तु उसके काटने से मर जायेगा। किन्तु जिनका परंपरा में आनुगत्य है, उनके साथ एसा नहीं होगा। इसी प्रकार कृष्ण मंत्र भी परम्परा में आ रहा है – श्री,ब्रह्म, रूद्र और सनक (चतुसन) ये चार मुख्य वैष्णव सम्प्रदाय है।
प्रमेय रत्नावली में इस चार सम्प्रदायों के मध्य – युग के आचार्यों के नाम लिखे हैं – श्री सम्प्रदाय के रामानुजाचार्य, ब्रह्म सम्प्रदाय के मध्वचार्य, रुद्र सम्प्रदाय के विष्णुस्वामी और चतुसन सम्प्रदाय के निंबार्क आचार्य । यह चार सम्प्रदायों से मंत्र आ रहा है, वहांँ से मंत्र लेना पड़ता है। इधर – उधर से लेने से लाभ नहीं होगा। हमारा ब्रह्म – मध्व -गोड़िय सम्प्रदाय है। चैतन्य महाप्रभु से भी एक नया सम्प्रदाय आ सकता था, किन्तु शास्त्र को मर्यादा देने के लिए मध्व सम्प्रदय के ईश्वरपूरी पाद से उन्होंने मंत्र लिया। कृष्ण ने भी मंत्र लिया संदीपनी मुनि से और राम जी ने भी लिया वशिष्ठ मुनि से। भगवान् तो सब के गुरु है, इनको किसी से मंत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। उनसे भी परम्परा आ सकती है किन्तु यदि वे गुरु-परंपरा में आश्रय नहीं करेंगे तो साधारण लोग भी ऐसा नहीं करेंगे इसलिए उन्होंने साधारण लोगों को शिक्षा देने के लिए उन्होंने गुरु से मंत्र ग्रहण किया।
उस समय दक्षिण भारत मे शैव, जो शिव के उपासक है वे लोग वैष्णवों का विरोध करते थे। शैव राजा कुलोत्तुंग ने देखा रामानुजाचार्य का प्रभाव बहुत बढ़ रहा है तो रामानुजाचार्य को अँधा करने के उद्देश्य से उनको अपने पास बुलाया। जब कुरैश को इस बात का पता चला, तब उसने अपने गुरूजी की रक्षा के लिए रामानुजाचार्य के वेश में वहाँ गया। वहाँ पर ये लोग विचार करने लगे विष्णु बड़ा है या शिव? कुरैश ने बताया – शिव से काक बड़ा है। काक के दो अर्थ है – ये एक प्रकार का माप (measurement) होता है और कौआ भी होता है। ये सुनकर राजा क्रोधित हो गया और उसने कुरैश की आँख नष्ट करवा दी। अपने गुरु की सेवा करने के लिए स्वयं मुसीबत ले लिया, किन्तु वरदराज जी की कृपा से उनको दिव्य नेत्र मिल गए।
रामानुजाचार्य ने यादवप्रकाश के पास वेदांत और शास्त्र अध्ययन किया, यादवप्रकाश मायावादी साम्प्रदाय को मानते थे, जहाँ पर ‘सो अहम्’ और ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ कहा जाता है। रामानुज सेवा भाव से यादवप्रकाश के पास आये और उनकी विभिन्न प्रकार से सेवा करते थे और उस समय उनमें बहुत से विषयों पर आलोचना होती थी, उन विषयों मे एक था—तैतिरीय उपनिषद का वाकय ‘सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म’—यादवप्रकाश उसकी व्याख्या करते हुए कहने लगे ये ठीक नहीं है, जैसे एक गाय है—उसका शिंग है, उसका शिंग टूट गया और उसका शिंग नहीं है, ये तीनों स्थिति एक साथ नहीं हो सकती। इसलिए सत्यं, ज्ञानं और अनन्तं ये तीनों गुण ब्रह्म में एक साथ में नहीं हो सकते, ब्रह्म निर्गुण होता है – तब रामानुजाचार्य कहते जब सत्य नहीं रहेगा तो उनका वास्तविक सत्ता ही नहीं रहेगी, अवास्तव वस्तु हो जाएगा। ब्रह्म ही तो एक मात्र सत्य है—‘ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या’ और ब्रह्म के अस्तित्व को स्वीकार करने से उसके गुणों को स्वीकार करना ही होगा। असत्य और अज्ञान तो जड़ वस्तु है, ब्रह्म तो सत्य है, वह तो अखंण्ड ज्ञान है, असीम है, अनन्त है। निर्गुण बोलने से प्राकृतिक गुण जैसे सत्य, रज और तम गुण है, उससे रहित है—उनको ब्रह्म में आरोपित करना निषेध है, किन्तु ब्रह्म अप्राकृतिक गुणों से संपन्न है। चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव सार्वभौम को समझाया ‘ब्रिहद्वती ब्रिहन्घ इति ब्रह्म’ सब को बनाने वाला और सबको पालन करने वाला ब्रह्म ही है।
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते
येन जातानि जीवन्ति
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति
तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति (तैत्तिरीय उपनिषद 3.1.1)
सब कुछ तो वहाँ से ही आता है, उनसे, उनके द्वारा उनके लिए सब है। वह तो अखंड-ज्ञान मय तत्व है,
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद् भागवतम् 1.2.11)
ब्रह्म तो अखण्ड ज्ञान है, अनन्त है, असीम है – जीव अपने मन, बुद्धि से उनको नहीं जान सकता, रामानुजाचार्य की व्याख्या सुनकर यादवप्रकाश को आश्चर्य हो गया। यह शिष्य कैसा है? और वे रामानुज को कोई उत्तर नहीं दे पाए।
एक बार रामानुजाचार्य अपने गुरु यादवप्रकाश के शरीर पर तेल से मालिश कर रहे थे, उस समय यादवप्रकाश छान्दोग्य उपनिषद मे से एक श्लोक की व्याख्या कर रहे थे, जिसमें भगवान् के सुन्दर नयनों का वर्णन किया गया था – उसमें एक शब्द है ‘कप्यासम’ जो कृष्ण की आँखों के बारे में लिखा है—’पुंडरीक नयन’। उनके गुरु ने ‘कप्यासम’ शब्द की व्याख्या करते समय कृष्ण की आँखों की तुलना वानरों के मल त्यागने वाले अंग से कर दी – वानरों के उस अंग का रंग लाल होता है, भगवान कृष्ण की आँखें भी उसी तरह लाल है, जिससे वो सब देखते है। अपने आराध्य के विषय में ऐसी व्याख्या सुनकर रामानुजाचार्य का मन दु:खी हो गया और वे रोने लगे। गुरु है, उनको कुछ बोल भी सकते। रामानुज रोते हुए सेवा कर रहे है और तब उनके नेत्रों से गरम आंसू यादवप्रकाश के शरीर पर गिरे तो उन्होंने रामानुज से उनके दु:खी होने का कारण पूछा, जिसके उत्तर मे रामानुज ने कहा अपने जो व्याख्या की – वह ठीक नहीं है। ‘क’ शब्द का अर्थ होता है जल, कं पिबति इति कपि: अर्थात् जो जल को पि लेते हैं, शोषण कर लेते हैं वे हैं ‘कपि’ अर्थात् ‘कपि’ शब्द से सूर्य को समझा जाता है।
‘अस्’ धातु का अर्थ होता है, विकसित या प्रस्फुटित होना और पुण्डरीक का अर्थ है कमल का फूल। जब सूर्य का उदय होता है, तब सूर्य के प्रकाश से कमल का फूल खिल जाता है – अर्थात् भगवान् के नेत्र कमल के फूल की भांति परम सुन्दर है। यादवप्रकाश अपने शिष्य रामानुज की व्याख्या सुन कर आश्चर्य-चकित हो गये, सब विचार में वे अपने शिष्य से पराजित हो जाते हैं, किन्तु उन्होंने विचार किया मैं तो गुरु हूँ और वह तो मेरे पास शिक्षा प्राप्त करने आया है। वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने रामानुज का तिरस्कार किया। किन्तु भीतर वे समझ गये कि रामानुज साधारण व्यक्ति नहीं और बाद मे वे उनके शिष्य बन गये।
जैसे महाप्रभु ने श्रीखण्ड वासी, मुकुन्द दास से पूछा तुम पिता हो या रघुनन्दन तुम्हारा पिता है? मुकुन्द दास ने इसके उत्तर में कहा – रघुनन्दन बच्चा है किन्तु वह मेरा पिता है क्योंकि मुझमें भक्ति उसी से आई है। इसी प्रकार यादवप्रकाश को भी ज्ञान हुआ, यद्दपि रामानुज मेरा शिष्य है,किन्तु वह ही मेरा गुरु है और मैं उनका शिष्य हूँ—मैं गुरु नहीं हूँ। तब उनको बहुत आनन्द हुआ। अलौकिक शक्ति के बिना ऐसा होना संभव नहीं है।
उस समय वहाँ के राजा, राजवल्लभ जो जैन धर्म को मानते थे और बहुत से लोग जो बुद्ध धर्म को मानते है वे सभी रामानुजाचार्य के शिष्य बन गए, रामानुजाचार्य 101 वर्ष तक प्रकट थे और श्रीरंगनाथ धाम में ही रहे थे।
श्रीरामानुज सम्प्रदाय में वैष्णव सेवा की अलौकिक महिमा की बहुत कथाएं श्रवण करने को मिलती है, वैष्णव भगवान के बहुत प्रिय होते हैं। वैष्णव सेवा से सब विघ्न दूर हो जाते हैं और भक्ति लाभ होती है। इस सन्दर्भ में बहुत उदाहरण है।
एक बार रामानुजाचार्य प्रचार करने के लिए अपने शिष्यों के साथ एक स्थान पर पहुंचे, वहाँ पर उनके दो शिष्य रहते थे —जिनमें एक बहुत धनी है और दूसरा दरिद्र। रामानुज अपने शिष्यों के साथ पहले धनी शिष्य के पास गये। जब उसने गुरुदेव को बहुत शिष्यों के साथ आते हुए दूर से देखा तो वह भय से घर के अन्दर चला और फिर बाहर आया ही नहीं। रामानुजाचार्य समझ गये – “इतने वैष्णव को देखकर वह डर गया और वैष्णव सेवा करने का उनका प्रवृत्ति नहीं है, इसलिए यहाँ पर रहने की आवश्यकता नहीं है।”
उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “हम लोग दूसरे शिष्य के पास जायेंगे। वह गरीब है, किन्तु वैष्णव है। उनके पास जाकर हम कुछ देर विश्राम कर के वापिस चले जायेंगे। यहाँ आपलोगों को खाने के लिए कुछ नहीं मिलेगा, आज तुम लोगों का उपवास होगा। किन्तु यहाँ नहीं रहेंगे।”
सब लोग दूसरे शिष्य के वहाँ चले गये, उनके शिष्य का नाम वरदार्य था। वहाँ पहुँच कर रामानुज ‘वरदार्य,वरदार्य’ पुकारने लगे, जब उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला तो उन्होंने पूछा, “घर मे कोई है?” जिसके उत्तर में किसी ने तीन ताली बजाकर संकेत दिया, वे सोचने लगे ये ताली का क्या अर्थ है? उस समय उन्होंने बाहर धुप में सुखाया हुआ माताजी का बहुत जगह से सिलाई किया हुआ कपड़ा देखा। ये देख कर रामानुज समझ गये, वरदार्य की पत्नी को पता नहीं हम लोग वहाँ आएँगे और उनके पति भी भिक्षा के लिए गये हैं। उनके पास घर मे एक ही कपडा है, जो उन्होंने स्नान करने के बाद धो कर सुखाया हुआ है और वह बाहर भी नहीं आ सकती। इसलिए उन्होंने तीन ताली बजायी, जिसके गुरुदेव और गुरु भाई वहाँ से चले न जाये। रामानुजाचार्य सब समझ गये और उन्होंने उत्तरी को घर के अंदर फ़ेंक दिया। वरदार्य का पत्नी उत्तरी को पहनकर रोते हुआ बाहर आई और गुरुदेव को प्रणाम किया। उसने कभी सपने मे भी चिंता नहीं की, गुरुदेव और वैष्णव उनके घर आएंगे। वह रोते हुए एक फटा हुआ आसन गुरुदेव को देते हुए कहने लगी आपको देने के लिए मेरे पास एक अच्छा आसन भी नहीं है। रामानुजाचार्य कहते हैं—भगवान ने कितना सुन्दर आसन दिया है, पेड़ के नीचे हरी घास है, यह सबसे सुन्दर आसन है। इससे बढ़कर आसन क्या होगा ? रामानुजाचार्य के आदेश अनुसार सब लोग वहीं पर बैठ गये और वे उस फटे हुए आसन पर ही बैठ गये। रामानुजाचार्य ने सबको पहले ही बता दिया था वरदार्य गरीब और सबके लिए खाने की व्यवस्था नहीं कर पायेंगे। वरदार्य की पत्नी को यह बात की बहुत चिंता हो रही थी कि वह कैसे गुरुदेव और गुरु भाइयों के लिए प्रसाद की व्यवस्था करे।
वरदार्य की पत्नी बहुत ही सुन्दर और पतिव्रता शिरोमणि स्त्री थी। उनकी सुन्दरता से आकर्षित होकर वहाँ पर एक धनी वनिक व्यक्ति ने उनको भोग करने की इच्छा से बहुत प्रलोभन दिखाया, किन्तु उसे उनका दर्शन भी नहीं मिला। अभी वह चिंता करने लगी कि पति तो घर पर नहीं है और सौभाग्य से वैष्णव सेवा मिली है, जीवन में पुनः वैष्णव सेवा मिलेगी, ये भी निश्चित नहीं। वैष्णव बिना कुछ खाये चले जायेंगे, इस शरीर का क्या मूल्य है—ये सोचकर उन्होंने निश्चय किया पति तो घर पर नहीं है किन्तु यह शरीर जो पति की सम्पत्ति है—इस शरीर को धनी व्यक्ति के पास बेचकर वैष्णव सेवा करेगी।
जब वरदार्य की पत्नी धनी वनिक के घर पहुँची तो वह उन्हें देखकर आश्चर्य-चकित हो गया। जिनका दर्शन नहीं मिलता है, वह स्वयं उनके पास आई है। बात क्या है? उन्होंने बताया, मेरे गुरुदेव और वैष्णव हमारे घर आये है – उनकी सेवा के लिए कुछ द्रव्य चाहिए। यदि आप द्रव्य दे देंगे तो आपकी इच्छा पूर्ति के लिए सायं-काल में मैं आपके पास आ जाऊँगी – में अपना शरीर आप को बेच रही हूँ। ये सुनकर उस वनिक को बहुत आनन्द हुआ और उन्होंने जितना माँगा था उसका दुगुणा सामान दे दिया।
वरदार्य के पत्नी ने उन द्रव्यों से विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाये। उनके घर में एक नारायण शालिग्राम थे, उनको भोग लगा कर गुरुदेव और सब वैष्णवों को प्रसाद खिलाया। प्रसाद पाने के बाद रामानुजाचार्य और उनके शिष्य पेड़ के निचे विश्राम करने लगे। अभी वह अपने पतिदेव के आने की प्रतीक्षा करने लगी,पतिदेव खाने के बाद ही वह खाएगी। दोपहर के बाद जब वरदार्य घर आये तो गुरुदेव और इतने वैष्णव को देखकर आश्चर्य-चकित रह गये। अत्यधिक आनंद से रोते हुए उन्होंने गुरुदेव को प्रणाम किया और अपने थैले में देख कर सोचने लगे, इसमें तो थोड़े ही चावल है, इतने से तो कुछ नहीं होगा। जब उन्होंने अन्दर जाकर विभिन्न प्रकार के व्यंजन देखे तो वे दंग रह गए और अपनी पत्नी से पूछने लगे तुम्हे ये सब कहाँ से मिला है? किसने दिया ये सब? पत्नी के कहा,मैं आपको सब बता दूंगी, पहले आप प्रसाद पा लीजिये। वरदार्य कहने लगे, मेरी प्रसाद पाने की इच्छा नहीं और जब तक मुझे पता नहीं चलेगा ये सब किसने दिया है मैं खा नहीं सकता, मेरा मन चंचल हो गया। बार-बार पूछने पर उनकी पत्नी ने रोते हुए उनके चरणों मे गिर कर सब बता दिया – आप घर पर नहीं थे, गुरुदेव और सभी वैष्णव बिना खाये चले जाते, इस रक्तमांस से बने शरीर का क्या मूल्य है। इसलिए मैंने ये शरीर जो आपकी ही सम्पति है— उसे बेच दिया। संध्या-काल में मुझे उनके पास जाना होगा, मुझसे अपराध हो गया। ये सब सुनकर वरदार्य एकदम गंभीर हो गया और बिना कुछ कहे प्रसाद पा लिया। वरदार्य के प्रसाद पाने के बाद उनकी पत्नी ने भी प्रसाद पा लिया। रामानुजाचार्य तो साधारण व्यक्ति नहीं है, उनको सब पता चल गया। जाते समय उन्होंने वरदार्य और उनकी पत्नी से कहा जिसने वैष्णव सेवा के लिए द्रव्य दिया है, उन्हें भी नारायण का प्रसाद देना।
रामानुजाचार्य के जाने के बाद, दोनों एक दूसरे को देख कर रोने लगे। रोते-रोते वरदार्य कहने लगे – मैं तो बहुत गरीब हूँ! तुमको अच्छे कपड़े नहीं दे सकता, अच्छे से खिला भी नहीं सकता। मैं जानता हूँ – उस धनी व्यक्ति ने तुमको कई बार प्रलोभन दिखाया, किन्तु उसे तुम्हारा दर्शन भी प्राप्त नहीं हुआ और आज तुमने गुरु वेष्णव की सेवा के लिए उसके पास अपना शरीर बेच दिया! मैं ये मान नहीं सकता कि इस संसार में कोई है जो तुम्हें स्पर्श कर सके। मैं तुम्हे आज्ञा देता हूँ, तुम जाओ, भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है कोई तुम्हारे केश के अग्रभाग को भी स्पर्श नहीं कर पायेगा।
वरदार्य की पत्नी को जब धनी व्यक्ति के घर पहुचने में विलम्ब हुआ तो वह बहुत चंचल होकर उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, जब वरदार्य की पत्नी वहाँ पहुँची उसे बहुत आनन्द और आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा मैंने आपको वचन दिया था, किन्तु मुझे आने में थोड़ा विलम्ब हो गया। मेरा आपके पास एक निवेदन है,“आपने जो द्रव्य दिए थे, मैंने उनसे विभिन्न व्यंजन बनाकर ठाकुरजी, गुरु और वैष्णव की सेवा में लगाया है (वह रामानुजाचार्य का महाप्रसाद लेकर आई थी) वही महा-महा प्रसाद आपके के लिए ले कर आयी हूँ। आप पहले उसे ग्रहण कीजिए।” प्रसाद पाते ही उनका हृदय परिवर्तन हो गया और वह चिल्लाकर रोते हुए उनके चरणों मे गिर कर कहने लगा— आप मानवी है या देवी है? आपके जैसे सती के साथ में ऐसा गन्दा काम करने का सोचा, मुझे तो नर्क मे भी स्थान नहीं मिलेगा। मैंने बहुत अपराध किया है, मुझे क्षमा कर दीजिये। मैंने कितने दिन आपको प्रलोभन दिया, किन्तु आपका दर्शन भी नहीं मिला। आपके घर ऐसे कौन आये है, जिसके लिए आप अपना शरीर बेचने आ गए?
जब वरदार्य की पत्नी ने रामानुजाचार्य के बारे में बताया तो उसने उनके चरणों में गिर कर क्षमा मांगी और रामानुजाचार्य के पास ले जाने के लिए प्रार्थना करने लगा। वे सब लोग रामानुजाचार्य को ढूंढने निकल गये और उनसे भेंट होने पर उन्होंने रामानुजाचार्य से क्षमा मांगी और मंत्र देने के लिए प्रार्थना की। रामानुजाचार्य से दीक्षा लेने के बाद उन्होंने वरदार्य और उनकी पत्नी की अंतिम समय तक सेवा की। क्या कोई साधारण व्यक्ति ऐसा कर सकता है? रामानुजाचार्य का प्रसाद खाने से उनका हृदय परिवर्तन हो गया। ऐसी बहुत घटनाएँ है।
हमारे मठ में भी एक ऐसी ही घटना हुई है। हमारी एक गुरु बहन थी—कुसुम कुमारी देवी।आप लोगो को उनका दर्शन मिला नहीं। वे बांग्लादेश में रहती थी,उस समय तो बांग्लादेश भारत में ही था। एक बार गुरु महाराज वहाँ पर प्रचार के लिए गये और वहाँ पर किसी धनी व्यक्ति के घर में ठहरे थे, क्योंकि किसी गरीब के घर में सब भक्तों के साथ जाने से उनको सबके रहने और खाने की व्यवस्था करने में बहुत कठिनाई होती है। गुरूजी उन सबके घर में कुछ समय के लिए ही जाते। कुसुम कुमारी देवी वहाँ पर गुरूजी से मिले और उन्होंने गुरूजी को सब भक्तों के साथ उनके घर आने के लिए निमंत्रण किया। गुरूजी ने विचार किया ये तो बहुत गरीब है, ये सब की सेवा कैसे करेंगी। गुरूजी ने उनसे पूछ लिया, आप सब के लिए रहने की व्यवस्था कैसे करेंगी? कुसुम कुमारी देवी को गुरु-वैष्णव की सेवा मे बहुत रूचि थी, उन्होंने कहा, “मुझे कोई परेशानी नहीं होगी, मेरा एक घर है, मैं उसे खाली कर दूँगी, आप सब वहाँ ठहर सकते हैं। हम गरीब है, इसलिए आपकी सेवा से वंचित रह जायेंगे?” उनके बार-बार प्रार्थना करने पर गुरूजी उनके घर जाने के लिए मान गए। जब गुरूजी सब के साथ उनके घर आये, तब उन्होंने ऐसे सेवा की जो कोई धनी व्यक्ति भी नहीं कर सकता। सुबह, दोपहर से लेकर रात तक सब की सेवा की, उनकी सेवा देखकर सब आश्चर्य हो गये—ये इतनी गरीब है, अपने लिए ही जिनको ठीक से खाने को नहीं मिलता है और वह सब की सेवा कैसे कर रही है! जब गुरूजी जाने लगे तो उन्होंने जाने नहीं दिया और सात दिन तक गुरूजी की सेवा की। सात दिन बाद जब सब जाने लगे तो सबको प्रणामी भी दिया।
बाद में गुरूजी को पता चला उन्होंने अपने एकमात्र घर को वैष्णव सेवा के लिए किसी धनी व्यक्ति के पास बेच दिया और उनसे कहा जब तक गुरुदेव वहाँ रहेंगे, तब तक वह घर रखेगी और गुरुदेव के जाते ही घर छोड़ देगी। एकमात्र घर बेचकर वह रास्ते पर आ गई उनके पास कुछ भी नहीं बचा। यह सुनकर गुरूजी का मन बहुत दु:खी हो आया और गुरूजी ने उनसे पूछा, “अपने ऐसा काम क्यों किया?” कुसुम कुमारी देवी ने उत्तर दिया, मैं नहीं जानती कि गुरु-वैष्णव पुनः कभी मेरे घर आएँगे और मैं उनकी सेवा कर पाऊँगी। इसलिए अपने प्राण से सेवा कर दी, अभी मैं रास्ते में मर जाऊ तो मर जाऊ, कोई चिन्ता नहीं। गुरु महाराज उनकी बात सुनकर आश्चर्य-चकित हो गये। यह किस प्रकार कि व्यक्ति है गुरु-वैष्णव की सेवा के लिए उन्होंने अपनी एकमात्र सम्पति को भी बेच दिया। गुरु महाराज ने चैतन्य महाप्रभु जी के जन्म स्थान ‘योगपीठ मन्दिर’ मे उनके रहने की व्यवस्था की।अंतिम समय तक उन्होंने वहीं पर भजन किया। और वहीँ पर ही उनका देहांत हुआ। उनका नाम लेने से ही गुरुजी की आँखों से आँसू आ जाते थे। एक स्त्री होकर पर भी इस प्रकार की वैष्णव सेवा की, चिंतन से परे है। एक बार कोलकाता में उन्होंने गुरूजी से पूछा मैं क्या पाठ करु? गुरु महाराज जी उनको गीता पाठ करने के लिए कहा, “गीता पाठ करती हूँ किन्तु सुख नहीं होता, क्योंकि उसमें चैतन्य महाप्रभु का नाम नहीं है। चैतन्य महाप्रभु के नाम में उनको बहुत निष्ठा थी। जब भी गुरुजी उनका नाम लेते तो गुरूजी की आँखों से आँसू आ जाते। इस प्रकार वैष्णव सेवा करके, आखिरी समय तक मायापुर मे चैतन्य महाप्रभु जन्म स्थान मे रही और वहीं पर अपना शरीर छोड़ा। उनकी कुछ हानि हुई?
रामानुजाचार्य तिरोभाव तिथि पूजा महोत्सव की जय!