नित्यलीलाप्रवीष्ट ॐविष्णुपाद श्रीश्रीभक्तिप्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज कृष्णदास कविराज गोस्वामी वृन्दावनकी लीलाओंको आस्वादन करते हुए कहते हैं।

अन्येर हृदय-मन, मोर मन-वृन्दावन, ‘मने’ ‘वने’ एक करि’ जानि।
ताहाँ तोमार पदद्वय, कराइ यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि।।
(चै.चै मध्य १३.१३७)
अधिकांश लोगोंके लिए मन तथा हृदय एक हैं, किन्तु मेरा मन वृन्दावन है। अतएव मैं अपने मन और वृन्दावनको एक मानता हूँ। मेरा मन पहलेसे वृन्दावन है तो क्या आप अपने चरणकमल वहाँ रखेंगे? इसे में आपकी पुर्ण कृपा मानूँगा।
“नहीं तो हमें धोखा देनेके सभी प्रयास छोड़ दो। यदि आप वास्तवमें मुझ पर कृपा करने चाहते हो तो यह राज्यकीय वेश, यह हाथी, घोड़े और सैनिकोंको छोड़ दो। मुझे इन सबसे लुभानेका प्रयास मत करो। यदि आप मेरे पास आना चाहते हो तो गवाले जैसा वेश धारण करो और मेरे साथ वृन्दावनमें चलो।”
कृष्ण लान ब्रजे जाय ए भाव अंतर (चै. चै. च. मध्य १.५६) में कृष्णको लेकर ब्रजमें लौट जाऊँगी। यह भाव गोपियोंके हृदयमें सदा रहा।
“यदि आप मेरे पास आना चाहते हो तो गोवाले जैसे वेश धारण करो! मेरे साथ वहीं यमुनाके तट पर चलो, वहीं कदम्बके वृक्षके नीचे चलो और मेरे साथ वहाँ खड़े रहो तभी में मानूँगी की आपने मुझ पर कृपाकी है। नहीं तो मैं समझेंगी यह सब और कुछ नहीं, परन्तु वञ्चित करना है।”
“क्या आप मुझे कभी स्मरण करते हैं? क्या आप समझते हैं कि हम योगी हैं? क्या आप समझते हैं कि स्वांसके व्यामसे, नाना प्रकारके शारिरीक आसन से या आपको ध्यान लगानेसे हम आपको अपने हृदयमें वशीभूत कर सकती हैं? प्रिय सखे, थोड़ा विचार करो, आप हमारे साथ इस प्रकारका व्यवहार क्यों कर रहो हो? आज पूर्ण चन्द्रमा (पूर्णिमा) की रात है, चलिए हम वहीं जमुनाके तट पर चलें।” जैसे ही राधाने ‘पूर्णिमा’ शब्द उच्चारण किया वह निराश हो गीं, यह राधारानीकी अवस्था है।
हम श्रीमति राधीकाको क्या समझें? कुछ क्षणके लिए मैं उनका वर्णन करके भावुक हो गया था। परन्तु हममें वह शक्ति नहीं है कि हम गोपियोंकी कृष्णसे विरह वेदनाको अनुभव कर पायें।
आज बहुत दिनोंके बाद कुरुक्षेत्रमें फिर सूर्य ग्रहण लगा है। सभी जन समुदाय यहाँ उपस्थित हुए हैं। कोई धनकी लालसासे आया है, कोई पुत्र तो कोई पुण्य एकत्रित करने आया ताकि भविष्यमें वह सुख भोग कर सकें। परन्तु ब्रजवासी, कृष्णको क्षणभर अवलोकन करनेकी लालसासे विरहकी अग्निसे जलते हुए आयें है। ” कृष्ण यहाँ आएँगे, और वास्तवमें मैं उनको देख पाँऊगा।”
ब्रजवासीयोंको मिलनेकी आकाँक्षासे कृष्ण अपने सारथी दारुकाको आदेश देते हैं कि रथको सुन्दरसे, ऐश्वर्यसे सजाओ। रथ घोड़ोसे एंव हाथीयोंसे घिरे है। कृष्ण राजकीय वेशमें रथ पर सवार हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं। ब्रजवासी कृष्णके निकट आये उन्होने कृष्णको अनेक वर्षोंके बाद पहली बार देखा।
कृष्णके पिता नन्द और चाचा उपनन्द बहुत देरसे प्रतिक्षा कर रहे हैं। उन्होंने बहुत कुछ सोचकर रखा है कि कृष्णसे क्या कहेंगे। परन्तु जब कृष्ण उनके सामने उपस्थित हो गये तो अब इन्हे कृष्णसे कहनेके लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा है। वह बोले “मेरे पुत्र ! गोपाल!” परन्तु इससे आगे कुछ भी उच्चारण नहीं कर पाये। यह शब्द भी अश्रुओंकी बाढ़में लुप्त हो गये। कृष्ण भी अपनेको रोक नहीं पाये। उनके अश्रु उनके कपोलों पर वर्षाकी भाँति गिर रहे हैं। नन्द बाबाने कृष्णको जानेकी अनुमति दे दी आखिर वह कब तक कृष्णको अपने नेत्रोंमें रोक सकते थे। नन्दबाबा और कृष्ण एक दूसरेको देखकर क्रन्दनके सिवाय कुछ न कर सकें। उनके अश्रुपात ही उनकी वात्तालाप थी। अब यशोदा माताकी कृष्णसे भेंट करने की बारी है। परन्तु वह भी “प्रिय पुत्र ! गोपाल ! “के सिवाय कुछ न बोल पायीं।
अब सखाओंकी बारी थी कृष्णको सम्बोधन करनी की। उनकी इच्छा थी कृष्णको शासन करके कहेंगे “भय्या तुम हमें क्यों भूल गये? क्या तुम्हे कभी भी हमारा समरण नहीं हुआ? परन्तु फिर विचार किया कि कन्हैयाको यह सब कहना उचित न होगा, यह सब कहनेकी आवश्यकता ही क्या है? इसलिए कुछ न कह पाये।
अब कृष्णकी राधारानीसे मिलनेकी बारी थी, श्रीराधारानी बोलीं “क्या तुमने कभी मुझे समरण किया?” कृष्ण बोलें “क्या कहतीं हो? निश्चय में तुम्हे समरण करता था।” यहीं पर श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वाम लिखते हैं-राधाजी कहीं हैं।
अन्येर हृदय-मन, मोर मन-वृन्दावन, ‘मने ‘वन’ एक करि’ जानि।
ताहाँ तोमार पादद्वय, कराइ यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि ।।
अधिकांश लोगोंके लिए मन तथा हृदय एक हैं, किन्तु मेरा मन कभी भी वृन्दावनसे पृथक नहीं होता। अतएव में अपने मन और वृन्दावनको एक मानता हूँ। मेरा मन पहलेसे वृन्दावन है तो क्या आप अपने चरणकमल वहाँ रखेंगे? इसे मैं आपकी पूर्ण कृपा मानूँगा।
“दूसरे लोगोंका मन ऐश्वर्य प्राप्तिकी इच्छासे पूर्ण हो जाता है। वह एकके बाद एक अपनी इच्छाओंको सन्तुष्ट करते रहते है। मुझे उनसे कुछ भी मतलब नहीं है। मेरा मन तो सदा वृन्दावनके भावमें विभोर है। यदि आप वास्तवमें मुझ पर कृपा करने चाहते हो तो यह गोपाल वेश धारण करो और मुझे वृन्दावन ले चलो। अपने राज्यकीय वस्त्रों और अलंकारोंको फेंक दो। हम इन ऐश्वर्यों, हाथियों और सैनिकोंको देखकर जलती हैं। हम यह कभी भी देख नहीं सकतीं। इन सबको दूर भेज दो और हमारे साथ आए। हम आपको उसी गोपालवेशमें देखना चाहती हैं जो आप गैया-चरानेके समय पहनते थे। तभी हम विश्वास करेगी कि आपकी हम पर पूर्ण कृपा है।
इतना कहने पर राधारानी क्रन्दन करने लगीं और कहने लगीं “तो आज तुम मुझे योग सिखाने आये हो। योगी लोग अपने प्राण वायुको नियन्त्रन कर शारीरिक व्यामसे तुम्हें अपने हृदयमें ध्यान लगाते हैं। तो क्या अब मुझे तुम्हारे बारेमें सोचने के लिए यह सब करना पड़ेगा? मेरी हर स्वास केवल तुम्हारे लिए क्रन्दन करती है, में सर्वत्र केवल तुम्हारे रूपका ही दर्शन करती हूँ। परन्तु क्या मुझे अब यह योग सिखना पडेगा। हम इस योगको भली-भाँती जानती हैं। पहले तुमने उद्धवको हमारे पास भेजा ज्ञानका मार्ग दिखानेके लिए और अब स्वयं हमें इस योगकी शिक्षा दे रहो हो।” इतना कहने पर राधारानी अपनेको रोक न सकीं और जोर-जोर से रोनी लगीं।
तब कृष्णने राधारानीको संतावना देते हुए कहा, “मैंने अनेक असुरका वध कर दिया है, परन्तु अभी भी कुछ बाकि हैं, उनको भी सबक सिखाकर में शीघ्रही तुम्हारे पास आऊँगा।” राधारानी किसी भी हालतमें यह प्रस्ताव स्वीकार न कर सकीं। वह अपनी सखीको ‘सहचरी’ सम्बोधित करके कहने लगीं, प्रियः सोऽमं सहचरी’ अर्थात् हे सखी यह वही हैं मेरे प्रियतम कृष्ण। ‘तद इदं उभयः संगम-सुख अर्थात् यह वही मिलनेका आनन्द है। ‘तथापि अन्तः खेलन-मधुर-मुरली पञ्चम-जुशे मनो मे कांलिदी पुलिन सर्फयतीं। (चै.चे मध्य १.७६)
“आप वही व्यक्ति हैं जो पहले थे, और में भी वही व्यक्ति है जो पहले थी। और यह एक-दूसरेको दर्शन करनेका जो आनन्द है वह भी पहला जैसा ही है परन्तु मुझे वही कालिंदी-पुलिन-विपिन, जमुनाका तट स्मरण हां रहा है, जहाँ आपने पहली बार मेरे मनको हरण किया अंतहः खेलन-मधुर्य-मुरली-पञ्चम-जुषे, मुरली की वह पञ्चम तार। यदि आप वास्तवमें मुझे सन्तुष्ट करना चाहते हो तो मेरे साथ वहीं जमुनाके तट पर चलो। कुछ भी हो परन्तु यह कहना बंद किजिए कि हमें योगी बनना चाहिए या कुछ और करना चाहिए। राधारानी इस प्रकारसे क्रन्दन करने लगीं कि कृष्ण भी सम्भाल न पाये, उन्होने राधारानीको संतावना देनेके फिर से प्रयास किया और कहा, “मैनें अनेक असुरोंका विनाश एवं वध किया। अब केवल एक ही रह गया है, उसका भी वधकर तुरन्त तुम्हारे पास आ जाऊँगा।
श्रील कृष्णदास कविराजने कितनी अदभूत भाषाका प्रयोग किया है। क्योंकि उनके भाव साक्षात् अनुभवसे उदय हुए है। हम नही जानते कि यह भाव कैसे अनुभव किये जॉऐ। हमें तो मात्र एक झलक दिखती है। केवल हरिनाम माला हाथमें लेना ही कृष्ण-भजन नहीं है। यह सत्य है, में हरिनाम माला हाथमें लिये है परन्तु मेरे विचार कहाँ हैं? मेरा भजन कहाँ हैं? भजनका रहस्य कया हैं? श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने अपने ग्रन्थ भजन रहस्यमें अनेक भजन लिखे हैं। परन्तु हमने इस दुविधामें अभी प्रवेश नहीं किया। यद्यपि हमें अष्टकालिया लीला-स्मरण करनेका निर्देश श्रील प्रभुपादजीसे प्राप्त हुआ है। इसलिए कोई यह धारणा न रखे कि यह सब हमारे परम्परामें नहीं है। जैसे वृन्दावनके कुछ लोग कहते हैं “गोड़ीय मठके लोग सुखे हैं उनके भजनमें डैनीसम नहीं है। दूसरी ओर हम लोग देखते है कि वह लोग जो कुछ करते है वह केवलमात्र क्षणभरकी भावना है और कुछ नही। इससे क्या लाभहै?
तब कैसे वास्तविक आध्यात्मिक अनुभूति सम्भव है? यह हरिनाम जपके फलस्वरूप सम्भव है। हरिनाम करते-करते वह समय आयेगा जब आखोंसे अश्रु बहेगें। आज मुझे कुछ अनुभव है, परन्तु मैं क्या कर सकता हैं? वह केवल क्षणभरके लिए है। कितना अच्छा होता यदि यह भावना और अनुभव सर्वकालके लिए कृष्णकी सेवाके लिए होती। परन्तु ऐसा भी नही होना चाहिए कि हमारा हृदय थोड़ा सा पिगलने लगा, हमारी आँखे भी थोड़ी सी भिगने लगीं और हम अपनेको बहुत बड़ा भजनानन्दी समझने लगें। फलस्वरूप हम दूसरोंको नीचे दिखानेकी भावना रखने लगें और यह सोचने लगें कि कोई भी वास्तवीक रूपमें भजन नहीं करता, मेरे सिवाय कोई भी वास्तविक रूपमें हरिनाम नहीं करता। जब ऐसे विचार हमारे मनमें आने लगें तो हमें अपने आपको शासन करना चाहिए। यह भजन नहीं है।
प्रिय बन्धुओं हरिनामके बिना कृष्ण-भजन सम्भव नहीं है। हरिनामको छोड़ कभी भी सम्भव नहीं है। महाप्रभुजी हरिनामका कितना गुणगान किया है। इसके उपर हमें गुरूजी की कृपा चाहिए।
नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।
तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा ।।
प्रिय मित्र ! मैं सबका आत्मा हूँ, सबका आत्मा हूँ, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान हूँ। मैं गृहस्थके धर्म उपनयन-वेदाध्यनन आदिसे, वानप्रस्थीके धर्म तपस्यासे और सब ओरसे उपरत हो जाना-इस संन्यासीके धर्मसे भी उतना सन्तुष्ट नहीं होता, जितना गुरुदेवकी सेवा-शुश्रषासे सन्तुष्ट होता हूँ। (श्रीमद्भागवतम् १०.८०.३४)
यह श्लोक चार आश्रमोंको सम्बोधन करता है। यदि मैं अपने आश्रमको पूर्ण रूपसे पालन करता हूँ तो भी भगवान्को सम्पूर्ण आनन्दित नही कर सकता। आप पूछ सकते हैं, “तो कैसे कृष्णको सन्तुष्ट कर सकते हैं?” वह कहते हैं, तुशयेयमं सर्व-भूतातां गुरू शु यथा। “मैं अत्यन्त सन्तुष्ट व आनन्दित तब होता हूँ जब किसीको परिपूर्णरूपसे गुरूकी सेवा करते देखता हैं न कि उसको जो अपने आश्रमको भलीभाँति पालन करता है।”
कृष्ण स्वयं अपने उद्धाहरणसे शिक्षा दे रहे है कि गुरू सेवा कैसे की जाती है। वे और उनके मित्रने सारी रात लकड़ीके गठरीको अपने मस्तक पर रखा था। आश्चर्य ! हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। स्वयं भगवान् कृष्णचन्द्र अपने मित्र सुदामासे कह रहे हैं “सुदामा क्या तुम्हें समरण है? एक दिन गुरुमाँ (गुरु पत्नी) ने हमसे कहा, “बालको आश्रममें लकड़ी नही है तो मैं कैसे रन्दन करूँगी? तब मैंने कहा था आप चिन्ता मत किजिए हम तुरन्त जाकर लकड़ी की वयस्था करते हैं। तब हमलोग घने जंगलमें गए और बहुतसी लकड़ीको इकट्ठीकर एक दूसरेके सिर पर रखने लगे। अचानक, कहाँसे घोर काले मेघ आगए और जोरसे वर्षा होने लगी। देखते-देखते सम्पूर्ण वनमें बाढ़ आ गई और हम दोनों एक दूसरेको सावधान कर रहे थे कि लकडीयाँको नीचे न रखना नही तो वह भीग जॉएगी और रन्दन न हो पायेगा। हम दानों उन गठरीयोंको अपने सर पर रख सारी रात भीगते रहे और वर्षा होती रही।”
हम भी शिष्य हैं और हमें भी ऐसा आचरण करना चाहिए। तो क्या इसलिए हम सद्गुरूके पास आएँ है कि हम लोग लकड़ीयोंको अपने सिरपर लादें? परन्तु यह तो कृष्ण साक्षाद् रूपमें गुरू सेवा करके दिखा रहे है न कि लोगोंको प्रभावित करनेके लिए ऐसा आचरण कर रहे हैं। आज यह दोनों मित्र सारी रात अपने सर पर भारी लकड़ीकी गठरीको लाद कर खड़े हैं और तेज मुस्लाधार वर्षामें भीग रहे हैं तो क्या यह एक साधारण बात है।
इधर आश्रममें गुरू सांदिपनी मुनि और उनकी पत्नी, गरू-पत्नी सारी रात एक पलके लिए भी न विश्राम कर पाये। वह सोच रहीं है, “हाय! मैंने इन बालकोंको
लकड़ी लानेके भेजा है। इत्नी देर हो गई है, वह दोनों बहुत कष्टमें होंगे।” मध्य रात्रिमें सांदिपनी मुनि उन बालकोंको ढूंढनेके लिए निकले और उच्चस्वरमें उन्हें पूकार रहे है “कृष्ण कहाँ हो? सुदामा कहाँ हो? हे गोपाल, तुम कहाँ हो? तब उन्होने अपने सामने यह अद्भुत दृश्य देखा, कृष्ण और सुदामा मस्तक पर लकड़ियाँ उठाये भीगे वस्त्रोंमें उनके सामने खड़े हैं। यह दृश्य देखकर गुरूजीका हृदय द्रवीभूत हो गया उनके आँखोंसे अश्रुओंकी धारा बह रही है, और उनके वक्षःस्थलको भी स्नापित कर रही है। सांदिपनी मुनिने उन शिष्योंकी प्रशंसा करते हुए कहा, मैं और क्या कहूँ? तुमने गुरूसेवाका एक आदर्श दिखाया है, इसलिए मैं तुम्हे आशिर्वाद करता हूँ कि मैंने जो भी तुम्हे सिखाया है वह तुम कभी भी नहीं भुलोगे न इस जन्ममें और न किसी दूसरे जन्ममें।
इसलिए इस प्रकारका भाव स्थिर रहना चाहिए। वह भाव स्थायी होना चाहिए, परन्तु यह भाव स्थिर कब रह सकता है? जब हम निरअपराध होकर हरिनाम करेंगे।
नाम बिना कलि-काले नहीं आर धर्म,
सर्व-मन्त्र-सार-नाम-एइ शास्त्र-मर्म।।
“कलियुगमें हरिनामको छोड़कर और कोई धर्म नहीं है। हरिनाम ही सभी मन्त्रोंका सार है ऐसा शास्त्र कहते हैं। (चै. चै आदि ७. ७४) आपके अधिक मन्त्रोंको समरण करनी आवश्यकता नहीं है। परन्तु कुछ विषयोंको सावधानीसे समझनेकी आवश्यकता है, हमारे मन्त्र, आप उन्हे अच्छेसे उच्चारण किजिए और अपराधोंसे दूर रहें। किन्तु वह केवल हाथमें माला लेनेसे नहीं होगा। बहुतसे व्यक्ति हाथमें माला तो लेते हैं परन्तु साथ-साथ ही व्यर्थकी बाते करते हैं। हमारा उद्देश्य है-अविक्षेपेन साततयां- “बाधा रहित जप करना”। इसलिए जब लोग मुझसे पूछते हैं, “क्या हम कभी भी कृष्णकी लीला समरण नहीं कर सकते। क्या हमें सदाके लिए इस अमृतसे वञ्चित होना पड़ेगा?” उत्तरमें मैं कहता हूँ “हाँ कयों नहीं तुम सब लीला समरण करो, और दूसरोंको भी इसका उपदेश करो, परन्तु ऐसा करनेसे पहले तुम्हे इसकी किमत देने पड़ेगी। और इसकी किमत केवल हरिनाममें निष्ठा है। यदि तुम्हारी हरिनाममें पूर्ण निष्ठा है तो तुम समरण कर सकते हो। भक्तिरसामृतसिंधु (१.४.१५-१७) में ऐसा लिखा हैः अदोः श्रद्धा तताह साधु-संग, साधु-संगके स्तर पर हम गुरुपदाश्रय है। तब भजन-क्रिया आरम्भ होगी।
कोन भाग्ये कोन जीवेर ‘श्रद्धा’ यदि हय।
तबे सेड़ जीव ‘साधुसङ्ग जे करय ॥
साधुसङ्ग हैते हय ‘श्रवण-कीर्त्तन’।
साधनभक्त्ये हय ‘सर्वानर्थनिवर्तन’ ॥
अनर्थनिवृत्ति हैले भक्त्ये ‘निष्ठा’ हय।
निष्ठा हैते श्रवणाद्ये ‘रुचि’ उपजय ॥
रुचि हैते भक्त्ये हय ‘आसक्ति’ प्रचुर।
आसक्ति हैते चित्ते जन्मे कृष्णे प्रीत्यङ्कर ॥
सेड़ ‘भाव’ गाढ़ हैले धरे ‘प्रेम’ नाम।
सेइ प्रेमा-‘प्रयोजन’ सर्वानन्द-धाम ॥
(चे. च. म. २३/९/१३)
“किसी भाग्यसे यदि किसी जीवकी ‘कृष्ण’ में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है तो उसीके फलस्वरूप वह साधुसङ्ग व गुरुपदाश्रय करता है। साधुसङ्ग होनेसे श्रवण और कीर्तन द्वारा स्थूल-स्थूल अनर्थ निवृत्त होनेसे श्रद्धा ही अनन्यभक्तिके प्रति ‘निष्ठा’ रूपमें उदित होती है। निष्ठा ही क्रमसे ‘रुचि’ हो जाती है। उसी रुचिसे ही बादमें ‘आसक्ति’ उत्पन्न होती है। आसक्ति निर्मल होने पर कृष्णप्रीतिके अंकुरस्वरूप ‘भाव’ व ‘रति’ होती है। वही रति गाढ़ होने पर प्रेम’ कहलाती है। वही प्रेम ही सर्वानन्द-धामस्वरूप ‘प्रयोजन-तत्वं है।
इस क्रमको विशेष रूपसे जाननेकी आवश्यकता है। नैष्ठिकी भक्ति क्या है? श्रीलजीवगोस्वामीपाद श्रीभक्तिरसामृत सिन्धु ग्रन्थकी टीकामें वर्णन करते हैं।
‘अविक्षेपेन सातत्यम्’ (१/४/१५) – ‘व्यवधान रहित स्थिरता’ अर्थात् विक्षेपरहित निरन्तरता। मैंने अनुभव किया है कि जब हम हरिनाम स्मरण करनेका प्रयास करते हैं तो नाना प्रकारकी चिन्ताएँ आती और जाती हैं। हम एक कौएको देखते हैं तो उसीकी चिन्ता करनेमें लग जाते हैं और न जाने कितनी जगहों पर हमारा मन चला जाता है? तो स्थिरता कहाँ है? श्रीलभक्तिविनोद ठाकुर श्रीहरिनाम चिन्तामणिमें लिखते हैं- ‘कोटि-कोटि नाम किये, परन्तु कृष्ण-प्रेमकी एक बूँद भी प्रविष्ट नहीं हुई। प्रेम ही गाढ़ भाव है। तो वह गाढ़ प्रेम कहाँ है? मुझे तो केवल मात्र संख्या पूर्ण करनी है और कुछ लेना-देना नहीं है। परन्तु नामाचार्य हरिदास ठाकुर क्या करते थे? वे कभी उच्च स्वरसे तो कभी निम्न स्वरसे नाम करते थे। सारी रात हरिनाम करते रहते थे। जब सूर्यका उदय होता तो वे अपने आपसे कहते, ‘क्या सूर्यका उदय हो गया है?’ कोई नहीं जानता था कि वे कब सोते थे, कब जागते थे। क्या हम उनकी अवस्थाकी चिन्ता कर सकते हैं? इसलिए यह जानना अति आवश्यक है कि नैष्ठिकी भक्ति क्या है? इसलिए में कहता है कि आप सभी भजन करें। यदि आप भजन करेंगे तो हो सकता है कि ऐसी भावना आएगी। परन्तु तब तक अपेक्षा करो जब तक तुम नैष्ठिकी भक्ति प्राप्त नहीं कर लेते और फिर आकर मुझे जिज्ञासा करो। यदि आपमें नैष्ठिकी भक्ति ही नहीं है तो आप कैसे सोच सकते हैं कि ऐसे भाव आपके हृदय में उदित होंगे?
नैष्ठिकी भक्तिके लक्षण श्रीमद्भागवतमें इस प्रकार कहे गए हैं-
तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये।
चेत् एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ॥
जब नैष्ठिकी भक्ति उदित होती है, तब रजोगुण और तमोगुणके भाव-काम और लोभादि शान्त हो जाते हैं और चित्त इनसे रहित होकर सत्त्वगुणमें स्थित एवं निर्मल हो जाता है। और यदि हम इस स्तर तक नहीं पहुँच पाए, तब हम अष्ट सात्त्विक भाव जैसे किसी विकारको कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
हमारा लक्ष्य क्या है? इसको स्पष्ट रूपसे बतानेके लिए कि हमारा लक्ष्य क्या है, श्रील प्रभुपादने कार्तिक मासमें हमें अष्ट-कालीय-लीला-स्मरणका सूत्र रूपमें वर्णन किया।
श्रील प्रभुपादने कहा कि अष्ट-कालीय-लीला-स्मरण करो। परन्तु पहले हरिनाम करो। सर्वप्रथम श्रीहरिनाममें थोड़ी निष्ठा तो आने दो। ‘अविक्षेपेन सातत्यम्’ उस स्तरको आने दो, जहाँ पर मन स्थिर और विक्षेप आदिसे रहित हो जाता है। मैं तो केवल विक्षेप ही देखता हूँ, मन इधर-उधर भागता है। दूसरी ओर, यदि भगवानकी लीलाओंका चिन्तन करनेसे कुछ लाभ होता है, तब यह और बात है। परन्तु यदि हमारा चित्त प्रतिक्षण अन्य विषयोंकी चिन्ता करता है, तो फिर इन लीलाओंका स्मरण करनेकी वास्तविक उत्कण्ठा कैसे उत्पन्न हो सकती है? इसलिए जब मेरे शिष्य दुःखी होकर पूछते हैं- “महाराज! क्या हम इस भावरहित स्थितिमें ही सब समय भजन करेंगे?” में उनको उत्तर देता हूँ- “यदि तुम नैष्ठिकी भक्तिकी स्थितिमें पहुँच चुके हो तो फिर तुम जैसा चाहो, वैसा कर सकते हो। और तुम दूसरोंको भी इस मार्गके विषयमें बता सकते हो। परन्तु यदि तुम स्वयं ही नैष्ठिकी भक्तिके स्तर तक नहीं पहुँचे हो, तो फिर दूसरेको कैसे उपदेश दे सकते हो? और इस स्थिति तक पहुँचनेके लिए श्रीहरिनामके अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।”
ऐसा नहीं हो सकता कि हरिनामके बिना ही किसीके चित्त रूपी दर्पणका मार्जन हो जाए। जब श्रीहरिनाममें दृढ़ता आ जाए और हृदयमें नैष्ठिकी भक्ति उत्पन्न हो जाए, फिर और प्रश्न करनेकी कोई आवश्यकता नहीं हैं। तुम्हें समझमें आ रहा है कि मैं क्या कहना चाहता हूँ? क्या अभी भी तुम मुझसे कहोगे कि हमें ‘कृष्ण-लीलामृतका पान करनेकी आवश्यकता है?’ श्रीकृष्ण लीलाका स्मरण करनेसे पूर्व तुम्हारे चित्तरूपी दर्पणका एक स्तर तक मार्जन हो जाना आवश्यक है। जब तक हृदय काम, क्रोध, लोभआदिसे भरा हुआ है, तब तक कोई कैसे इन दिव्य लीलाओंको अनुभव कर सकता है? क्या तुम शुद्ध सत्त्वकी स्थितिमें पहुँच गए हो? इसलिए श्रीमद्भागवतमें कहा गया है- ‘तदा रजस्तमोभावाः। इस पर अच्छी प्रकारसे विचार करो। क्या तुमने इस पयारको सुना है?
श्रद्धाः शब्दे विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय ।
कृष्ण भक्ति कैले सर्व कर्म कृत हय ॥
(चै. च. मध्य २२/५२)
कृष्णकी भक्ति करनेसे सभी कर्म करना हो जाता है-इस सुदृढ़ निश्चयात्मक विश्वासको भक्तिमें अधिकार देनी वाली ‘श्रद्धा’ कहा जाता है।
इसीसे भक्तिमें दृढ़ता आती है। जब हृदयमें ऐसी श्रद्धा उत्पन्न हो जाएगी, तभी भक्तोंका संग सम्भव है। इसी साधुसंगके फलस्वरूप तुम शुद्ध भक्तोंका आश्रय ग्रहण करोगे। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने साधु-संगको दो प्रकारका बताया है। एक साधुसंग श्रद्धासे प्रारम्भ होकर पारमार्थिक संगकी ओर जाता है। ऐसा भजन क्रिया द्वारा होता है। यह संग श्रवण, कीर्तन आदि द्वारा होता है।
कोन भाग्ये कोन जीवेर ‘श्रद्धा’ यदि हय।
तबे सेइ जीव ‘साधुसङ्ग’ ये करय ॥
साधुसङ्ग हैते हय ‘श्रवण-कीर्तन’।
साधनभक्त्ये हय ‘सर्वानर्थनिवर्तन’ ॥
अनर्थ निवृत्ति हैले भक्त्ये ‘निष्ठा’ हय।
निष्ठा हैते श्रवणाद्ये ‘रुचि’ उपजय ॥
(चै. च. मध्य २३/९-११)
भक्ति-उन्मुखी सुकृतिके बलसे किसी जीवकी यदि अनन्य भक्तिके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तब वह जीव शुद्ध भक्तरूप साधुओंका संग करता है। उसी साधुसंगसे श्रवण-कीर्तन होता है। श्रवण और कीर्तन जितने परिमाणमें होता है, साधन-भक्तिसे उसी परिमाणमें ही सभी अनर्थोसे निवृत्ति होती है। श्रद्धा उदय होनेके साथ ही साथ श्रवण और कीर्तन द्वारा स्थूल-स्थूल अनर्थोकी निवृति होने पर श्रद्धा ही अनन्य भक्तिमें ‘निष्ठा’ के रूपमें उदित होती है। फिर निष्ठा ही क्रमानुसार ‘रुचि’ में परिवर्तित हो जाती है।
जब भक्त जातरुचिके स्तर पर पहुँचता है, तब वह कुछ सात्विक भावोंका अनुभव करता है। जैसे कि नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होना इत्यादि। श्रीमद्भागवत (२/३/२४) में कहा गया है-
तदश्मसारं हृदयं वतेदं, यदगृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः।
न विक्रियेताथ यदा विकारो, नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः ॥
सूतजी! हरिनाम ग्रहण करने पर भी जिसका हृदय द्रवीभूत नहीं होता, नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित नहीं होती एवं रोम-रोम आनन्दसे पुलकित नहीं होता, उसका हृदय पाषाणके समान कठोर है।
अपराध-फले मम, चित्त भेल बज्र-सम
तुया नामे ना लभे विकार।
हताश हईया हरि, तब नाम उच्च करि
बड़ दुःखे डाकि बार-बार ॥
(गीतावली, शिक्षाष्टक ६)
अपराधोंके फलस्वरूप मेरा चित्त बज्रके समान कठोर हो गया है, इसलिए श्रीहरिनाम ग्रहण करते समय मेरे हृदयमें किसी भावका उदय नहीं होता। इसलिए हे हरि ! मैं हताश होकर आपके नामोंका बार-बार उच्च स्वरसे दुःखपूर्वक गान करता हूँ।
इसलिए यदि नाम करते हुए हृदयमें विकार उत्पन्न नहीं होते तो कुछ न कुछ व्यथा तो हृदयमें होनी ही चाहिए। क्या कभी तुम्हारे मनमें ऐसा विचार आता है?
दीन-दयामय करुणा-निदान भाव-बिन्दु देइ राखह पराण।
कबे तुया नाम उच्चारणे मोर नयने झरिबे दर-दर लोर ॥
(गीतावली, शिक्षाष्टक ६)
हे भगवान्! आप तो दीनों पर दया करनेवाले हैं। करुणाके सागर हैं। मुझे भावके सागरका एक बिन्दु मात्र देकर प्राण दान कीजिए। कब आपका नाम उच्चारण करते हुए मेरे नयनोंसे अश्रुओंकी धारा बहेगी?