पंचम दिवस
(20 अगस्त, 1935, मंगलवार)
हेलोद्धूलितखेदया विशदया प्रोन्मीलदामोदया
शाम्यच्छास्त्रविवादया रसदया चित्तार्पितोन्मादया।
शश्वद्भक्तिविनोदया शमदया माधुर्यमर्यादया
श्रीचैतन्य दयानिधे, तव दया भूयादमन्दोदया।।
[हे दयानिधि श्रीचैतन्य! जो अनायास ही समस्त क्लेशों को दूर कर देती है; जिसमें पूर्ण निर्मलता है; जिससे पूर्ण सुगंध का विस्तार होता है अथवा परमानंद (जो अन्य सभी विषयों को आच्छादित कर लेता है) प्रकट होता है; जिसके उदय होने पर शास्त्र-विवाद शांत हो जाते हैं; जो रस प्रदान करती है और रस-वर्षण द्वारा चित्त में उन्मत्तता का संचार करती है; जो नित्य सेवा-प्रवृत्ति का विधान करती है; सर्वदा भगवन्निष्ठा प्रदान करती है और जो माधुर्य-मर्यादा में प्रतिष्ठित है—वैसी ही नव-लक्षणा आपकी वह दया सब प्रकार के अमंगलों का नाश कर जगत् का मंगल विधान करे।]
श्रीकृष्णचैतन्यदेव दयानिधि हैं, उनकी दया ‘अनन्द’ (परम कल्याणकारी) उदय कराती है। जो दया जीव के भविष्य में अमंगल लाती है और केवल तात्कालिक सुख उत्पन्न करती है, उसे नित्यकाल शुभ प्रदान करने वाली दया नहीं कहा जा सकता। परंतु दयानिधि—जिनके पास ऐसा कुछ नहीं जो अवितरणीय (न देने योग्य) हो, जो सहज ही ‘अमन्दोदया’ दया का वितरण कर सकते हैं—वे ही चैतन्यदेव कहते हैं: श्रीमद्भागवत का श्रवण, श्रीमूर्तियों की पाद-पद्म सेवा, साधु-संग, नाम-संकीर्तन और मथुरा-वास—इन पाँचों के अल्प संग से ही जीव की भक्ति की वृद्धि होकर प्रेमभक्ति की प्राप्ति होती है। जिन लोगों का विचार केवल धर्म-अर्थ-काम तक सीमित है—अर्थात् इस लोक और परलोक में केवल अपने सुख-भोग की कामना है अथवा विषय-भोग के अभाव से जनित मोक्ष-प्राप्ति का विचार है, उन्हें भागवत-श्रवण की आवश्यकता नहीं है। चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का प्रयास जब तक जीव के हृदय में विद्यमान रहता है, तब तक भगवत्तत्व की बात वहाँ स्थान नहीं पा सकती।
कल हमारे बीच उरुक्रम अधोक्षज भगवान् के संबंध में कुछ चर्चा हुई थी। उस उरुक्रम, पुरुषोत्तम, अधोक्षज भगवान् के स्थान पर अपरोक्ष, अतीन्द्रिय, निर्विशेष आदि जो शब्द हमें मिलते हैं, वे अपूर्णता-सूचक होने के कारण ‘अमन्द’ (परम मंगल) का उदय कराने में असमर्थ हैं। उनसे वस्तुतः भगवान् की दया प्राप्त नहीं होती। परंतु दामोदर स्वरूप—जो वेदांतशास्त्र में परम पारंगत थे, जिनका पूर्व नाम पुरुषोत्तम भट्टाचार्य था और जो वेदांत के अध्ययन के लिए वाराणसी गए थे—उनका विचार मानव का मंगल-साधन करना था। किंतु जब उन्हें यह बोध हुआ कि चतुर्वर्ग के प्रयास से वास्तविक मंगल नहीं होता, तब हृदय में श्रीचैतन्य के चरण-कमलों की स्फूर्ति होने पर वे श्रीचैतन्य के चरणों का आश्रय लेने हेतु पुरुषोत्तम (पुरी) पहुँचे और उनसे उस ‘अमन्दोदया’ दया की प्रार्थना की। वह दया नौ प्रकार से प्रकट होती है—(१) हेलोद्धूलित-खेदा, (२) विशदा, (३) प्रोन्मीलदामोदा, (४) शाम्यच्छास्त्र-विवादा, (५) रसदा, (६) चित्तार्पितोन्मादा, (७) शश्वद्भक्ति-विनोदा, (८) शमदा और (९) माधुर्यमर्यादा।
“आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां… व्रजसुन्दरिणाम्” इस श्लोक में जिस मुकुंद-पदवी की बात कही गई है, जो श्रुतियों के विशेष अन्वेषण का विषय है, जो वेदांत का एकमात्र चरम प्रतिपाद्य विषय है और जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए समस्त श्रुतियाँ अत्यंत व्यग्र रहती हैं—वही वस्तु ‘मुकुंद-पदवी’ है। उनका भजन कब और किसके द्वारा संभव है? आर्यपथ और स्वजनों के परित्याग का सामर्थ्य जिनमें आ चुका है; जो लौकिक स्वजनों पर निर्भर रहकर कृष्ण के प्रति अपनी निर्भरता को त्यागने वाले विचार के नहीं हैं—वे ही आर्यपथ और स्वजन-परित्यागी व्यक्ति मुकुंद-पदवी की सेवा करने में समर्थ हैं। यही समस्त श्रुतियों का प्रतिपाद्य विषय है।
वर्तमान समय में हमारा जो ज्ञान है, वह प्रायः नाना प्रकार के अज्ञान से ढका हुआ है। कई बार “तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो…” श्लोक में वर्णित विचार से भ्रमित व विमूढ़ होकर जीव यह सोच बैठता है कि ‘मैं सब समझ गया हूँ’ और अहंकार से मोहित हो जाता है। उस प्रतीति के कर्तृत्व-अभिमान के कारण वह वास्तविक सत्य को समझ नहीं पाता। यदि मैं वास्तव में अपने मंगल का प्रार्थी बनूँ, तो श्रीचैतन्यदेव मेरा मंगल विधान करते हैं। प्रत्येक चेतन-धर्म में स्थित व्यक्ति के वे ही मंगल-विधाता हैं। जो नित्य मंगल के स्थान पर साधारण अमंगल को पाने के लिए तत्पर रहते हैं, उनकी विचार-धारा में आस्वादन का विपर्यय (रस-विपर्यय) घटित होता है—अर्थात् इस जगत् में वे भगवद्-रस से रहित होकर जड़-रस को ही श्रेष्ठ मान बैठते हैं और उसी में मत्त होकर उस चेतनमय रस से, जो विशुद्ध चेतना में उदित होता है, वंचित रह जाते हैं।
दो प्रकार के रस प्राप्त होते हैं—एक प्रेयः-मार्ग में और दूसरा श्रेयः-मार्ग में। प्रेयः-मार्ग में जड़-रस का उपभोग करने वाले के काव्यशास्त्र में जिस रस के आस्वादन की बात कही गई है, उसका आस्वादन करने पर विचार-भ्रांति उपस्थित होती है। आस्वादनकर्ता के हृदय में मल-प्रवेश के कारण अमल (निर्मल) रस का आस्वादन नहीं हो पाता। श्रेयः-मार्ग में चिद्-रस (आध्यात्मिक रस) ही आस्वादन का विषय है। जैसा कि श्रील रूप प्रभु ने ‘उपदेशामृत’ ग्रंथ में कहा है—
स्यात् कृष्णनामचरितादिसिताप्यविद्या-
पित्तोपतप्तरसनस्य न रोचिका नु।
किन्त्वादरादनुदिनं खलु सैव जुष्टा
स्वादी क्रमाद्भवति तद्गदमूलहन्त्री।।
मनुष्य जब रोगग्रस्त होता है, तब आस्वादनकर्ता की जिह्वा अनेक व्याधियों से घिरी रहती है। ‘क्या भला है और क्या बुरा’—इस प्रकार का विचार आकर बाधा पहुँचाता है। अनर्थ-युक्त अवस्था में रस-विचार करने पर यदि कोई प्रेयः-मार्गी होता है, तो श्रेयः-मार्गी जन कहते हैं कि उस जड़-रस के भोग से विरक्त होना ही श्रेयस्कर है। वर्तमान काल में जड़-इंद्रियाँ ही हमारी संपत्ति हैं; उन इंद्रियों के संचालन से जो जड़-विलास उत्पन्न होता है, उससे पृथक होना या उसका विपरीत ‘वैराग्य’ अपनाना—परंतु वह भी हमारी मूल आवश्यकता नहीं है। जड़-विलास और जड़-वैराग्य को दूसरी भाषा में भोग और त्याग कहा जाता है। भागवत में कहा गया है—
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते।
न तीर्थपदसेवाये जीवन्नपि मृतो हि सः।।
‘जो कुछ भी कर्म हम करें, वह धर्म के लिए न हो; अथवा धर्म करने पर भी वह सांसारिक भोग के लिए संपन्न हो, ऐसा वैराग्य उचित नहीं है; और वैराग्य भी यदि तीर्थपद (भगवान्) की सेवा के काम न आए’—इस प्रकार का विचार जब तक बना रहता है, तब तक—“जीवन्नपि मृतो हि सः” (वह जीवित होता हुआ भी मृत के समान है)। उस समय हम चेतना की स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते रहते हैं। उसे जीवन्मृत की अवस्था कहा गया है। प्रेयः-मार्ग द्वारा संचालित होकर—ईश्वर-सेवा से विमुख होकर जड़-रस में प्रमत्त हो पड़ते हैं। केवल आध्यक्षिकता (इंद्रियपरकता) ही आवश्यक प्रतीत होने लगती है। आनंद-लाभ के दो मार्ग हैं—प्रेयः और श्रेयः। प्रेयः-मार्ग में आनंद प्राप्त करने में जो दोष है, वह वैराग्य के मार्ग से दूर होता है। हम कर्तापन के धर्मवश जिन कर्मों का आह्वान करते हैं, उनसे जो रस उत्पन्न होता है, श्रेयः-मार्गी कहते हैं—उसका त्याग करना ही कर्तव्य है। विलास का विलोम वैराग्य है। श्रीचैतन्यदेव की ‘अमन्दोदया’ दया इन दोनों ही विचारों से परे है। श्रुतियों के विशेष अन्वेषण की जो वस्तु ‘मुकुंद-पदवी’ है, उसका भजन महा-महावैदांतिकों में अग्रगण्य, विशुद्ध चेतना में स्थित, परम-सिद्धा और सर्वोत्तमा गोपियों ने किया था। इंद्रिय-लोलुप व्यक्ति अपने-अपने जड़-रस के आस्वादन हेतु जिस विचार में प्रवृत्त रहते हैं, वैसे प्रेयः-मार्ग का अनुसरण न करके, स्वजनों और आर्य-मर्यादा के पथ का परित्याग कर अधोक्षज-विचार के अंतर्गत आश्रय-जातीय गोपियों ने आत्म-विज्ञान प्राप्त किया। गुण-जनित सत्त्व-प्रधान विचार से जो निर्धारित होता है, उसे त्यागने का सामर्थ्य केवल वैराग्य में कहाँ? जो लोग अपनी स्वाभाविक नित्य उत्कट प्रीति-चेष्टा के वशीभूत होकर भगवान् द्वारा आकर्षित होकर सेवा के प्रति यत्नशील हुए हैं, वास्तविक वस्तु के विचार में जिनके हृदय में वास्तविक रस का प्राकट्य हुआ है—वे रज और तम को तो छोड़ ही चुके हैं, सत्त्वगुण की उत्तम बातों तक का परित्याग कर कृष्ण के चरण-कमलों का आश्रय ले चुके हैं; वास्तव में वे ही श्रेयः-मार्गी हैं। जिनका ज्ञान अज्ञान से आच्छादित है, जो विवर्त के शिकार होकर ‘भगवद्-ज्ञान तुच्छ है और कपोल-कल्पित, जड़-विशेषता-रहित निर्विशेष ज्ञान ही महान है’—इस माया-मृगतृष्णा में फँस गए हैं, उनके कल्याण के लिए चैतन्यदेव के नित्य-दास ने श्रीचैतन्य की पूर्ण दया को ‘अमन्दोदया’ कहा है। भागवत के अनुशीलन द्वारा ही उस वस्तु की प्राप्ति संभव है। इसीलिए “जन्माद्यस्य यतः” आदि प्रथम श्लोक में संबंध-ज्ञान की बात कही गई है।
जड़-विशेष अप्रासंगिक है। जड़ जगत् का तिक्त अनुभव होने पर भोग के विचार से त्राण पाने के लिए मनुष्य ‘नेति-नेति’ का विचार लाकर भोग से निवृत्त होता है। चूँकि सुख भोगने पर दुःख मिलता है और प्रेयः-मार्ग ग्रहण करने पर त्रिताप-यंत्रणा भोगनी पड़ती है, अतः ‘बोध-रहित होना ही अंतिम सत्य है’ या ‘बोध-साहित्य के विशेष अन्वेषण से रहित होना ही परम पद है’—जिनका ऐसा विचार है, वे भी अज्ञानियों की श्रेणी में ही आते हैं। सर्वाधिक भ्रांत व्यक्ति विवर्तवाद का आश्रय लेकर जड़ता को अथवा जड़ को चिद्-भ्रांति के रूप में ग्रहण करते हैं। उसमें वास्तविक तत्त्व कुछ भी नहीं है। वे कहते हैं—’अल्प, संकीर्ण जड़-भोग ज्ञान की चेष्टा के साथ जड़ातीत भक्तिपूर्ण पुरुषोत्तम-ज्ञान की चेष्टा सजातीय है; अल्प-क्रम वाले की चेष्टा और उरुक्रम की चेष्टा एक ही जैसी है’। अज्ञानवश वे भगवद्-सेवा से वंचित होकर, भगवल्लीलानुकूल वस्तु की उपेक्षा कर निर्विशेषवाद को ही श्रेष्ठ स्थान पर बिठाते हैं। चैतन्यदेव ने उसकी व्यर्थता को उजागर करके मानव-जाति का जो उपकार किया है, वही हमारे लिए प्रार्थनीय है। जो लोग पूर्ण को अपूर्ण सिद्ध करने की कुत्सित पिपासा रखते हैं, वे भारी संकट में पड़ चुके हैं। दामोदर स्वरूप ने निर्विशेष-विचार प्रणाली, जिसमें निर्विशिष्ट मोक्ष ही अभीष्ट माना जाता है, उससे मुक्ति पाकर जड़-सविशेष को स्वीकार नहीं किया। वे प्राकृत-सहजिया के इस विचार में नहीं पड़े कि ‘प्रकृति-जनित जगत् में ही विविधता है और चित्-शक्ति का वैचित्र्य-विचार जड़-शक्ति के ही अंतर्गत है’। जो लोग ऐसे विचार में स्थित हैं, वे अत्यंत दुर्भाग्यशाली हैं। जड़-सविशेष में चिद्-सविशेष का विवर्त (भ्रम) मान लेने पर अभीष्ट लाभ के स्थान पर अधःपतन निश्चित हो जाता है। जड़-रस को समाप्त करना होगा, सुखाना होगा, किंतु “रसो वै सः”—वह सच्चिदानंद रस तो बना ही रहेगा। यदि ऐसा न हुआ, तो प्रकृतिवादी का बौद्ध-विचार अथवा मायावादी का केवल शुष्क तर्क बनकर रह जाएगा। बुद्ध को सच्चिदानंद-वस्तु न मानकर बौद्धों ने एक स्वतंत्र जड़-भोग्य अवास्तविक विचार गढ़ा है। जड़-सविशेष धर्म जब तक नष्ट नहीं होता, तब तक सांसारिक प्रपंच को लेकर उस वस्तु के सान्निध्य से दूर रहना होगा। परंतु जिस क्षण चेतना का उन्मेष होगा और यह समझ में आएगा कि ‘चिद्-विशेष’ क्या तत्त्व है, तभी भागवत-श्रवण का वास्तविक अधिकार प्राप्त होगा।
लीला कोई सामान्य उद्देश्यपरक सांसारिक क्रिया नहीं है। ‘मानव-लीला’ या ‘दरिद्र-नारायण’ जैसा विचार रखने वाले घूम-फिरकर Henotheism (पञ्चोपासना) या Impersonalism (निर्विशेषवाद) में ही जा गिरते हैं। जड़-सविशेष के पार जाने के बाद जिस चिन्मय रस की बात आती है, उसी की चर्चा होनी आवश्यक है। उस रस की तिलांजलि देना ही सब कुछ नहीं है।
दहरोपनिषद् (छांदोग्य) में जो बातें कही गई हैं, जैसे—“स यदि पितृलोककामो भवति… मातृलोककामो भवति… भ्रातृलोककामो भवति… स्वसृलोककामो भवति… सखिलोककामो भवति… गन्धमाल्यलोककामो भवति… यदि अन्नपान-लोककामो भवति… यदि गीतवादित्रलोककामो भवति… स्त्रीलोककामो भवति… यं यमन्तमभिकामो भवति… यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते।”
ये सब कामनाएँ होने पर “भूतेज्या यान्ति भूतानि” का ही विचार चरितार्थ होगा। कामदेव-संबंधी कामना उदित होने के पूर्व तक यह सब केवल सांसारिक वासना मात्र है। “श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छ्यामं प्रपद्ये” के विचार को यदि केवल प्रत्यक्ष अनुमान का विषय मान लिया जाए, तब तो वह केवल empiricism (अनुभववाद) बन जाएगा। हमें प्रकृति के relativity (आपेक्षिकता) में आच्छादित करके ‘उरुदाम्निबद्धाः’ (महान् बंधनों में आबद्ध) कर रखा है। उरुक्रम के पाद-पद्म के स्पर्श की योग्यता होने पर ही हम आध्यक्षिकों (इंद्रियपरक ज्ञानियों) के विचार-चातुर्य के खोखलेपन को समझ सकेंगे।
‘हेलोद्धूलितखेदया’—जीव के हृदय में जो भी कष्ट और ताप-त्रय आदि से उत्पन्न मलिनता उपस्थित होती है, उससे मुक्ति पाने का यत्न करना आवश्यक है। कोई-कोई सोचते हैं कि जड़-जगत् के अमंगल में ही बने रहेंगे, और यदि बार-बार इसी संसार के अमंगल में घूमते रहें, तो भविष्य में सुख भोगने की सुविधा मिल जाएगी। किंतु परम-मुक्त महापुरुषों का विचार ऐसा नहीं होता। भोगरूपी निद्रा की खुमारी को त्यागकर मनुष्य यदि चैतन्य-युक्त हो जाए, अपने वास्तविक स्वरूप और आत्मा की पहचान पा ले, तो वह अनात्म-प्रतीति के संकट से छुटकारा पा लेता है।
जिस समय माया की सृष्टि नहीं हुई थी—अर्थात् अचित्-परिणाम प्रवृत्त नहीं हुआ था—उस समय भी चित्-शक्ति द्वारा प्रकटित वैकुंठ का समस्त वैचित्र्य विद्यमान था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। आध्यक्षिक विचार में ही केवल आपेक्षिकता (relativity) होती है। ईश्वर श्रीकृष्ण का सिद्धांत है—“असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात्।”
भागवत-संप्रदाय में सांख्य्यायन, सनत्कुमार आदि ने नाना प्रकार से विचार किया है। निरीश्वर-सांख्य, बहुत्ववादी बहु-ईश्वरवाद (Polytheism) आदि विभिन्न विरोधी संप्रदायों का भी अभाव नहीं है। जब एकायन-पद्धति प्रचलित थी (सत्ययुग में), तब केवल एक मात्र नारायण की ही पूजा होती थी। ‘एकायन’ का अर्थ है संख्या-रहित (अद्वैत)। जब वह विचार बाधित हुआ, तभी त्रेतायुग में ध्यान-निष्ठा के खंडित होने से जीवों की दुर्गति हुई। त्रेता में वेद-त्रयी की उत्पत्ति हुई और पुरूरवा के समय से कर्मकांड का प्रादुर्भाव हुआ।
एक एव पुरा वेदः प्रणवः सर्ववाङ्मयः।
देवो नारायणो नान्य एकोऽग्निर्वर्ण एव च।।
पुरूरवस एवासीत् त्रयी त्रेतामुखे नृप।
अग्निना प्रजया राजा लोकं गान्धर्वमेयिवान्।।
(भागवत ९।१४।४८-४९)
इस पर श्रीधर स्वामी की टीका है—
“ननु अनादिवेदत्रयबोधितो ब्राह्मणादीनाम् इन्द्राद्यनेकदेवयजनेन स्वर्गप्राप्तिहेतुः कर्ममार्गः कथं सादिरिव वर्ण्यते तत्राह एक एवेति द्वाभ्याम्। पुरा कृतयुगे सर्ववाङ्मयः सर्वासाम् वाचां बीजभूतः प्रणव एक एव वेदः। देवश्च नारायण एक एव। अग्निश्चैक एव लौकिकः, वर्णश्चैक एव हंसो नाम। वेदत्रयी तु पुरूरवसः सकाशात् आसीत्। एयिवान प्राप। अयम्भावः—कृतयुगे सत्त्वप्रधानात् प्रायशः सर्वेऽपि ध्याननिष्ठाः। रजःप्रधाने तु त्रेतायुगे देवादिविभागेन कर्ममार्गः प्रकटो बभूवेति।
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।।
वर्तमान समय में केवल हरिकीर्तन ही एकमात्र संबल है। उसी से हम जान पाएँगे कि वास्तविक तत्त्व क्या है। सत्य के सदृश दिखने वाली आभासी वस्तुओं का सहारा लेना उचित नहीं है। ‘विशदा’—अर्थात् पूर्णतः निर्मल; ‘आमोद’—जिसमें सुगंध उत्कृष्ट रूप से प्रस्फुटित हुई हो; जिसमें कोई दुर्गंध न हो—ऐसी ही कृपा होती है, निर्विशेष हो जाना कृपा नहीं है। यह सुरभि-युक्त स्वरूप है। भगवत्कृपा रूपी वायु के चलने से संसार की सारी धूल सहज ही उड़ जाती है—सफ़ाई हो जाती है। कर्म-मार्ग के आश्रित व्यक्तियों को ही सर्वाधिक कष्ट झेलना पड़ता है। इसके विपरीत मत का विचार है—अव्यक्त।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।
जो कृष्ण-चेतना से शून्य हैं, उनके दुःख का वर्णन नहीं किया जा सकता; वे अपने ही विचारों के अनुसार दुर्गति भोग रहे हैं। उससे मुक्ति पाना अनिवार्य है। राजा पुरूरवा की काम-वासना के कारण ही वेद-त्रयी का विस्तार हुआ। पुरूरवा उर्वशी के रूप पर मुग्ध होकर कर्मकांड में प्रवृत्त हुए थे। रूप-रस आदि तुच्छ विषयों में आसक्त होने के कारण उनके कृष्ण-दर्शन में बाधा आई। Aesthetic culture (सौंदर्य-संस्कृति) में relative activity (सापेक्ष क्रियाशीलता) विद्यमान रहती है, और यह empiricist (इंद्रियानुभववादियों) का ही विचार है।
चैतन्यदेव की ‘अमन्दोदया’ दया में कर्मकांड के लिए कोई प्रश्रय नहीं है। जीव ताकि ऐहिक और पारलौकिक भोगों में न फँसा रहे, इसके लिए उन्होंने प्रयास किया है।
‘शाम्यच्छास्त्रविवादा’—ज्ञानी वर्ग की विचार-धारा में “अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन…” वाले गुरु-तत्त्व का भी नाश हो जाता है। वे सोचने लगते हैं कि ‘गुरु और मैं अलग नहीं हैं, गुरु नित्य नहीं हैं, मैं स्वयं ईश्वर में विलीन हो जाऊँगा’—यह वास्तविक श्रीमद्भागवत-व्याख्या
…सत्य की खोज न पाकर केवल अंधेरे में हाथ-पैर मारने की व्यर्थ चेष्टा है। ‘ज्ञाने प्रयासमुदपास्य…’, ‘श्रेयःसृतिं भक्तिमुदस्य…’, ‘येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनः…’, ‘नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं…’ आदि भागवत के जिन श्लोकों का अनुशीलन करने वाले जानते हैं कि ऐसे शुष्क मार्ग पर आगे बढ़ने से अंततः मनोरथ निष्फल ही रहता है—और वास्तव में व्यक्ति अज्ञान में ही स्थायी रूप से फँसा रह जाता है। मुक्ति-कामी छल-कपट का आश्रय लेकर कुछ समय Henotheism (पञ्चोपासना) में बिताकर अंत में स्वयं Impersonal (निराकार) बनकर अपनी सत्ता ही खो बैठते हैं—यहाँ तक कि गुरु के महत्त्व को भी समाप्त कर देते हैं। चैतन्यदेव ने इन सभी विरोधी विचारों का समन्वय कर दिया है। भागवत की चर्चा करने पर शास्त्रीय यथार्थ से दूर भटकने की जो स्थिति आती है, उससे सहज ही निवृत्ति मिल जाती है।
‘रसदा’—जड़-रस और चिद्-रस के मध्य जो भेद है, उसे समझाकर वे वास्तविक चिद्-रस प्रदान करते हैं। सांसारिक खेदों के शांत होने पर और परस्पर विवादी विचारों के शमित हो जाने पर विशुद्ध ‘भक्ति-रस’ उपस्थित होता है। चित्त में इस दिव्य रस के आते ही भगवद्-उन्माद का संचार होता है और दिव्य आस्वादन की मस्ती आती है। ब्रह्मरस का विशुद्ध ज्ञान प्रबल हो उठता है। प्रपंच में अवतरित विषयों को केवल आरोह-विचार (तर्क-पद्धति) से समझने के प्रयास से जो अमंगल उत्पन्न होता है, उससे रक्षा पाकर जीव ‘चित्तार्पितोन्मादा’ की स्थिति को प्राप्त करता है।
‘शश्वद्भक्तिविनोदा’—वह दया निरंतर नित्य सेवा-प्रवृत्ति प्रदान करने वाली है।
‘शमदा’—’जो मन्निष्ठा (भगवन्निष्ठा)’ रूपी प्रज्ञा प्रदान करती है। “ज्ञानं मे परमं गुह्यं यद्विज्ञानसमन्वितम्”—भगवान्, परमात्मा और ब्रह्म के ज्ञान में ‘मे ज्ञानं’ अर्थात् भगवत्-ज्ञान ही परम है, अन्य ज्ञान सामान्य—मध्यम और निम्न श्रेणी के हैं। विशेष-ज्ञान निर्विशेष ब्रह्म में नहीं होता। कुछ अंश परमात्मा में रहता है, किंतु उसमें पूर्ण रहस्य नहीं है। एकमात्र भगवत्-ज्ञान में ही तदंग, रहस्य और विज्ञान-सहित पूर्ण ज्ञान विराजमान रहता है। केवल बाहर-बाहर से ‘हरिबोल’ कहकर व्यापकता के धर्म की आड़ में जड़-भोगपरकता को भगवद्भक्ति पर आरोपित करना कदापि उचित नहीं है। योगियों की विचार-प्रणाली में ऐश्वर्य की मर्यादा है, विभूतियों की चर्चा है; परंतु माधुर्य-विज्ञान के अभाव के कारण केवल परमैश्वर्य ही उनका काम्य विषय बन पाता है। ऐश्वर्य की महत्ता दरिद्र की दृष्टि में होती है; दरिद्र यदि स्वयं धनवान बन जाए, तो धन के प्रति उसकी उदासीनता या वितृष्णा आ जाती है। माधुर्य के प्रति आकर्षण बढ़ जाने पर वह ऐश्वर्य का भाव टिकता नहीं। भक्ति द्वारा हम ऐश्वर्य के कुछ अंश पा भी लें, तो अगले ही क्षण माधुर्य के प्रबल होते ही ऐश्वर्य की अपूर्णता पर हम कभी आकृष्ट नहीं होते। ‘मैं बड़ा बनूँगा, दूसरों की क्या बात’—यह भाव घूम-फिरकर वास्तव में अभक्ति ही है। भागवत में जितने भी श्लोक हैं, उनके सार को नौ लक्षणों के माध्यम से विचार करके वेदांतियों के शिरोमणि स्वरूप-दामोदर ने अपने इस स्वरचित श्लोक द्वारा श्रीचैतन्यदेव के चरणों का आश्रय लिया और उनकी दया की सर्वोत्तमता का गान किया। केवल अधोक्षज के सेवक ही इन गूढ़ बातों को समझ सकते हैं; अधपके, रसहीन शुष्क ज्ञानी में इन्हें समझने की योग्यता नहीं होती।
हमें भागवत का सम्यक् पाठ करना चाहिए। अब तक जो बातें कही गईं, वे मंगलाचरण का ही अर्थ थीं। मैं निर्विशेषवादी नहीं हूँ। भागवत से निर्विशेषवाद को शत-सहस्र योजन दूर फेंक दिया गया है। केवलाद्वैतवाद की कोई चर्चा भागवत में है ही नहीं। यदि आदि से अंत तक निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए, तभी भागवत का यथार्थ उद्देश्य समझ में आ सकता है। परम रूप से निर्विशेष के कामी पञ्चोपासक मूल के साथ संगति रखते हुए श्रीमद्भागवत की टीका नहीं कर पाते। टीका करने चलने पर उनकी अपनी विचारधारा नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है, यह जानकर वे एक भी श्लोक की उचित व्याख्या नहीं कर पाते। यदि कोई टीका करने का प्रयास भी करे, तो उसमें कुछ भक्तिपरक विचार तो आ सकते हैं, किंतु अंत में निर्विशेष स्थापित करने का उनका सारा प्रयास व्यर्थ ही सिद्ध होता है।
भागवत में केवलाद्वैतवाद की गंध भी नहीं है। इसमें शुद्धाद्वैतवाद का प्रतिपादन हुआ है, और वही परम प्रयोजनीय है; उसमें कोई त्रुटि नहीं है, क्योंकि वह भक्ति-पूर्ण है। शुद्धाद्वैतवाद जड़-भोग का नाशक और भक्ति-पूर्ण है। जहाँ द्वैतवाद जड़-विचारों से परिपूर्ण रहता है, वहाँ वह शुद्ध नहीं रह जाता; शुद्ध-द्वैतवाद ही वास्तविक चिन्मय आध्यात्मिकता है। भास्कर आदि का भेदाभेद-विचार जड़-भोग के विचारों पर आश्रित होने के कारण भ्रमपूर्ण है। विशिष्टाद्वैतवाद में भी कुछ अपूर्णता रह जाती है। श्रीचैतन्यदेव ने जिस ‘अचिंत्य-भेदाभेद’ सिद्धांत का दर्शन कराया है, उसमें कोई अपूर्णता या विरोध नहीं है; वही पूर्ण एवं निर्दोष विचार है।
अचिंत्य-भेदाभेद का विचार जिन्हें पच नहीं पाता, वे उसके वास्तविक मर्म को विकृत करके प्रतिपल सत्य का अपलाप करने की चेष्टा करते हैं। उनकी बातों में आकर भागवत के अमृत-वचनों को नहीं भूलना चाहिए। भगवान् पुरुषोत्तम हैं, उरुक्रम हैं; वे केवल ‘अपरोक्ष’ शब्द मात्र से निर्दिष्ट नहीं होते, वे उससे परे ‘अधोक्षज’ हैं; वे प्राकृत नहीं, बल्कि ‘अप्राकृत’ हैं। चेतन और अचेतन के रस को एक नहीं कर देना चाहिए। ईश्वर-विमुख जीवों ने कर्मफलवश जो स्थान प्राप्त किया है, वह वास्तव में एक कारागार है। यहाँ ‘अनया नीयते’ (प्रकृति द्वारा संचालित होने) का विचार और दास्य-भाव ही प्रबल रहता है। ‘भगवान् का कोई अंग-रूप नहीं है’—जिनका ऐसा विचार है, वे रहस्य-युक्त ज्ञान-विज्ञान को अज्ञान कहते हैं, यह उनकी अपनी अज्ञता का ही संकट है।
यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः।
तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्।।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्।।
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथा भासो यथा तमः।।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः।
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा।।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्।।
[भगवान् का जो स्वरूप है, उनके जो नित्य भाव हैं, उनके जो रूप, गुण और कर्म (लीलाएँ) हैं—वे सब भगवत्-कृपा से ही वस्तुतः मुक्त जीव के अनुभव का विषय बनते हैं। कृपा के अयोग्य, भगवद्-विरोधी और अवज्ञाकारी व्यक्ति अकुंठ वस्तु को छोड़कर भोग्य भावों, भोग्य रूपों, भोगपरक गुणों और जड़-आनंद के भ्रमों में स्थित रहने के कारण अहंकार-विमूढ़ होकर अंततः मायावादी बन जाते हैं।
सृष्टि के पूर्व भी भगवान् का ही नित्य अस्तित्व था और प्रलय के पश्चात भी केवल उन्हीं की सत्ता शेष रहती है। जड़-सत्ता और जड़-भोग से अतीत जो अनधिष्ठान तत्त्व है, उससे पृथक स्वरूप होते हुए भी वे ब्रह्म या परमात्मा से भिन्न नहीं हैं।
भगवत्तत्त्व की प्रतीति के अभाव में जो कुछ प्रतीत होता है, और भगवत्तत्त्व के अतिरिक्त जिसका कोई वास्तविक सत्तात्मक अस्तित्व नहीं है; परमात्मा के बिना जिसकी कोई प्रतीति संभव नहीं—वही ‘माया’ है। माया का स्वरूप द्विविध है—प्रकाशमयी जीव-माया और अंधकारमयी गुण-माया। शक्तिमान् तत्त्व और शक्ति के सम्यक् विचार द्वारा भ्रांति के निवारण हेतु ही यह परिभाषा है।
अभिधेय-विचार से ही यथार्थ जिज्ञासा का उदय होता है। अतत्त्वज्ञ में वास्तविक सत्य जानने की चेष्टा ही नहीं होती। अन्वय और व्यतिरेक—इन दोनों पद्धतियों द्वारा सर्वत्र और सर्वदा उसी भगवत्तत्त्व का श्रवण-कीर्तनादि करना ही परम कर्तव्य एवं विधेय है।]
[जिस प्रकार महाभूत (पंचमहाभूत) समस्त छोटे-बड़े प्राणियों में प्रविष्ट होकर भी वस्तुतः अप्रविष्ट के समान रहते हैं, उसी प्रकार भक्त-हृदय में नित्य प्रविष्ट होकर भी भगवान् अपने अधिष्ठान की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं; जिसके द्वारा प्रेमभक्ति की नित्य प्राप्ति के विषय में अज्ञानी और विज्ञ-भेद से अनधिष्ठित और अधिष्ठित—यह दोनों प्रकार की परिचय-विशेषता प्रकट होती है।]
वास्तव में अभक्तजन कभी भी भागवत नहीं पढ़ सकते। वे तो भुक्ति और मुक्ति के पिपासु—कर्मी और ज्ञानी हैं।
भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।
तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथम् अभ्युदयो भवेत्।।
कर्मी और ज्ञानी के विचार से भक्ति के स्वरूप-निर्णय में बाधा उपस्थित होगी। प्रेयः-मार्गी लोग मनोविकारों द्वारा संचालित होकर ‘यह भला है, यह बुरा’—इसी विचार में व्यस्त रहते हैं। “द्वैते भद्राभद्र-ज्ञान सब मनोधर्म”—अतः जड़-निर्विशेष और जड़-सविशेष दोनों का परित्याग करके एक ही साथ चिन्मय निर्विशेष और चिन्मय सविशेष का विचार ही ग्राह्य है, और वही अचिंत्य-भेदाभेद विचार है।
भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले।
अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम्।।
यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम्।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते।।
अनर्थोपशमं साक्षाद् भक्तियोगमधोक्षजे।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम्।।
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोक-मोह-भयापहा।।
[भक्तियोग के प्रभाव से निश्चल मन के भली-भाँति समाहित होने पर व्यासदेव ने कांति, अंश और स्वरूप-शक्ति से समन्वित श्रीकृष्ण को तथा उनके पश्चाद्भाग में गर्हित (लज्जित) भाव से आश्रिता माया को देखा। उस माया द्वारा जीव का स्वरूप आवृत और विक्षिप्त होकर, जीव सत्त्व-रज-तम रूप त्रिगुणात्मक जड़ से अतीत होने पर भी अपने को जड़-देह और मन-बुद्धि मान बैठता है। उस प्रकार के त्रिगुणात्मक अभिमान से उत्पन्न कर्तृत्व आदि के कारण वह संसार-वासना को प्राप्त करता है।
श्रीव्यासदेव ने देखा कि इंद्रिय-ज्ञानातीत भगवान् में अव्यवहित (अनन्य) भक्ति का अनुष्ठान होने पर ही संसार के भोग-दुःखों की निवृत्ति होती है। यह सब प्रत्यक्ष दर्शन करके सर्वज्ञ वेदव्यास ने इस विषय से अनभिज्ञ जन-समुदाय के कल्याण हेतु ‘श्रीमद्भागवत’ नामक परमहंसी संहिता की रचना की। इस परमहंसी संहिता श्रीमद्भागवत के श्रवण मात्र से ही परमपुरुष श्रीकृष्ण के प्रति शोक, मोह और भय का नाश करने वाली पराभक्ति का उदय होता है।]
सात्वत-संहिता भागवत का अध्ययन न करने तक जीव केवल इंद्रियपरक (आध्यक्षिक) ही बना रहता है। भागवत परमहंसी संहिता है। परमहंसगण—परममुक्त निष्किंचन जन क्या कह रहे हैं, यह जानने की और चर्चा करने की यदि इच्छा हो, तो दशम स्कंध का अनुशीलन करना होगा। दशम स्कंध के अनुशीलन के उपरांत एकादश स्कंध का अध्ययन न करने पर अधःपतन निश्चित है। इसीलिए भागवत-श्रवण ही हमारा एकमात्र कर्तव्य है; भागवत-श्रवण में ही अन्य चारों अंग—साधु-संग, नाम-संकीर्तन, श्रीमूर्ति की चरण-सेवा और मथुरा-वास स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। मथुरा अर्थात् ज्ञान-भूमि; पूर्ण ज्ञान में निवास करना और अज्ञानमयी चेतना में वास न करने का नाम ही मथुरा-वास है। “नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च” आदि पांचरात्र की चरण-सेवा पद्धतियाँ भी भागवत में निहित हैं।
श्रीचैतन्यदेव के चरणों का आश्रय लेने पर ही ‘आसक्तिस्तद्गुणाख्याने’ का विचार समझ में आएगा, तभी वास्तविक रस का बोध होगा। जड़-रस का भाव रहने तक चिन्मय रसमय स्वरूप भगवान् को समझना असंभव है। निर्विशेष विचार में केवल जड़-रस का नाश मात्र होता है। उससे छुटकारा पाकर पुनः जड़-रस प्रबल न हो जाए, इसीलिए चिद्-रस की चर्चा अत्यंत आवश्यक है। वह केवल नाम-संकीर्तन से ही संभव है, क्योंकि नाम ही साक्षात् रसमय विग्रह है।
नामचिन्तामणिः कृष्णश्चैतन्यरसविग्रहः।
पूर्णः शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नत्वात् नामनामिनोः।।
रस के विपर्यय में जो रस-दर्शन है, और जड़ अलंकार-शास्त्र में जिस रस तथा काव्यप्रकाश, भरतमुनि आदि के जो विचार हैं—वे शुद्ध नहीं हैं। ‘उज्ज्वलनीलमणि’, ‘अलंकारकौस्तुभ’ आदि के अनुशीलन से ही चिद्-रस की यथार्थ उपलब्धि होती है। चैतन्यचंद्र की कृपा होने पर ही समस्त अमंगल दूर होंगे। लौकिक जड़ नायक-नायिका के विचार से पूर्णतः निवृत्त होना पड़ेगा। दोनों को एक नहीं माना जा सकता।
जो लोग जड़ के साथ चिद्-रस की समानता का विचार करते हैं, वे अपराधी हैं। आगे चलकर सिद्ध हो जाएँगे—ऐसा विचार करने वाले “सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः” श्लोक के ही लक्ष्य बनते हैं। भगवान् उनके रसरहित नीरस ब्रह्म-विचार को विनष्ट कर देंगे; जैसा कि कंस, जरासंध, हिरण्यकशिपु आदि की दशा हुई।
सच्चिदानंद-विग्रह जब अपने रस की उरुक्रमता (अलौकिक विस्तार) दिखाते हैं, तब क्षुद्र संकीर्ण बुद्धि वाले मनुष्य के मस्तिष्क में जो आध्यक्षिकता (इंद्रियपरकता) है, और महाज्ञानी व महाकर्मी का जो अहंकार है, वह सब बहकर धुल जाता है। चैतन्यदेव ने कहा है—“याह भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने” (जाकर वैष्णव के चरणों में भागवत पढ़ो)। जो चौबीसों घंटे भगवान् की चर्चा में मग्न रहते हैं, उन्हीं के श्रीमुख से भागवत का श्रवण करना चाहिए। कुमार्ग पर जाने पर व्यक्ति पहले निर्विशेषवादी बनता है, और उसके उपरांत जड़-सविशेषवादी बन जाता है। कदम-दर-कदम हर निर्विशेषवादी का अंततः सर्वनाश और अधःपतन ही होता है। ‘सब कुछ मायामय है’ कहते-कहते वैकुंठ तक को अपनी सीमा में नापने की चेष्टा में अंततः वे तीन आयामों (Three dimensions) के भौतिक घेरे में प्रविष्ट होकर घोर जड़ता को प्राप्त करते हैं और भयंकर क्लेश भोगते हैं।
क्लेश-नाशिनी भक्ति का आश्रय न लेने पर—अर्थात् भागवत-भक्त के सान्निध्य में भागवत का श्रवण न करने पर सर्वनाश निश्चित है। भोगी व्यक्ति भागवत का वास्तविक पाठ नहीं कर सकता। उसके मुख में भगवान् (भगवन्नाम) का वास नहीं हो सकता; पञ्चोपासक अथवा अघ, बक और पूतना के अनुगामियों के मुख से कभी भागवत नहीं सुननी चाहिए। श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार गोकुल में अठारह प्रकार के असुरों का वध किया था, उसी प्रकार इन समस्त अघासुर-बकासुर-पूतना रूपी भृत्य-वर्ग के अनुकरण में कृष्ण को मिटाने की चेष्टा करने वाले पाखंडी मतों का भी कृष्ण स्वयं नाश कर देंगे। असुरों का अनुगमन करना या उनका बहुमान करना कदापि उचित नहीं है, और न ही उनका अनुग्रह चाहने योग्य है। जिन-जिन नामों से देवता हैं, उन्हीं नामों से असुर भी विद्यमान हैं। वे मनुष्यों को भ्रमित करके चेतन-धर्म से शून्य कर देते हैं। अतः केवल भगवद्भक्तों की चरण-रज ही एकमात्र परम आवश्यक और श्रेयस्कर वस्तु है।