श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के अनुसार, श्रीमद्भागवत शुद्ध भक्ति का वह स्रोत है जो जीवों को भौतिक भोगों से हटाकर कृष्णप्रेम प्रदान करता है। वे भागवत को सांसारिक लाभ या अर्थोपार्जन का माध्यम बनाने का कड़ा विरोध करते हैं। उनके अनुसार, भागवत-कथा को केवल शुद्ध, सरलहृदय वैष्णवों से सुनना चाहिए, ताकि कथा विकृत न हो। वेदों के वास्तविक अर्थ को समझकर केवल कृष्ण की अनन्य सेवा करना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य है।

(दिनांक ३० श्रावण, बृहस्पतिवार; स्थान—श्रीगौड़ीय मठ, कलकत्ता)

आनन्दलीलामयविग्रहाय हेमाभदिव्यच्छविसुन्दराय।
तस्मै महाप्रेमरसप्रदाय चैतन्यचन्द्राय नमो नमस्ते॥

हम कल श्रीमद्भागवत की चर्चा करने प्रवृत्त हुए थे। उसमें दो विषय चर्चित हुए थे। एक—धर्म-अर्थ-काम—भोग के इन त्रिविध फलों एवं मुक्ति या मोक्ष—बंधन से मुक्ति—अशान्ति के हाथों से परित्राण-लाभरूप त्याग के फल—चतुर्वर्ग की प्रार्थना; और दूसरी बात पंचम पुरुषार्थ ‘प्रेमा’। चतुर्वर्ग की प्रार्थना में जो व्यस्त हैं, वे भागवत पढ़कर फल प्राप्त नहीं करते। ‘प्रेम’ अर्थात् कृष्ण का प्रीति-संग्रह जिनका प्रयोजनीय विषय है, वे ही भागवत पाठ का फल प्राप्त करते हैं। ‘प्रेम’ सर्वश्रेष्ठ वस्तु होने के कारण आलोच्य होने पर ही भागवत पढ़ने की आवश्यकता होती है।

हमने पाँच प्रकार के भक्ति के अंगों को प्रधान रूप में महाप्रभु के मुख से श्रवण किया है—

“साधुसंग, नामकीर्तन, भागवतश्रवण।
मथुरावास, श्रीमूर्त्तिर श्रद्धाय सेवन॥
सकल साधन-श्रेष्ठ इस पंच अंग।
कृष्णप्रेम जन्माय इस पाँचके अल्पसंग॥”

ये ही हमारे परम प्रयोजनीय विषय हैं। इन पाँचों के अल्प संग से ही हम भजनीय वस्तु का अनुशीलन कर सकते हैं। इन पाँचों के अल्प संग के प्रभाव से भगवद्वस्तु की प्राप्ति होती है। वर्तमान समय में हमारे समक्ष भागवत-श्रवण नामक एक कार्य उपस्थित है। ऐसे ग्रन्थ को सुनकर लोगों को क्या अधिक लाभ होगा, क्या प्रयोजन सिद्ध होगा—इन सभी पूर्वपक्षों पर विचार होना आवश्यक है—इस विषय को भली-भाँति जानना आवश्यक है।

अति प्राचीन काल में जीवों के हृदय में उपासना का विचार था, वे उपास्य वस्तु के निर्णय की आवश्यकता समझते थे। किन्तु कालान्तर में देखा गया कि सभी के उपास्य, आराध्य एवं उपासना या आराधना एक नहीं है; उनके अनेक गंतव्य स्थान हैं और प्राप्य वस्तुएँ भी भाँति-भाँति की हैं। इसी कारण बहु-देवताओं की उपासना प्रचलित हुई। अति प्राचीन काल में ‘हंस’ नाम की केवल एक ही जाति थी। वे इस जगत् में वास करते हुए भिन्न-भिन्न उपास्यों की उपासना एवं पूज्यों की पूजा करते थे। उनमें से जो श्रेष्ठ थे, वे ही ‘परमहंस’ अर्थात् परमार्थ-पथ के पथिक कहलाते थे। पूर्वकाल में वैष्णवों का नाम ‘परमहंस’ था। भागवत-सम्प्रदाय की अति प्राचीन बातों की चर्चा करने पर हम इस ‘हंस’ और ‘परमहंस’ के विषय में जान पाते हैं। इनकी पद्धति ‘एकायन पद्धति’ थी। श्रीमद्भागवत-ग्रन्थ उस प्राग्वैदिक युग का भी आलोच्य विषय था, इसलिए श्रीमद्भागवत को ‘पारमहंस्य’ अथवा ‘पारमहंसी संहिता’, ‘सात्वत संहिता’ आदि कहा जाता है। ‘संहिता’ का अर्थ है संकलित ग्रन्थ, जिसमें परमहंसों के विचारणीय विषय संग्रहीत हुए हैं। एकायनियों के मध्य पाँच स्थानों से जो ज्ञान संग्रहीत होता था, उसे ‘पंचरात्र’ कहा जाता है। पुष्कर, हयशीर्ष, नारद-पंचरात्र आदि पाञ्चरात्रिक ग्रन्थ हैं।

भगवान् के उपासक ‘भागवत’ नाम से प्रसिद्ध हैं। जिस समय श्रीव्यास ने शम्याप्रास में श्रीशुकदेव को भागवत का अध्ययन नहीं कराया था, मैं उस समय की बात कह रहा हूँ। उस समय भी ‘पारमहंसी संहिता’, ‘सात्वत संहिता’ आदि शब्द हमें व्यास की लेखनी से प्राप्त होते हैं। वेदों के अर्थ को पूर्ण करने हेतु वेदव्यास ने पुराणों की रचना की। पुराणों में प्राचीन बातें हैं। श्रीमद्भागवत को भी व्यासरचित एक विशेष पुराण कहा जाता है। किन्तु श्रीमद्भागवत एकायन पद्धति का एकमात्र ग्रन्थ है, इसे पाञ्चरात्रिक ग्रन्थ भी कहा जाता है।

एकायन-स्कन्ध और बहुयन-शाखाएँ—ये दो प्रकार की वेदों की स्कन्ध-शाखाएँ हैं। च्युतगोत्रीय ऋषिगण बहुयन-शाखावलम्बी तथा अच्युतगोत्रीयगण ही एकायनपन्थी हैं। बहुयन-शाखा एकायन-स्कन्ध से स्वतंत्र है। एकायन पद्धति में ही पूर्ण समन्वय का विचार एवं एक पथ का विचार है। सत्ययुग में जो बात भागवत ने कही है, उस बात का विचार क्रमशः क्षीण होने पर वेद-विभाग और वर्ण-विभागादि आरम्भ हुए। एकपाद-धर्म के क्षय होने से वेद ऋक्, साम, यजुः आदि संहिताओं और उपनिषदों में विभक्त हुए तथा ब्राह्मण, क्षत्रियादि वृत्ति-विचार से वर्ण-विभाग हुआ। त्रेता से पूर्व वर्ण-विभाग नहीं था, सभी एक ‘हंस’ जाति के अन्तर्गत थे।

निष्क्रिय होकर जो परमार्थ-पथ पर अग्रसर होते थे, वे ही परमहंस थे। वैष्णव-विरोधी मत क्रमशः प्रबल होने के साथ-साथ ऋक्-सामादि वेद-विभाग और हंस जाति में ब्राह्मणादि वर्ण-विभाग आरम्भ हुआ।

मैं प्रारम्भिक बात कह रहा हूँ। हंस जाति काश्यप-ह्रद (कैस्पियन सागर) के निकट एशिया नामक स्थान में वास करके ‘आर्य’ कहलाए। वे अग्न्यादि देवों की उपासना के प्रत्यक्ष विचार में स्थित होकर विष्णु की उपासना को भी तज्जातीय मानते हैं। विष्णु से स्वतंत्र ईश्वर-ज्ञान करके ऋक्, साम, यजुः आदि संहिताओं में भिन्न-भिन्न देवताओं का उल्लेख एवं उनके उपासना-काण्ड में उन सभी देवताओं के स्तोत्रादि देखने को मिलते हैं। जो श्रीमद्भागवत का विवरण श्रवण करेंगे, उन्हें इन सभी बातों की आवश्यकता है, अन्यथा श्रीमद्भागवत को नवाभ्युदित मध्ययुगीन ग्रन्थ मात्र मानने की भ्रान्ति अवश्यंभावी है। एकायन-पद्धतिरूप श्रीमद्भागवत ही एकमात्र वेद है। उपनिषदों में एकायन, महाभारत, पंचरात्र आदि शब्द मिलते हैं। भागवत के प्राक्-इतिहास अर्थात् प्राग्वैदिक युग के इतिहास की चर्चा करने से यह ज्ञात होता है कि ऋग्वेद से पूर्व भी मानव जाति सभ्य उपासक थी, वे एकायन-पथावलम्बी होकर सहज विष्णुभक्ति अथवा वैष्णवता के विचार में ही प्रतिष्ठित थे। त्रेता के प्रारम्भ में स्थान-स्थान पर एकायन विचार के शिथिल होने पर वेद-विभाग और वेदाङ्गादि का प्रचार हुआ। पहले ‘एकायन’, ‘पंचरात्र’, ‘सात्वत’ आदि शब्द थे। एकायन की बात अब न्यूनाधिक वर्तमान इतिहास में विलुप्त है; इस पर प्रचुर मात्रा में विचार होने पर ज्ञात होता है कि प्राग्वैदिक युग में विष्णुभक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई बात नहीं थी, त्रेता के आरम्भ से ही अन्य बातों का विस्तार हुआ। हमारे इस देश में कुछ काल पूर्व केवल बौद्ध, जैन आदि ही वास करते थे, ऐसा नहीं है; सात्वत-ब्राह्मण भी थे। उनमें विष्णुभक्ति की बात ही प्रबल थी। उनके वंशज अब ‘सात्वती’ शब्द से अपभ्रंश होकर ‘सातशती’ या ‘शाश्वती’ के रूप में अपना परिचय देते हैं। कान्यकुब्ज से पंचब्राह्मणों के आने से पूर्व बंगाल में सात्वत अथवा वैष्णव ब्राह्मण वास करते थे। प्रत्यक्ष जड़-विचारपरायण बौद्ध राजाओं के प्रबल पराक्रम से वैष्णवधर्म का प्रचार न्यूनाधिक रूप से स्तब्ध हो गया था। नाना बाधाओं को पार करके भी भगवत्कृपा से उसी पुरातन जैवधर्म की पुनः प्रचुर चर्चा हो रही है।

जो लोग ‘पुराण’ कहकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे प्राग्वैदिक युग के सात्वत-स्वभाव सम्पन्न व्यक्ति क्या विचार करते थे, उसकी चर्चा करें। पुराण या पंचरात्रान्तर्गत अकृत्रिम वेदान्त श्रीमद्भागवत नाक-भौं सिकोड़ने की वस्तु नहीं है। श्रीनारायण ऋषि ने नारद को, नारद ने वेदव्यास को, और व्यास ने पुनः शुकदेव को यह भागवती कथा कही। व्यास के शम्याप्रास आश्रम में श्रीमद्भागवत की प्रथम बैठक हुई थी। श्रीशुक ने वहाँ भागवत की चर्चा की थी। उसी समय से ‘भागवत’ शब्द का प्रयोग हुआ, उससे पूर्व परमहंसों एवं सात्वतों के आलोच्य ‘पारमहंसी’, ‘सात्वतसंहिता’ आदि शब्दों का प्रयोग हम इतिहास के अनुशीलन में पाते हैं।

सात कल्पों में ब्रह्मा के सात जन्म हुए थे। हमारे श्रीचैतन्यचरितामृत की भूमिका में यह विशेष रूप से वर्णित है—महाभारत में भी यह बात है। वर्तमान में जो श्रीमद्भागवत ग्रन्थ प्रचारित है, उसमें प्राग्वैदिक युग की उपासना-प्रणाली लिपिबद्ध है। वैदिक युग के अर्थात् सत्ययुग के परवर्ती समय में ऋक्, साम, यजुः—इस वेदत्रयी में जिन सभी विचार-प्रणालियों की बात है, जो पुनः सूक्ष्म रूप से संहिता, आरण्यक, उपनिषदादि में हैं, उनमें वैष्णवधर्म की ही बात कही गई है। तथापि क्रमशः मनुष्यों की उपासना की विचार-धारा जैसी रही, उसमें मत्स्य, कूर्मादि अवतारों के क्रम में बुद्ध और कल्कि का आविर्भाव हुआ। बुद्ध के समय से वेदविरोधी विचार प्रवर्तित हुआ है, कल्कि के समय वह समाप्त होगा। रोहिणीनन्दन राम के बाद एक (बुद्ध) हुए हैं, और एक (कल्कि) होंगे। भिन्न-भिन्न निमित्तों के वशीभूत होकर विष्णु के ये सभी अवतार प्रकट हुए। ये नित्य वैकुण्ठ में विद्यमान हैं। कुछ काल के लिए हमारे प्रति कृपालु होकर उनका इस देश में आना या जीव-हृदय में उतरना ही—अवतार है। किन्तु उनकी अप्रकट-लीला-भूमि कोई पार्थिव प्राकृत अवर-भूमि नहीं है। वैकुण्ठ-तत्त्व पर किसी प्रकार की अवरता (निम्नता) का आरोप नहीं किया जा सकता। समस्त अवरता ऐहिक सृष्टि के भीतर ही आबद्ध है। हिरण्यकशिपु नित्य वैकुण्ठ में नहीं है। तथापि उसके भाव को वहाँ ले जाने पर विष्णु द्वारा लीलापोषण हेतु उसके भाव का विनाश ज्ञात होता है। हिरण्यकशिपु इस जगत् का अचित् पार्थिव त्रिगुणात्मक पदार्थ-विशेष है, उस देश में लीला की पुष्टि के लिए केवल तच्चिन्मय भावमात्र वर्तमान रहता है; वहाँ जड़ाधिष्ठान नहीं है। प्रकट-लीला और अप्रकट-लीला—ये दो बातें विचारणीय हैं। प्रकट-लीला में जड़-जगत् वैभवावतारों का प्राकट्य होने पर भी अप्रकट वैकुण्ठ में वे पूर्ण रूप से विद्यमान रहते हैं। यह जड़-जगत् विभिन्न इन्द्रियग्राह्य भूमिकाओं के भेद से युक्त होकर यहाँ उपस्थित हुआ है। वहाँ कोई अनुपादेय अवर-विरोधी धर्म नहीं है। सभी भाव वहाँ विद्यमान हैं, किन्तु विचित्रता होने पर भी प्रपंच की भाँति वहाँ प्रेम का अभाव नहीं है; प्रत्येक कार्य ही विषय के प्रीतिजनक हैं; अचेतन, अपूर्ण और आनन्दबाधक नहीं हैं। विरोध, अभाव, अनुपादेय, हेय, परिच्छिन्न की अवरता या आपेक्षिकता जैसी कोई बात वैकुण्ठ-राज्य में नहीं है।

इस दुष्प्राप्य वैकुण्ठ-कथा को कहने और सुनने के लिए ही गौड़ीय मठ के श्रवण-सदन के निर्माण की आवश्यकता हुई है। स्थान-स्थान पर श्रवण-सदन का निर्माण किया जा रहा है, जिससे कि भागवत की कथा लोगों के कानों में प्रविष्ट होकर अन्य बातों में व्यर्थ की श्रद्धा समाप्त हो जाए। कोई-कोई कहते हैं—श्रीमद्भागवत जुलाहों की विचारणीय पोथी है, यह स्वाध्याय-परायण विचारशील ब्राह्मणों का विचार्य ग्रन्थ नहीं है! कई बार तो हम सुनते हैं कि कुछ लोग महाप्रभु को ‘शची बुआ का लड़का’—यहाँ तक कहकर ही सम्मान देते हैं। कोई कहते हैं, पुराण की बातें निरर्थक बातें हैं, आषाढ़ी गप्पें हैं, पुरानी बातें हैं, उन बातों को सुनकर क्या होगा! कोई कहते हैं, भागवत वोपदेव द्वारा रचित है। यदि ऐसा ही है, तो जिस वोपदेव ने भागवत की रचना की है, वे कितने महान् होने चाहिए, यह एक बार भागवत का विचार करके देखना चाहिए। भागवत-विरोधी सम्प्रदायों में श्रीमद्भागवत पर जो यह दोषारोपण किया जाता है कि यह व्यास की रचित पुस्तक नहीं है, ईसवी तेरहवीं या दसवीं शताब्दी का ग्रन्थ-विशेष कहकर इसे आधुनिक सिद्ध कर हेय बनाया जाता है, उसके मूल कारण की खोज श्रवण-सदन में ही विशेष रूप से आलोच्य विषय होना चाहिए। अन्य जिह्वा-गह्वरों के विविध वितण्डा और भेक-जिह्वा (मेंढक जैसी जीभ) के कोलाहल को पूर्णतः स्तब्ध हो जाना चाहिए। इसीलिए मैं बार-बार विचार करता हूँ कि श्रवण-सदन में कुछ भागवत की चर्चा हो—वर्तमान में जिसका महादुर्भिक्ष उपस्थित है, उस विचाररूपी आदान-प्रदान की प्रचुर मात्रा में चर्चा हो। भागवत को कहीं पण्यद्रव्य (बिक्री की वस्तु) न बना दिया जाए। सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के उपाय के रूप में, समय बिताने का साधन मानकर या अर्थ-विनिमय (पैसों के बदले) से भागवत श्रवण का विचार करने पर उससे ऐकान्तिक आवश्यकता की उपलब्धि या आशानुरूप फल प्राप्त नहीं होगा। शुद्ध सारस्वत-श्रवण-सदन का जितना विस्तार हम लक्ष्य करेंगे, जितनी चर्चा बढ़ेगी, जितने बड़े-बड़े टाउनहॉल, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ श्रीगौड़ीय मठ के भागवत-श्रवण-सदन बनेंगे, उतना ही लोगों का मंगल होगा, सभी हरिकथा पर विचार करेंगे, सर्वत्र हरिकथामय वातावरण बन जाएगा—उसी दिन यह विश्व पूर्ण सुखमय होगा।

‘मठन्ति वसन्ति छात्राः यस्मिन्’, परमार्थ-शिक्षा-सदन ही भागवतमठ है। शिक्षा-शिरोमणि परमार्थानुशीलन के अतिरिक्त मठ का अन्य कोई कार्य ही नहीं है। भक्तिमठ में भगवत्सेवा के अनुरागी व्यक्ति ही वास करें, सेवाविमुख या सेवाविरोधी का यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है; अन्याभिलाषी, कर्मी, ज्ञानी आदि अभक्तजन इस स्थान पर वास करने का सदुद्देश्य नहीं समझ पाएँगे। भक्तिमठ में पांचरात्र-विधि के अनुसार मन्त्रों द्वारा विविध उपचारों से ठाकुर जी का अर्चन होता है, भोग लगता है; भगवद्भोज्य वस्तु जब उन्हें समर्पित होती है, तब तदुपभुक्त विचार से उसे ‘प्रसाद’ मानकर ग्रहण किया जाता है। प्राग्वैदिक युग के विचारणीय भागवत-विचार का अनुसरण करके वैदिक पण्डिताभिमानियों के वर्तमान विचार से अवकाश पाना आवश्यक है। भगवान् की बातों से ही सब सुविधा होगी। केवल एक भागवत को बनाए रखकर अन्य सभी चिन्ताओं को छोड़ देने से भी काम चल जाएगा। “किंवापरैः।” श्रीमद्भागवत ने पूर्वपक्षरूप समस्त विरुद्ध बातों को उपस्थित करके उनकी सम्पूर्ण अकर्मण्यता आँखों में उँगली डालकर दिखा दी है।

मनुष्य का भाग्य इतना मन्द हो गया है कि वे ‘विद्यासुन्दर’ के पाठ के स्थान पर या वेश्याओं के नर्तन-कीर्तन के स्थानों में भागवत का पाठ करवाकर इन्द्रिय-तृप्ति का भाव ग्रहण करते हैं, मानो भागवत भी उन्हीं की तरह अनर्थ बढ़ाने वाले जनों के लिए कर्ण-रसायन की वस्तु हो! मनुष्यों का भगवान् की सेवा का विचार इतना क्षीण हो गया है कि यदि शत-प्रतिशत (९९.९९…%) भी कहा जाए, तो कोई भूल नहीं होगी। भागवत की बात ही मानो अनर्थ उत्पन्न करने वाली या उपेक्षणीय (negligible) वस्तु बन गई है। जहाँ अन्य सभी बातों को त्यागकर शत-प्रतिशत भागवत की बात—नित्यमंगल की बात—प्रबल होनी चाहिए थी, वहाँ इसके विपरीत विचार बन गया है। जीवों का समस्त संकीर्ण विचार समाप्त हो जाए। भागवत की चर्चा न करने पर ही हम अन्य विषयों में मन लगाएँगे, विश्व—संसार जैसे प्रपंच उपस्थित होंगे। जो लोग जन्म-जन्मान्तर से भगवत्प्रसंग से विमुख होकर संसार में दुःख-कष्ट और अशान्ति भोग रहे हैं, क्या वे अब भी स्वास्थ्य-लाभ का प्रयास नहीं करेंगे? प्रवृत्तिमार्ग में नाना प्रवृत्तियों द्वारा चालित होकर पद-पद पर अशान्ति भोगनी पड़ती है; एकमात्र भगवत्कथा के आश्रय से ही परम शान्ति प्राप्त हो सकती है। क्या मानव जाति के लिए यह बात अब भी विचारणीय नहीं होगी?

श्रीव्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को भागवत पढ़ाया था, वे शुकदेव संसार में प्रविष्ट नहीं हुए थे। कितनी उदारता के साथ वे उन्हें भागवत की बात कह सके थे—द्वितीयाभिनिवेश न होने के कारण लेशमात्र भी संकोच का अनुभव नहीं करना पड़ा था, ऐसे एक श्रोता थे शुकदेव। व्यास द्वारा शुकदेव को सुनाने से पूर्व नारद से, और नारद ने पुनः नारायण ऋषि से यह भागवत श्रवण किया था। ‘श्रीकृष्ण-ब्रह्मा-देवर्षि-बादरायण’ के क्रम में हमारी गुरु-परम्परा में जो बात है, वह वही एक ही बात है। श्रीभगवान् की अपनी उक्ति से हम जान सकते हैं—

“कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता।
मयादौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मकः॥
तेभ्यः पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः॥
किं देवाः किन्नरा नागा रक्षः किंपुरुषादयः।
बह्व्यस्तेषां प्रकृतयो रजःसत्त्वतमोभुवः॥
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां पतयस्तथा।
यथा प्रकृति सर्वेषां चित्रा वाचः स्रवन्ति हि॥”
(भागवत ११।१४।३, ५-७)

इस भक्ति की बात ही काल के प्रभाव से प्रलय में विनष्ट हो गई थी। भगवान् द्वारा ही आदिकवि ब्रह्मा को वेदों के नाम से परिचित भागवतधर्म सृष्टि के प्रारम्भ में कहा गया था। उनसे—पितृगण से देव, दानव, गुह्यक, मनुष्य, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर, चारण, किन्नर, नाग, राक्षस, किंपुरुष आदि ने प्राप्त करके अपनी-अपनी रजः-सत्त्व-तमोगुणजन्य प्रकृति के विचार के अनुसार विविध विचारों से पुष्ट वाक्यों को कहा। भिन्न-भिन्न प्रकृतियों के प्रभाव से भूतपतियों के मध्य विभिन्न वेद-विचारों में भिन्नता आ गई।

सर्वप्रथम भागवत की बातों की चर्चा श्रीशुक ने अपने छात्र-जीवन में शम्याप्रास मठ में की थी। व्यास ने अपने अकृतदार (अविवाहित) कुमारधर्मी पुत्र शुकदेव को ही भागवत का उपदेश दिया था। वे पुनः संसार में प्रविष्ट न होकर महाराज परीक्षित जैसे विविध श्रोताओं को पाकर उन्हें वही बात कहने लगे। जिन्होंने ब्रह्मशापग्रस्त होकर राज्य-ऐश्वर्य सब कुछ त्यागकर गंगातट पर प्रायोपवेशन (अनशन-व्रत) में बैठकर परमार्थ के लिए पार्थिव शरीर-त्याग का यत्न प्रदर्शित किया था, ऐसे एक व्यक्ति को श्रीशुक ने भागवत-कथा कहने के लिए श्रोता रूप में पाया। श्रीव्यास ने शुकदेव से अत्यन्त साहस के साथ—पूर्णतः निःसंकोच होकर “सङ्गं न कुर्यात् शोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च” आदि तीव्र बातें कही थीं। पुनः शुकदेव भी महाराज परीक्षित से परम साहस के साथ वही बात कह सके। परीक्षित ने अपने अध्यापक शुक के मुख से जो सुना था, वह मुजफ्फरनगर जिले के अन्तर्गत शुकताल, भुखारहेड़ी या भोपा नामक स्थान में सुना था। यहीं भागवत की दूसरी बैठक हुई थी।

तीसरी बैठक नैमिषारण्य में हुई। शौनकादि साठ सहस्र (६०,०००) ऋषियों ने सूत गोस्वामी के निकट भागवत-कथा सुनी थी। सूत चारण श्रेणी के व्यक्ति थे। पूर्व इतिहास का गान करके कहने के लिए वे शिक्षित (प्रशिक्षित) होते थे। आज-कल जैसे वंशावली बताने वाले अपने पूर्वपुरुषों की बात कहते हैं, उसी प्रकार श्रीसूत ने शुक-परीक्षित संवाद को साठ हजार ऋषियों के सम्मुख शुक-स्थान में श्रुत वाक्यों को अभिनय के समान गान किया था। ऋषियों ने कलियुग को समागत देखकर सहस्र वर्षों तक चलने वाला एक यज्ञ प्रारम्भ किया था। भगवदिच्छा से श्रीसूत उस स्थान पर उपस्थित हुए, तो ऋषियों ने उन्हें भागवत-वक्ता के रूप में वरण किया। श्रीसूत ने श्रीशुक के मुख से जो बातें सुनी थीं, अति अल्प समय में ही उन्होंने उन अठारह हजार श्लोकों का पाठ-कार्य आरम्भ कर दिया।

“तच्छृण्वन् सुपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः।”

इधर कर्मकाण्डी जन वेदत्रयी के मधुपुष्पित वाक्यों से आच्छन्न होकर वेदों की आश्वलायन, सांख्यायनादि शाखाओं का निर्णय करके उसी में व्यस्त हो गए; और जो सर्वाधिक बुद्धिमान व भाग्यवान थे, उन्होंने सुप्राचीन एकायन पद्धति का आश्रय लिया।

भागवत-सम्प्रदाय की दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ हैं। सनत्कुमार से एक और ब्रह्मा-नारदादि हमारी गुरु-परम्परा की बात आप सबने सुनी है। धरा द्वारा गठित श्रीमूर्त्ति—परम ऐश्वर्यमयी महालक्ष्मी-पूजा के विचार से जो अर्चन-मार्ग निकला है, ईश्वर-भाव जिसके अनुगत है, वह पद्धति सनत्कुमार से आकर पहुँची है।

भागवत अथवा वैष्णवों के पूर्व इतिहास में ‘हंस’ और ‘परमहंस’ संज्ञाएँ हैं। त्रेतायुग में जब जातियों का विभाजन हुआ, तब च्युत और अच्युत गोत्र का एक भेद उत्पन्न हुआ। जैसा कि हम भागवत में देखते हैं—

“सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक्।
अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः॥”

अच्युतगोत्र भागवत परमहंस-कुल है, और च्युतगोत्र ऋषिकुल है। ये दोनों ही परम सम्मानित थे। इन दोनों के मध्य ही परलोक (परतत्त्व) की चर्चा थी। जिनके मध्य परलोक की चर्चा थी, उन्हें कर (लगान) नहीं देना पड़ता था, वे बिना मूल्य के मठ-मन्दिरों में वास करते थे। अलग से धन-संग्रह की आवश्यकता नहीं थी। पृथ्वी पर सभी का कर्त्तव्य स्वाध्याय-निरत ब्राह्मणों और भगवद्भक्त वैष्णवों की सेवा करना था। पृथु महाराज के समय में यह व्यवस्था थी। वे सप्तद्वीपों के एकच्छत्र राजा थे। ऋषिवंश पर कोई दण्ड लागू नहीं था। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि ब्राह्मण का परिचय देकर ब्राह्मणेतर आचरण में प्रवृत्त हुआ जाए, यह तो बड़े ही कलंक की बात होगी। महाराज पृथु के समय ऐसा नहीं था। ब्राह्मण विशुद्ध वैदिक आचार में प्रतिष्ठित थे, श्रौत-गृह्यसूत्रों के अनुसार आचरण करते थे। और अच्युतगोत्रीय वैष्णवों का परमार्थानुशीलन ही प्रबल था। ब्राह्मण अथवा वैष्णव कोई भी फौजदारी या दीवानी जैसा कोई अपराध नहीं करते थे। यह हम भागवत में पाते हैं।
भागवत की चर्चा ऋषिवंश के भीतर भी थी। जब इसे संहिता कहा गया, तब यह संकलित होकर, सर्वत्र न सही, स्थान-स्थान पर इसकी चर्चा अवश्य ही होती थी। क्योंकि आज भी यह तत्त्व विद्यमान है। कोई-कोई भागवत के विषय में कहते हैं—यह पाञ्चरात्रिक ग्रन्थ है, पुराण नहीं; कोई पुनः देवीभागवत को ही प्राचीन होने का दावा करते हैं। जो लोग भागवत के पक्षधर के रूप में परिचय देते हैं, वे भी भागवत को बिक्री की वस्तु बना देना चाहते हैं। श्रोता की रुचि के अनुकूल विकृत होकर लाभ, पूजा और प्रतिष्ठा की आकांक्षा रखने वाले कभी भागवत के सेवक नहीं हो सकते।

चौबीस घण्टों में से चौबीस घण्टे जो भगवान् की सेवा में नियुक्त हैं, अन्याभिलाषिता तथा कर्म-ज्ञानादि की चेष्टाओं से पूर्णतः निर्मुक्त हैं, भागवत उन्हीं का आराध्य है; वे ही भागवत की आराधना जानते हैं। भागवत को अर्थोपार्जन, पुण्य-संग्रह या दुःख-निवृत्ति की औषधालय-मात्र में परिणत कर देना भागवत की सेवा नहीं है।

श्रीचैतन्यदेव ने जब जगत् के दुःख को जाना, उनके परम प्रिय सनातन, रूप, जीव गोस्वामीगण जब जगत् के दुःख से दुःखी हुए, तब उन्होंने भागवत को बिक्री की वस्तु में परिणत होने से रोका। उन्होंने भागवत को कालिदास, माघ, श्रीहर्ष, भारवि, भर्तृहरि आदि द्वारा लिखित अन्य काव्यों या पुराण-ग्रन्थों की भाँति मात्र एक साधारण ग्रन्थ के रूप में, अथवा उसकी चर्चा को केवल समय बिताने की किसी व्यवस्था-विशेष में प्रयुक्त नहीं होने दिया।

श्रीचैतन्यदेव ने जयदेव की ‘मधुर कोमल कान्त पदावली’ का आदर किया। जयदेव महात्मा की अष्टपदी ‘गीतगोविन्द’ का उत्कल देश (ओडिशा) में बहुत प्रचार है; दक्षिण भारत में कम, पश्चिम में नहीं के बराबर है, और बंगाल में प्रचुर प्रचारित है। जयदेव ने भागवत की बात—तीसरी बैठक की बात जिसमें लिखी है—उसी का अवलम्बन करके परिशिष्ट-कथा का वर्णन किया है। बहुत-से लोग जयदेव की बात को न समझ पाने के कारण उनका यथोचित आदर नहीं कर पाते।
दक्षिण देश की कृष्णवेण्णा नदी के तट से महाप्रभु ‘कृष्णकर्णामृत’ नामक एक परम उपादेय ग्रन्थ संग्रह करके लाए थे। इस देश में चण्डीदास, विद्यापति, रामानन्द राय का जगन्नाथवल्लभ नाटक आदि ग्रन्थ थे।

“चण्डीदास विद्यापति, रायेर नाटकगीति,
कर्णामृत, श्रीगीतगोविन्द।
स्वरूप-रामानन्दसने, महाप्रभु रात्रिदिने,
गाय, शुने परम आनन्दे॥”
(चै० च० म० २।७७)

इन पाँच प्रकार के ग्रन्थों एवं गीतों ने गौरसुन्दर के परम प्रीति का विधान किया है। यह है भागवत-सम्प्रदाय की स्थिति। साधारण लोग अर्थोपार्जन और पुण्य-संचय के लिए भागवत पढ़कर भागवत-पाठ को मार्कण्डेय चण्डी (सप्तशती) के पाठ जैसा ही एक अनुष्ठान मान बैठते हैं।

आप लोगों ने कदाचित् कुलीनग्राम के मालाधर वसु—गुणराज खान का नाम सुना होगा। उन्होंने श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध की कथाओं को बांग्ला पयार छन्द में पांचाली के रूप में ग्रथित किया है। उस ग्रन्थ का नाम ‘श्रीकृष्णविजय’ है। उस ग्रन्थ में उज्ज्वल रूप से लिखा है—

“नन्दनन्दन कृष्ण मोर प्राणनाथ”

महाप्रभु इस बात पर परम प्रीति प्राप्त कर बोले थे—”इस वाक्य पर मैं उनके वंश के हाथों बिक गया हूँ।”

‘हरिलीला-शिखरिणी’, ‘मुक्ताफल’ आदि भागवत की प्राचीन टीकाएँ हैं; श्रीमध्व की स्वनिर्मित टीका है; मध्व-सम्प्रदाय के विजयध्वज आदि ८-१० जनों ने भागवत की टीका लिखी है। रामानुज-सम्प्रदाय के वीरराघवादि और भी दो व्यक्तियों ने भागवत की व्याख्या की है। केवल केवलाद्वैतवादियों में से किसी ने भागवत की टीका नहीं लिखी। वे केवल कपटतापूर्वक यह कहते फिरते हैं कि भागवत में केवलाद्वैतवाद की बात है। किन्तु हम तो भागवत में कहीं भी केवलाद्वैतवाद नहीं देखते। भागवत से शत-सहस्र योजन दूर अवस्थित होकर, इस प्रकार का कोई व्यक्ति भागवत की बात लिखेगा या जानेगा, यह कभी सम्भव नहीं है। बहुत-से लोग कहते हैं कि मधुसूदन सरस्वती मानो भागवत के पक्षधर व्यक्ति थे, किन्तु ऐसा नहीं है; वे अद्वैतवादी थे। अघ, बक, पूतना ने भी कृष्ण के अपने जन के रूप में परिचय दिया था। कृष्ण ने माथुरमण्डल में अघ-बक आदि १८ असुरों का वध किया और द्वारका में वास करते समय जरासंध आदि अन्य १८ असुरों का संहार किया था। असुरों का प्रधान प्रयास कृष्ण का विनाश करना ही होता है, किन्तु कृष्ण उनके समस्त प्रयासों को व्यर्थ कर देते हैं। यद्यपि गीता वैष्णवों का ही पूज्य ग्रन्थ है, किन्तु उसे पञ्चायती अखाड़े के लोग अपनी प्रधान पूज्य वस्तु बताकर नाना टीका-टिप्पणियों की रचना करते हुए वैष्णवधर्म के सरल विश्वास पर आघात कर रहे हैं। भागवत को भी इसी प्रकार अपना बनाने के प्रयास में वे विरुद्ध बातें प्रचारित करते हैं।

जब जगत् में इस प्रकार का अन्यायपूर्ण विचार प्रवृत्त हुआ था, ऐसे समय में श्रीचैतन्यदेव ने मनुष्यों के कल्याण हेतु ‘कृष्ण-पादपद्म क्या वस्तु है’, यह जना दिया। किन्तु हमारा ऐसा दुर्भाग्य (मन्द भाग्य) है कि उस कृष्णकथा में रुचि ही नहीं है!

जैसा कि ‘श्रीचैतन्य भागवत’ में चैतन्यदेव के आविर्भाव से पूर्व इस देश की अवस्था के विषय में स्पष्ट कहा गया है—लोग केवल गंगा-स्नान के समय एकाध बार हरिनाम का उच्चारण करते थे, व्यावहारिक रस में मत्त रहते थे, पण्डितगण वाद-वितण्डा में प्रवृत्त रहते थे, और ब्राह्मण मृत्यु के समय ‘गङ्गानारायण ब्रह्म’ का उच्चारण करते थे; अर्थात् अन्त में निर्विशेष-गति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, यही उनकी धारणा थी, वे भूलकर भी महामन्त्र का उच्चारण नहीं करते थे। भागवत की कथा को लोक-चक्षुओं से आवृत करने के लिए ये सब बातें प्रबल रूप से चल रही थीं। चेतन के विलास को जड़-विलास में परिणत करके जो लोग भागवत के साथ आत्मीयता दिखाने जाते हैं, भागवत को उपहार देने जाते हैं, वे इस प्रकार की दुश्चेष्टा से निवृत्त हों तथा भागवत को दूषित करने में प्रवृत्त न हों—इसलिए श्रीचैतन्यदेव ने उनके हाथों से भागवत की रक्षा की है।

शेक्सपियर, कालिदास आदि जड़-कवियों के पार्थिव जड़-रस के काव्य-साम्य से भागवत के साथ खेलना, उसे पण्यद्रव्य (बिक्री की वस्तु) में परिणत करने की दुर्बुद्धि अत्यन्त अपराधपूर्ण कार्य है। कुछ लोग पुनः स्वयं को चैतन्यदेव का अनुगत बताकर भी भागवत के उद्देश्य को नष्ट, कलंकित एवं कलुषित करने में व्यस्त हैं; उनसे श्रीमद्भागवत की कथा का संरक्षण करना, उसे उज्ज्वल एवं पुष्ट करना हमारा प्रधान कर्त्तव्य बन गया है। पाँचों के अल्प-संग से ही जीव शुद्ध-भक्ति का अवलम्बन कर सकें, इसीलिए श्रीमद्भागवत का अभ्युदय हुआ है।

श्रीमद्भागवत के अनुगत विश्रम्भ-भाव का पोषण करने वाले अनेक ग्रन्थ हैं—श्रीरूपकृत ‘संक्षेप-भागवतामृत’, श्रीसनातनकृत ‘बृहद्-भागवतामृत’, श्रीजीवकृत ‘षट्-सन्दर्भ’, श्रील चक्रवर्ती ठाकुर की ‘सारार्थदर्शिनी’ टीका, और श्रीबलदेव ने भी दशम स्कन्ध की टीका की है। परवर्ती काल में गौर-अनुगत सम्प्रदाय में इन ग्रन्थों की चर्चा होती है। श्रीवल्लभ की ‘सुबोधिनी’, पुरुषोत्तम महाराज की टीका एवं उस सम्प्रदाय की और भी २-३ भागवत-टीकाएँ हैं। ये लोग यद्यपि चैतन्य के अनुगत नहीं हैं। चैतन्य के जो अनुगत हैं, उन्होंने एक प्रकार से व्याख्या की है, और जिन्होंने चैतन्य की बातें श्रवण नहीं कीं—जैसे वादिराज आदि—उनकी व्याख्या-धारा अन्य प्रकार की है। तथापि सभी के लिए एकमात्र भागवत-ग्रन्थ ही आलोच्य है। सुवर्ण-सिंहासन पर श्रीमद्भागवत को स्थापित करके प्रोष्ठपदी (भाद्रपद पूर्णिमा) के दिन श्रीमद्भागवत-वितरण का माहात्म्य शास्त्रों में कीर्तित है।

श्रीजीव ग्रन्थों की रचना करके इस देश (बंगाल) में भेजते थे। श्रीनिवास आचार्य, ठाकुर नरोत्तम, श्यामानन्द ने इस देश में उन ग्रन्थों के प्रचार का प्रचुर प्रयास किया। किन्तु साधारण व्यक्ति कर्मजड़-स्मार्तों के विरुद्ध आचरण को वैष्णवाचार बताकर चला रहे हैं और उसे कलुषित करने का बहुत यत्न कर रहे हैं। बंगाल में प्राकृत सहजिया मत का प्रबल उपद्रव चल रहा है; भागवत-विरोधी बातों को चैतन्यदेव के अनुगत के रूप में थोप दिया जा रहा है। लोगों की चापलूसी करने के लिए भागवत-विरोधी उल्टी बातें चलाना कितना बड़ा अविचार और कैसा उपद्रव है, इसे भाषा द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। इसीलिए हम कह रहे हैं—भारत में ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण जगत् में भागवत की कथा प्रचारित हो, अन्य सभी बातें रुक जाएँ। भागवत की बात ही चैतन्यदेव की बात है, भागवत से श्रीचैतन्य की बातों में लेशमात्र भी भेद नहीं है। चैतन्यदेव की बातें सुचारु रूप से प्रचारित होने पर लोगों का नित्य मंगल होगा, अनन्त काल से संचित—जन्मान्तरों के समस्त अनर्थ और समस्त कठिनाइयाँ दूर होंगी। यह ‘श्रीचैतन्यवाणी’—श्रीमद्भागवत की कथा ही गौड़ीय मठ का प्रचारणीय विषय है।

अब मैं संक्षेप में अपने विचारणीय विषय कहता हूँ:—पाँचों के अल्प-संग से ही कृष्णप्रेम उत्पन्न होता है। एक ओर भजनीय या सेव्य-वस्तु भागवत, दूसरी ओर भागवत के पाठक एवं श्रोतारूपी सेवक, और मध्यवर्ती स्थान में भक्ति अथवा भागवतकथा-श्रवणादि सेवा। भागवतकथा की सुचारु रूप से चर्चा होना आवश्यक है। अमल-ज्ञान (विशुद्ध ज्ञान) की बात कल कही गई थी। समल-ज्ञान (दोषयुक्त ज्ञान) में भागवतकथा की चर्चा नहीं होती। श्रीचैतन्य के अकृत्रिम दासों के लिए भागवत की कथा के अतिरिक्त अन्य कोई बात नहीं है; उन्हीं के लिए भागवत विचारणीय है। आज चैतन्य के अनुगत दास होने का ढोंग करके कैसे-कैसे अनुचित कार्य नहीं चल रहे हैं! वे जगत् का कोई मंगल नहीं कर सकते। गोपीवसनहरण और रासलीला के नायक की बातें बुद्धिमान कहलाने वालों द्वारा भी किस प्रकार दूषित की जा रही हैं—वे समालोचना द्वारा मूल तत्त्व को छिपाकर कैसा घोर अन्याय कर रहे हैं, मनुष्य-जीवन की सार्थकता को नष्ट कर लोगों को कुमार्ग पर ले जा रहे हैं, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। हमारे बन्धु-बान्धव आज भगवत्कथा को भूलकर कृष्ण को रूपक (metaphor) या ऐतिहासिक नायक के रूप में कल्पित करके, नाना अश्रव्य बातों की चर्चा और अदर्शनीय चित्रों का अंकन करके स्वयं तो भ्रष्ट हो ही रहे हैं, साथ ही न जाने कितने लोगों का भाग्य भी बिगाड़ रहे हैं। जयदेव, चण्डीदास आदि ने, जिसकी चर्चा महाप्रभु ने अपने नितान्त अन्तरंग पार्षदों के साथ परम प्रीतिपूर्वक की थी, उसकी—श्रीमद्भागवत-व्याख्या—नाना प्रकार से विकृत व्याख्या करके हाट-घाट में जहाँ-तहाँ उसे इन्द्रिय-तृप्ति की वस्तु बना दिया है। कैसा दुर्भाग्य है! अति उच्च कोटि के पुरुषों के विचारणीय विषयों पर, वैसी उच्चता या योग्यता प्राप्त करने से पूर्व ही साधारण जन-समाज में चर्चा करना अत्यन्त अनुचित है। मूर्ख अथवा पण्डिताभिमानी—किसी के भी पक्ष में ये सब बातें शोभा नहीं देतीं। वे इन सब विषयों पर चर्चा करने का दम्भ करके अपने साथ-साथ बहुत-से लोगों का सर्वनाश करेंगे। जो बात मानवमात्र के लिए आवश्यक है, क्या मनुष्य उसे सुनेगा? जिससे तात्कालिक आनन्द और इन्द्रिय-चंचलता उत्पन्न होती है, उसी को सुनने के लिए लोग व्याकुल हैं।

विवर्तवादियों की बातें सुनना ही मनुष्य ने अपनी आवश्यकता मान लिया है। हरिकथा सुनने वाले लोग नहीं मिलेंगे। भक्ति के साथ विरोध करने वाले अभक्त, महाज्ञानी, परमसन्न्यासी, “महाब्राह्मण” और मायावादी जो हैं, वे ही ‘भक्त हैं’ या ‘पाण्डित्य केवल उन्हीं के पास है’ ऐसा कहकर लोगों को ठगते हैं और उनका अमंगल करते हैं।

जिनका भाग्य मन्द है, वे उनके चंगुल में फँस जाते हैं। जो लोग भक्ति की नित्यता को स्वीकार नहीं करते, वे अघ-बक शाखा से उद्भूत हैं; उनका संग करने से मनुष्य का कभी मंगल नहीं होगा। अप्राकृत पञ्चरसाश्रित सेवाधारा की चित्तवृत्ति के प्रति लोभ जाग्रत होने पर ही मनुष्य का कल्याण है। वे ही परममुक्त पुरुष हैं। आज उन्हीं की वाणी का दुर्भिक्ष उपस्थित है। उनके मुख-कमल से निःसृत हृदय-कर्ण-रसायन कथाओं को ग्रहण करने का ही मनुष्य प्रयास करे।

“सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति॥”

श्रीकपिलदेव ने कहा है—निर्मत्सर साधुओं का सर्वतोभावेन संग करने वाले व्यक्ति ही मेरे असीम पराक्रम की परम कल्याणकारी कथाओं को जानते हैं। जो उनके वचनों में श्रद्धा रखते हैं, वे ही भगवत्स्वरूप एवं उनकी लीला को अनुभव करने में समर्थ होते हैं। भगवत्कथा निर्मल हृदय को रस से पूर्ण करके आनन्द का वर्धन करती है। भगवद्भक्तों द्वारा कथित हरिकथामृत से जब जीव के अनर्थ नष्ट होते हैं, तब व्यर्थ की बातों और भौतिक भावों के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न होकर हरिनाम रूपी अमूल्य रत्न आदि में प्रगाढ़ विश्वास जाग्रत होता है। उसी के प्रभाव से भावभक्ति के लक्षणस्वरूप स्थायी भाव-रति में जीव की प्रतिष्ठा होती है, और समग्र उपादानों के संयोग से रसोदय होकर प्रेमभक्ति की प्राप्ति होती है।