सबसे पहले मैं अपने परम आराध्यतम गुरुदेव, भगवान श्री कृष्ण से अभिन्न और उनकी कृपा मूर्ती, नित्यलीला प्रविष्ट विष्णुपाद अष्टोत्तर-शत (१०८) श्री श्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज के चरण कमलों में अपना अनंत कोटि साष्टाँग दण्डवत प्रणाम करता हूँ। मैं उनसे भगवान श्री कृष्ण और उनके भक्तों (पार्षदों) की महिमा कीर्तन के लिए योग्यता प्रदान करने के लिए अहैतुकी कृपा की प्रार्थना करता हूँ, जिससे मेरा मन शुद्ध हो सके और मैं भगवान श्री कृष्ण की एकांतिकी और अनन्य भक्ति प्राप्त कर सकूँ। मैं अपने पूज्यनीय शिक्षा गुरु वर्ग के चरण कमलों में अपना अनंत कोटि दण्डवत प्रणाम करता हूँ और उनकी अहैतुकी कृपा की प्रार्थना करता हूँ कि वो मुझे भगवान श्री कृष्ण और उनके पार्षदों की महिमा कीर्तन के लिए शक्ति प्रदान करें जिससे मेरा मन शुद्ध हो सके और मैं भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्ति प्राप्त कर सकूँ। मैं यहाँ उपस्थित सभी भक्तों को अपना यथोचित सम्मान प्रदान करता हूँ।

हम यहाँ भारत में पुरुषोत्तम-व्रत का पालन कर रहे हैं। एक लंबे समय के बाद, भगवान की इच्छा से मुझे कलकत्ता में पुरुषोत्तम-व्रत पालन करने का अवसर मिला है। भगवान के द्वारा जो भी किया जाता है, सभी के आध्यात्मिक लाभ के लिए होता है। प्रतिदिन मैं भूतल पर संकीर्तन भवन में प्रवचन कर रहा हूँ और रविवार को भक्त-गण वीडियो कॉन्फ्रेंस (वीडियो सम्मेलन) कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। यह भी भगवान की इच्छा है। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि भगवान की इच्छा के बिना कुछ किया जा सकता है, तब भगवान की भगवदत्ता की हानि हो जाती है। यहाँ तक कि पेड़ का एक पत्ता भी भगवान की स्वीकृति के बिना नहीं हिल सकता, हम पहले ही सुन चुके हैं। जो कुछ भी होता है, भगवान की इच्छा से होता है, वे सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं। क्योंकि वे सर्वमंगलमय हैं, उनकी इच्छा से जो कुछ भी होता है, नित्य लाभ के लिए ही होता है। अब, यदि आपको पुरुषोत्तम-व्रत पालन करने की महिमा पता है, तब हम अपना ध्यान इस पर दे सकते हैं। आपके अंदर रुचि हो सकती है। बिना महिमा जाने किसी के अंदर पुरुषोत्तम-व्रत के बारे में सुनने के लिए समय लगाने की रुचि या इच्छा नहीं होगी। इसलिए पहले हमें पुरुषोत्तम-व्रत पालन करने की महिमा, उपयोगिता और लाभ जानना होगा। हमारे परम आदरणीय श्रीला भक्तिविनोद ठाकुर ने इसके बारे में लिखा है। वे चैतन्य महाप्रभु के निज जन हैं। चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें भेजा, और उनके पुत्र अथवा शिष्य—जैसा भी आप कहें—हमारे परम गुरुपाद-पद्म, नित्यलीला-प्रविष्ट विष्णुपाद श्री भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी ठाकुर को भी भेजा। वे भी चैतन्य महाप्रभु के निज जन हैं। क्योंकि चैतन्य महाप्रभु, उनके निज पार्षदों तथा उस समय के सभी वैष्णव आचार्यों के अन्तर्धान के पश्चात् इस क्षितिज पर अन्धकार छा गया। यहाँ ग्रंथ थे, यहाँ शास्त्र थे। यहाँ श्री चैतन्य भागवत, श्री चैतन्य चरितामृत, श्रीमद्भागवतम, गीता—सब कुछ था। गोस्वामियों की सभी लेखनियाँ भी यहाँ थीं, परन्तु कोई भी व्यक्ति शास्त्रों के वास्तविक आशय को नहीं समझ पा रहा था। इसलिए चैतन्य महाप्रभु के दिव्य प्रेम के संदेश की गरिमा को हानि पहुँचाने के लिए अनेक छद्म संप्रदाय उत्पन्न हो गए। तब चैतन्य महाप्रभु ने यह दयनीय स्थिति देखी कि कोई भी व्यक्ति उनके संदेश को ठीक से समझ नहीं पा रहा है। इसलिए दया से परवश होकर उन्होंने अपने निज जनों को इस संसार में भेजा। वे निज पार्षद हैं; कमलमणि मंजरी और नयनमणि मंजरी। वे भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा से अवतीर्ण हुए। श्रीला भक्तिविनोद ठाकुर ने पुरुषोत्तम-व्रत पालन करने की उपयोगिता के विषय में लिखा है। उन्होंने वैदिक आर्यन शास्त्रों को दो श्रेणियों में विभाजित किया स्मार्त और परमार्थ। स्मार्त का अर्थ है, (साधारण अर्थ कर्म-काण्ड है) जहाँ उन्होंने संसार के अनित्य लाभों की प्राप्ति के लिए कर्मकाण्डीय अनुष्ठानों इत्यादि का विधान किया है।

परमार्थ का अर्थ है भक्ति, शुद्ध भक्ति। हमें दोनों को समझाना होगा। हम केवल स्मार्त को जानते हैं। मैं इसके विषय में थोड़ा सा बोलूँगा। स्मार्त (कर्म-काण्ड) श्रेणी में, वे कुछ कर्मकाण्डीय अनुष्ठानों का विधान करते हैं, जैसे कि ऐसा करने से आपको इस लोक में या इससे ऊपर के लोक में इस प्रकार का सांसारिक लाभ होगा। परंतु जब आपका भाग्य समाप्त हो जाएगा, आप वहाँ से नीचे गिर जाओगे। ये स्वर्ग इस ब्रह्माण्ड, भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर हैं। सामान्य लोगों की रुचि भौतिक लाभ प्राप्त करने में और अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने में होती है।

चन्द्र मास तिथि पर आधारित होता है। पवित्र धार्मिक अनुष्ठान चन्द्र तिथियों पर ही आयोजित किए जाते हैं। लगभग ३२ महीनों (२ वर्ष ८ महीने) के बाद एक अतिरिक्त महीना, जिसे अधिक मास कहा जाता है, आता है। यह सौर वर्ष के साथ तिथि-पद्धति का सामंजस्य बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है। इस प्रकार यह तेरहवाँ महीना होता है।

कर्मकाण्डियों के अनुसार अधिक मास अपवित्र माना जाता है, इसलिए वे इस महीने में किसी भी प्रकार के कर्मकाण्डीय अनुष्ठानों का निर्धारण नहीं करते। परन्तु आध्यात्मिक साधक—केवल कर्मी, ज्ञानी और योगी ही नहीं, बल्कि भक्ति की ओर प्रवृत्त जीव—ऐसा मानते हैं कि सर्वोच्च आध्यात्मिक साधना शुद्ध भक्ति है, इसलिए वे इस महीने को अपवित्र नहीं मानते।

उनका कहना है कि यह महीना अन्य सभी महीनों में सबसे उच्च और सबसे पवित्र है। बृहद् नारदीय पुराण में इस महीने की महिमा का वर्णन मिलता है। स्वयं श्रीकृष्ण ने भी इसकी महिमा का वर्णन किया है।

यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १५.१८)

“मैं इस संसार के नश्वर जीवों से परे हूँ और अक्षर ब्रह्म से भी श्रेष्ठ हूँ। इसलिए लोक और वेदों में मुझे पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध कहा गया है।”

मैं पुरुषोत्तम हूँ; मैं देवों का भी देव हूँ। इसलिए यह महीना पुरुषोत्तम मास कहलाएगा। यह सभी महीनों में सबसे श्रेष्ठ है। जब पुरुषोत्तम मास सबसे श्रेष्ठ है, तब इस महीने में भक्ति करने में हम आलस्य क्यों करें? इससे हमें क्या लाभ होगा? यदि हम यह सोचें कि यह महीना अपवित्र है, इसलिए हमें कोई आध्यात्मिक साधना नहीं करनी चाहिए, और अपने मन को बुरे विचारों में ही लगाकर रखें—और यदि इसी अवस्था में हमारी मृत्यु हो जाए, तो फिर हम कहाँ जाएँगे?

यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥
(श्रीमद् भगवद्-गीता ८.६)

“मृत्यु के समय मनुष्य जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर त्याग करता है, हे कौन्तेय, वह उसी अवस्था या योनि को प्राप्त होता है।”

इसलिए आध्यात्मिक साधक—विशेष रूप से वे जो शुद्ध भक्ति का प्रचार करते हैं—यह उपदेश देते हैं कि इस पवित्र महीने में भगवान हरि की भक्ति अवश्य करनी चाहिए। यह महीना भगवान के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह कार्तिक तथा अन्य सभी महीनों से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है—अत्यंत परम और मंगलमय। इसका पालन करने से साधक को अत्यधिक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।

जब मनुष्य पुरुषोत्तम व्रत की महिमा और उपयोगिता को समझता है, तब वह स्वाभाविक रूप से इसमें अपना मन और ध्यान लगाता है। हमारे गुरु-वर्ग ने भी इसी उद्देश्य से इस व्रत के पालन को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया है। लगभग दो वर्ष और आठ महीनों के बाद यह अधिक मास पुनः आता है। इसका उद्देश्य सांसारिक लाभ प्राप्त करना नहीं है, बल्कि सर्वोच्च वस्तु—परमार्थ—की प्राप्ति करना है। जिसे प्राप्त कर लेने पर सब कुछ प्राप्त हो जाता है, और जिसे जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है—वे ही परमब्रह्म, परमेश्वर हैं। उसी परम सत्य की प्राप्ति ही परमार्थ है।

इस पुरुषोत्तम-व्रत में क्या करना चाहिए? वाल्मीकि मुनि—जो श्रीरामचन्द्र की पवित्र जीवनी रामायण के रचयिता हैं—ने पुरुषोत्तम-व्रत के नियम और विधि-विधान बताए हैं। उन्होंने निर्देश दिया है कि इस महीने में साधक को प्रतिदिन श्रद्धा और सकारात्मक भाव से श्रीमद्भागवत का अध्ययन करना चाहिए। साथ ही शालिग्राम और श्री राधा-कृष्ण की आराधना करनी चाहिए, विग्रह को दीप अर्पित करना चाहिए, पुरुषोत्तम मास की महिमा का पाठ करना चाहिए, तथा जगन्नाथ-अष्टकम, चोराग्रागण्य-अष्टकम आदि भक्तों द्वारा रचित प्रार्थनाएँ सुननी या गानी चाहिए, जिससे भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्न होते हैं।

किन्तु जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, उनकी योग्यता और आध्यात्मिक स्थिति के अनुसार श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने तीन श्रेणियाँ बताई हैं—स्वनिष्ठ, परिनिष्ठित और निरपेक्ष।

स्वनिष्ठ वे साधक हैं जिनका झुकाव अभी भी वर्णाश्रम-धर्म की ओर है और जो अभी तक अनित्य सांसारिक लाभों के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। वे मायिक शक्ति—सत्त्व (अच्छाई का गुण), रजोगुण (उत्साह और कामना का गुण) तथा तमोगुण (अज्ञान का गुण)—से आच्छादित रहते हुए भी कुछ धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं और धीरे-धीरे भक्ति की ओर अग्रसर होते हैं।

दूसरी श्रेणी परिनिष्ठित कहलाती है। गुणों में ये श्रेष्ठ होते हैं, यद्यपि इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम होती है। परिनिष्ठित वे लोग हैं जो किसी सांसारिक लाभ के लिए प्रयास नहीं करते। वे चार वैष्णव सम्प्रदायों में से किसी एक सम्प्रदाय से सम्बद्ध आचार्य के मार्गदर्शन में पुरुषोत्तम-व्रत—कार्तिक-व्रत की भाँति—नियमपूर्वक और शास्त्रीय विधि से पालन करते हैं।

पालन करने की सबसे श्रेष्ठ विधि निरपेक्ष कहलाती है। निरपेक्ष वे साधक हैं जो श्रीकृष्ण की एकांत भक्ति में स्थित रहते हैं। वे केवल आध्यात्मिक लाभ के लिए दिन-रात श्रीकृष्ण के नाम, रूप, लीला और गुणों का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करते हुए भगवान की आराधना करते हैं। यह समझते हुए कि किसी भी प्रकार के सांसारिक लाभ की इच्छा उनके मन को अवश्य विचलित कर देगी, वे इस पूरे महीने को कृष्ण-कथा का श्रवण करते हुए, महामंत्र का कीर्तन करते हुए और प्रसाद ग्रहण करते हुए व्यतीत करते हैं। इस प्रकार वे श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करते हैं।

कौंडिल्य मुनि ने इस व्रत में राधा-कृष्ण मंत्र के जप का भी निर्देश दिया है—

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।
गोकुलोत्सवम् ईशानं गोविन्दं गोपिका प्रियम्।।

इस मंत्र का जप कम से कम बारह बार शांत भाव से, मन ही मन करना चाहिए। यदि कोई इसे बारह से अधिक बार जपता है, तो उसका आध्यात्मिक लाभ और भी अधिक बढ़ जाता है।

यहाँ अनेक वैष्णव संप्रदाय हैं, परंतु मुख्य रूप से चार को प्रमुख माना गया है। संप्रदाय शब्द का अर्थ यहाँ किसी सांप्रदायिक या सामाजिक विभाजन से नहीं है,ऐसा अर्थ करना भाषा का व्यभिचार माना जायेगा। भाषा की सूक्ष्मता को समझना होगा।

संप्रदाय का वास्तविक अर्थ क्या है? दिव्य ज्ञान उचित आचार्य-परंपरा के माध्यम से दिया जाता है। यह ज्ञान ऊपर से नीचे की ओर अवतरित होता है, और उसी परंपरा के माध्यम से उसकी शुद्धता और पवित्रता सुरक्षित रहती है।

इसे समझने के लिए एक उदाहरण दिया जाता है। गंगा नदी निरंतर अपनी धारा में प्रवाहित होती रहती है। यदि आप गंगा के तट पर जाकर उसमें स्नान करते हैं, तो आपको गंगा-स्नान का विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है। लेकिन यदि आप किसी दूसरी नदी में जाकर स्नान करें, तो क्या वही लाभ मिलेगा? नहीं, क्योंकि वह नदी गंगा नहीं है।

इसी प्रकार, आध्यात्मिक ज्ञान भी जब प्रमाणिक आचार्य-परंपरा—अर्थात् संप्रदाय—के माध्यम से प्राप्त होता है, तभी उसका वास्तविक और पूर्ण लाभ मिलता है। इसलिए शास्त्रों में चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों का उल्लेख किया गया है।

सम्प्रदाय-विहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मताः।
अतः कलौ भविष्यन्ति चत्वारः सम्प्रदायिनः॥
श्री-ब्रह्म-रुद्र-सनकाः वैष्णवाः क्षिति-पावनाः॥
(पद्म पुराण)

अर्थात्—जो मंत्र किसी प्रमाणिक संप्रदाय से प्राप्त नहीं होते, वे निष्फल माने गए हैं। इसलिए कलियुग में चार वैष्णव संप्रदाय प्रकट होंगे—श्री, ब्रह्म, रुद्र और सनक (कुमार)—जो पृथ्वी को पवित्र करने वाले होंगे।

यह पद्म पुराण में वेदव्यास मुनि द्वारा कहा गया है। यहाँ चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों का वर्णन मिलता है। दिव्य ज्ञान इन चार संप्रदायों के माध्यम से ऊपर से नीचे की ओर—अर्थात् आचार्य-परंपरा के द्वारा—अवतरित होता है। यदि कोई मंत्र इन चार संप्रदायों में से किसी एक की प्रमाणिक आचार्य-परंपरा के माध्यम से प्राप्त नहीं हुआ है, तो उसका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होता। चाहे कोई व्यक्ति उस मंत्र का करोड़ों वर्षों तक जप ही क्यों न करता रहे, उसे वास्तविक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि उस मंत्र में जीवन नहीं है। वास्तविक जीवन तो भगवान से ही आता है। भगवान के समान या उनसे ऊपर कोई नहीं है। भगवान एक ही हैं। इसलिए भगवान को प्राप्त करने का मार्ग भी एक है और यह उनकी इच्छा से निर्धारित होता है।

कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि भगवान तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं। वे उदाहरण देते हैं कि जैसे कलकत्ता या लंदन जाने के कई रास्ते हो सकते हैं, वैसे ही भगवान तक पहुँचने के भी अनेक मार्ग होने चाहिए। भगवान अनंत हैं, इसलिए उनके पास पहुँचने के भी अनंत मार्ग होने चाहिए। परंतु यह उपमा दोषपूर्ण है। जब हम इस उदाहरण का विश्लेषण करते हैं, तो समझ में आता है कि कलकत्ता या कोई भी भौतिक स्थान पाँच भौतिक तत्वों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से बना हुआ है। हमारा यह स्थूल शरीर भी इन्हीं भौतिक तत्वों से निर्मित है। किन्तु इस स्थूल शरीर से भी श्रेष्ठ एक सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म-देह) है, जिसमें मन, बुद्धि और विकृत अहंकार सम्मिलित हैं। और इन सबके भीतर आत्मा स्थित है। इसी आत्मा के कारण प्रत्येक व्यक्ति—प्रत्येक चेतन प्राणी—इस संसार में सदैव जीवित रहना चाहता है। वह ज्ञान प्राप्त करना चाहता है और आनंद की प्राप्त करता चाहता है।

ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने वास्तविक स्वरूप में जीवात्मा सत्-चित्-आनंद स्वरूप है। वह विभु, पूर्ण सत्-चित्-आनंद नहीं है, बल्कि उस दिव्य सत्-चित्-आनंद का एक अंश—एक कण—है। इसलिए वह स्वाभाविक रूप से नित्य जीवन की कामना करता है। वह मरना नहीं चाहता। वास्तव में कोई भी जीव मरना नहीं चाहता। किन्तु फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि मृत्यु अवश्य होगी। यहाँ एक प्रश्न उठता है—यदि जीव वास्तव में नित्य नहीं होता, तो उसके भीतर नित्य जीवित रहने की इतनी गहरी आकांक्षा कैसे उत्पन्न हो सकती है? यदि जीव ज्ञान से रहित होता, तो उसमें ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा कैसे उत्पन्न होती? वह जानने के लिए उत्सुक क्यों होता? यदि वह स्वभाव से आनंदहीन होता, तो उसे सुख की कामना क्यों होती? वास्तव में सत्-चित्-आनंद स्वरूप आत्मा उसके भीतर विद्यमान है। यह अणु-आत्मा (जीवात्मा) उस विभु-आत्मा—परमात्मा या भगवान—से ही प्रकट हुई है।

किसी वस्तु का कारण ‘कुछ भी नहीं’ नहीं हो सकता; प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। कारण में जो तत्त्व होता है, वही किसी रूप में कार्य में प्रकट होता है। इसलिए आत्मा से रहित कोई वस्तु आत्मा को उत्पन्न नहीं कर सकती।

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
येन जातानि जीवन्ति।
यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
तद् विजिज्ञासस्व।
तद् ब्रह्मेति॥
(तैत्तिरिया उपनिषद ३.१.१)

सभी जीव ब्रह्म (भगवान) से ही प्रकट होते हैं। वे ब्रह्म के भीतर स्थित हैं, ब्रह्म के द्वारा ही अस्तित्व में हैं, और अंततः ब्रह्म की ओर ही लौटते हैं। इसी कारण जब अणु-चेतन—अर्थात् आत्मा—इस शरीर को छोड़ देती है, तब इस शरीर का कोई वास्तविक मूल्य नहीं रह जाता। मृत शरीर को कोई व्यक्ति नहीं मानता, क्योंकि व्यक्ति की वास्तविक पहचान आत्मा है।

अब प्रश्न उठता है कि आत्मा परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकती है? इसके लिए समझना होगा कि आत्मा के पास सापेक्षिक (सीमित) स्वतंत्रता होती है। चूँकि आत्मा चेतन है, इसलिए उसमें सोचने, अनुभव करने और इच्छा करने की क्षमता होती है। भगवान इस सापेक्षिक स्वतंत्रता के परम नियंत्रक हैं। वे चाहें तो बलपूर्वक हस्तक्षेप कर सकते हैं और इस स्वतंत्रता को छीन सकते हैं; परंतु यदि वे ऐसा करें, तो आत्मा जड़ और अचेतन हो जाएगी। इसलिए भगवान बलपूर्वक हस्तक्षेप नहीं करते। इसके स्थान पर वे हृदय के भीतर स्थित रहकर मार्गदर्शन करते हैं—मानो संकेत देते हों: “तुम इस मार्ग पर जा सकते हो, या उस मार्ग पर।” वे स्वयं अवतार लेकर आते हैं और अपने प्रिय भक्तों तथा आचार्यों को भी भेजते हैं, ताकि हम स्वेच्छा से सत्य को स्वीकार करें और भगवान के चरणों में समर्पण करें। इस प्रकार समर्पण स्वेच्छा से होता है, न कि किसी प्रकार के दबाव से। मनुष्य अपनी इस सापेक्षिक स्वतंत्रता का उपयोग अच्छे या बुरे दोनों प्रकार से कर सकता है। यदि वह बुरे कर्म करता है, तो उसे उसके अनुसार बुरा फल प्राप्त होगा। परिणामों का नियंत्रण भगवान के हाथ में होता है। जैसा कि गीता में कहा गया है—

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

अर्थात् मनुष्य को कर्म करने का अधिकार है, परंतु उसके फल पर उसका अधिकार नहीं है। फल का नियंत्रण भगवान के हाथ में है।

इसलिए हमें इस संसार में दूसरों को दोष देने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। किसी अन्य व्यक्ति के पास हमारे कर्मों के फल को नियंत्रित करने का सामर्थ्य नहीं है। वास्तव में हम अपने ही कर्मों के परिणाम भोगते हैं; अन्य लोग केवल निमित्त (माध्यम) मात्र हो सकते हैं।

ध्रुव को सुनीति देवी द्वारा कहे गए करुणामय वचनों को हमेशा याद रखना चाहिए। उनको भूलना नहीं चाहिए। यदि आप अपने आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। जब सुनीति देवी को पता लगा कि उनका पुत्र कृष्ण, श्री हरि की आराधना करना चाहता है, उन्होंने ध्रुव को चेतावनी दी, “अपनी सौतेली माता के द्वारा फटकारे जाने के कारण उन्हें दोष मत देना, वह कारण नहीं है। तुमने अपने पिछले जन्म में यह किसी के साथ किया होगा। भगवान निष्पक्ष है। वे सब कुछ देख रहे हैं, सब कुछ नियंत्रित करते हैं। इस जन्म में या किसी अन्य जन्म में तुमने कुछ होगा और उसके परिणामस्वरूप तुम्हें ये वापस मिला है। तुम्हारी सौतेली माँ निमित्त बन गई हैं, वे कारण नहीं हैं। उनको कारण मानते हुए, अपनी सौतेली माता के प्रति द्वेष का भाव रखने से तुम्हें कृष्ण नहीं मिलेंगे। पहले तुम पूरी तरह से अपना दिल साफ़ करो (इस संसार में किसी के प्रति द्वेष का भाव मत रखो और कृष्ण को पुकारो।” उन्होंने ध्रुव को इस प्रकार ‘पद्मपलाश-लोचन-हरि’ की आराधना करने की सलाह दी।) नहीं तो इस संसार में किसी के प्रति द्वेष के साथ तुम श्री हरि, ‘पद्मपलाश-लोचन-हरि’ की आराधना नहीं कर सकते।” उसने ध्रुव को इस प्रकार सलाह दी। ध्रुव के अंदर अपनी माता की सभी शिक्षाओं को पूरी तरह से स्वीकार करने की योग्यता थी। उसने अपनी माता की शिक्षाओं का पालन किया और भगवान की कृपा प्राप्त की। भगवान संतुष्ट हो गए। वे जंगल में ध्रुव की रक्षा कर रहे थे, वहाँ अनेकों हिंसक जानवर थे। हम नास्तिकों को विश्वास नहीं है। भगवान रक्षकर्ता है। यदि भगवान रक्षा करते हैं, कोई भी आपको मार नहीं सकता। यदि भगवान मारते हैं तब कोई आपको बचा नहीं सकता।

ध्रुव जंगल में घूम रहा थाfrf और भगवान नियंत्रित कर रहे थे। सभी हिंसक जानवर आ रहे थे और ध्रुव उन्हें गले लगाकर पूछ रहा था, “क्या तुम मेरे भगवान श्री हरि हो?” हिंसक जानवरों ने ध्रुव को कोई हानि नहीं पहुँचाई क्योंकि भगवान शासन और नियंत्रण कर्ता हैं। भगवान सभी के अंदर निवास करते हैं। जब भगवान संतुष्ट हो जाते हैं, सभी संतुष्ट हो जाते हैं। परंतु हरिनाम करते समय वह अपने पिता के पास या अपनी सौतेली माता के पास या किसी और के पास नहीं गया और ना ही कहा, “कृपया मुझसे असंतुष्ट ना हों, कृपया मेरे प्रति दयालु हों।” केवल श्री हरि का नाम उच्चारण करने से या हरिनाम करने से हरि संतुष्ट हो जाते हैं और अन्य सभी भी संतुष्ट हो जाते हैं। उत्तानपाद रो रहा था, जिस सौतेली माँ ने ध्रुव को फटकारा था, छोटे ध्रुव के बारे में सोच कर वह भी रो रही थीं; राज्य में हर कोई रो रहा था। उनका मन पूरी तरह से बदल गया था। (तब भगवान ने देखा कि बिना ध्रुव के उत्तानपाद मर जाएगा)। भगवान ने देखा उत्तानपद छोटे पुत्र, ध्रुव के लिए अत्यधिक विरह से व्याकुल हो रहे हैं। वे कह रहे थे, “युवा रानी के प्रति आसक्त होकर और उसके वश में आकर मैंने ग़लत किया। मेरा छोटा पुत्र हिंसक जानवरों के द्वारा मारा गया होगा या भूख से मेरा पुत्र अवश्य ही मर गया होगा। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ।” उसको बहुत बुरा लग रहा था। उस समय नारद मुनि उत्तानपाद के राज्य में गये और उसको और उसको भली प्रकार समझाया। नारद मुनि ने कहा, “तुम बहुत ही कठोर बन गए। जब तुम्हारा पुत्र तुम्हारी गोद में बैठाने के लिए आया तब तुमने उसके साथ बुरी तरह से व्यवहार किया और अब तुम सोच रहे हो कि तुम्हारा पुत्र पहाड़ों की गोद में मर गया होगा? तुम इतना अधिक क्यों सोच रहे हो? भगवान तुम्हारे पुत्र की रक्षा कर रहे हैं। ध्रुव के बारे में मत सोचो। ध्रुव ठीक है। मैं तुम्हें आश्वासन देता हूँ। बिल्कुल भी चिंता मत करो। वह, वहाँ जंगल में कृष्ण की आराधना कर रहा है और कृष्ण उसकी रक्षा कर रहे हैं और मैं वहाँ से आ रहा हूँ।” इस प्रकार से नारद मुनि ने उत्तानपाद को सांत्वना दी। उसके बाद नारद मुनि ने ध्रुव को मंत्र दिया और कहा, “यदि तुम नारायण को प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें मंत्र लेना होगा।” और उन्होंने ध्रुव को उसकी माँ द्वारा दी गई शिक्षाएँ याद दिलाईं। यह हमें याद रखना चाहिए, ध्रुव को अपनी माता सुनीति देवी के करुणामय वचनों को सदैव स्मरण रखना चाहिए था—उन्हें कभी भूलना नहीं चाहिए। वास्तव में, जो भी अपने आध्यात्मिक जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है, उसके लिए यह शिक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

जब सुनीति देवी को ज्ञात हुआ कि उनका पुत्र ध्रुव भगवान श्रीकृष्ण, श्रीहरि की आराधना करना चाहता है, तब उन्होंने उसे सावधान करते हुए कहा—“तुम्हें अपनी सौतेली माता द्वारा फटकारे जाने के कारण उन्हें दोष नहीं देना चाहिए। वे वास्तविक कारण नहीं हैं। संभव है कि तुमने अपने किसी पिछले जन्म में किसी के साथ ऐसा ही व्यवहार किया हो। भगवान पूर्णतः निष्पक्ष हैं। वे सब कुछ देख रहे हैं और सब कुछ नियंत्रित कर रहे हैं। इस जन्म में या किसी अन्य जन्म में तुमने जो कुछ किया होगा, उसी का परिणाम तुम्हें अब प्राप्त हुआ है। तुम्हारी सौतेली माता तो केवल निमित्त बन गई हैं, वे वास्तविक कारण नहीं हैं।

यदि तुम उन्हें ही कारण मानकर उनके प्रति द्वेष का भाव रखोगे, तो तुम्हें श्रीकृष्ण नहीं मिलेंगे। इसलिए पहले अपने हृदय को पूर्णतः शुद्ध करो। इस संसार में किसी के प्रति भी द्वेष मत रखो और फिर कृष्ण को पुकारो।” इस प्रकार सुनीति देवी ने ध्रुव को ‘पद्म-पलाश-लोचन हरि’ की आराधना करने का परामर्श दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि हृदय में किसी के प्रति द्वेष है, तो उस स्थिति में श्रीहरि—पद्म-पलाश-लोचन भगवान—की सच्ची आराधना संभव नहीं है। ध्रुव के भीतर अपनी माता की शिक्षाओं को पूर्ण रूप से ग्रहण करने की योग्यता थी। उसने उनकी सभी शिक्षाओं को स्वीकार किया, उनका पालन किया और अंततः भगवान की कृपा प्राप्त की। भगवान उससे अत्यंत प्रसन्न हो गए।

जब ध्रुव वन में तपस्या कर रहा था, तब वहाँ अनेक हिंसक पशु थे, किन्तु भगवान स्वयं उसकी रक्षा कर रहे थे। नास्तिक लोग इस बात पर विश्वास नहीं करते, परंतु सत्य यह है—भगवान ही वास्तविक रक्षक हैं। यदि भगवान रक्षा करते हैं, तो कोई भी आपको हानि नहीं पहुँचा सकता; और यदि भगवान ही किसी का अंत करना चाहें, तो कोई भी उसे बचा नहीं सकता।

ध्रुव वन में निडर होकर घूमता था। वह प्रत्येक जीव को देखकर प्रेम से पूछता—“क्या तुम मेरे भगवान श्रीहरि हो?” आश्चर्य की बात यह थी कि वे हिंसक पशु भी उसे कोई हानि नहीं पहुँचाते थे, क्योंकि भगवान ही सबके शासक और नियंत्रक हैं। भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में निवास करते हैं और वही सबका संचालन करते हैं।

माममंगलं तात परेषु मंस्था
भुक्ते जनो यत् परदुःखदस्तत्॥

अपने संतापों, दुखों इत्यादि के लिए दूसरों को दोष मत दो। तुम अपने ही कर्मों का फल भोग रहे हो। दूसरे निमित्त हो सकते हैं। यदि आप द्वेषपूर्ण सोच के साथ दूसरों को दोष देते हैं, और यदि आप आराधना करते हैं, आपको कभी भगवान नहीं मिलेंगे। कभी नहीं। इसका क्या लाभ है? इसलिए, यहाँ, एक क्रमिक प्रक्रिया है। अपने संतापों, दुखों और कष्टों के लिए दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए। वास्तव में हम अपने ही कर्मों का फल भोग रहे होते हैं; अन्य लोग केवल निमित्त (माध्यम) मात्र बनते हैं। यदि कोई व्यक्ति द्वेषपूर्ण भावना से दूसरों को दोष देता रहता है और साथ ही भगवान की आराधना भी करता है, तो उसे भगवान की प्राप्ति कभी नहीं होगी। ऐसी आराधना का कोई वास्तविक लाभ नहीं है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में एक क्रमिक प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। जैसा कि पहले कहा गया है, चार प्रमुख वैष्णव संप्रदाय हैं। बिना संप्रदाय के दिव्य ज्ञान की परंपरा सुरक्षित नहीं रह सकती। पद्म पुराण में इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है कि रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी और निम्बादित्य—ये चार आचार्य भगवान से चली आ रही परंपरा के प्रतिनिधि हैं। इस प्रकार चार वैष्णव संप्रदाय प्रकट होते हैं—

श्री संप्रदाय — लक्ष्मी देवी से, जिसमें आगे चलकर रामानुजाचार्य प्रकट हुए।

ब्रह्म संप्रदाय — ब्रह्मा से, जिसमें मध्वाचार्य प्रकट हुए।

कुमार (सनक) संप्रदाय — चतुःसन (चार कुमार) से, जिसमें निम्बार्काचार्य प्रकट हुए।

रुद्र संप्रदाय — भगवान शिव (रुद्र) से, जिसमें विष्णुस्वामी प्रकट हुए।

इन संप्रदायों के माध्यम से दिव्य ज्ञान गुरु-परंपरा में ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित होता है, और उसी परंपरा में उसकी शुद्धता और पवित्रता सुरक्षित रहती है। इसलिए मंत्र भी उसी प्रमाणिक परंपरा से ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वहीं भगवान के साथ वास्तविक संबंध स्थापित होता है।

यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि संप्रदाय शब्द का अर्थ कट्टरपंथ या सांप्रदायिकता नहीं है। संप्रदाय का वास्तविक अर्थ है—वह परंपरा जिसमें दिव्य ज्ञान शुद्ध रूप से सुरक्षित रहता है और उचित गुरु-परंपरा द्वारा प्रवाहित होता है।

संप्रदाय शब्द का अर्थ है—“सम्यक् प्रदत्त ज्ञान”, अर्थात् ऐसा ज्ञान जो पूर्ण और सही रूप में आचार्य-परंपरा से प्राप्त हुआ हो। दुर्भाग्य से, विशेषकर बंगाल में, सामान्य लोग इस शब्द को सांप्रदायिकता या कट्टरता के अर्थ में समझ लेते हैं, जबकि इसका वास्तविक अर्थ पूर्ण भिन्न है।

वाल्मीकि मुनि ने बताया है कि पुरुषोत्तम-व्रत का पालन किस प्रकार करना चाहिए। अपने संप्रदाय—ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय संप्रदाय—के आचार्यों द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुसार भी इस व्रत का पालन किया जा सकता है। इस प्रकार के पालन को परिनिष्ठित कहा जाता है। अर्थात्, एक ओर हम वाल्मीकि मुनि के निर्देशों का पालन करते हैं और दूसरी ओर अपने आचार्यों द्वारा दिए गए नियमों का भी अनुसरण करते हैं। उदाहरण के लिए, कार्तिक-व्रत की भाँति हम कुछ नियमों का पालन करते हैं—जैसे सरसों का तेल, तिल का तेल और कुछ विशेष सब्जियाँ, जो कार्तिक मास में निषिद्ध मानी जाती हैं, उनका सेवन नहीं करते। पुरुषोत्तम मास में यहाँ घी सहज रूप से उपलब्ध नहीं होता, इसलिए हम मूँगफली के तेल का उपयोग करते हैं। इस प्रकार, आचार्यों ने जो-जो नियम बताए हैं, उनके अनुसार आचरण करना चाहिए। यह अवस्था परिनिष्ठित कहलाती है। इससे भी ऊपर की अवस्था एकान्तिक भक्ति की है, जो सर्वोच्च मानी जाती है।

वेदव्यास मुनि ने वेदों का विस्तार किया, वेदान्त की रचना की, अठारह महापुराणों का संकलन किया और भगवद्गीता भी प्रस्तुत की। फिर भी उन्हें आंतरिक शान्ति प्राप्त नहीं हुई। अंततः उन्हें अपने गुरु नारद मुनि की शरण में जाना पड़ा।

नारद मुनि ने उन्हें परामर्श दिया कि वे भगवान श्रीकृष्ण की महिमा का कीर्तन सही प्रकार से करें, क्योंकि अभी तक उन्होंने उसे उस रूप में नहीं किया था।

वेदव्यास मुनि ने कहा—

“मैंने तो महाभारत में, विशेषकर भगवद्गीता के माध्यम से, भगवान की महिमा का वर्णन किया है।” तब नारद मुनि ने उत्तर दिया—

“वहाँ अंतिम उद्देश्य मुख्यतः मुक्ति है, भगवान की प्रत्यक्ष सन्तुष्टि नहीं। तुम्हें श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण और लीलाओं की महिमा का कीर्तन केवल उनकी सन्तुष्टि के लिए करना चाहिए। जब भगवान संतुष्ट हो जाते हैं, तब स्वाभाविक रूप से साधक भी संतुष्ट हो जाता है।”

नारद मुनि ने वेदव्यास मुनि को चार मूल श्लोकों का उपदेश दिया। उन श्लोकों पर वेदव्यास मुनि ने गहन ध्यान किया और ध्यान में उन्होंने भगवान की समस्त लीलाओं का साक्षात्कार किया। तब उन्होंने श्रीमद्भागवत की रचना की और उसी के द्वारा उन्हें वास्तविक आध्यात्मिक शांति प्राप्त हुई।

इसी कारण कहा गया है कि पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन श्रीमद्भागवत का पढ़ना या सुनना अत्यंत आवश्यक है। यहाँ कलकत्ता में हम प्रतिदिन रात्रि में ब्रह्मा की प्रार्थनाओं (ब्रह्म-स्तव) पर प्रवचन आयोजित कर रहे हैं। ब्रह्मा की वह लीला प्रसिद्ध है जिसमें वे श्रीकृष्ण की योगमाया से मोहित हो गए थे। परंतु यह समझना चाहिए कि वेदव्यास मुनि ने इसे जिस प्रकार लिखा है, वह भी एक विशेष उद्देश्य से है। वास्तव में वेदव्यास मुनि सर्वज्ञ थे; वे सब कुछ जानते थे। वे जानते थे कि ब्रह्मा की वह अवस्था भी भगवान की लीला का ही एक भाग थी। फिर भी उन्होंने इसे इस प्रकार प्रस्तुत किया कि ब्रह्मा मानो कृष्ण की महिमा को समझ नहीं पाए और मोह में पड़ गए।

ऐसा उन्होंने इसलिए किया ताकि साधकों को इससे शिक्षा मिल सके। यदि वे यह स्पष्ट लिख देते कि ब्रह्मा वास्तव में मोहित नहीं हुए थे, तो उस प्रसंग की गंभीरता और उससे मिलने वाली शिक्षा कम हो जाती। भजन के मार्ग पर नए लोगों को यह समझाने के लिए कि भगवान की महिमा कितनी असीम है, उन्होंने इस घटना को इस प्रकार वर्णित किया।

हम इससे यह शिक्षा लेते हैं कि ब्रह्मा, जो समस्त जीवों की सृष्टि के अधिष्ठाता माने जाते हैं, वे भी प्रारम्भ में श्रीकृष्ण की लीलाओं की गहराई को नहीं समझ पाए। परंतु जब उन्होंने पूर्णतः श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण की, तब भगवान ने उन्हें अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिया।

इसलिए हमें भी यही समझना चाहिए कि भगवान की प्राप्ति का मार्ग अनन्य भक्ति है।

इन व्रतों और विधि-विधानों के पालन में अत्यधिक कठोरता या बाह्य आग्रह करने की आवश्यकता नहीं है। मुख्य बात यह है कि—श्रवण (भगवान की कथा सुनना), कीर्तन (नाम-जप करना), प्रतिदिन प्रसाद ग्रहण करना, और अनन्य भक्ति के साथ भगवान की सेवा करना—इन बातों का पालन अवश्य करना चाहिए। यही पुरुषोत्तम मास का वास्तविक सार है।

शृण्वतः श्रद्धया नित्यं गृणतश्च स्वचेष्टितम्।
कालेन नातिदीर्घेण भगवान् विशते हृदि॥
(श्रीमद् भगवतम् २.८.४)

कृष्ण को सदैव स्मरण में रखने के लिए भक्ति के ये दो अंग—श्रवण और कीर्तन—अत्यंत आवश्यक हैं। वास्तव में भक्ति के सभी अंगों का मूल उद्देश्य यही है कि साधक के हृदय में निरंतर कृष्ण का स्मरण बना रहे। परंतु आप निरंतर कृष्ण का स्मरण किस प्रकार से कर सकते है?

श्रुति-स्मृति-पुराणादि- पाञ्चरात्र-विधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिर् उत्पातायैव कल्पते॥
(पद्म पुराण, चैतन्य चरितामृत मध्य २२.११३)

आपको हमेशा कृष्ण को स्मरण रखना चाहिए। आपको उनको कभी नहीं भूलना चाहिए। शास्त्रों में कुछ भक्ति के अंग दिए गए हैं। यदि कोई ऐसी क्रिया है जो आपको कृष्ण को स्मरण कराती हैं, वह अनुमत है। वहाँ कुछ निषेध हैं। यदि कोई वस्तु जो आपको कृष्ण को भुलवा देती है, यद्यपि वह तालिका में नहीं है, आपको वह नहीं करनी चाहिए। परंतु विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं बिना श्रवण और कीर्तन के स्मरण नहीं हो सकता। श्रवण कीर्तन अधीन ही स्मरणम्—

केवल श्रवण और कीर्तन के द्वारा ही स्मरण सम्भव है। यदि आप निरंतर दूसरे क्या सोचते हैं के बारे मैं सुनते हो, हमेशा गपशप सुनते हो, दुनियावी वस्तुओं के बारे में बात करते हो, क्या कृष्ण आपके पास आएंगे?

आपको सदा कृष्ण का स्मरण करना चाहिए—उन्हें कभी भी नहीं भूलना चाहिए। शास्त्रों में भक्ति के कुछ अंग बताए गए हैं। यदि कोई ऐसी क्रिया है जो आपको कृष्ण का स्मरण कराती है, तो वह स्वीकार्य है। और यदि कोई वस्तु या कार्य ऐसा है जो आपको कृष्ण को भुला देता है, तो यदि वह निषिद्धों की सूची में स्पष्ट रूप से न भी हो तब भी आपको उससे दूर रहना चाहिए।

परंतु श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि बिना श्रवण (सुनना) और कीर्तन (जप या हरिनाम का उच्चारण) के स्मरण संभव नहीं है। इसलिए कहा गया है—

“श्रवण-कीर्तन के अधीन ही स्मरण है।” अर्थात् केवल श्रवण और कीर्तन के माध्यम से ही वास्तव में स्मरण होना संभव है। यदि आप निरंतर लोगों की बातें सुनते रहें कि कौन क्या सोच रहा है, ग्राम्य-वार्ता सुनते रहें, और केवल जागतिक विषयों की चर्चा करते रहें तो फिर कृष्ण आपके पास कैसे आएँगे?

हमेशा ‘श्रृण्वतः श्रद्ध्या नित्यम’—हमेशा, प्रत्येक दिन आपको शुद्ध भक्त से कृष्ण की लीलाओं के बारे में सुनना चाहिए और सुनने के बाद आपको इसका मनन करना चाहिए और तब आपको दोहराना चाहिए। इस तरह से नहीं, केवल जब साधु आएंगे हम आराधना करेंगे। जब साधु यहाँ नहीं होंगे, हम नहीं करेंगे। नहीं, यह ग़लत है। इसके द्वारा हम कभी भी उच्चतम लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाएंगे। अनन्य भक्ति को महत्व देने के लिए, रोजाना श्रवण, कीर्तन और प्रसाद ग्रहण करना आवश्यक है। जब आप दवा ले रहे हैं तब आपको आहार के बारे में विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि आहार ठीक नहीं है (उचित रूप से नहीं लिया जाएगा) तब, यहाँ तक कि इस भौतिक शरीर में भी दवा काम नहीं करेगी। यह श्रवण और कीर्तन सबसे अच्छी दवा है और इसमें भी कीर्तन सबसे अच्छी दवा है और आपको यह प्रत्येक दिन करना चाहिए। दवा (श्रवण और कीर्तन) के साथ आपको प्रसाद लेना होगा।

“श्रृण्वतः श्रद्धया नित्यम्”—अर्थात् हमें सदा, प्रतिदिन, श्रद्धा के साथ किसी शुद्ध भक्त से कृष्ण की लीलाओं का श्रवण करना चाहिए। श्रवण के बाद उसका मनन करना चाहिए और फिर उसे दूसरों के सामने कीर्तन करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि केवल जब साधु आएँ तभी हम भजन-साधन करें, और जब साधु यहाँ न हों तो हम कुछ भी न करें। यह सही मार्ग नहीं है। इस प्रकार के आचरण से हम कभी भी जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। अनन्य भक्ति को वर्धन करने के लिए प्रतिदिन श्रवण, कीर्तन और प्रसाद-सेवन अत्यंत आवश्यक है। जैसे जब कोई औषध लेता है, तो उसे अपने आहार के विषय में भी विशेष सावधानी रखनी पड़ती है। यदि आहार ठीक न हो, तो इस भौतिक शरीर में भी औषध अपना प्रभाव नहीं दिखा पाता। उसी प्रकार श्रवण और कीर्तन सबसे उत्तम औषध है—और उनमें भी कीर्तन सर्वोत्तम औषधि है। इसलिए इन्हें प्रतिदिन करना चाहिए। इस दवा—श्रवण और कीर्तन—के साथ-साथ हमें प्रसाद भी अवश्य ग्रहण करना चाहिए।