षष्ठ दिवस
(२३ अगस्त, १९३५, शुक्रवार)
ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं
तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चिनुतं शरण्यम्।
भृत्यार्त्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं
वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥

मैं उस महापुरुष के चरणों की वंदना करता हूँ, जो ‘शिव-विरिञ्चि-नमस्कृत’ हैं—अर्थात् महादेव, ब्रह्मादि जिन्हें सर्वदा प्रणाम करते हैं। वे जगद्वरेण्य हैं; उनके आश्रय की आकांक्षा सभी करते हैं। वे संसार के मालिन्य को सर्वथा दूर करने में समर्थ हैं। हमारी जो प्रार्थना होनी चाहिए, वे उसके अनुसार फल प्रदान करते हैं। वे ही ध्यान के योग्य हैं। जड़-पदार्थ तो भोग्य हैं, वे ध्येय नहीं हैं। तुम्हीं अपने सेवकों के क्लेशों का निवारण करते हो। तुम्हीं शरणागत जनों के पालनकर्ता हो। तुम्हारे चरण भवसागर पार कराने वाली नौका के समान हैं। हे महापुरुष! मैं तुम्हारे चरण-कमलों की वंदना करता हूँ। यह महापुरुष कौन हैं? श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक में ही हमें इनके ध्यान का उपदेश प्राप्त होता है—

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥

वे परमेश्वर-तत्त्व ही हमारे ध्यान का विषय बनें। वश्य वस्तु—अर्थात् हमारे अधीन यह संसार ईश्वर नहीं है; अपितु परमेश्वर ही ध्यान का विषय हैं, जिन महापुरुष के विषय में आगे ‘ध्येयं सदा…’ श्लोक में कहा गया है।

“वेदशास्त्र कहे—सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन।”

भागवत निगम-शास्त्र (वेद) का सर्वप्रधान ग्रंथ है। इसी ने उस वास्तविक तत्त्व का संधान दिया है, जिससे हमारे जैसे लोग उस भगवत्तत्त्व की सेवा करने के लिए उत्साहित हो सकें। हम सर्वदा सेवा-विमुख रहते हैं। सेव्य के दर्शन से सेवक की सेवा-उत्कंठा में वृद्धि होती है।
भागवत में ब्रजेन्द्रनंदन की बात कही गई है। वेदशास्त्र जिस सम्बन्ध की बात करते हैं, उसी सम्बन्ध का निर्णय प्रथम श्लोक के ‘सत्यं परं धीमहि’ वाक्य में हुआ है। वही परम एवं सत्य-तत्त्व हमारे ध्यान का विषय बने। भोग्य संसार का ध्यान करते-करते हमारे अनेक जन्म व्यतीत हो गए। भागवतकार व्यासदेव कहते हैं—‘धीमहि’ अर्थात् ध्यायेम—हम सब मिलकर ध्यान करें। ध्यान की योग्यता हममें है; किंतु जब तक हम सेव्य परमेश्वर को छोड़कर भोग्य-जगत के अन्य नश्वर विषयों का ध्यान करते हैं, तब तक परमेश्वर का ध्यान नहीं होता, केवल भोग ही होता है। जो हमारे अधीन वस्तु है, जिसका हम भोग या त्याग कर सकते हैं, उसी का ध्यान हो जाता है। ‘हमारा’ बहुवचन पद है। हम अनेक हैं, किंतु सेव्य एक हैं। ‘परम्’ एकवचन है। एकमात्र वही तत्त्व ध्येय है। हम सब मिलकर उस ध्येय-पदार्थ की सेवा करें। ध्यान-निष्ठा सत्ययुग की बात है। जब धर्म का एक भी चरण क्षीण नहीं हुआ था, द्विपाद या त्रिपाद धर्म का नाश नहीं हुआ था, तब ध्यान-निष्ठा ही थी; किंतु उसमें भगवद्-विस्मृति के कारण बाधा उत्पन्न हुई।

कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥

सत्ययुग के आरंभ में भक्तिमार्ग के पथिकों के लिए परमेश्वर विष्णु का ध्यान संभव था। उस समय सर्वकालिक भोग्य अन्य वस्तुएं ध्येय नहीं थीं, इसलिए नारायण का ध्यान संभव हो पाता था। किंतु पाप के प्रवेश करने पर—धर्म का एक चरण क्षीण होने से जीवों की सत्ययुगीन ध्यान-निष्ठा कुछ संकट में पड़ गई। तब यज्ञ की व्यवस्था हुई। उस समय बहुत से लोगों में सत्कर्म-निष्ठा प्रबल हुई। जीवों के नित्य-कृत्य कर्म-निष्ठा के अंतर्गत यज्ञ के द्वारा यजन-कार्य संपन्न होता था। धर्म के एक चरण के क्षय होने पर ध्यान करने हेतु यज्ञ के साहचर्य से पूर्णता प्राप्त होती थी। कालांतर में द्वापर युग में परिचर्या अर्थात् श्रीमूर्ति-सेवा का विधान प्रवर्तित हुआ।

इन हाथों से अर्चा (विग्रह) की सेवा करके सेवोन्मुखता को अभिव्यक्त कर सकते हैं। हाथों द्वारा एकत्रित सामग्री से पूजा कर सकते हैं। अर्चा पंचम स्तर पर स्थित भगवत्-प्रकाश मूर्ति है। जिसे हम सम्मुख देख रहे हैं (श्रीमूर्ति की ओर संकेत करते हुए), ये ही अर्चा-अवतार हैं। जब हम अर्चनीय विचार से सच्चिदानंद-तत्त्व के निकट उपस्थित होते हैं, तब असत्, अचित् और निरानंद की कल्पना का उस भगवद्-तत्त्व पर आरोप नहीं करते। अर्चन से पूर्व ‘भूतशुद्धि’ का विधान है, जिससे वर्तमान अर्चा का अधिष्ठान सेवोन्मुख रूप में परिणत हो जाता है। उपचारों का प्रोक्षण-कार्य आवश्यक होता है। अर्चा स्वयं भगवान् ही हैं; किंतु पाँच स्तरों का अतिक्रमण करने पर ही उस परमतत्त्व का ध्यान होता है। परिचर्या-विधान में पांचरात्रिक अर्चन-पद्धति है। समस्त वस्तुओं के अंतःकरण में अंतर्यामी-सूत्र से भगवान् का अधिष्ठान है। वे अन्य शब्दों में ‘पुरुषावतार’ कहे जाते हैं।

“यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा
य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः।
षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं
न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह॥”

अर्चा की उपासना हम हर समय कर सकते हैं। साक्षात् विग्रह मानकर समयानुकूल सेवा करने की योग्यता हम सभी में है, किंतु अंतर्यामी को सर्वदा चित्त में धारण करने में सब समर्थ नहीं होते। अर्चा प्रत्यक्ष साधन के सर्वथा योग्य है। सेव्य-अर्चा को भोग्य अथवा त्याज्य विचार में प्रतिष्ठित करना उचित नहीं है; उसमें सेव्य-भाव का विचार होना चाहिए। जैसे विग्रह के समक्ष जोर से बोलना, सांसारिक प्रपंच करना अथवा उनके सामने स्वयं भोग ग्रहण करना अपराध है, वहाँ कोई उद्दंडता नहीं चल सकती। सेवापराध के बत्तीस प्रकार वर्णित हैं। जब उनका ध्यान नाना प्रकार से संकट में पड़ा, तब अर्चन का विधान किया गया। यद्यपि उपरिचर वसु सत्ययुग में भी श्रीविग्रह की उपासना करते थे, किंतु द्वापर में ही इसका विशेष प्रसार हुआ। अर्चन में ‘ध्यान’ का एक अंग होता है; वह अंतर्यामी, वैभव और व्यूह का अतिक्रमण कर परतत्त्व-ज्ञान सहित की जाने वाली सेवा है। भोग की चिंता न करके यदि सेव्य की चिंता की जाए, तो ध्यान सुचारू रूप से संभव है। अर्चा को पार्थिव मानने पर भोग-बुद्धि जाग्रत होती है। जब धर्म के तीन चरणों को अधर्म ग्रस लेता है, तब एकमात्र संकीर्तन ही गति है। उदर-पोषण के लिए अर्चा-पूजा में प्रवृत्त रहने पर व्यक्ति विपथगामी न हो, यह देखना आवश्यक है। द्वापरकालीन अर्चन जब नाना प्रकार के तर्कों से आच्छादित होने लगा, तब हरिकीर्तन की व्यवस्था हुई—’कलौ तद्धरिकीर्तनात्’। हरिकीर्तन में ही अर्चन समाहित है; उसी के द्वारा यज्ञ और ध्यान की सार्थकता सिद्ध होती है। कलिकाल में धर्म के तीन चरणों के ह्रास के कारण हरिकीर्तन ही एकमात्र उपाय है। उसके प्रभाव से सब कुछ सिद्ध हो जाता है, यहाँ तक कि ध्यान-निष्ठा भी प्राप्त हो जाती है।

“कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥”

हम कीर्तन करते-करते उस परमेश्वर के सान्निध्य में पहुँच सकते हैं। ध्यान-निष्ठा, यजन-निष्ठा, अर्चन-निष्ठा—ये सभी कीर्तन में समाहित हैं। ‘कलि’ का अर्थ है विवाद। कोई भी बात कही जाए, उसका प्रतिवाद उपस्थित रहता है। एक पक्ष दूसरे पक्ष पर आक्रमण करेगा ही। कलि दोषों का सागर है। इसके अनगिनत दोष होने पर भी इसमें एक अत्यंत महान गुण है, जो सत्य, त्रेता और द्वापर में भी नहीं था। अत्यंत अयोग्य और दुर्बल जीवों के लिए यह ऐसी तीव्र गुणकारी औषधि है, जो उन तीन चरणों के धर्म की अयोग्यता को भी समाप्त कर यथार्थ फल प्रदान करने में समर्थ है।

कृष्णलीला द्वापर के अंत में अप्रकट (गुप्त) हो गई थी। कृष्ण-कीर्तन को सभी लोग जान सके। जैसे कल का सूर्योदय और सूर्यास्त, आज के सूर्योदय और सूर्यास्त को देखने पर पूर्णतः नूतन प्रतीत होता है, उसी प्रकार द्वापर के अंत में कलि के आगमन पर श्रीकृष्ण नित्य-प्रकटलीला का संवरण करके वर्तमान में कीर्तन-मुख में ही विराजमान हैं। अट्ठाइसवें चतुर्युग के द्वापर के अंत में श्रीकृष्ण के प्राकट्य-काल में उनके नित्य गुण, लीला, परिकर, रूप और नाम—इन सबके दर्शन का सुअवसर सौभाग्यशाली चेतन जीवों को प्राप्त हुआ था। कलि के प्रवृत्त होने के उपरांत कृष्ण-कीर्तन के द्वारा ही कर्म अथवा ज्ञान-प्रवृत्ति रूपी समस्त अमंगलों से सहज ही मुक्त होकर नित्य रूप, गुण, लीला, परिकरों के दर्शन का परम सौभाग्य घटित होता है।

हम जड़-जगत के संकीर्ण नियमों में पूरी तरह जकड़े हुए हैं। कृष्ण-कीर्तन से वे सारे बंधन कट जाते हैं। कीर्तन होने पर ही दर्शन और श्रवण की पात्रता आती है। निर्माल्य की गंध में क्या दिव्य सुगंध है, यह हम कृष्ण-कीर्तन द्वारा समझ सकते हैं। जैसे सनकादि ऋषि भगवान के गुणों पर मुग्ध होकर भगवत्-सुगंध को ग्रहण करने की योग्यता पा सके थे। कीर्तन द्वारा सब कुछ संभव है। “प्रोन्मीलदामोदया”—यहाँ ‘आमोद’ शब्द का अर्थ सुगंध अथवा सुरभि है। कीर्तन के द्वारा उस दिव्य सुरभि की प्राप्ति होती है; भोग की सामग्री जैसे इत्र-फुलेल आदि सूंघने की दुर्बुद्धि नष्ट हो जाती है। उसके प्रभाव से आसक्ति-रहित होकर उस परमपुरुष के सान्निध्य में जाया जा सकता है, अर्थात् कृष्ण-सेवोन्मुखता प्राप्त होती है।

“अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥”

सेवोन्मुख चित्त में कीर्तन के प्रभाव से स्वयं-रूप श्रीभगवान अपने-आप ही प्रकट हो जाते हैं। कीर्तन के साथ ही उसकी अनुभूति होने लगती है।
‘सत्यं परं धीमहि’—परमेश्वर-तत्त्व के योग्य होकर हम सब उनका ध्यान करें। वह तत्त्व क्या है? सत्य, वास्तविक-ज्ञेय परमेश्वर। परमेश्वर का मुख्य प्रकाश सत्य ही है। ‘सत्’ शब्द का अर्थ है—नित्य वर्तमान रहना। जड़-जगत के पदार्थ भोक्ता के सम्मुख कुछ समय के लिए ही उपस्थित होते हैं, उसके बाद नष्ट हो जाते हैं। अतः उनका अस्तित्व तात्कालिक है, वह केवल ‘सत्याभास’ (सत्य का आभास) मात्र है। यह सत्य किसी दूसरे सत्य के आगमन से पराजित होने योग्य है—यह अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने में समर्थ नहीं है। परमेश्वर अविचलित, अचल, ध्रुव सत्य हैं; वे किसी अन्य वस्तु द्वारा आवृत होने योग्य नहीं हैं। वही उस ध्येय-तत्त्व का मुख्य लक्षण है। यह सत्य इस जगत के मलिन-हृदय जीवों के समक्ष नाना रूपों में प्रतिभासित होता है, क्योंकि बद्धजीव का हृदय अनेक प्रकार के असत्य के आवरणों से ढका हुआ है।

‘धाम्ना स्वेन’—‘धाम’ का अर्थ है किरण, प्रकाश, अथवा आश्रय। वास्तविक सत्य का जो धाम है, उसके द्वारा बद्धजीव की भोग-आकांक्षा और कपटता दूर हो जाती है। ‘कुहक’ शब्द का अर्थ है आवरण अथवा छलना। बाह्य दृष्टि से जो दिखाई देता है, वस्तुतः वह वैसा नहीं होता। उसका निवारण किसके द्वारा होगा? ‘स्वेन धाम्ना’ अर्थात् अपने ही तेज/धाम से। सत्य से कुहक का निवारण न होने की अवस्था—अर्थात् धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से तात्कालिक सत्याग्रह की जो पिपासा है—उतनी ही बात यहाँ नहीं है। ‘सदा’—अर्थात् नित्यकाल सत्य। क्षणिक काल के लिए ‘सदा’ शब्द प्रयुक्त नहीं हो सकता; यह कोई जादू के खेल जैसी बात नहीं है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से प्रेरित होकर परमेश्वर के अनुशीलन के नाम पर जो असंगत आडंबर खड़ा किया जाता है, यह वह नहीं है। परमेश्वर ‘निरस्तकुहक-सत्य’ हैं, वे सर्वदा सत्य से मंडित और नित्य वर्तमान हैं। सच्चिदानंद के विचार से रहित होकर जो त्रिगुणात्मक भोग्य-पदार्थों की खोज की जाती है, वह केवल सांसारिक ज्ञान का ही अंग है। प्राकृत सहजिया-संप्रदाय के लोग स्वयं को किशोरी (गोपी) मानकर जिस भोग्य किशोर (श्रीकृष्ण) का भजन करते हैं, वे अपनी जड़-भोग्य काम-भावना को प्रबल रखकर कृष्ण के आनंद की अनुभूति में बाधा डालते हैं। अर्थात् गोपियों के नित्य अनुगत्य के बिना किया जाने वाला भजन छलावों (कुहक) से आवृत होता है। भागवत में भगवान ही एकमात्र ज्ञेय हैं। चैतन्यदेव द्वारा निर्दिष्ट भगवान के विचार से पृथक होकर यदि हम मलिन हृदय से कृष्ण के आविर्भाव की बात करते हैं, तो वह दोषयुक्त है; वह ‘धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकम्’ नहीं हो सकता। यदि कोई यह कहे कि वे निर्विशेष ब्रह्म-प्रतिपाद्य अथवा परमात्मा-प्रतिपाद्य हैं, तो ‘भगवान’ शब्द से चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की चेष्टा के कारण विरोध उत्पन्न हो जाता है। इसीलिए भागवत ने उस कपटता के आवरण को पूर्णतः अनावृत कर दिया है। संकीर्ण धर्म-धारणाओं से आच्छन्न रहकर परमतत्त्व के संबंध में जो भिन्न-भिन्न कल्पनाएं की जाती हैं, उनसे मुक्त होना आवश्यक है।

मायावी कुहक की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा गया है—‘तेजोवारिमृदां यथा विनिमयः’। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि में एक के स्थान पर दूसरे का दर्शन होना भ्रांतिपूर्ण अथवा विवर्त-दर्शन है। जैसे मृगतृष्णा (मरीचिका) में जल का भ्रम होता है, किंतु निकट जाने पर जल नहीं मिलता। बाह्य दृष्टि का यह भ्रम, एक को दूसरा समझ लेना, एक के स्थान पर दूसरे की भ्रांति होना—जैसे आकाश को देखकर समुद्र का भ्रम अथवा तेज में जल का भ्रम आदि—यही ‘विवर्त’ है। तेज और जल के स्थान पर जो विपरीत धारणा उत्पन्न होती है, वहीं ‘कुहक’ (भ्रम) उपस्थित रहता है।

‘मुह्यन्ति यत् सूरयः’—जिसमें बड़े-बड़े विद्वान और ज्ञानी भी मोहित हो जाते हैं; पंडितों में भी आत्म-अहंकार आ जाता है।

मूढ़ होने का मूल कारण है—
“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥”

जो यह कहता है कि ‘मैं बहुत बुद्धिमान हूँ’, उसने उतना ही कम समझा है। मूर्ख बनने का यह सबसे सरल मार्ग है—‘foolishness made easy’।

“नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।
यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥”
—(केनोपनिषद्)

जो व्यक्ति यह कहता है कि ‘मैंने सब जान लिया है’, ‘मैं पक्का वैष्णव बन गया हूँ’, वह वास्तव में हरिभक्ति के मार्ग पर चल ही नहीं रहा है। पग-पग पर हमारी भ्रांति होती है। माया के कुहक द्वारा आवृत रहने के कारण सत्य का उद्घाटन तब तक संभव नहीं होता, जब तक हम उनके दिव्य प्रकाश से आलोकित न हो जाएँ। जैसे आँखें होते हुए भी प्रकाश के अभाव में मनुष्य अंधकार में हाथ-पैर मारता रह जाता है।

‘यत्र त्रिसर्गोऽमृषा’—इन समस्त क्षणभंगुर, नश्वर, ससीम पदार्थों का भगवद्-तत्त्व में कोई स्थान नहीं है; माया में आराध्य का कोई स्थान नहीं होता।
जैसे—

“ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः॥”

भगवान की माया को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। वे वैकुंठ-तत्त्व हैं। भगवत्-दर्शन के अतिरिक्त मायिक-दर्शन की भी कोई स्वतंत्र संभावना नहीं है। माया में भगवान नहीं हैं; पूजा और सांसारिक भोग-बुद्धि दोनों सर्वथा भिन्न हैं। माया-निर्मित इस संसार को हम अपने अधीन या उपयोग की वस्तु मान बैठते हैं; जैसे नासिका से हम सुगंध लेते हैं, कानों से शब्द सुनते हैं—हम स्वयं को सुनने का स्वामी मानते हैं, चाहें तो न भी सुनें, अनमने रह सकते हैं। भोगियों के भोग्य-पदार्थ संबंधी ज्ञान में अनेक बाधाएं आती हैं। उस परमसत्य में ‘त्रिसर्ग’ अर्थात् रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण—तथा जन्म, स्थिति और प्रलय आदि को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। त्रिगुणात्मक संसार में गुणातीत भगवान की स्थिति नहीं है।

‘अमृषा’ का तात्विक विचार करने पर—स्वरूप-शक्ति, बहिरंगा-शक्ति और तटस्था-शक्ति, ये तीनों शक्तियाँ जिनमें परम-शक्ति रूप में नित्य विद्यमान हैं। अचित्-शक्ति से यह जगत बना है, जो बद्धजीवों की भोग-भूमि है। यहाँ हमारी बद्धावस्था का यह प्रयास रहता है कि जिससे दुःख कम हो, वही सुख है; अर्थात् दुःख ही इस संसार की स्वाभाविक अवस्था है। भगवान में अनित्य, विरोधी सत्त्वादि गुणों का अधिष्ठान नहीं है; वहाँ तीनों शक्तियाँ नित्य वर्तमान रहती हैं। शक्ति और शक्तिमान के अभिन्न होने के कारण तत्त्व की एकता सिद्ध होती है। विभिन्न आंशिक प्रकाशों को देखने की योग्यता हममें विद्यमान है। शक्ति-परिचय के आधार पर एकात्म भाव में स्थित न होकर हम सांख्य-दर्शन के विचार में स्थित हो सकते हैं। जहाँ एकत्व है, वहाँ संख्यागत बहुत्व नहीं होता; जहाँ अखंड तत्त्व है, वहाँ संख्यागत भेदों का कोई समावेश नहीं होता। यहाँ सांख्य से तात्पर्य निरीश्वर सांख्य अथवा चौबीस तत्वों के अंतर्गत आने वाली बात से नहीं है। परलोक में—अर्थात् इंद्रियातीत दिव्य-जगत में—संख्यागत वैचित्र्य विद्यमान है; ऐसा नहीं है कि वहाँ केवल निर्विशेष भाव ही नित्य विराजमान रहता है।

विश्लेषणात्मक (Analytic) विचार—अर्थात् ‘unity’ (एकता) से ‘diversity’ (विविधता) का विचार ही ‘विशिष्टाद्वैत’ सिद्धांत अथवा ‘एकयन’ नाम से प्रसिद्ध है। सांख्य-सम्मत समस्त वैचित्र्यों के समन्वय के उद्देश्य से किया गया यह प्रयास ‘शुद्धाद्वैतवाद’ अथवा ‘चिन्मय-भेदसिद्धांत’ की एकरूपता को स्पष्ट करता है।

गुणातीत जगत जो है—वह त्रिगुणातीत जगत वैसा नहीं है, वहाँ परस्पर वैषम्य है—समता का अभाव है।

त्रिसर्ग की एक और व्याख्या है—गोकुल, मथुरा, द्वारका—ये ब्रजेन्द्रनन्दन के तीन स्थान हैं। श्रीहरि द्वारका में ‘पूर्ण’, मथुरा में ‘पूर्णतर’ और गोकुल में ‘पूर्णतम’ हैं। ‘पूर्णतमता पूर्ण-विकसित हृदय में ही देखी जा सकती है।’ अखिल रस की पूर्णतमता गोकुल में है। मथुरा-मंडल ज्ञान-भूमिका में रस-विचार से ‘तर’ संज्ञा वाला है।

मल्लानामशनिर्नृणां नरवरः स्त्रीणां स्मरो मूर्त्तिमान्
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।
मृत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्वं परं योगिनां
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रङ्गं गतः साग्रजः॥

यहाँ दो मूर्तियाँ हैं—स्वयंरूप और स्वयं-प्रकाश। द्वारका में चतुर्व्यूह-विचार से पूर्णता सिद्ध हुई है। चार ‘quadrant’ (वृत्तपाद) मिलकर पूर्णता बनी है। मथुरा में प्रद्युम्न और अनिरुद्ध उपस्थित नहीं हैं; गोकुल में स्वयंरूप हैं। वासुदेव का प्रकाश संकर्षण है, जो उनकी संवित्ति—विभुत्व-वर्णन का प्रकाश है। उस तत्त्व-प्रकाश के लक्षण में हम बलदेव प्रभु के चरण-कमलों तक पहुँच सकते हैं। उनसे चतुर्व्यूह प्रकट होता है। महावैकुंठ अथवा मूल-वैकुंठ में हम यही लक्षित करते हैं। जब कारण, गर्भ और क्षीरोदक में भी उनका पृथक्-पृथक् प्रकाश नहीं हुआ था, तब भी चतुर्व्यूह विद्यमान था। मथुरा ज्ञानमयी भूमिका है, द्वारका चतुर्व्यूह की लीला-स्थली है, किंतु वह द्विभुज-विचार से युक्त है। चतुर्भुज विग्रह-धाम परव्योम की अपेक्षा द्विभुज विग्रह-धाम द्वारका की श्रेष्ठता है। परव्योम में चार हाथ हैं, यहाँ (द्वारका में) दो हाथ हैं। यह (द्वारका) भगवान (श्रीकृष्ण) के निज धाम के तीन प्रकोष्ठों में से एक है। गोकुल में रस-विकास की पूर्णतमता है, अखिल रसामृतमूर्ति की पूर्णलीला का प्राकट्य है। यहाँ हास्य, अद्भुत, वीर, करुणादि सात गौण-रस पाँच मुख्य स्थायी-भावों को समृद्ध करने के लिए विद्यमान हैं। यद्यपि मथुरा में रौद्रादि गौण-रस हैं और वृंदावनादि के मधुर-रस की चर्चा यहाँ नहीं है, तथापि मथुरा कोई शुष्क ज्ञान-भूमि नहीं है। स्वयं-प्रकाश तत्त्व स्वयं पधारे हैं; भोग का तथाकथित ‘ethical principle’ (नैतिक सिद्धांत) रजक (धोबी)-वध के समय ही समाप्त हो गया। वे ऐसे अपूर्ण तत्त्व नहीं हैं जिन पर सांसारिक नीति का कोई दबाव (ethical restriction) थोपा जा सके। द्वारका, मथुरा, गोकुल इस त्रिसर्ग में जो नित्यकाल अवस्थित हैं, वही वास्तव-वस्तु भावत्रय के परमेश्वर ज्ञेय हैं। मानव-कल्पित जड़ के प्रभु-ज्ञान से उपनिषद् का अध्ययन करने में जो भूल हम करते हैं—ब्रह्म और परमात्मा के विचार में जो भूल करते हैं, अथवा द्वितीय पुरुषावतार के “सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्” मंत्र से युक्त आंशिक समष्टि-विष्णु की पूजा की ओर दौड़ते हैं, वे केवल उतनी ही सत्ता मात्र नहीं हैं। नष्ट न होने वाली त्रिपुटी के प्रबल काल में जो दुर्गति होती है, वे केवल उतने मात्र नहीं हैं। मैं उन परमेश्वर की बात कर रहा हूँ जो ईश्वरों के भी ईश्वर साक्षात् श्रीकृष्ण हैं।

ब्रह्मसंहिता में कहा गया है—
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः।
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥

असम्यक् आंशिक धारणा से आबद्ध ब्रह्म और परमात्मा रूपी समस्त अवतारों के, तथा समस्त कारणों के भी कारण सच्चिदानंद-विग्रह श्रीकृष्ण हैं। चिद्-विशेष सच्चिदानंद के आकर (स्रोत) के अविनाशी रूप की जो सर्वदा रक्षा करते हैं, बारहों रस जिनकी सेवा में नियुक्त रहते हैं, उनके द्वारा ही उन समस्त रसों की बूँदें इस जगत में प्रवाहित हुई हैं। वे परमेश्वर सच्चिदानंद-विग्रह हैं—विशेष रूप से उन्होंने संधिनी, संवित् और ह्लादिनी—इन तीनों शक्तियों को धारण किया हुआ है। ‘त्रिसर्ग’ शब्द से इन तीनों शक्तियों की व्याख्या भी कुछ विद्वान करते हैं। वे सत्यव्रत और त्रिसत्य हैं। उस सत्य-तत्त्व तथा नश्वर जगत की सृष्टिकारिणी बहिरंगा शक्ति जिनकी है, हम उनका ध्यान करते हैं। उसी तत्त्व के एक ‘secondary emanation’ (गौण प्राकट्य) के रूप में यह क्षुद्र जगत—’universe’ रचा गया है। त्रिआयामी विचार में लंबाई, चौड़ाई और मोटाई (गहराई) होती है। चार के आयतन के अवकाश में घन (cube) होते हैं—घन के भीतर वर्ग-संबंधी लंबाई और चौड़ाई होती है। एक के आयतन में रेखा-तल (linear surface) होता है; यह सब इसी में समाहित है। इसमें आबद्ध रहने पर बद्ध-भूमि के अनुमोदन और प्रतिषेध में ही व्यस्त रहना पड़ता है। त्रि-आयाम को दर्शाने वाला ब्रह्मांड भी—अंड (ब्रह्मांड) के भीतर का पदार्थ है, बाहर का नहीं। “बृहत्त्वाद् बृहणत्वात्” जो ब्रह्म हैं, उनके प्रकाश-विग्रह विधाता के रूप में जो ब्रह्मा हैं, यह अंड उन्हीं का है।

प्रागवैदिक युग में जब केवल नारायण का एकत्व था, तब त्रि-आयामी राज्य की ऐसी कोई बड़ाई नहीं थी, इसलिए उस विषय में अधिक विस्तार से कहना अभीष्ट नहीं है।

‘अस्य विश्वस्य जन्मादि यतः’—यह जो दृश्यमान विश्व है, जो इंद्रिय-ज्ञान का विषय और हमारी भोग-भूमि है, इसकी उत्पत्ति आदि जिनकी प्रकृति-शक्ति से होती है। अहंकार का त्याग करके भक्तिमान होने पर ही हम यह जान सकेंगे कि उस नित्य तत्त्व की अचित्-शक्ति माया द्वारा ही इस जगत की सृष्टि हुई है। यहाँ प्रत्येक स्थान पर गुणों की शिराएँ (nerves) देखने को मिलती हैं। गुण-जनित जगत का वर्णन करते हुए उन्होंने इसे—गौण—’secondary eclipsed manifestation’ (गौण तिरोहित प्राकट्य) कहा है। केवल इतने अस्तित्व का ही विचार किया जाए तो ईश्वर की शक्ति को संकुचित कर दिया जाता है। यह संसार एक कारागार है—’reformatory of imperfection’ (अपूर्णता का सुधारगृह)। भक्ति से भटके हुए बद्धजीव को घोर संशय के गर्त में परीक्षा हेतु प्रभु बनकर अपनी भोग्य वस्तु मानकर इस कारागार के भोग-व्यापार में बाँध रखा है। अन्य व्यर्थ की वस्तुओं द्वारा नित्य-सेवक की जो सेवा बाधित हो रही है, उसी का वर्णन सम्बन्ध-ज्ञान के समय किया जा रहा है। शक्ति के विकार से ही यह जगत उत्पन्न हुआ है।

विश्व की सृष्टि-प्रक्रिया (Cosmology)—उसका उद्भव किस प्रकार हुआ? यह कोई ‘Abraham begets’ (इतिहास-क्रम) जैसी बात नहीं है, अपितु ‘अन्वयादितरतश्च’ है। ‘Manifestive phase’—अर्थात् लीला-वैचित्र्य से परिपूर्ण नित्य-जगत यहाँ आच्छादित (eclipsed) हो गया है, जिससे वास्तविक सत्य के दर्शन में अपूर्णता (imperfection) आ गई है। यह छाया-जगत है; जिसकी यह छाया है, उस मूल तत्त्व की ओर जाना चाहिए। छाया को वास्तविक वस्तु मान लेने पर अ-वस्तु में ‘वस्तु’ का भ्रम उत्पन्न हो जाता है। वास्तविक जगत तो गोलोक-वृंदावन है, जहाँ विषय एक हैं और आश्रय अनेक हैं। वे एकमात्र सेव्य हैं और असंख्य जीव उनके सेवक हैं। एकमात्र सेव्य की सेवा के अतिरिक्त वहाँ अन्य कोई धर्म नहीं है। कुत्ते की सेवा करके भंगी बनना, घोड़े की सेवा करके साईस बनना, अथवा गाय की चिकित्सा करके पशु-चिकित्सक (Veterinary Surgeon) बनना या परोपकारिता (altruistic enterprise) के नाम पर मनुष्य की सेवा करते हुए भगवान को भूल जाना व्यर्थ है। फिर गोरी अथवा काली चमड़ी के आधार पर परोपकार की भिन्न-भिन्न व्यवस्थाएँ करना, बद्धावस्था की दासता मात्र है, नित्य सेवा नहीं। घर-परिवार, गाँव, विशेष जाति अथवा विशेष कालखंड के परोपकार-विचार (altruistic idea) में हमारा बहुत समय नष्ट हो जाता है। तुच्छ वस्तुओं की उपासना में प्रवृत्त होकर जीव उसी में लिप्त या व्यसनी बन जाता है; तंबाकू, मद्य, सुपारी आदि के चक्कर में पड़ जाता है। जगत की समस्त अभावग्रस्त वस्तुएँ ही हम पर आक्रमण करती हैं। हिंसक पशु हमारा मांस भक्षण करने को आतुर रहते हैं काम, क्रोध आदि छहों रिपु विषय बनकर हम पर आक्रमण करते हैं—रूप आँखों को अपनी ओर खींच लेता है, सुरीला संगीत कानों को आकर्षित करता है, कोई हमारी प्रशंसा कर दे तो हम उसकी सेवा में दौड़ पड़ते हैं। आत्मा की नित्य-वृत्ति सेवा इस प्रकार की सांसारिक वस्तु नहीं है। वह तो ‘पूर्ण’ की सेवा है, किसी भोग्य खण्डित अंश की नहीं। पूर्ण के रूप, गुण, लीला और परिकरों की विशेषताओं की सेवा करने पर ही हम यह समझ पाते हैं कि इस नश्वर जगत में केवल पूर्ण-जगत की छाया मात्र पड़ी है। छाया के पीछे भागने से कोई लाभ नहीं होता; वह तो मृगतृष्णा अथवा दृष्टिभ्रम (Phantasmagoria) के समान है।
गीता में कहा गया है—

“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥”

माप-तोल रूपी संकीर्ण धर्म से हमें मुक्ति कब मिलेगी? जब हम भगवान की वास्तविक आराधना करना सीख जाएँगे। माया का प्रभु बनने के व्यर्थ प्रयास को छोड़कर जब जीव इस सीमित धर्म से त्राण पाकर भगवान का भजन करता है, तभी उसे सांसारिक कष्टों अथवा भोग-विलास से मुक्ति प्राप्त होती है। जड़-भोगमय इंद्रिय-धर्म में सीमित माप-तोल का ही विचार चलता है—जैसे जहाज पर चढ़ते समय तीन बाम, तीन हाथ आदि नापा जाता है। हम निरंतर यही मापते रहते हैं कि किसके हृदय में कितने इंच की उदारता है, कितना रजोगुण या सत्त्वगुण है; जब तक हम इसी में उलझे रहेंगे, तब तक केवल सांसारिक दृष्टि ही बनी रहेगी। तब भागवत पढ़कर हम यह अनुसंधान करते हैं कि इसे ‘गौण’ क्यों कहा गया है, और परमेश्वर ही एकमात्र ‘सत्य’ क्यों हैं, यह समझ पाते हैं। सत्त्वादि तीनों गुणों का सर्ग असत्य है; यह विश्व परिवर्तनशील और विकारयुक्त है; केवल सच्चिदानंद ही शाश्वत और स्थायी हैं। जब हम संसार को सीमित दृष्टि से मापने जाते हैं, तब केवल विश्व-दर्शन ही होता है, जो भगवान का एक गौण रूप से रचित विधान है। और जब हम स्वयं को
समर्पित करते हैं, तब यदि वे अपनी ओर आकर्षित करते हैं, तभी हम उस परम आकर्षक को ‘श्रीकृष्ण’ के रूप में जान पाते हैं। वे केवल भवानी के स्वामी (शिव) मात्र नहीं हैं, अर्थात् वे केवल इस मायिक-संसार के नियामक मात्र नहीं हैं—

“कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्च्यादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥”

सकाम कर्मों द्वारा रचित समस्त लोक—पाताल से लेकर ब्रह्मलोक पर्यन्त—सब के सब परिणामी एवं नश्वर हैं। चौदहों भुवन किसी मुक्त-जीव का वास्तविक कल्याण करने में असमर्थ हैं। जहाँ तीनों गुणों का साम्यवाद है—वह विरजा नदी है, वहाँ भी सेव्य-तत्त्व की प्राप्ति जैसा कोई लाभ नहीं मिलता, वहाँ केवल भोग की समाप्ति मात्र होती है। निर्विशेष धाम ब्रह्मलोक तो कोरी स्लेट (tabularasa) के समान है, वहाँ भी उपास्य अधोक्षज उरुक्रम (भगवान) नहीं हैं। परव्योम (वैकुंठ) में हमें सेव्य-तत्त्व प्राप्त होता है, जहाँ नाभि से मस्तक पर्यन्त उत्तमांगों द्वारा पूज्य-भाव से सेवा होती है, और अधो-अंगों को सामान्य कार्यों में रखकर पूज्य-बुद्धि से सेवा की जाती है। परमेश्वर इस प्रकार ‘अर्धकुक्कुटी-न्याय’ के अनुसार खंडित अथवा केवल विशिष्टाद्वैत के विचारकों के ही सेव्य नहीं हैं। जहाँ विश्रम्भ-भाव (गाढ़ प्रेम) के विचार से वात्सल्य और मधुरादि भावों द्वारा सेवा नहीं है, वहाँ प्रवेश करने पर अति निम्न स्तर की आंशिक हरिभक्ति ही प्राप्त होती है।

“वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोषकारणम्॥”

यह सब अत्यंत प्रारंभिक एवं निम्न स्तर का विचार है। श्रीनाथ, श्रीजानकीनाथ और श्रीगोपीनाथ के स्वरूप-विचार को जब हम क्रमशः जान सकेंगे, और ‘अन्वयादितरतश्च’ के विचार को जिस अनुपात में समझ पाएँगे, उसी अनुपात में यथार्थ सत्य (Positivism) का उदय होगा तथा मन का मैल दूर होगा। वास्तविक सत्य के विचार को ग्रहण करने की योग्यता प्राप्त होने पर ही हम अखिल रसामृतमूर्ति, द्वादश रसों के नित्य एवं अखंड आश्रय श्रीकृष्णचंद्र को अपने वास्तविक सेव्य-तत्त्व के रूप में जान सकेंगे।