जगद्गुरु ॐ विष्णुपाद श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ‘प्रभुपाद’

श्रीगुरु-पदाश्रय करना ही भगवद्भक्ति साधनका सबसे पहला दरवाजा है। इसीलिए भक्ति-आचार्य श्रीरूप गोस्वामीने ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’- ग्रन्थमें भक्तिके अङ्गोंका वर्णन करते हुए लिखा है-

सर्व प्रथम-

गुरुपादाश्रयस्तस्मात् कृष्ण-दीक्षादि शिक्षणम्।
विश्रम्भेण गुरोः सेवा साधु वर्मानुवर्तनम् ॥

अपने नित्य चरम कल्याणकी कामना रखनेवाले जीव यदि संसार बन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले भगवान्‌के प्रकाश-स्वरूप सद्गुरुके शरणागत होना चाहिए। श्रीगुरुदेवके चरणोंमें आत्म-समर्पणके बिना अनर्थ सागरसे उद्धार पाना कठिन ही नहीं, बिलकुल असम्भव है। सगुरुके दो लक्षण हैं-श्रोत्रिय अर्थात् श्रुति-शास्त्रमें पारङ्गत तथा ब्रह्मनिष्ठ अर्थात् कृष्णतत्त्वविद् । ऐसे सगुरुका आश्रय ग्रहण करनेके बदले जो लोग तर्क द्वारा भव-समुद्रको पार कर परतत्त्वको जानना चाहते हैं, उन्हें केवल मात्र तर्क ही लाभ होता है। ये लोग श्रीत-पथसे विमुख होकर भ्रम, प्रमाद, करणापाटव और विप्रलिप्साके फेरमें पड़कर नास्तिक हो पड़ते हैं। इनकी सारी चेष्टाएँ गुरु-द्रोह एवं भगवत्-द्रोहके लिए होती है। जो लोग संसार-समुद्रमें सदाके लिए डूब जानेके लिए दृढ़-सङ्कल्प हैं, वे सद्गुरु पदाश्रयकी कोई आवश्यकता अनुभव नहीं करते; बल्कि वे अपने ही जैसे गृहासक्त भगवद्-विमुख गुरुब्रुवको ही गुरुके रूपमें वरण करके करोड़ों कल्पों तक अन्धविश्वासके चक्करमें पड़े रहते हैं। ऐसे लोगोंका तब तक कल्याण नहीं होता, जब तक वे सगुरुका वरण नहीं करते।

इस महा-सत्यका प्रचार करने तथा स्वयं आचरण द्वारा लोक शिक्षाके लिए जगद्गुरु श्रीगौर-सुन्दरने स्वयं श्रीगुरुपादपच्योंमें आत्म-समर्पण एवं शरणागतिका आदर्श दिखलाया है। श्रीगुरुदेव यथार्थ कृष्णैकशरण एवं कृष्णकी प्रीतिके लिए ही अखिल चेष्टायुक्त होते हैं; ऐसे सद्गुरुकी लघुता एवं उनका अभाव अनुमान कर जो उसे पूर्ण करनेके लिए तर्क पथका अवलम्बन करता है, वह भव-यन्त्रणासे कभी छुटकारा नहीं पा सकता। “सजातीयाशये स्निग्धे साधौ सङ्गः स्वतो वरे” (भ. र. सि. पूर्व वि. ४०) यह कल्याणकारी विचार जिनके हृदयमें प्रबल है, केवल वे ही आत्म-समर्पण या श्रीगुरुपदाश्रय करनेमें समर्थ हो सकते हैं। श्रीभगवान्‌के चरणकमलोंको ही एकमात्र सेवनीय जानकर स्वयं भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने कृष्ण-प्रेमके सच्चे साधकोंको आदर्श-विधिकी शिक्षा प्रदान करनेके लिए श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रिय कृपापात्र श्रीईश्वरपुरीपादको श्रीगुरुदेवके रूपमें वरण करनेका लीलाभिनय करके उनपर कृपा की थी। जिस कृष्णपादपब्य-सुधारसका पान करनेके लिए शिष्यका अभिनय करनेवाले श्रीचैतन्य महाप्रभु की गुरुदेव के श्रीचरणोंमें भिक्षा-प्रार्थना है, उसी कृष्णपादपग्य सुधारसका पान करनेके लिए ही गुरु-लीलाका अभिनय करनेवाले भिक्षादाता ईश्वरपुरी पादका भिक्षा प्रदान करना है। इन दोनोंमें किसी प्रकारका वैषम्य लक्षित नहीं होता।

न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।
जन्मनि मम भवताद्भक्तिरहैतुकी जन्मनीश्वरे त्वयि ॥

– हे जगदीश ! मैं न धन चाहता है, न पुत्र परिवार आदि जन चाहता हूँ, न सुन्दर कविता ही चाहता हूँ। चाहता है केवल हे प्राणेश्वर ! आपके चरणकमलोंमें मेरी जन्म-जन्ममें अहतुकी भक्ति हो।

उपरोक्त श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुजीने साधकके लिए जिस चरम प्रार्थनाकी शिक्षा दी है, वही श्रीमन्माधवेन्द्रपुरीके निष्कपट एवं परिपूर्ण करुणा-प्रसादके प्रभावसे श्रीईश्वरपुरीपादके हृदयमें संचारित होकर हदगत भावके रूपमें सदैव निहित थी।