(दिनांक ३१ श्रावण, शुक्रवार; स्थान—श्रीगौड़ीय मठ, कलकत्ता)

“नमो महावदान्याय कृष्णप्रेमप्रदाय ते।
कृष्णाय कृष्णचैतन्यनाम्ने गौरत्विषे नमः॥”

प्रारंभ में हमने श्रीमद्भागवत के पाठ-निरूपण में कहा है कि भुभुक्षा (भोग की इच्छा) और मुमुक्षा (मोक्ष की इच्छा) रूपी धर्म में जिनकी आवश्यकता है, उनका भागवत-पाठ में अधिकार नहीं है और उसकी चर्चा में वे अधिक सुख प्राप्त नहीं करते। चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का साधन-प्रयास केवल उपाधि का नाश मात्र है। परंतु पंचम वर्ग (प्रेम) की बात आत्मा के नित्य धर्म से संबंधित है। इस भागवत की महिमा विभिन्न स्थानों पर कथित होने पर भी यह कुछ व्यक्तियों के लिए रुचिकर नहीं होती। यहाँ तक कि भागवत के पाठक और चर्चा करने वालों की चित्त-तुष्टि के लिए विपरीत मार्ग के पथिक भी कई बार भागवत का आदर करते हैं, परंतु उनके क्रिया-कलापों से प्रायः इसका यथार्थ आदर प्रमाणित नहीं होता।

अनेक लोग भागवत को पुराण अथवा पांचरात्र के अंतर्गत मानकर स्वीकार नहीं करते। किंतु आगम और निगम दोनों संयुक्त रूप में श्रीमद्भागवत में विद्यमान हैं। हम भागवत की चर्चा में प्रथम स्कंध के चतुर्थ अध्याय में ‘सात्वती श्रुति’ नाम से एक उल्लेख पाते हैं। नारायण ऋषि ने जब नारद जी को भागवत का उपदेश दिया, तब उसे ‘वेदसंमित’ कहा है। जैसे श्रौत-पद्धति का अवलंबन कर अनेक देवताओं की स्तुति करने वाले साधारण शास्त्रों को भी वेद कहा गया है, उसी प्रकार सात्वत-गण भागवत को वेदों का सर्वोत्तम अंश मानकर विचार करते हैं।

प्रयोजन-तत्व के निरूपण में ‘निगमकल्पतरोर्गलितं फलम्’ श्लोक में ‘निगम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके अतिरिक्त उपनिषदों के अनेक मंत्र भागवत में यथावत प्रकट देखे जाते हैं। भागवत में स्थान-स्थान पर श्रुति-वाक्यों का न्यूनाधिक उल्लेख हुआ है—

श्रुतियों की अत्यंत सुगम एवं प्रांजल व्याख्या की गई है। यथा—

“अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः।
गायत्रीभाष्यरूपोऽसौ वेदार्थपरिबृंहितः॥”

गीता का विशेष अर्थ भागवत में देखा जाता है—यह ब्रह्मसूत्र का भाष्य-स्वरूप, वेदार्थ से परिपूर्ण और वेदमाता गायत्री की व्याख्या पर आधारित रचा गया है। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में भगवत्ता की चर्चा प्रचुर रूप से की गई है और श्रीकृष्ण के अन्य अवतारों का वर्णन भी इसमें स्थान प्राप्त करता है। उस श्रीमद्भागवत का उल्लेख विभिन्न शास्त्रों में मिलता है। जैसे स्कंदपुराण के विष्णुखंड के चार अध्यायों में, पद्मपुराण के उत्तरखंड में, गरुड़पुराण में और अन्य कई पुराणों में भागवत की प्रधानता वर्णित है। सर्वोपरि, भागवत का अनुगत संप्रदाय इसे ‘प्रमाण-शिरोमणि’ मानता है।

यह भागवत क्या विषय है, इसकी इतनी प्रशंसा क्यों है, और इसके प्रति इतना आग्रह (दौरात्म्य) ही क्यों है, इन विषयों को जानना आवश्यक है। यह कुछ व्यक्तियों की जीविका का साधन बन गया है, दूसरी ओर जो पारमार्थिक आदर्श पर स्थित हैं, उनके लिए भी यह परम सेव्य है। इसके अलावा संसार में रहने वाले चारों वर्ण और चारों आश्रमों के सभी लोगों के लिए यह ग्रंथ आराध्य है। भागवत में ऐसी कौन-सी बात है जो सभी श्रेणियों के लिए आराध्य है? इसमें कुछ कर्म-अनुष्ठान और विभिन्न अवस्थाओं के अनुकूल व्यवस्थाएँ हैं—जैसे ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासियों के धर्म का विषय पृथक रूप से लिखा गया है। वर्ण-विचार में विभिन्न वर्णों के लक्षण और उन लक्षणों द्वारा वर्ण-निर्धारण का विधान है। भागवत में दर्शन की बात और ज्ञानियों की सभी श्रेणियों की चर्चा है; अतः यह सभी के लिए पठनीय और परम आवश्यक है। पंडित, मूर्ख, स्त्री, पुरुष, संसारासक्त और संसारमुक्त—सभी के लिए यह विचारणीय है। यह भगवत-अभिन्न वस्तु है।

द्वादश स्कंध भागवत को भगवान के द्वादश अंग कहा गया है, किंतु यह विराट रूप की कल्पना के समान नहीं है। वास्तव में श्रीविग्रह के रूप में भगवान इसमें प्रतिष्ठित हैं। इसका विशेष रूप से अनुशीलन करने पर ही यह समझ में आता है।

अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णचंद्र के साथ चेतन और अचेतन दोनों की ही आवश्यकता जुड़ी है। किंतु वे अचेतन द्वारा आवेष्टित अवस्था में दृष्टिगोचर नहीं होते; अर्थात् चेतन-मिश्रित भाव से उन्हें नहीं देखा जा सकता। पुनः जब हम मलिन ज्ञान में लीन रहते हैं, तब भगवान की श्रीमूर्त्ति में भी अनेक मलिनताओं का अनुभव करते हैं। यह केवल अपने नेत्रों की असमर्थता मात्र है। इंद्रियों के भेद के कारण हम एक ही वस्तु को भिन्न-भिन्न रूपों में देखते हैं। जैसे—

मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्त्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गतः साग्रजः॥

जब बलराम जी के साथ श्रीकृष्ण कंस की सभा में प्रविष्ट हुए, तब उन्हें विभिन्न रसों का आस्वादन करने वाले व्यक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में देख रहे थे। किंतु निष्कलंक ज्ञान से युक्त व्यक्ति उस प्रकार से दर्शन नहीं करते। जो साधारण स्त्रियाँ हैं अर्थात् गोपियों की अनुगत नहीं हैं, वे जो दर्शन करती हैं, वह कुछ-कुछ काम-दृष्टि से युक्त दर्शन है। अपनी इंद्रियों की तृप्ति की इच्छा से जुड़े दर्शन में मलिनता रहती है। अनर्थों से घिरी अवस्था में पूर्ण-प्रकाश वस्तु का यथार्थ दर्शन नहीं होता। जो भेद (वकलन) करना जानते हैं, वे अंतर समझ सकते हैं। एक साधारण व्यक्ति और परम-मुक्त पुरुष के दर्शन में अंतर होता है।

प्रायः एक ही वस्तु भिन्न-भिन्न रूपों में क्यों दिखाई देती है? इसका उत्तर है—मलिनता के परिमाण के अनुसार। अनर्थ-युक्त अवस्था और अनर्थ-निवृत्ति के बाद का दर्शन पृथक होता है। धनात्मक वस्तु से यदि ऋणात्मक वस्तु के अंतर का निर्धारण किया जाए, तो वहाँ एक ‘Differentia’ (विभेदक तत्व) लक्षित होता है। २४ वर्ष के युवक के काव्य-अध्ययन और शिशु के काव्य-अध्ययन में एक अज्ञानी साधारण व्यक्ति भेद नहीं देख पाता; वह दोनों को एक ही समझता है। किंतु अनुभवी व्यक्ति उसे समझ सकता है। कई बार भेद-बोध के अभाव के कारण हम वस्तु-निर्णय में भ्रमित हो जाते हैं। इन सब विचारों की चर्चा संबंध-तत्व के प्रसंग में विस्तार से की जाएगी। विभिन्न स्तरों के तर्क-ज्ञान से रहित होकर सभी यदि प्रत्येक अवस्था में इसका अनुशीलन करें, तो साथ ही उनके अपने-अपने कर्तव्य निर्धारित हो सकते हैं और किसी प्रकार का संशय शेष नहीं रहता। भगवत-दर्शन से समस्त संशय दूर हो जाते हैं—

“भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे॥”

पूर्व में ही मैंने कहा है कि भागवत साक्षात भगवत-स्वरूप वस्तु है। इसका श्रवण, कीर्तन और मनन ही भगवदनुशीलन है। बाह्य जगत की वस्तुओं को देखते समय यदि तुरंत भगवत-दर्शन की स्मृति जाग्रत हो जाए, तो उस वस्तु के भोग अथवा त्याग की प्रवृत्ति के समय उस वस्तु का भगवान से क्या संबंध है, यह स्पष्ट हो जाता है। जैसे कोई व्यक्ति जब बाजे-गाजे के साथ विवाह करने जा रहा हो, और उस समय यदि उसके हृदय में श्रीकृष्ण के अप्राकृत रुक्मिणी-विवाह अथवा वृंदावन की लीलाओं का स्मरण हो आए, तो वह अपने भोग की सामग्री जुटाने के इस आयोजन की तुच्छता और दोनों के मध्य के अंतर को समझ सकता है। यदि कोई व्यक्ति श्रीपंचमी (सरस्वती पूजा) के दिन हाथ में खली लेकर पाठशाला जाते समय श्रीकृष्ण के सांदीपनि मुनि के आश्रम में जाने का विचार करे, अथवा अर्जुन या उद्धव के प्रति दिए गए भगवान के उपदेशों का उसकी स्मृति में उदय हो—अर्थात् वह कृष्ण-संसार में वास करे, कृष्ण-कथा में रत रहे और कम से कम श्रीगौरसुंदर के आचरणों से अपने कर्मों का मिलान कर ले, तो वह समस्त विपत्तियों से मुक्त हो जाता है।

भागवत ही सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। प्रमाण द्वारा शक्ति-संपन्न होने के उपरांत ही हम श्रद्धा-युक्त हो सकते हैं। उत्कृष्ट रूप से जिसे अंगीकार किया जाए वही प्रमाण है। भागवत नित्यलीलामय भगवान के चरित्र-वर्णन का प्रमाण है। भागवत द्वारा क्या कार्य सिद्ध होता है? यह संपूर्ण मानव जाति के भीषणतम रोग की सबसे बड़ी औषधि और चिकित्सक दोनों ही है। जो भयानक व्याधि तत्वज्ञ दार्शनिकों के मध्य भी प्रविष्ट हो चुकी है—वेदांतसूत्र की निर्विशेष व्याख्या, जिसे अंग्रेजी भाषा में Impersonalism कहते हैं, वही सबसे भीषण व्याधि है। भगवत्ता को निर्विशेष रूप में स्थापित कर अपने जड़-विशेष का दंभ भरना ही मुख्य व्याधि है, जैसा कि हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, रावण, कुंभकर्ण, कंस और जरासंध आदि का हुआ था। यह व्याधि विचारशील प्राणी-जगत के परम कल्याण में बाधा पहुँचाने वाला अत्यंत प्रबल Cogent Engine है! इसने भागवत-धर्म को नष्ट करने के लिए क्या-क्या प्रयास नहीं किए! वर्तमान समय में ईश्वर-विमुखता का भाव—‘हम किसी के अनुगत नहीं होंगे’—यही हमारा स्वभाव बन चुका है। भागवत को कभी समझा नहीं जा सकता यदि यह कहा जाए कि इसमें निर्विशेष का विचार है। इस चरम व्याधि से मुक्ति पाने के लिए वैष्णवों के अनुगत होकर निरंतर भागवत का पठन करना आवश्यक है। जैसे नामापराध करने वाले के लिए निरंतर नाम-जप ही नामापराध के विनाश का एकमात्र उपाय है:

“नामापराधयुक्तानां नामान्येव हरन्त्यघम्।
अविश्रान्तप्रयुक्तानि तान्येवार्थकराणि च॥”

अपराध की चरम सीमा ही यही है—भगवत्ता को निर्विशेष भाव में स्थापित करना। मापते-मापते Tabula rasa (कोरी पट्टी) तक पहुँचना, अर्थात् जड़ जगत की समस्त मलिनताओं और खंड-ज्ञान के अनुभवों से मुक्त होकर त्रिपुटी-विनाश (ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय का लोप) की अवस्था प्राप्त करना ही वह भीषण व्याधि है। उस व्याधि से मुक्त होना हो तो भागवत के निकट बैठकर भागवत की चर्चा करनी होगी, भागवत-विरोधियों के पास नहीं। जो चौबीसों घंटे भागवत की सेवा करते हैं, जिनका प्रत्येक कर्म ही भगवत-सेवा है, जो चेतन-दर्शन के आधार पर धर्म को स्वीकार करते हैं और जो केवल जड़-पिंड के दर्शन में आबद्ध नहीं हैं—ऐसे पूर्णचेतन विग्रह स्वरूप वैष्णवजन, जो पूर्ण-प्रज्ञा के अधीन भागवत-स्वरूप हैं और अचेतन की मलिनता से ज्ञान का संग्रह नहीं करते, वे ही भागवत का यथार्थ उपदेश दे सकते हैं।

यदि भागवत के भीतर कल्पित कहानियाँ अथवा Archaeological research or chroniclers—इतिहासकारों के कौन-कौन से अंश हैं, इसका विचार करने लगें, तो भागवत का सच्चा अध्ययन नहीं हो सकेगा। श्रीगौरसुंदर ने जिस प्रणाली से भागवत की चर्चा करने का निर्देश दिया है, तदनुसार चर्चा न होने पर खरपतवार को बचाकर मूल वृक्ष ही उखाड़ दिया जाएगा। इसलिए २४ घंटों में हम कभी भी इसके श्रवण, कीर्तन और मनन से विलग न हों।

भागवत में ऐसे अनेक वचन हैं—
“निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः।
दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा॥”

रात्रि निद्रा में बीत जाती है और दिन चढ़ने पर आयु-धर्म के वश में होकर इंद्रिय-तृप्ति का प्रयास कैसा कष्टदायक होता है, यह सभी जानते हैं। कामुकता की तृप्ति हेतु वानर के gland द्वारा rejuvinated होने का प्रयास, मकरध्वज का सेवन कर शरीर को स्वस्थ रखने की चेष्टा, ‘कलप’ (हेयर डाई) लगाकर काले केश बनाए रखना और कृत्रिम दाँत लगाकर युवावस्था को थामे रखने का प्रयास कार्योपयोगी दर्शन के अभाव के कारण पराये चश्मे से अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर स्वास्थ्य संग्रह का यत्न करते हैं। किंतु “आधिक्ये न्यूनतायाञ्च च्यवते परमार्थतः”—अत्यधिक साधन करने पर साधक के साधन से च्युत होने की संभावना अधिक रहती है। गीता में कहा गया है कि जो लोग आत्म-पीड़न करते हैं, वे तामसिक हैं। जो अपने ही गाल पर स्वयं थप्पड़ मारने की चेष्टा करते हैं, उनका भी कोई कल्याण नहीं होता। और जो लोग सांसारिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक विषयों से भी दूर भागते हैं, उनमें भी अनित्यता विद्यमान है। सारा दिन धन कमाने के प्रयास में व्यतीत होता है, और अधिक धन होने पर लोक-रंजन कैसे करें अथवा आवश्यकता पड़ने पर लोगों से पुनः सम्मान और दान कैसे मिले, इन्हीं व्यर्थ चेष्टाओं में मनुष्य व्यस्त रहता है।

‘अन्य कुटुंब भले ही अकाल से नष्ट हो जाएँ, किंतु मैं अपने कुटुंब की थोड़ी सेवा कर प्रतिष्ठा प्राप्त कर लूँ।’ कृष्ण-सेवा की चेष्टा के अतिरिक्त अन्य कोई भी चेष्टा उदय होगी तो विपत्ति ही आएगी। अतः जहाँ जितनी चेष्टाएँ हैं, उनका त्याग करके परम प्रयोजन के लिए यत्न करना आवश्यक है। उन्हें त्यागकर जितने भी धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र अथवा सात्विक शास्त्र हैं, उन्हें यदि हम standard मान लें और सबको छोड़कर केवल रजोगुण और तमोगुण के विधान से काम चलने दें, तो राजसिक और तामसिक आचरण के कारण यूरोप और अमेरिका की जो दुर्दशा हुई है, वही हम पर भी आक्रमण करेगी। रजोगुण और तमोगुण से प्रेरित होकर सत्त्वगुण को विनष्ट करने की प्रवृत्ति का परिणाम भगवान पग-पग पर दिखाते हैं। जब हम मत्स्य-धर्म (मत्स्य-न्याय) अपनाकर कांटे में लगा चारा खाते हैं, तब कांटे के angle में चमड़ी बिंध जाने पर मत्स्य-भक्षी हमारा मांस खाते हैं; तब समझ में आता है कि उन्होंने हमारे विनाश के लिए ही हम पर इतनी दया की थी।

भागवत के एकादश स्कंध का अनुशीलन करने पर ज्ञात होता है कि रजोगुण द्वारा तमोगुण का नाश करके, सत्त्वगुण द्वारा रजोगुण की प्रवृत्ति को समाप्त करना होगा, और फिर विशुद्ध-सत्त्व द्वारा मिश्र-सत्त्व को भी विसर्जित करना होगा। रजोगुण का कार्य क्या है? ‘मैं बड़ा परोपकारी हूँ, Red cross society का member हूँ, देश-विदेश के flood relief का कार्य करना ही हमारा धर्म है!’ इससे क्या सिद्ध होता है? कुछ नहीं; बस यह कि ‘मैंने दूसरों का जो उपकार किया है, उसके बदले में वे मेरी कामुकता के लिए ईंधन जुटाते रहें।’

सत्त्वगुण के द्वारा इस प्रवृत्ति को शांत करना होगा। यदि राजसिक लोग कहें कि ‘विष्णु-भक्ति के कारण देश रसातल में चला गया’, तो यह केवल उनके तमोगुण की ही वृद्धि करेगा। भागवत ने जो महान उपकार किया है, उसके वास्तविक कार्य की वे कभी चर्चा नहीं करते।

भागवत ने किस विषय का विवेचन किया है? श्रीकृष्ण, रोहिणी-नंदन बलराम, दशरथ-नंदन राम, परशुराम, वामन, वराहदेव, नृसिंहदेव, कूर्मदेव, मत्स्यदेव, लक्ष्मीनारायण, ब्रह्म और परमात्मा की व्यापकता और उनकी शक्तियों का सविस्तार विवेचन किया है। अतः निर्विशेष रूपी व्याधि का निराकरण कर सविशेष-धर्म की पूर्णता यहाँ स्थापित की गई है। इस चिकित्सालय में—जहाँ समस्त औषधियों का भंडार है, श्रीचैतन्य महाप्रभु और उनके अनुगतों द्वारा निःस्वार्थ भाव से औषधि का वितरण किया जा रहा है। किंतु इस देश का ऐसा दुर्भाग्य है कि किसी भी प्रकार भागवत इस देश से बाहर हो जाए, इसी कुत्सित प्रयास में लोग लगे हुए हैं और यही उनका मुख्य कर्तव्य बन गया है। वे भागवत में दोष ढूँढ़कर मनुष्य को सकाम कर्म-प्रवृत्ति के बंधन में बांध रहे हैं। संसार को नश्वर जानते हुए भी—

“कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्च्यादमंगलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥”

—इस श्लोक के विचार से विमुख होते ही हमारे भीतर फल-भोग की आकांक्षा प्रबल हो उठती है। भागवत (४।२२।३९) में एक और बात कही गई है—

“यत्पादपंकजपलाशविलासभक्त्या
कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः।
तद्वन् न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध-
स्रोतोAttributeगणास्तमरणं भज वासुदेवम्॥”

एकमात्र शरणीय वासुदेव के चरणकमलों के पलाश (अंगुलियों अथवा नखों) के विलास-रूप भगवत-भक्ति के साधन द्वारा संतजन बद्ध-जीवों की कर्म-ग्रंथि का जिस प्रकार समूल उच्छेदन कर देते हैं, वैसा संचित कर्म-बीज के निवारणार्थ कर्म-शून्य विचार में रत संयमी यतियों के अनुष्ठानों द्वारा सिद्ध नहीं हो पाता। अतएव उन वासुदेव की सेवा करना ही शास्त्र-विहित है।

वासुदेव के विषय में सभी जानते हैं: “सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव शब्दितम्”। वह वासुदेव-तत्व विशुद्ध सत्त्व है; दूसरों के समान रजोगुण से उनकी सृष्टि नहीं होती और न ही तमोगुण से उनका कभी विनाश होता है। मैं उस अधोक्षज-तत्व का भजन करता हूँ। ‘अरण’ शब्द का अर्थ है शरणीय। एकमात्र वासुदेव की ही शरण ग्रहण करनी होगी। रजोगुण अथवा जड़-सत्त्व का संरक्षण करने से काम नहीं चलेगा; अपितु जो सत्त्व काल द्वारा कभी विनष्ट नहीं होता, उसी विशुद्ध सत्त्व में वासुदेव का प्राकट्य होता है। वे पुरुषोत्तम तत्व हैं; उन्होंने तीनों गुणों को तिरस्कृत किया है, अतः उन्हीं की शरण लेनी होगी।

श्लोक में ‘रिक्तमतयः’ का अर्थ है vacant बुद्धि वाले—सब कुछ छोड़कर Tabula rasa की भाँति ‘सब शून्य और निर्विशेष कर दो’—ऐसी बुद्धि से जो रहित हैं, वे ही उनका भजन करते हैं। ‘निरुद्धस्रोतोAttributeगणाः’—समस्त इंद्रिय-प्रवाहों को रोकने के प्रयास में जो लगे रहते हैं, वे भी शांति नहीं पाते। अत्यंत असंयत व्यक्ति भी यदि भगवत-सेवा में लग जाए, तो उसका कल्याण सुलभ हो जाता है।

“यत्पादपंकज…………सन्तः”—अर्थात् भगवान के चरणकमलों की अंगुलियों की शोभा का निरंतर स्मरण करते हुए भक्तजन पूर्व-संचित कर्म-वासना रूपी हृदय-ग्रंथि का अनायास ही छेदन कर देते हैं। ‘पलाश’ का अर्थ अंगुलि है; उसकी विचित्रता अर्थात् विलास की जो सेवा-साहचर्य है (जैसे वज्रांग जी ने राघवेंद्र की सीता-वियोग की अवस्था में जो सेवा और साहचर्य प्रदान किया), वह भगवान का विलास है और भक्त के पक्ष में सेवा है। मनुष्य कर्म के आश्रय में ग्रथित होता जा रहा है—‘मैं अपने कर्मों का फल स्वयं भोगूँगा’—इस प्रकार की दुर्बुद्धि कर रहा है। जैसे ग्रीस देश में virtue & piety का संग्रह करना ही धर्म माना जाता था।
किंतु ठाकुर महाशय (श्रील नरोत्तम दास ठाकुर) ने कहा है—

“पुण्य से सुखेर धाम, तार ना लइओ नाम, पाप-पुण्य—दुइ परिहर।”

मुंडकोपनिषद् में भी कहा गया है—
“तदा विद्वान् पुण्य-पापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति।”

पापी जन पुण्य-संग्रह में व्यस्त रहते हैं। Altruistic Propaganda करने वालों का मुख्य कार्य यही है—उन्होंने या उनके बंधु-वर्ग ने जो-जो अन्यायपूर्ण कार्य किए हैं, उन पर whitewash करने का प्रयास करना। यह निम्न श्रेणी के व्यक्तियों के लिए है। कर्माशय का अर्थ है स्वर्गादि लोकों में निवास का प्रयास; उससे मनुष्य को कुछ समय के लिए शांति मिल सकती है, किंतु वह स्थायी नहीं टिकती। इन दोनों आशाओं और वासनाओं का जो त्याग कर देते हैं, वे निर्विशेष ज्ञानी अथवा Gnostic—Impersonal aspect of Godhead को अपना लक्ष्य बनाते हैं। उस विषय रूपी व्याधि के वास्तविक चिकित्सक श्रीमद्भागवत हैं। भागवत ने वासुदेव के भजन का उपदेश दिया है; वह Phytographic, zoo morphic or anthropomorphic demonstration नहीं है। हम समयानुसार इस विषय पर पर्याप्त चर्चा करेंगे।

तब भव-रोगी संप्रदाय की यह विषम व्याधि—निर्विशेष वेदांत-विचार के नाम पर रजोगुण और तमोगुण की प्रवृत्तियों को बढ़ाना, अथवा ‘सर्वत्र ब्रह्म-दर्शन’ के नाम पर दरिद्र को नारायण मानकर स्वयं दाता बनकर जन्मांतर में प्रशंसा या सेवा पाने की चेष्टा—इस सबका मूल्य फूटी कौड़ी से भी कम प्रतीत होगा। भागवत-चर्चा के अभाव के कारण ही आज विभिन्न देशों में इस भ्रम का आदर हो रहा है। वे कह रहे हैं—धर्म को सरल शब्दों में altruism कहा जा सकता है, अर्थात् सत्त्व के परिचय से उसका अंश बनकर, रजोगुण और तमोगुण से चालित होकर संसार में वास करना। ‘पहले कुछ नहीं था, बाद में भी कुछ नहीं रहेगा, जड़ के सम्मिश्रण से चेतना उत्पन्न हुई है और अंत में redistributed हो जाएगी’—आदि विचार रोग के समान हैं। धर्म-जगत में जितने भी रोग उत्पन्न हुए हैं, उन सभी की चिकित्सा-प्रणाली भागवत में उपस्थित है। भागवत समस्त रोगों का विनाश कर रोग के मूल उद्गम तक को समूल उखाड़ फेंकता है।

यदि मनुष्य के पास श्रवण करने योग्य कान हों, तो वह Antitheistic (ईश्वर-विरोधी) विचार-प्रवाह को थूक से उड़ा देगा। किंतु यदि उसके कान empiricism (अनुभववाद) के प्रभाव में हैं, तो बाह्य जगत का विचार-प्रवाह उस पर आक्रमण करेगा। उस आक्रमण को dismantle (नष्ट) करने की पूरी व्यवस्था श्रीमद्भागवत ने की है।

कुछ लोग कहते हैं—“भागवत में अनैतिक प्रसंगों से भरी कृष्ण-लीला की चर्चा की गई है, अतः भागवत की विचार-प्रणाली तो व्यभिचार को बढ़ावा देने के लिए है!” किंतु हम कहते हैं—यह कोई allegory (प्रतीक-कथा) या इतिहास (history) मात्र नहीं है। इसमें क्या साम्यता और क्या विषमता है, इसे समझने के लिए थोड़ा समय देना होगा।

“धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्॥”

—इस विचार को ग्रहण करने पर ही भागवत क्या है, यह हम समझ सकेंगे। चतुर्वर्ग-प्रयासी (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की इच्छा रखने वाले) विचारशील और अपनी इंद्रियों की तृप्ति का साधन खोजने वाले प्रत्येक व्यक्ति से यह प्रश्न है—यदि तुम वास्तविक सुख चाहते हो, तो वास्तविक सुख के एकमात्र कर्ता श्रीकृष्ण को छोड़कर सुख कहाँ पा सकोगे?

_  _ _ _ _ _ _ _ _