करुणा के विशाल सिन्धु

श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद

यह व्याख्यान श्रील प्रभुपाद द्वारा १९२८ में सच्चिदानन्द श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के १४वें तिरोभाव दिवस के उपलक्ष्य में दिया गया था। इसमें वे प्रतिपादित करते हैं कि वैष्णव किस प्रकार करुणा के अपार सिन्धु (कृपा-सिन्धु) हैं। वे बिना किसी याचना के अहैतुकी पूर्ण कृपा प्रदान करते हैं और पतितों के एकमात्र उद्धारक (पतितपावन) हैं। श्रील प्रभुपाद के अनुसार, वैष्णव ही हमारे वास्तविक आत्मीय जन हैं और उनकी शरण ग्रहण करने के अतिरिक्त उद्धार का अन्य कोई विकल्प नहीं है। वैष्णव अमर होते हैं और भगवान की नित्य लीलाओं में सदैव सम्मिलित रहते हैं। उनका एकमात्र कार्य श्री कृष्ण की सेवा करना है, जो उनके प्रकट होने और अंतर्धान होने, दोनों ही स्थितियों में शाश्वत रूप से चलता रहता है।

वांछा-कल्प तरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः

मैं समस्त वैष्णवों को अपना अत्यंत विनम्र और श्रद्धापूर्ण दंडवत प्रणाम अर्पित करता हूँ—एक बार नहीं, दो बार नहीं, अपितु बारम्बार। इसके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई कर्तव्य नहीं है। ‘नमः’ शब्द में निहित ‘म’ अक्षर मिथ्या अहंकार अथवा गर्व का द्योतक है। इसी गर्व का परित्याग कर मैं अपनी सविनय वंदना अर्पित करता हूँ। वैष्णव ‘वांछा-कल्प-तरु’ हैं अर्थात् वे अभीष्ट पूर्ण करने वाले दिव्य वृक्ष हैं। जिस प्रकार इस संसार के कल्पवृक्ष कामना के अनुरूप फल देते हैं, उसी प्रकार अप्राकृत वैष्णव अपने भक्तों की समस्त प्रार्थनाएं पूर्ण करते हैं। जहाँ भौतिक जगत के कल्पवृक्ष क्षणभंगुर फल देते हैं, वहीं दिव्य वैष्णव जीवन का सर्वोच्च और शाश्वत लक्ष्य अर्थात् ‘अखण्ड फल’ प्रदान करते हैं। उनके श्रीचरणों की शरण लेना ही मेरा एकमात्र कर्तव्य है क्योंकि इसके अतिरिक्त उद्धार का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

करुणा के अक्षय सागर

कोमलता के दिव्य स्वामी वैष्णव ठाकुर करुणा के अगाध सिन्धु हैं। वे बिना मांगे ही पूर्ण कृपा की वृष्टि करते हैं। उनकी दया का अक्षय पात्र कभी रिक्त नहीं होता और न ही उसमें कभी न्यूनता आती है। भौतिक जगत का सागर सूख सकता है, परन्तु वैष्णवों की कृपा कभी समाप्त नहीं होती। उस भंडार से कितनी भी कृपा वितरित की जाए, वह सदैव पूर्ण बनी रहती है।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते पूर्णसय पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते (बृहदारण्यक उपनिषद् ५.१ एवं ईशोपनिषद्)

समस्त अवतारों के मूल भगवान स्वयं पूर्ण और सिद्ध हैं। उनकी पूर्णता के कारण उनसे प्रकट होने वाले सभी अवतार भी पूर्ण होते हैं। उस परम पूर्ण से जो भी उद्भूत होता है, वह पूर्ण ही होता है। यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल भी दिया जाए, तब भी वह पूर्ण ही शेष रहता है। परमेश्वर की पूर्णता में कभी कोई ह्रास नहीं होता। मैं ऐसे पूजनीय वैष्णवों को बारम्बार प्रणाम करता हूँ।

ईर्ष्यालुओं के त्राता

वैष्णव पतितों का उद्धार करने वाले हैं। इस देह-प्रधान संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो मुझे शुद्ध कर सके, क्योंकि यहाँ एक-दूसरे को देखने मात्र से परस्पर ईर्ष्या उत्पन्न होती है। यही ईर्ष्या अहंकार को जन्म देती है, जिससे व्यक्ति दूसरों को हीन, मूर्ख अथवा पतित समझने लगता है। परन्तु वैष्णव इसके विपरीत हैं। मैं पतित हूँ और कृष्ण को विस्मृत कर इंद्रिय-भोग में निमग्न हूँ। मेरी आँखें भौतिक रूपों से भ्रमित होकर मेरी शत्रु बन गई हैं, कान अपनी स्तुति सुनने में व्यस्त हैं और जीभ स्वाद के पीछे भाग रही है। इस इंद्रिय-आसक्ति के कारण मैं भगवान से विमुख हो गया हूँ और नर्क का मार्ग प्रशस्त कर लिया है। ऐसे जघन्य अपराधी का उद्धार केवल वैष्णव ही कर सकते हैं, क्योंकि वे निरंतर जीवों पर कृपा करने में ही संलग्न रहते हैं।

एकमात्र वास्तविक आत्मीय

आज श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के तिरोभाव दिवस पर, मैं स्वयं को कर्ता समझने के मिथ्या अभिमान को त्यागकर वैष्णवों के चरणों में आत्मसमर्पण करता हूँ। यह गर्व मेरी भौतिक इंद्रियों का विकार मात्र है जिसने मुझे भगवान के दर्शन से वंचित रखा है। जब मैं अपनी शोचनीय स्थिति पर विचार करता हूँ, तब पाता हूँ कि वैष्णवों के अतिरिक्त मेरा कोई अन्य रक्षक नहीं है। इस संसार के तथाकथित संबंधी वास्तविक आत्मीय नहीं हैं क्योंकि वे भगवद-भक्ति के अनुकूल नहीं हैं। केवल वैष्णव ही मेरे सच्चे आत्मीय हैं। हम सभी को मिलकर अविलम्ब भगवान के दासों की सेवा में संलग्न हो जाना चाहिए।

सर्वव्यापी प्रभु के सच्चे सेवक

‘वैष्णव’ शब्द को प्रायः संकीर्ण सांप्रदायिक अर्थ में लिया जाता है, जो सर्वथा त्रुटिपूर्ण है। वास्तविक आस्तिक जानते हैं कि भगवान सर्वव्यापी हैं और प्रत्येक परमाणु एवं प्रत्येक जीव के हृदय में अंतर्यामी रूप में वास करते हैं। ‘विष्णु’ शब्द भगवान की सर्वशक्तिमानता और सर्वव्यापकता का परिचायक है, न कि किसी संप्रदाय का। सच्चे वैष्णव उस परम सत्ता के वास्तविक सेवक हैं और वे भगवान के विग्रह से अभिन्न हैं। वे आत्मा के वास्तविक धर्म को जानने वाले और मानवीय संकीर्णता से ऊपर उठे हुए महापुरुष हैं।

वैष्णव अमर हैं

वैष्णव साधारण जीव नहीं होते। वे श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण में रहकर निरंतर श्री कृष्ण की सेवा में समर्पित रहते हैं। जब कोई सामान्य व्यक्ति उन्हें अपनी चर्म-चक्षुओं से देखता है, तो वह उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ पाता। उन्हें केवल उनकी कृपा के आलोक में ही जाना जा सकता है। एक सामान्य मनुष्य की मृत्यु पर शोक सभा होती है क्योंकि वह अपने कर्मफलों से बँधा होता है। परन्तु वैष्णव के लिए जन्म और मृत्यु के नियम लागू नहीं होते। मृत्यु का दिन साधारण व्यक्ति के लिए उसके सुकर्मों और कुकर्मों के न्याय का दिन (Day of Judgment) होता है। परन्तु वैष्णव कर्म-बन्धन से मुक्त होते हैं।

जो वैष्णव चरणों का आश्रय लेता है, वह समस्त कल्याण सहज ही प्राप्त कर लेता है। श्री हरि के भक्तों को पुनः गर्भ-वास नहीं करना पड़ता। यहाँ तक कि जिन्होंने केवल वैष्णवों के दर्शन किए हैं, वे भी पुनर्जन्म से मुक्त हो जाते हैं। विरह के इस अवसर पर आनंद का उत्सव इसलिए मनाया जाता है क्योंकि वैष्णव कभी नहीं मरते। वे भगवान की नित्य लीलाओं के शाश्वत सहभागी हैं। उनकी कृष्ण-सेवा अप्रकट होने के बाद भी निरंतर चलती रहती है, क्योंकि भक्ति, भगवान और भक्त—तीनों ही सनातन हैं।