अष्टम दिवस
(26 अगस्त 1935, सोमवार)
“ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं
तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चिनुतं शरण्यम्।
भृत्यार्तिहं प्रणतपाल भवाब्धिपोतं
वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥
त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं
धर्म्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।
मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्-
वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्दम्॥”
हे महापुरुष! आपने देवताओं के लिए भी वांछनीय एवं अत्यंत दुर्लभ राजलक्ष्मी का परित्याग करके, आर्य-श्रुति के वचनों के अनुसार मायावाद का परिहार करते हुए परमधर्म के आश्रय में विशेष रूप से कान्तागण के कान्त के प्रति सेवा के सौष्ठव-विधान की भूमि वृन्दावन का आश्रय लेकर जो शिक्षा दी थी, उस लीला के अनुगत होकर मैं आपके चरण-कमलों की वंदना करता हूँ। भगवद्वस्तु महापुरुष सर्वदा ही अपने सेवकगण द्वारा सेवित होते हैं। उनके परमेश्वर-तत्व होने के कारण वश्य और ईश्वर-संप्रदाय नित्य उनकी सेवा करते रहते हैं। फिर भी, उन्होंने उसका परित्याग करके प्रिय भक्तों के जो अभीष्ट—भजनीय वस्तु के प्रति जो विचार है—उसके अनुवर्ती होकर विषय-विग्रह के लीलारस का आस्वादन करने के बदले आश्रय-विग्रह के आस्वाद्य रस का—जिसकी अनुभूति विषय-विग्रह होने के कारण उनके पूर्व में घटित नहीं हुई थी, अर्थात् विषय-विग्रहोचित रस-आस्वादन का परिहार करके आस्वादक-सूत्र से आस्वाद्यरस-विलास को ग्रहण किया है।
उन्होंने जो त्याग किया है, वह क्या वस्तु है?—‘सुरेप्सितराज्यलक्ष्मी’। और आर्य-वचन के अनुसार मायावादी श्रुति में अनुसंधान का त्याग किया है। सुर अर्थात् देवता; वे अभिलाषा करते हैं—भोग की, और उस स्वर्गादि भोगराज्य—अमरभूमि में जो राजलक्ष्मी है, उसका परित्याग करके अर्थात् भोगी का रूप और मायावादी मृग की द्रुतगति का परित्याग करके चिद्विलास-अरण्य—वृंदावन का आश्रय लिया है। और अपनी प्रियतमा (राधिका) के द्वारा इंगित आश्रय-जातीय विग्रह के जो विषय-जातीय आस्वादन हैं, उनके पीछे वे दौड़े थे। अर्थात् वृषभानुनंदिनी जिस विचार को अपनाकर अपने कान्त की सेवा करती हैं, उसी वृषभानुनंदिनी के अनुगत्य-विचार में मुक्तपुरुषगण जिस प्रकार कृष्णसेवा करेंगे, उसके आदर्श के रूप में आगे बढ़कर वृन्दावन जाने की अभिलाषा प्रदर्शित की थी। क्योंकि उनकी विचार-प्रणाली में देखते हैं—
आराध्यो भगवान् व्रजेशतनयस्तद्धाम वृन्दावनं
रम्य काचिदुपासना व्रजवधूवर्गेण या कल्पिता।
श्रीमद्भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुमर्थो महान्
श्रीचैतन्यमहाप्रभोर्मतमिदं तत्रादरो नः परः॥
व्रजवधुओं ने जिस प्रकार अपने कान्त की उपासना की है, वह लोकशिक्षा के लिए उन्होंने प्रदान की है। वे स्वयं वही वस्तु होने के कारण स्वयं ही अपने-आप का आस्वादन कर रहे हैं। यथा—
अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी
स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः।
अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः
सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव॥
[कृष्ण ने कहा—आहा! यह प्रगाढ़-माधुर्य का चमत्कार उत्पन्न करने वाला, पूर्व में कभी न देखा गया श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इसके प्रति दृष्टि डालते ही मैं लोभी मन से देख रहा हूँ और बलपूर्वक आलिंगन करने के लिए राधिका के समान इच्छा कर रहा हूँ।]
उपर्युक्त श्लोक में निर्दिष्ट विषय में जिस प्रकार भगवान् की रस-आस्वादन की चेष्टा है, वे श्रीगौरसुन्दर में चरितार्थ हुई हैं। अतः वे महापुरुष ही भगवान् श्रीगौरसुन्दर हैं। बहुत से लोग सीतापति (श्रीराम) के पक्ष में इस अंतिम श्लोक की व्याख्या करते हैं, किंतु प्रच्छन्नावतारी श्रीकृष्णचैतन्यचंद्र ने इन सभी बातों पर एक आवरण देकर अन्य प्रकार के विचार की व्यवस्था भी कर रखी है। इसलिए हमारे मृग्य—ध्येय पदार्थ वे ही परमेश्वर हैं। यद्यपि भागवत में कृष्णलीला का वर्णन करने बैठे हैं, पूर्वार्ध में संभोगमयी लीला की बात कही है; किंतु विप्रलंभमयी लीला, जिससे संभोग की पुष्टि होती है, उस परम प्रयोजनीय विषय को गौरसुन्दर ने प्रदर्शित किया है। अतः गौरसुन्दर द्वारा प्रचारित जो भागवत की विचार-प्रणाली है, वही हमारे विचार-विमर्श का विषय बने। हम सम्बन्ध-तत्व की चर्चा में पाते हैं, यथा गौरसुन्दर के वचन—
“वेदशास्त्र कहे—सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन।”
साधारण जीव विवर्त का आश्रय लेकर बद्धजीव को मुक्तावस्था में ब्रह्म के साथ अभिन्न न मान बैठे, उसके लिए गौरसुन्दर को भोगवाद और मायावाद का अनुसंधान छोड़कर भक्ति के अरण्य का आश्रय लेना पड़ा। उन्होंने कपट-संन्यासी बनकर अहंग्रहोपासना—अर्थात् मायावाद का उपदेश नहीं दिया। मायामृग में जो ईश्वर-बुद्धि है—सदानंद योगींद्र का जो सदसद्-अनिर्वचनीय विचार है, उससे पृथक (वेदांत की) व्याख्या गौरसुन्दर ने की है। साधारण लोग सोचते हैं कि गौरसुन्दर ने भक्त के विचार को प्रकट किया है, किंतु वे स्वयं साक्षात् वही उपास्य-वस्तु हैं। यदि वे इस बात का तनिक भी संकेत देते कि भक्त का भगवत्ता प्राप्त कर लेना संभव है, तो मायावाद समस्त संसार को निगलकर भ्रम के मार्ग पर धकेल देता। “हम ईश्वर हैं, भोगी हैं, जगत् हमारा भोग्य है, अथवा वैकुंठ में कोई विचित्र विलास नहीं है, वैकुंठ भी माया-रचित है”—इस दुर्बुद्धि से उन्होंने मानव-जाति की रक्षा की है।
कृष्णद्वैपायन व्यास महाशय ने भागवत के प्रारंभ में जो श्लोक लिखा है, उसमें सम्बन्ध-ज्ञान की बात है। हम सम्बन्ध-ज्ञान की प्रचुर मात्रा में चर्चा करेंगे। बहुत से लोगों का यह आग्रह भी था कि सम्बन्ध के विषय में विस्तृत चर्चा हो। दशम स्कंध की व्याख्या के समय वह चर्चा सुचारु रूप से होगी। सम्बन्ध के विषय में पिछले दो दिनों में चर्चा हुई है, आज अभिधेय के विषय में चर्चा होगी। सम्बन्ध के साथ-साथ अभिधेय की चर्चा करना भी आवश्यक है। अभिधेय का श्लोक इस प्रकार है—
“धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किंवापरैरीश्वरः
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्॥”
जो भक्ति-मार्ग का आश्रय लेंगे, वे प्रह्लाद-उक्त इस श्लोक का आश्रय लेंगे—
“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥”
समस्त शास्त्र-श्रवण का फल ही जीव का भक्तिमान होना है—अभक्ति के मार्ग का आश्रय न लेना। इसलिए अभिधेय-विचार की बात असंप्रसारित बीज के समान इस श्लोक में (धर्मः प्रोज्झितकैतवः श्लोक में) बीजरूप में निहित है। यह कोई विस्तृत विवेचन नहीं है, यह सूत्रात्मक रूप से अभिधेय-विचार है। जैसे प्रथम श्लोक में सम्बन्ध-ज्ञान की बात संक्षेप में कही गई है, वैसे ही अभिधेय भी इस स्थान पर उसी प्रकार कथित हुआ है। जो लोग सम्बन्ध-ज्ञान से युक्त होकर अभिधेय की ओर अग्रसर होते हैं, उनके सम्बन्ध-ज्ञान की पूर्णता-प्राप्ति से पूर्व ही साथ-साथ अभिधेय-विचार का होना आवश्यक है। केवल सम्बन्ध-ज्ञान रहने से अभिधेय-विचार की शुद्धि नहीं हो पाती। केवलज्ञानी-संप्रदाय का जो विचार है, उसमें अभिधेय का विचार अस्थायी हो गया है। यद्यपि वे कर्मकांड को अभिधेय के रूप में निर्धारित करते हैं, किंतु नैष्कर्म्यवाद—फल-कामना से रहित होना ही उनका उद्देश्य है। उसमें फल-कामना की जो पर्याप्त निवृत्ति है, वह चतुर भक्तगण उनकी आँखों में उँगली डालकर दिखा देते हैं। मुमुक्षा-धर्म में शांति का जो प्रयास है, वह कृष्णभाव-वर्जित आत्म-इंद्रियतर्पण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। “चूँकि जड़ जगत् में त्रिविध तापों से संतप्त रहना पड़ता है, अतः गुणजनित जगत् के अमंगल से मुक्ति पाना आवश्यक है—त्रिपुटी का विनाश करने पर—ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता का विचार न रहने पर हमारा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रहेगा, और आत्म-विनाश भली-भाँति हो सकेगा”—इसी का नाम मायावाद है। मापते-मापते माप को ही छोड़कर ज्ञाता के धर्म से ही रहित हो जाना। जैसे शाक्यसिंह (बुद्ध) का विचार—चेतन-धर्म से रहित होना ही मुक्ति है; किंतु चेतन-धर्म का पूर्ण विकास उस वास्तविक नित्य वस्तु में अब भी है, और आगे भी रहेगा। इनकी बद्ध अवस्था किस प्रकार हुई थी, और मुक्त अवस्था में क्या होगा, यह वे समझ नहीं पाते। उनकी मुक्ति का विचार सर्वथा असंगत है। इसीलिए भागवत में कहा गया है—
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन-
स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥
तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद्-
भ्रश्यन्ति मार्गात् त्वयि बद्धसौहृदाः।
त्वयाभिगुप्ता विचरन्ति निर्भया
विनायकानीकपमूर्धसु प्रभो॥
भक्त का विचार संकीर्ण नहीं होता। अहंग्रहोपासना केवल एक तात्कालिक विचार मात्र है, जो जगत् से आहरित ज्ञान के आधार पर बहिर्जगत् के विचार का सहारा लेकर अग्रसर होना है; अर्थात् जगत् के कटु अनुभवों को लेकर अग्रसर होकर उसके त्याग की इच्छा करना। अंततः उसमें कुछ भी शेष नहीं रहेगा—यही सिद्ध किया जाता है। किंतु पूर्णज्ञानमय वस्तु विद्यमान है और नित्यकाल तक रहेगी। इसके विरुद्ध अभियान में प्रवृत्त होना उचित नहीं है। सूर्य के प्रकाश को नष्ट नहीं किया जा सकता और न ही किसी आवरण द्वारा सूर्य को ढँकना संभव है। छाते द्वारा सूर्य को आच्छादित नहीं किया जा सकता। छाते के बाहरी भाग पर किरणें पड़ती ही हैं, और छाते को सूर्य के निकट नहीं ले जाया जा सकता। ब्रह्म अज्ञानी होकर जीव बन गया है, ऐसी बात नहीं है। क्योंकि यदि ऐसा माना जाए, तो ब्रह्म के अतिरिक्त अज्ञानता के एक दूसरे अधिष्ठान को स्वीकार करना पड़ेगा। जीव-ब्रह्म के ऐक्य-वाद में जो अज्ञानता है, जिसका रामानुज ने वेदार्थसंग्रह में ‘परोपाध्यालीढं भ्रमपरिगतं’ इत्यादि मतों के रूप में वर्णन किया है, उसमें ब्रह्म-वस्तु माया से आक्रांत होने के कारण अज्ञानता को प्राप्त हुई है, यह बात मान्य नहीं है। इससे मानव जाति को निवृत्त होना चाहिए। उनकी बुद्धि का विस्तार हो—वे भक्ति की आवश्यकता को समझें। “तथा न ते माधव” श्लोक की विवेचना करने पर हम जान पाते हैं कि भगवान् जीव की नित्य सत्ता की चिरकाल तक रक्षा करते हैं।
हम इस इहलोक में विघ्नों के नाश के लिए गणपति की उपासना करते हैं, जिससे विघ्न नष्ट होने पर भोग की ही पूर्णता प्राप्त होगी; किंतु यह विचार भक्ति के प्रतिकूल है। इसलिए महाविष्णु नृसिंहदेव के अनुगत होने पर जड़ जगत् के विघ्न-निवारण की चेष्टा को केवल बाल-चापल्य मात्र समझा जाता है। गणेश की पूजा करने पर सिद्धि मिलती है, जिससे सांसारिक असुविधाओं को दूर करके धन-प्राप्ति होती है—अर्थात् जागतिक आवश्यकताओं की पूर्ति, जिससे हम अच्छी तरह भोगी बन सकें। संसार बुद्धिमान लोगों के रहने का स्थान नहीं है, यह केवल गल्प सुनने से काम नहीं चलेगा। यहाँ से निवृत्ति पाना आवश्यक है। और यदि निवृत्ति न लेकर इस संसार की उन्नति की कामना से दिन-रात परिश्रम करेंगे, तो क्या मिलेगा? कनक, कामिनी—या फिर ‘साधु’ कहकर सम्मान प्राप्त होगा। किंतु ये तीनों ही निंदनीय वस्तुएँ हैं।
भक्ति के उदय से पूर्व ही विवेकशील मनुष्य यह समझ जाता है कि ये तीनों वस्तुएँ प्रयोजनीय नहीं हैं। और मोक्ष ही किसलिए चाहिए? जिससे मेरा ही भला हो, भले ही दूसरों को कष्ट हो—ऐसी दुराशा के वशीभूत होकर ही मुक्ति की पिपासा जागती है। सायुज्य के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से यदि दूसरे लोगों को मुक्ति मिल जाए, तो कहीं वे उसके प्रतिस्पर्धी न बन जाएँ, या दूसरा व्यक्ति ईश्वर न बन जाए—इस भय से वे दूसरों को मुक्त करने का प्रयास नहीं करते। जैसे बाउल संप्रदाय में भोग्य-वस्तु को लेकर आपस में प्रतिस्पर्धा होती है।
किंतु सौतियाडाह (सपत्नीक-भाव) का यह द्वेष रासस्थली में आकर पूरी तरह समाप्त हो गया। प्रत्येक गोपी अपनी भजनीय वस्तु को लेकर आनंदपूर्वक मंडलीनृत्य करती हैं। अनूढ़ा, परोढ़ा आदि गोपियों ने लोक-मार्ग और स्वजनों का परित्याग करके कृष्ण के चरण-कमलों में आकर उपस्थिति दर्ज कराई। मायावादी का कपट इसी रासस्थली में आकर पकड़ा जाता है। जो वस्तु प्राप्त हुई है, उसका माधुर्य कैसा है, यह मुक्तावस्था में ही समझा जा सकता है।
कृष्ण की सबसे अधिक कृपा किसके प्रति है, यह जानना आवश्यक है। गोपी या यूथेश्वरी होने का अभिमान एक तुच्छ प्रयास है; किंतु राधिका की पाल्य-दासी होने का अभिमान ही सबसे बड़ी बात है। जब भक्ति प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है, तब हम जान पाते हैं कि कुंज-तट पर नित्य स्थान विद्यमान है। चैतन्यदेव ने जो बातें कही हैं, उन्हें उसी स्थल पर जाना जा सकता है। निःसंदेह, यह सब भागवत में भली-भाँति प्रवेश करने के बाद की बात है।
बहुत से लोग भागवत में राधिका के नाम के अनुसंधान में व्यस्त रहते हैं। कोई इस भ्रम में न पड़े कि भागवत में राधा का नाम नहीं है; वास्तव में इससे कहीं बढ़कर गहन विचार उसमें समाहित हैं। ‘यदि उनका नाम मिल जाए, तो हमने सब अधिकार प्राप्त कर लिया, भागवत पढ़ ली’—ऐसी दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है। यदि ‘अनयाराधितो नूनं’ अथवा रासस्थली के तात्पर्य को समझ लिया जाए, तो वह परिपाक के उपरांत जीर्ण होकर त्याज्य वस्तु बन जाती है। जो कुछ हम खाते हैं, वह बाहर निकल जाता है; वैसे ही यदि यह विचार आ जाए कि ‘सब पढ़ लिया—हमने बाज़ी मार ली’, तो कृष्ण का नित्यानुशीलन ही समाप्त हो जाएगा। उसकी अपेक्षा आस्वाद्य वस्तु का धीरे-धीरे आस्वादन करना श्रेयस्कर है। जैसे सैकरीन (Saccharin) कोलतार जैसी वस्तु है, अत्यंत मीठी होती है, एक साथ खाने पर बेस्वाद लगती है; उसे पतला (dilute) करके धीरे-धीरे आस्वादन करने की आवश्यकता होती है। ध्वनि का कंपन (Sound vibration) अत्यधिक या बहुत कम होने पर सुनाई नहीं देता, सीमा (range) के अनुसार ही सुनने में सुविधा होती है; अत्यधिक भोजन करने से अपच (उदरामय) हो जाता है, अतः अपनी योग्यता के अनुसार ही ग्रहण करना चाहिए।
यावता स्यात् स्वनिर्वाहः स्वीकुर्यात्तावदर्थवित्।
आधिक्ये न्यूनतायाञ्च च्यवते परमार्थतः॥
भागवत की चर्चा करने का नाम ‘परिपठन’ है, और उससे पूर्व ‘संश्रवण’; उसके पश्चात ‘विचारणपरता’। सर्वदा स्मृति-पथ में बना रहे—यही विचारणपरता है। उसमें यह लक्ष्य रहे कि भागवत का श्रवण-पठन-चिंतन ही भक्ति का प्रधान साधन है। भागवत कहने से भगवान् और उनके अनुगत भक्त—दोनों का बोध होता है।
एक भागवत बड़ भागवतशास्त्र।
आर भागवत भक्त भक्तिरसपात्र॥
ग्रंथ के रूप में शब्दब्रह्म ‘श्रीमद्भागवत’ हैं; और जब वे भक्त के आचरण में—काया, मन और वाणी से सर्वतोभावेन उनकी चेष्टा में प्रकट होते हैं, तब जो लोग उनकी पूजा करते हैं, वे ‘भक्त-भागवत’ हैं। अतः हमारा विचार है—शब्दब्रह्म की उपासना ही भागवत का कीर्तन है। भागवत साक्षात् भगवद्वस्तु हैं; उसमें भगवदवतारों की लीला-तारतम्य में कृष्णलीला का ही श्रेष्ठ रूप से कीर्तन हुआ है। इसलिए भागवत की अंग्रिसेवा (चरणसेवा) आवश्यक है। अर्चाविग्रह के रूप में श्रीमद्भागवत-रूपी सूर्य उदित हुए हैं। इस सूर्य की उपासना होनी चाहिए। कृष्णलीलामय मुख से ही भागवत-सूर्य की पूजा—उनकी अंग्रिसेवा है। पाँच अंगों में प्रधान अंग ‘कीर्तन’ है। नाम, रूप, गुण, परिकर और लीला-कीर्तन का भागवत में सुंदर वर्णन हुआ है। वही भागवत-वर्णन हमारे आदर का विषय बने। किंतु इसका अधिकारी कौन है? “जितने थे नाड़ा-बूने, सब बन गए कीर्तनियाँ; हँसिया तोड़कर बना लिया करताल”—यदि सभी मिलकर ऐसे बन जाएँ, तो उससे कोई लाभ नहीं होगा। योग्यता एवं अधिकार प्राप्त करके भागवत का अध्ययन करना चाहिए।
अन्यथा ऐसा विचार उत्पन्न होगा कि भागवत से केवल अद्वैतवाद निकाल लिया जाए, जिससे भक्त के हृदय में बाण चुभाया जा सके! भागवत के विचार-सौष्ठव को विकृत कर देने से ही उन्हें सुविधा होती है! फिर, प्राकृत-सहजिया भागवत से भोग-बुद्धि की सुविधा ढूँढ़ते हैं। इसलिए भागवत कहती है—इसके पाठक साधु और निर्मत्सर (ईर्ष्यारहित) हैं। इसमें परमधर्म की बात है, किसी निकृष्ट (इतर) धर्म की चर्चा नहीं है। साधु पुरुषों का—ईर्ष्यारहित महापुरुषों का परमधर्म भागवत में वर्णित है।
भागवत भोग में लिप्त, कनक-कामिनी-प्रतिष्ठा के लोभी जीवों के लिए तैयार किया गया भोज्य नहीं है। वे (केवलाद्वैतवादी) कहते हैं—“भागवत बहुत खराब वस्तु है, इसे छोड़कर वेदांत और उपनिषद् पढ़ने चाहिए। क्योंकि भागवत के श्रवण से व्यभिचार उत्पन्न होता है, जो मनुष्य को नरक में ले जाएगा।” किंतु जो भागवत से घृणा करते हैं, वे ही असाधु और ईर्ष्यालु हैं। चाहे अज्ञानतावश हो या रजोगुण-तमोगुण की प्रबलता के कारण, जिनका इससे विराग है, वे भागवत-विरोधी संप्रदाय ऐसा विचार करके असत् पापियों में अग्रगण्य होकर सांसारिक भोग के कारण नरक को प्राप्त होते हैं।
भागवत-विरोधी संप्रदाय भगवद्रस को अपने भोग का विरोधी जानकर कल्याण के मार्ग से उल्टी दिशा में जा रहे हैं। धर्म के नाम पर अपनी इंद्रियतृप्ति की प्रबल इच्छा रखते हुए बाहर से धार्मिकता का ढोंग करने वालों का स्थान कहाँ होगा?
भागवत में कपटरहित परमधर्म की बात कही गई है। वास्तविक वस्तु को जानना ही वह परमधर्म है, जो कल्याणकारी (शिवद) है; उसके द्वारा तीनों तापों का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा—त्रिताप की जड़ ही कट जाएगी, वे फिर पनप नहीं सकेंगे और उनका नामो-निशान नहीं रहेगा। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चिंतन से तीनों ताप बार-बार लौटकर आएँगे। धर्म, अर्थ और काम की चिंता भोग है, जिसके लिए कहा गया है ‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति’ (पुण्य क्षीण होने पर पुनः मृत्युलोक में गिरना पड़ता है); और मोक्ष—सब कुछ त्यागकर निराकार (Impersonal) हो जाना—ज्ञानी की इस विचारधारा में मुक्ति की कोई संभावना नहीं है। भेदरहित ब्रह्मवाद में कोई सत्य प्रतीति नहीं है, यह सर्वथा निराधार बात है। स्वप्न में भले ही तात्कालिक प्रतीति होती है; किंतु इसमें न पारमार्थिक सत्यता है और न ही कोई तात्कालिक सत्यता। बाहरी आवरण को ठीक रखकर शिष्टाचार के बहाने केवल ईश्वर को धोखा देना—ईर्ष्यालु असाधु व्यक्तियों की बुद्धि से ही यह विचार उत्पन्न हुआ है।
भागवत के “येऽन्येऽरविन्दाक्ष”, “श्रेयःस्रुतिं” और “नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं” इत्यादि श्लोकों में निर्विशेष-विचार को नासमझों की विचारधारा कहा गया है। वेदांत की व्याख्या भी ऐसी नहीं हो सकती। सेव्य ईश्वर को नित्य सेवक के फल-प्राप्ति की इच्छा द्वारा धोखा देने की प्रवृत्ति से ही भोग और त्याग की उत्पत्ति होती है। भोग से क्षणभंगुर लोक की प्राप्ति होती है और मुमुक्षा सर्वथा काल्पनिक है। जड़ वस्तुएँ समाप्त हो जाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं; किंतु चेतन का विलास ही रुक जाए, यह अत्यंत अल्पबुद्धि का विचार है। तमोगुण से ऐसा विचार उत्पन्न होता है। ‘मैं ईश्वर बन जाऊँगा’—क्या ऐसा कोई श्रुति-वाक्य है, क्या उसका पोषण किया जा सकता है, इस पर विचार होना चाहिए।
संसार के निकृष्ट जीवों जैसी सोच वाले मनुष्यों को ऐसी दुर्बुद्धि क्यों होती है? यह मत्सरता (ईर्ष्या) से उत्पन्न है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और मद—ये पाँचों जब एकत्र होते हैं, तब मत्सरता या परश्रीकातरता (दूसरों के ऐश्वर्य से जलना) आती है। कामना की अपूर्णता से क्रोध उत्पन्न होता है। कामादि पाँचों शत्रुओं की दासता में पूरी तरह रहने पर मत्सरता उत्पन्न होती है। इनमें से किसी एक को भी कम करने पर मत्सरता कुछ घटती है। और उससे मुक्ति मिलने पर वे भागवत का श्रवण कर सकते हैं।
‘कैतव’ शब्द का अर्थ छल है। श्रीधर स्वामीपाद ने व्याख्या की है—“प्रकर्षेण उज्झितं कैतवं फलाभिसन्धिलक्षणं कपटं यस्मिन् सः। ‘प्र’ शब्देन मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः।” सामान्य रूप से धर्म, अर्थ और काम की व्याख्या की जाती है, किंतु ‘मोक्ष’ नामक वस्तु सबसे बड़ा कपट है। भोग की इच्छा में ‘कौड़ी फेंको, तेल लगाओ’ (लेन-देन का भाव)—यह स्पष्ट दिखाई देता है। ज्योतिष्टोम, सौत्रामणि आदि यज्ञों द्वारा यज्ञेश्वर की आराधना करके पशु-मांस खाएँगे; खाना है तो खाओ, यहाँ ईश्वर की आड़ में स्वार्थ सिद्ध करने की क्या आवश्यकता है? इन तीनों में कोई विशेष छिपाव नहीं है।
किंतु मोक्ष की दुर्भिसंधि बहुत बड़ा छल है—इससे कृष्णलीला ही रुक जाएगी। इसमें रुद्र द्वारा विष्णु के संहार की प्रवृत्ति निहित है; किंतु क्या विष्णु का संहार हो सकता है? नहीं, रुद्र का संहार संभव हो सकता है। जैसे वृकासुर ने रुद्र से वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वही भस्म हो जाएगा। अंततः शिव से वर पाकर वह उन्हीं के सिर पर हाथ रखकर रुद्र का संहार करना चाहता था, किंतु विष्णु ने उनकी रक्षा की। यह निर्विशेषवाद (Impersonalism)—आत्म-प्रवंचना है। इससे मुक्ति पाना आवश्यक है।
मुमुक्षु का विचार है कि कष्ट छूट जाने पर मैं आनंद में रहूँगा। यह सच्चिदानंद की संविद्-शक्ति पर प्रहार करना है। मुमुक्षा का अंतिम फल यही है। मुक्ति में शांति तो ये स्वयं प्राप्त करेंगे, और भगवान् छूट जाएँगे। इस प्रकार नित्यसेव्य विष्णु को ही त्याग देना सर्वथा अनुचित है। इसके समान दूसरा कोई कपट नहीं है। जप-तप करना, गोपाल का ध्यान करना, और अंत में ‘मैं अपनी सुविधा कर लूँगा, भगवान् भले ही समाप्त हो जाएँ; मैं निर्विशेष ब्रह्म बन जाऊँगा, जहाँ शोक-मोह नहीं रहेगा’। अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ही भगवान् की आवश्यकता है; स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर भगवान् की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती!
भोग-बुद्धि के लिए भगवान् की सृष्टि करते हैं, और त्याग की अवस्था आते ही उन्हें पोंछ डालते हैं। त्याग के इस निकम्मेपन को श्रीकृष्णचैतन्यदेव और अन्य आचार्यों ने स्पष्ट दिखाया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में जिनका प्रयास रहता है, वे अभक्त हैं। भागवत का श्रवण उन्हें अच्छा नहीं लगता; उन्हें परमधर्म की बात के सिवा अन्य बातें अच्छी लगती हैं। साधुओं का विचार नित्य-तत्व का विचार है। वे गुणजनित विषयों में स्वयं को लिप्त नहीं करते। वास्तविक वस्तु को जानना होगा। जब तक यह दुर्बुद्धि बनी रहेगी कि ‘चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का प्रयास ही अंतिम सत्य है’, तब तक ईर्ष्या-द्वेष रूपी दुर्गुण से छुटकारा नहीं मिल सकता।
वास्तविक वस्तु का विज्ञान ही ‘शिवद’ अर्थात् कल्याणकारी है। वास्तविक वस्तु हैं—व्रजेंद्रनंदन राधाकांत; और शेष सब अवास्तविक-मिश्रित प्रतीतियों से भरा है। राधागोविंद, राधामदनमोहन और राधागोपीनाथ की सेवा के अतिरिक्त सब कुछ अवास्तविक एवं मिश्रित वस्तु-ज्ञान है, जो स्वप्न में धन-संपत्ति मिलने के समान है। नींद टूटने पर ही वास्तविक वस्तु का ज्ञान होता है। यह कौन जानेगा?—जो भक्त हैं और ईर्ष्यारहित (निर्मत्सर) हैं।
परमधर्म को जान लेने पर फल की कामना शेष नहीं रहती। ‘मुझे फल मिले, कृष्ण भले ही वंचित रहें’—यह प्रत्येक संसारी भोगी मनुष्य का स्वभाव है, जो कृष्ण-विमुखता से उत्पन्न होता है। कृष्णसेवा से वंचित होकर हम अनावश्यक वस्तुओं (rubbish/कूड़ा-कर्कट) को सिर पर ढो रहे हैं। वास्तविक वस्तु का विज्ञान प्राप्त होने पर—सकारात्मक मंगल (positive মঙ্গল) प्राप्त होने पर गौण अमंगल रूपी व्यर्थ के विचार कहाँ चले जाएँगे!
दार्शनिकगण कहते हैं—दुःख-त्रय के नाश के लिए ही धर्म में प्रतिष्ठित रहना आवश्यक है। इसमें उनका अपना ही स्वार्थ है। क्या? ‘धर्मेण गमनमूर्ध्वं तद्विपरीतं भवत्यधर्मेण’ (धर्म से ऊर्ध्वगति होती है और अधर्म से इसके विपरीत अवनति होती है)। किंतु उससे परम मंगल नहीं होगा।
‘कर्मणां परिणामित्वात् आबिरिञ्च्यादमङ्गलम्।’
“मैं कर्म का कर्ता हूँ, कर्म करके लाभ प्राप्त करूँगा, परमेश्वर को वंचित रखूँगा। परमेश्वर को न मिले, शत्रु को न मिले, भाइयों को भी नहीं दूँगा”—यह समस्त दुर्बुद्धि भोगी-संप्रदाय में पाई जाती है। वे सोचते हैं कि भोग में बाधा पड़ने से असुविधा होगी।
वेद्य (जानने योग्य) संविद्-शक्ति में अधिष्ठित व्रजेंद्रनंदन, यशोदा के स्तनपान करने वाले बालगोपाल अथवा किशोर गोपाल को प्राप्त करना आवश्यक है। वे ही परमतत्व परमेश्वर हैं, मूल पदार्थ हैं, वास्तविक वस्तु हैं। यह जानना आवश्यक है। वस्तु का विशेषण है ‘वास्तव’ वस्तु—अर्थात् जो नित्य विद्यमान रहता है। अस्तित्व-धर्म से युक्त होकर जो नित्य रहता है, वही वास्तव (सत्य) है। वह केवल काल्पनिक ब्रह्म या परमात्मा की अधूरी या आंशिक धारणा मात्र नहीं है। वे अचिंत्य-शक्तिमान नंदनंदन हैं। सामान्य तर्कवादी बहुत पीछे छूट जाएँगे। भागवत पढ़ने पर, दशम स्कंध पढ़ने पर वास्तविक वस्तु अनिर्दिष्ट नहीं रह जाती। वह अमूर्त (Abstract) नहीं रहती। वह स्वतः-कर्तृत्व धर्म से युक्त (चेतन एवं स्वतंत्र) है। नित्य सापेक्ष धर्म (relativity) वास्तविक वस्तु के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
संसार की एक वस्तु के साथ दूसरी वस्तु के भेद-निरूपण में समानता और विषमता का विचार होता है। किंतु मूल वस्तु में नाप-तोल करने का धर्म नहीं है। जो वस्तु नित्य नहीं रहती, उसके साथ मूल वस्तु का क्या संबंध? तथापि, पिछले दिन मैंने कहा था कि अन्वय-क्रम से समानता है। किंतु वह तद्भाव-विशिष्ट (पूर्णतः वही रूप) नहीं है। जैसे नारायणोपनिषद् पढ़कर ‘अश्व-नारायण’, ‘दरिद्र-नारायण’ आदि का विचार करने जाएँगे, तो सर्वनाश हो जाएगा। ‘उलटा समझ लिया राम’—तब तो यह विपथगामी नीति हो जाएगी।
‘तेजोवारिमृदां’ को न समझ पाने के कारण इसे किसी ऐंद्रजालिक (जादूगर) की रचना माना जा सकता है। किंतु वह भूल केवल बाह्य दृष्टि (seeming sight) के कारण दिखाई दे रही है; लोग प्रथम दृष्टि में भ्रमवश ऐसा देख रहे हैं। पिता के वात्सल्य-पूर्ण शासन को देखकर बहुत से लोग भयभीत हो सकते हैं। वे यह नहीं जानते कि पिता शासन कर रहे हैं—शिक्षा के लिए, मंगल के लिए। किंतु पिता का प्रचुर वात्सल्य उसमें अंतर्निहित है। शिक्षित होने पर लाभ संतान का ही है, पिता का कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं है।
श्रीमद्भागवत को महामुनि नारायण ऋषि ने कहा है। बाद में कृष्णद्वैपायन व्यासदेव ने शिष्य-परंपरा द्वारा विचार-विमर्श हेतु इसे ग्रंथाकार में लिपिबद्ध किया है।
‘अपरेः किम्’—अन्य शास्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं है। अन्य बातें कहने से क्या लाभ? इसी से समस्त अर्थों की सिद्धि हो जाती है। भगवान् हरि के हृदय में अवरुद्ध (प्रतिष्ठित) हो जाने पर व्यर्थ की बातें शेष नहीं रहेंगी। तब महाप्रभु का यह कथन—‘दूसरों का हृदय मन है, मेरा मन वृन्दावन है’—भली-भाँति समझ में आ सकेगा।
वही वस्तु आदि-कवि ब्रह्मा के हृदय में प्रकाशित हुई थी। तब तक तीनों तापों का उदय नहीं हुआ था—ब्रह्मांड की सृष्टि भी नहीं हुई थी। उसी समय ब्रह्मा जी ने इसे प्राप्त किया था। हमें उस नित्य वस्तु में रुचि नहीं है; जो भगवान् नहीं है, वही हमारे हृदय में आ रहा है। नेत्र, कर्ण, नासिका, जिह्वा और त्वचा हमारे भोग में सहायता करें; मैं जगत् का भोग करूँगा; बाह्य संसार की वस्तुएँ पाकर मुझे संतोष हो; दूसरों द्वारा संतोष कराकर मैं संतुष्ट होऊँगा; कृष्ण को संतुष्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं है—यह सब संकीर्ण परार्थता (स्वार्थ-लिप्त परोपकार) है।
उदार परार्थता में किसका उपकार करूँगा?—जो कृष्ण का भजन करेगा। भक्त के साथ मित्रता करूँगा; जो कृष्ण-कथा कहते हैं, उनकी सेवा करूँगा। प्रतिकूल वचनों के प्रति उदासीन रहूँगा। भक्त का संग ही वांछनीय है—अभक्त को कुसंग जानकर त्याग देना चाहिए। उन पर आक्रमण भी नहीं करूँगा और उनकी किसी बात में सम्मिलित भी नहीं होऊँगा।
कृष्ण जब हृदय में अवरुद्ध हो जाएँगे, तब वे भाग नहीं सकेंगे। यहाँ ‘शुश्रूषुभिः कृतिभिः’ ये दो शब्द आए हैं—अर्थात् जो अत्यंत निपुण हैं और सेवा करते हैं (श्रवण-कीर्तनात्मक सेवा)।
‘तत्क्षणात् और सद्यः’—ये दोनों शब्द विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं। बालक जन्म लेकर क्रमशः बड़ा होगा, फिर दीक्षा/अध्ययन पूर्ण करके संतान उत्पन्न करेगा—इसमें तो बहुत समय लगेगा। यहाँ ऐसी बात नहीं है। तुरंत ही, बिना किसी काल-विलंब के भगवद्-ज्ञान और सेवा का अधिकार प्राप्त किया जा सकता है।