देवानन्द पण्डित एक निपुण वक्ता, जितेन्द्रिय तथा आचरणशील भक्त थे। उनके अनेक शिष्य थे। किन्तु, वे श्रीमद् भागवतम् की व्याख्या भक्ति मूलक सिद्धान्त अनुसार नहीं करते थे, तथा महाप्रभु के ऊपर उनका विश्वास नहीं था। एक बार श्रीवास पण्डित, जो स्वयं नारद गोस्वामी से अभिन्न है, श्रीमद् भागवत कथा सुनने के लिए देवानन्द पण्डित के आश्रम गए। वहाँ श्रीमद् भागवत का पाठ सुनकर, वे भाव मुद्रा में चले गए, तथा जोर-जोर से चित्कार करने लगे। यह देख कर देवानन्द पण्डित के शिष्यों ने श्रीवास पण्डित को आश्रम से बाहर निकाल दिया।

यह सारा दृश्य देख कर भी देवानन्द पण्डित ने अपने शिष्यों को ऐसा करने से नहीं रोका, जिस कारण से महाप्रभु उन पर क्रोधित हो गए। महाप्रभु ने कहा कि देवानन्द पण्डित का श्रीमद् भागवत कथा करने का कोई अधिकार नहीं है। वास्तव में कृष्ण लीला में नन्द बाबा के सभा-पंडित ‘भागुरी मुनि’ ही चैतन्य लीला में देवानन्द पण्डित के रूप में हमें शिक्षा प्रदान करने के लिए आए। उन्होंने अपने आचरण से हमें यह शिक्षा प्रदान की कि घमण्ड के द्वारा, अपनी बुद्धि बल के द्वारा या अपने पाण्डित्य के द्वारा शास्त्रों के तथा श्रीमद्भागवत के अर्थों को नहीं समझा जा सकता, और जो ऐसा विचार करते हैं कि वे अपने बुद्धि बल तथा पाण्डित्य के द्वारा समझ लेगें, तो इसका अर्थ यह हुआ कि अभी तक वे शास्त्रों के बारे में कुछ समझे ही नहीं। भक्ति के बिना उनको समझा नहीं जा सकता, भक्त्याहं एकग्राह्य, वास्तव में भक्ति को छोड़कर अन्य किसी भी उपाय के द्वारा ‘श्रीमद् भागवतम’ या ‘भगवान’ की महिमा प्रकाशित करनेवाले शास्त्रों को नहीं समझा जा सकता।

देवानन्द पण्डित ने जो अपराध किया, उसके कारण उनकी महाप्रभु के लिए श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो पाई। श्रद्धा उत्पन्न नहीं होने के कारण उनको महाप्रभु की कृपा कैसे प्राप्त होती? महाप्रभु ने उन्हें गर्हन किया। चैतन्य भागवत में ऐसा वर्णन आता है कि महाप्रभु ने ऐसा आदेश दिया था की देवानन्द पण्डित से श्रीमद् भागवत छीन कर ले आओ, क्योंकि, उनका श्रीमद्भागवत पढ़ने का अधिकार नहीं है। किन्तु, जब वक्ररेश्वर पण्डित, देवानन्द पण्डित के घर पर रुके, तथा देवानन्द पण्डित ने उनकी श्रद्धा पूर्वक सेवा की तब महाप्रभु उन पर प्रसन्न हो गए।

इस प्रकार ‘वैष्णव अपराध’ बहुत ही भयंकर अपराध है। यदि हम यह सोचेंगे की अपराध भी करते रहेंगे, तथा भक्ति भी हो जाएगी, तो यह असम्भव है। चाहे वह अपराध गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी या और कोई भी क्यों ना करें। वैष्णव अपराध की तुलना हाथी माथा (वह पागल हाथी, जो दहाड़ता हुआ बगीचे में आता है, तथा सब फूल-बूटियां इत्यादि को तहस-नहस कर देता है) से की गई है। जिससे भक्ति रूपी लताओं की जड़े सूखने से उनका पतन हो जाता है। देवानन्द पण्डित ने श्रीवास पण्डित जो नारद गोस्वामी से अभिन्न हैं, उनके चरणों में अपराध करके भगवान को अप्रसन्न किया। ऐसी भागवत कथा का क्या लाभ है?

यदि हमारे द्वारा किसी वैष्णव के चरणों में अपराध हो जाए, तो उनके चरणों में क्षमा याचना करने से भी क्षमा प्राप्ति हो जाती है। गोपाल चापाल, जब श्रीवास पण्डित के चरणों में अपराध करने के पश्चात कुष्ठ रोग से ग्रसित हुए, तब वे महाप्रभु के चरणों में गिर गए। तब महाप्रभु ने उनसे कहा. ‘तुमने ऐसा कार्य किया, जो क्षमा योग्य नहीं है’। तुमने लोगों को ऐसा बोध करवाया कि जैसे श्रीवास पण्डित भवानी का भक्त हैं और उनकी पूजा करते हैं। इसलिए मैं तुम्हें ऐसा दण्ड प्रदान करूंगा, जिससे यह कुष्ठ रोग तुम्हें करोड़ों जन्म तक प्राप्त होगा। महाप्रभु स्वयं भगवान है, अंतर्यामी रूप से सब जानते हैं। वे जानते थे कि श्रीवास पण्डित के चरणों में किसने अपराध किया है। साधारण लोग यह जानने में असमर्थ थे। कुछ समय के बाद गोपाल चापाल, ‘कोलद्वीप’ नामक स्थान पर गए, जो ‘अपराध भन्जन’ पाट नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर उन्होंने फिर से महाप्रभु से क्षमा याचना की। महाप्रभु ने उनसे कहा कि तुम श्रीवास पण्डित के चरणों में जाकर क्षमा याचना करो। क्षमा याचना मांगने पर सब ठीक हो जाएगा। गोपाल चापाल के महाप्रभु की आज्ञा अनुसार, श्रीवास पण्डित के चरणो में क्षमा याचना करने पर सभी अपराध नष्ट हो गए।

वैष्णव अपराध का प्रायश्चित करने का एक ओर उपाय है कि जिस मुख से हमने विषपान किया अर्थात वैष्णव निन्दा की उसी मुख से सब समय वैष्णव की महिमा का कीर्तन किया जाए। कीर्तन करते करते जीव्हा पर वह अमृत आ जाएगा, जो अपराध रूपी विष को समाप्त कर देगा। महा-भागवत सभी को चाहे वह कनिष्ठ, मध्यम या उत्तम क्यों ना हो सभी को भगवान के सेवक के रूप में देखते हैं। घमण्डी व्यक्ति सब समय यही सोचते हैं कि एकमात्र वही वैष्णव है, अन्य कोई भी वैष्णव नहीं है। किन्तु, जो शुद्ध वैष्णव होते हैं, वह स्वयं में ही अवगुण ढूंढते हैं, अन्य सभी को भगवान से सम्बन्धित रूप में देखते हैं। स्थावर जंगम देखे ना, देखे तार मूर्ति। सर्वत्र हय निज इष्टदेव स्फूर्ति।। इसीलिए चैतन्य महाप्रभु ने सावधान करते हुए कहा है कि,”तृणादपि सुनीचेन, तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदाहरि:”। हम केवल मुख से बोल देते हैं, किन्तु अंदर में तो वह भाव है ही नहीं। हमें वृक्ष से भी अधिक सहनशील होना चाहिए, तथा किसी से भी मान (सम्मान) की आशा नहीं करनी चाहिए, अपितु सभी को मान (सम्मान) देना चाहिए। “जीवेर सम्मान दीबे जानी कृष्ण अधिष्ठान”। इस प्रकार देवानन्द पण्डित के द्वारा उनके घर पर वक्ररेश्वर पण्डित की सेवा करने के कारण महाप्रभु के चरणों में श्रद्धा उत्पन्न हो गई। तब उन्हें महाप्रभु के आश्रय में उनकी कृपा प्राप्ति हुई, तथा उनके सारे अपराध समाप्त हो गये। जिस मुख से इतने दिन वैष्णव निन्दा की, उसी मुख को वैष्णव जन का गुणगान करने में नियुक्त किया जा सकता है। संसार में जितने भी प्राणी हैं सब में गुण तथा दोष होते हैं। किन्तु हमें सभी में गुण ही देखने चाहिए। वैष्णव को वैष्णव रूप में ही देखना चाहिए। ये गुण हम तो नहीं देख सकते है, किन्तु, जो शुद्ध वैष्णव हैं, वे यही देखते हैं कि सभी विष्णु के हैं, तथा उनके द्वारा भेजे गए हैं और उनको छोड़ कर सभी भगवान की सेवा करने में व्यस्त हैं।