सप्तमोऽध्यायः
श्रीव्यासदेवके द्वारा भक्तियोग-समाधिमें लीला-परिकरोंके साथ पूर्णपुरुष श्रीकृष्णका दर्शन,
अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाका मानमर्दन
श्रीशौनक उवाच –
निर्गते नारदे सूत भगवान् बादरायणः ।
श्रुतवांस्तदभिप्रेतं ततः किमकरोद्विभुः ॥ १ ॥
श्रीशौनक ऋषिने पूछा- हे श्रीसूत गोस्वामी ! सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीव्यासदेवने देवर्षि श्रीनारदका अभिप्राय सुनकर उनके वहाँसे प्रस्थान करनेपर क्या किया ? ॥१॥

श्रीसूत उवाच –
ब्रह्मनद्यां सरस्वत्यामाश्रमः पश्चिमे तटे।
शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्द्धनः ॥ २ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- ब्रह्मनदी अर्थात् ब्राह्मणोंसे घिरी हुई सरस्वती नदीके पश्चिम तटपर शम्याप्रास नामक एक आश्रम है। वहाँ ऋषियोंके यज्ञ होते ही रहते हैं ॥ २ ॥

तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीषण्डमण्डिते ।
आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥ ३॥
वहींपर बेरके वृक्षोंके सुन्दर वन द्वारा परिशोभित श्रीव्यासजीका आश्रम है। वे अपने आश्रममें आसनपर बैठ गये और उन्होंने जलस्पर्श अर्थात् आचमन किया। आचमनके बाद जड़-प्रक्रियाओंकी सहायताके बिना वे देवर्षि श्रीनारदके उपदेशानुसार भक्ति-समाधि द्वारा अपने मनको स्थिर करते हुए ध्यान करने लगे ॥ ३॥

भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।
अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायाञ्च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥
भक्तियोगके प्रभावसे व्यासदेवजीका मन पूर्णतः एकाग्र और निर्मल हो गया। तब उन्होंने लीला-परिकरोंके साथ पूर्णपुरुष श्रीकृष्णका दर्शन किया और उनके पृष्ठ भाग (पीछे) में लज्जित भावसे आश्रय लेकर खड़ी बहिरङ्गा मायाको भी देखा ॥४॥

यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम् ।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतञ्चाभिपद्यते ॥ ५ ॥
इसी मायाके द्वारा जीवका स्वरूप आवृत और विक्षिप्त हो जाता है। उस समय जीव मोहित होकर गुणातीत होनेपर भी स्वयंको त्रिगुणात्मक मान लेता है और जड़ातीत होनेपर भी इस जड़-देहमें आत्म-बुद्धि (जड़-शरीरमें ‘मैं’ का अहङ्कार) करने लगता है। इस जड़-अभिमानके कारण ही वह अपनेको कर्त्ता और भोक्ता मानकर सांसारिक भोगोंकी वासनाको प्राप्त करता है ॥५॥

अनर्थोपशमं साक्षाद्भक्तियोगमधोक्षजे ।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम् ॥ ६ ॥
अधोक्षज अर्थात् इन्द्रिय-ज्ञानसे अतीत भगवान् श्रीविष्णुमें अहैतुक भक्तियोग अनुष्ठित होनेसे संसारके दुःखोंका भोगना समाप्त हो जाता है। सर्वज्ञ श्रीव्यासदेवने जब समाधिमें इन सबका दर्शन किया तब इन विषयोंसे अनजान लोगोंके कल्याणके लिए उन्होंने श्रीमद्भागवत नामक पारमहंसी संहिताकी रचना की ॥ ६ ॥

यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपुरुषे ।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा ॥ ७ ॥
इस श्रीमद्भागवत नामक पारमहंसी संहिताके श्रवणके साथ-साथ ही भगवान् पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके प्रति प्रेमभक्ति उदित होती है, जिसके फलस्वरूप शोक-मोह और भयका नाश हो जाता है ॥७॥

स संहितां भागवतीं कृत्वानुक्रम्य चात्मजम्।
शुकमध्यापयामास निवृत्तिनिरतं मुनिम् ॥ ८ ॥
महर्षि श्रीव्यासदेवने इस पारमहंसी भागवत्-संहिताकी रचना की अर्थात् प्रथमतः स्वयं ही इसे संक्षेपमें भक्तियुक्त रूपमें प्रस्तुत किया और फिर बादमें श्रीनारदजीके उपदेशानुसार एकमात्र श्रीभगवद्भक्तिको ही प्रधान रूपसे स्थापित करते हुए उसका क्रमपूर्वक विस्तार किया। तत्पश्चात् उन्होंने भोग-तृष्णासे रहित तथा भगवान्के मननमें रत अपने पुत्र श्रीशुकदेवजीको इसका अध्ययन कराया था ॥ ८ ॥

श्रीशौनक उवाच –
स वै निवृत्तिनिरतः सर्वत्रोपेक्षको मुनिः।
कस्य वा बृहतीमेतामात्मारामः समभ्यसत् ॥ ९ ॥
श्रीशौनक ऋषिने पूछा- हे सूतजी ! श्रीशुकदेव गोस्वामी तो परम विरक्त थे, वे किसी भी वस्तुकी अपेक्षासे रहित, ब्रह्मानन्दमें निमग्न और ब्रह्म-चिन्तनमें डूबे रहते थे। अतः किसलिए उन्होंने इस विशाल श्रीमद्भागवत ग्रन्थका भलीभाँति अध्ययन किया? ॥ ९॥

श्रीसूत उवाच –
आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः ॥ १०॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- ब्रह्मानन्द-सुखमें मग्न एवं आत्मामें ही रमण करनेके कारण जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है, वे मुनिगण भी क्रोध-मोह-अहङ्कारादिसे मुक्त होकर निष्काम भावसे अर्थात् फलकी कामनासे रहित होकर अमित विक्रम श्रीहरिकी सेवा करते रहते हैं, क्योंकि भगवान् श्रीहरिके गुण ही ऐसे हैं जिससे वे आत्मारामगणोंको भी आकर्षित कर लेते हैं ॥ १०॥

हरेर्गुणाक्षिप्तमतिर्भगवान् बादरायणिः ।
अध्यगान्महदाख्यानं नित्यं विष्णुजनप्रियः ॥ ११ ॥
महायोगी व्यासनन्दन श्रीशुकदेव गोस्वामीका चित्त भगवान् श्रीहरिके गुणोंसे आकृष्ट हो चुका था, इसीलिए उन्होंने इतने विशाल महापुराण श्रीमद्भागवतका अध्ययन किया। इस भागवतकी ऐसी सुन्दर व्याख्या करनेके कारण ही श्रीशुकदेव भगवद्भक्तों अर्थात् वैष्णवोंके नित्य प्रिय हैं ॥ ११ ॥

परीक्षितोऽथ राजर्षेर्जन्म-कर्म-विलापनम् ।
संस्थाञ्च पाण्डुपुत्राणां वक्ष्ये कृष्णकथोदयम् ॥ १२ ॥
अब मैं राजर्षि परीक्षित्के जन्म, कर्म, आमरण अनशन और देहत्याग अर्थात् मुक्तिका वृत्तान्त कहूँगा तथा साथ ही पाण्डवोंके स्वर्ग-आरोहणरूप महाप्रस्थानका भी वर्णन करूँगा। इन सब वृत्तान्तोंके द्वारा प्रधान रूपसे श्रीकृष्णकी बहुत-सी कथाओंका उदय होता है ॥ १२ ॥

यदा मृधे कौरवसृञ्जयानांवीरेष्वथो वीरगतिं गतेषु ।
वृकोदराविद्धगदाभिमर्ष-भग्नोरुदण्डे धृतराष्ट्रपुत्रे ॥ १३ ॥
भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।
उपाहरद्विप्रियमेव तस्यजुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ति ॥ १४ ॥
माता सुतानां निधनं शिशूनांनिशम्य घोरं परितप्यमाना।
तदारुदद्वाष्पकलाकुलाक्षीतां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥ १५ ॥

जिस समय कौरवों और सृञ्जयवंशमें उत्पन्न पाञ्चालराज द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्नके द्वारा परिचालित पाण्डवोंकी सेनाओंके बीच हुए महाभारतके युद्धमें बहुत-से योद्धा वीरगति (स्वर्ग) को प्राप्त हो चुके थे और भीमसेनकी गदाके प्रहारसे दुर्योधनकी जाँघ टूट चुकी थी, उस समय अश्वत्थामाने स्वयं ही अपने पालनकर्त्ता दुर्योधनका प्रिय-कार्य सोचकर द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंका उनकी सुप्त अवस्थामें ही वध करके उनके सिरोंको दुर्योधनको उपहारके रूपमें प्रदान किया। परन्तु दुर्योधनको भी यह निन्दनीय कर्म अप्रिय ही लगा, क्योंकि ऐसे नितान्त नीच, घृणित और भीषण पापकार्योंकी सभी निन्दा करते हैं। जब द्रौपदीने अपने पुत्रोंकी हत्याकी बात सुनी, तब वह असहनीय शोक-तापसे जर्जरित होकर पुत्रोंके वियोगमें क्रन्दन करने लगी और उनकी आँखोंसे अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। उनकी यह दशा देखकर किरीटमाली (१) अर्जुन द्रौपदीको सान्त्वना देते हुए कहने लगे – ॥ १३-१५ ॥

(१) किरीटमाली अर्थात् मुकुटोंकी मालाको धारण करनेवाले।
तदा शुचस्ते प्रमृजामि भद्रेयद्ब्रह्मबन्धोः शिर आततायिनः ।
गाण्डीवमुक्तैर्विशिखैरुपाहरेत्वाक्रम्य यत् स्नास्यसि दग्धपुत्रा ॥ १६ ॥
(श्रीअर्जुनने कहा-) हे कल्याणि ! जब मैं उस आततायी (२) अर्थात् हाथोंमें शस्त्र धारणकर छलसे पुत्रोंका वध करनेवाले अधम ब्राह्मण अश्वत्थामाका सिर अपने गाण्डीव धनुषके द्वारा छोड़े गये बाणोंसे काटकर तुम्हें उपहार स्वरूपमें प्रदान करूँगा और पुत्रोंके दाह-संस्कारके बाद जब तुम उसपर पैर रखकर स्नान करोगी, तभी मैं तुम्हारे शोकाश्रुओंको पोछूँगा ॥ १६ ॥

(२) आग लगानेवाला, विष देनेवाला, बुरी नियतसे हाथमें शस्त्र धारण करनेवाला, धन लूटनेवाला, खेत और स्त्रीको छीननेवाला- ये छह आततायी कहलाते हैं। इति प्रियां वल्गुविचित्रजल्पैःसः सान्त्वयित्वाच्युतमित्रसूतः ।अन्वाद्रवदंशित उग्रधन्वाकपिध्वजो गुरुपुत्रं रथेन ॥ १७ ॥

इस प्रकार अर्जुनने विविध मनोहर और विचित्र वचनोंसे अपनी पत्नी द्रौपदीको सान्त्वना दी। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ही जिनके एक साथ बन्धु और सारथी-दोनों ही हैं, उन कपिध्वज अर्जुनने अपने भयङ्कर गाण्डीव-धनुषको धारण किया, कवच पहना और रथपर सवार होकर वे गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पीछे दौड़ पड़े ॥ १७ ॥

तमापतन्तं स विलोक्य दूरात्कुमारहोद्विग्नमना रथेन।
पराद्रवत् प्राणपरीप्सुरुर्व्यांयावद्गमं रुद्रभयाद् यथा कः ॥१८॥
बालकोंके हत्यारे अश्वत्थामाने जब दूरसे ही अर्जुनको रथपर सवार होकर अपनी ओर तीव्रगतिसे आते हुए देखा, तो उसका हृदय काँपने लगा और वह अपने प्राणोंकी रक्षाके लिए पृथ्वीपर यथाशक्ति ठीक उसी प्रकार भागा, जिस प्रकार रुद्रके भयसे भयभीत होकर सूर्य भाग रहे थे ॥ (१) १८ ॥

(१) वामनपुराणके अनुसार शिवभक्त विद्युन्माली नामक कोई राक्षस शिवजी द्वारा प्रदत्त सुवर्णमय विमानपर सवार होकर सूर्यके पीछे-पीछे भ्रमण करता हुआ उस विमानकी चमकसे रात्रिके अन्धकारको दूर कर रहा था। इससे सूर्यने क्रोधित होकर अपने तेजसे उसे विमानसे नीचे गिरा दिया। उसी समय श्रीरुद्रदेव आ पहुँचे, उनसे डरकर सूर्य तीव्रगतिसे भागते हुए वाराणसीमें गिर पड़े, जिससे उनका नाम लोलार्क प्रसिद्ध हो गया। यदा शरणमात्मानमैक्षत श्रान्तवाजिनम् ।अस्त्रं ब्रह्मशिरो मेने आत्मत्राणं द्विजात्मजः ॥ १९॥

किन्तु जब द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामाने देखा कि वह अब रक्षकहीन होनेके कारण बिलकुल अकेला है तथा उसके घोड़े भी थक गये हैं, तब उस नासमझ विप्रने ब्रह्मास्त्रको ही अपनी रक्षाका एकमात्र उपाय समझा ॥ १९ ॥

अथोपस्पृश्य सलिलं सन्दधे तत् समाहितः ।
अजानन्नपि संहारं प्राणकृच्छ्र उपस्थिते ॥ २० ॥
यद्यपि अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्रको लौटानेकी विधिसे अवगत नहीं था, तथापि प्राणोंपर सङ्कट आया देख उसने आचमन किया और ध्यानस्थ होकर ब्रह्मास्त्रका सन्धान किया ॥ २० ॥

ततः प्रादुष्कृतं तेजः प्रचण्डं सर्वतो दिशम् ।
प्राणापदमभिप्रेक्ष्य विष्णुं जिष्णुरुवाच ह ॥ २१ ॥
तब उस अस्त्रसे भयङ्कर आग निकलने लगी और वह दसों दिशाओंमें फैल गयी। उस समय अपने प्राणोंपर ही सङ्कट आया देखकर अर्जुनने श्रीकृष्णसे प्रार्थना की ॥ २१॥

श्रीअर्जुन उवाच –
कृष्ण कृष्ण महाबाहो भक्तानामभयङ्कर।
त्वमेको दह्यमानानामपवर्गोऽसि संसृतेः ॥ २२ ॥
श्रीअर्जुनने कहा- हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महाबाहो ! (आपकी शक्ति अनन्त है।) आप भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले हैं। हे हरि ! एकमात्र आप ही त्रितापकी ज्वालासे दग्ध लोगोंके संसारके तापका विनाश करनेवाले हैं ॥ २२॥

त्वमाद्यः पुरुषः साक्षादीश्वरः प्रकृतेः परः ।
मायां व्युदस्य चिच्छक्त्या कैवल्ये स्थित आत्मनि ॥ २३॥
आप ही समस्त कारणोंके कारण हैं। आप ही प्रकृतिसे अतीत आदि पुरुष साक्षात् परमेश्वर हैं, अतएव आप निर्लिप्त अथवा अविकारी हैं। आप अपनी स्वरूप-शक्तिके प्रभावसे त्रिगुणमयी बहिरङ्गा माया-शक्तिको दूर रखकर केवल स्व-स्वरूपमें प्रतिष्ठित रहते हैं ॥ २३॥

स एव जीवलोकस्य मायामोहितचेतसः ।
विधत्से स्वेन वीर्येण श्रेयो धर्मादिलक्षणम् ॥ २४ ॥
मायासे दूर अवस्थित रहनेपर भी आप अपनी शक्तिके प्रभावसे माया द्वारा अभिभूत अर्थात् हरिसेवासे विमुख तथा भोगपरायण जीवोंके लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक चतुर्वर्गरूप कल्याणका विधान करते हैं ॥ २४॥

तथायञ्चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया।
स्वानाञ्चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत् ॥ २५ ॥
पूर्व-पूर्व अवतारोंकी भाँति आपका वर्त्तमान श्रीकृष्णरूपमें अवतार भी पृथ्वीका भार हरण करनेके लिए और आपके स्वजनों तथा एकान्तिक भक्तोंके निरन्तर भजन-सुख (स्मरण-ध्यान) के लिए ही हुआ है ॥ २५ ॥

किमिदं स्वित् कुतो वेति देवदेव न वेद्मयहम्।
सर्वतोमुखमायाति तेजः परमदारुणम् ॥ २६ ॥
हे देवादिदेव भगवन् ! मैं यह जो अपने समीपमें सर्वव्यापी अत्यन्त भयङ्कर अग्नि देख रहा हूँ, यह क्या वस्तु है और कहाँसे आ रही है? मुझे इसके विषयमें कुछ भी ज्ञान नहीं है ॥ २६ ॥

श्रीभगवानुवाच –
वेत्थेदं द्रोणपुत्रस्य ब्राह्ममस्त्रं प्रदर्शितम् ।
नैवासौ वेद संहारं प्राणबाध उपस्थिते ॥ २७ ॥
श्रीभगवान्ने कहा- हे अर्जुन ! यह अश्वत्थामाका ब्रह्मास्त्र है। अपने जीवनको सङ्कटमें आया देखकर उसने इसका प्रयोग तो कर दिया है, किन्तु वह इस अस्त्रको लौटाना बिलकुल नहीं जानता, किन्तु तुम जानते हो ॥ २७ ॥

न ह्यस्यान्यतमं किञ्चिदस्त्रं प्रत्यवकर्शनम् ।
जह्यस्त्रतेज उन्नद्धमस्त्रज्ञोऽस्यस्त्रतेजसा ॥ २८ ॥
इस ब्रह्मास्त्रका दमन किसी भी अन्य अस्त्र द्वारा नहीं हो सकता, अतएव तुम अपने ब्रह्मास्त्रके तेजके द्वारा ही इस उत्कट ब्रह्मास्त्रके तेजका विनाश करो। तुम अस्त्र-विद्याके कुशल जानकार हो, अतः तुम्हें इसका प्रयोग भी आता है और इसे लौटाना भी ॥ २८ ॥

श्रीसूत उवाच –
श्रुत्वा भगवता प्रोक्तं फाल्गुनः परवीरहा।
स्पृष्ट्वापस्तं परिक्रम्य ब्राह्यं ब्राह्माय सन्दधे ॥ २९ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- अर्जुन वीर-शत्रुओंको मारनेमें बड़े प्रवीण थे। भगवान्के इन वचनोंको सुनकर अर्जुनने आचमन किया और उनकी परिक्रमा की। तत्पश्चात् उस ब्रह्मास्त्रका निवारण करनेके लिए श्रीकृष्णके आदेशानुसार उन्होंने अपने ब्रह्मास्त्रका ही सन्धान किया ॥ २९ ॥

संहत्यान्योन्यमुभयोस्तेजसी शरसंवृते ।
आवृत्य रोदसी खञ्च ववृधातेऽर्कवह्निवत् ॥ ३० ॥
इसके बाद बाणोंसे घिरे हुए उन दोनों ब्रह्मास्त्रोंका प्रचण्ड तेज, प्रलयकालके समय नीचेसे सङ्कर्षणकी मुखाग्नि और ऊपर स्थित सूर्यके प्रखर तापके समान, परस्पर मिलकर स्वर्ग, मर्त्य और अन्तरीक्ष लोकोंको आच्छन्नकर सभी दिशाओंमें वर्द्धित होने लगा ॥ ३० ॥

दृष्ट्वास्त्रतेजस्तु तयोस्त्रींल्लोकान् प्रदहन्महत्।
दह्यमानाः प्रजाः सर्वाः सांवर्तकममंसत ॥ ३१ ॥
अर्जुन और अश्वत्थामाके उन भीषण ब्रह्मास्त्रोंकी आगकी लपटें तीनों भुवनोंको ही दग्ध करने लगीं, जिससे समस्त जीव उत्तप्त हो गये और समझने लगे कि प्रलयकालीन सांवर्तक अग्नि ही उपस्थित हो गयी है ॥ ३१॥

प्रजोपद्रवमालक्ष्य लोकव्यतिकरञ्च तम्।
मतञ्च वासुदेवस्य संजहारार्जुनो द्वयम् ॥ ३२॥
उस प्रचण्ड प्रलयाग्निसे प्रजाओंका सङ्कट और समस्त लोकोंका विनाश होते देखकर महावीर पार्थने भगवान् श्रीकृष्णका अभिप्राय जानकर उनकी अनुमतिसे उन दोनों ही ब्रह्मास्त्रोंको लौटा लिया ॥ ३२॥

तत आसाद्य तरसा दारुणं गौतमीसुतम् ।
बबन्धामर्षताम्राक्षः पशुं रशनया यथा ॥ ३३॥
अर्जुनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। उन्होंने गौतम-वंशमें उत्पन्न कृपी (कृपाचार्यकी बहिन) के पुत्र नृशंस (अर्थात् नर-वध करनेवाले) अश्वत्थामाको झपटकर बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे इस प्रकार बाँध दिया, जिस प्रकार याज्ञिक लोग रस्सी द्वारा यज्ञके पशुको बाँध देते हैं ॥ ३३॥

शिबिराय निनीषन्तं रज्वा बध्वा रिपुं बलात्।
प्राहार्जुनं प्रकुपितो भगवानम्बुजेक्षणः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार जब अर्जुन अपने शत्रु अश्वत्थामाको रस्सी द्वारा बलपूर्वक बाँधकर शिविरकी ओर ले जा रहे थे, तभी कमल दलके समान नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण मानो क्रोधित होकर अर्जुनसे कहने लगे – ॥ ३४ ॥

मैनं पार्थार्हसि त्रातुं ब्रह्मबन्धुमिमं जहि।
योऽसावनागसः सुप्तानवधीन्निशि बालकान् ॥ ३५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- हे पार्थ ! इस अश्वत्थामाने रातके समय सोये हुए निरपराध शिशुओंकी हत्या की है। अतः इस अधम ब्राह्मणको छोड़ना युक्तिसङ्गत नहीं है, इसका वध कर डालो ॥ ३५ ॥

मत्तं प्रमत्तमुन्मत्तं सुप्तं बालं स्त्रियं जडम् ।
प्रपन्नं विरथं भीतं न रिपुं हन्ति धर्मवित् ॥ ३६ ॥
धर्मवेत्ता पुरुष न तो ऐसे व्यक्तिका वध करते हैं जो मद्यपानसे मत्त, असावधान, ग्रह या वायु-रोग आदिसे पीड़ित (पागल) हो और न ही वे सोये हुए, चेष्टारहित, विवेकशून्य, शरणागत, रथहीन, बालकों, स्त्रियों अथवा भयभीत शत्रुका ही वध करते हैं ॥ ३६ ॥

स्वप्राणान् यः परप्राणैः प्रपुष्णात्यघृणः खलः ।
तद्वधस्तस्य हि श्रेयो यद्दोषाद्यात्यधः पुमान् ॥ ३७ ॥
परन्तु जो दुष्ट और क्रूर व्यक्ति दूसरोंका वधकर अपने प्राणोंका पोषण करते हैं, उनके लिए मृत्यु दण्ड ही कल्याणकारी है। मानव जब पापादि कार्य करते हैं, तब राजाओंके द्वारा दण्डित होनेसे उनका पाप धुल जाता है और वे सुकृतिवानोंके समान स्वर्गलोक जाते हैं। अन्यथा इस लोकमें दण्ड और प्रायश्चित्तसे रहित रहनेपर पापके फलसे वे नरकगामी होते हैं ॥ ३७॥

प्रतिश्रुतञ्च भवता पाञ्चाल्यै शृण्वतो मम।
आहरिष्ये शिरस्तस्य यस्ते मानिनि पुत्रहा ॥ ३८ ॥
हे अर्जुन ! मैं जानता हूँ कि तुमने द्रौपदीसे यह प्रतिज्ञा की है कि “हे मानवती ! जिस अश्वत्थामाने तुम्हारे पुत्रोंकी हत्या की है, मैं उसके सिरको तुम्हें उपहारके रूपमें प्रदान करूँगा ॥ ३८ ॥

तदसौ वध्यतां पाप आतताय्यात्मबन्धुहा।
भर्तुश्च विप्रियं वीर कृतवान् कुलपांसनः ॥ ३९ ॥
हे शूर ! इस शस्त्रधारी, स्वजनोंका वध करनेवाले, पापी, कुलाङ्गार अश्वत्थामाने ऐसा घृणित कार्य किया है, जिससे इसके स्वामी दुर्योधनको भी दुःख पहुँचा है, अतएव हे अर्जुन ! इसका वध कर ही डालो ॥ ३९ ॥

श्रीसूत उवाच –
एवं परीक्षता धर्मं पार्थः कृष्णेन चोदितः ।
नैच्छद्धन्तुं गुरुसुतं यद्यप्यात्महनं महान् ॥ ४० ॥
श्रीसूतगोस्वामीने कहा- इस प्रकार अर्जुनकी धर्म-निष्ठाकी परीक्षा करते हुए यद्यपि श्रीकृष्ण उन्हें अश्वत्थामाके वधके लिए प्रोत्साहित ही करते रहे, तथापि महात्मा अर्जुनने अपने महत्वके लिए पुत्रोंका हत्यारा होनेपर भी गुरुपुत्र अश्वत्थामाका वध करनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४० ॥

अथोपेत्य स्वशिबिरं गोविन्द-प्रियसारथिः ।
न्यवेदयत्तं प्रियायै शोचन्त्यायात्मजान् हतान् ॥ ४१ ॥
तत्पश्चात् अर्जुन अपने सखा और सारथी श्रीकृष्णके साथ अपने शिविरमें उपस्थित हुए और पुत्रोंके मर जानेपर शोक करती हुई द्रौपदीके निकट अश्वत्थामाको उसी स्थितिमें समर्पित कर दिया ॥ ४१ ॥

तथाहृतं पशुवत् पाशबद्ध-मवाङ्मुखं कर्मजुगुप्सितेन ।
निरीक्ष्य कृष्णापकृतं गुरोः सुतंवामस्वभावा कृपया ननाम च ॥४२॥
द्रौपदीने देखा कि अश्वत्थामाको रस्सीसे बाँधकर पशुके समान बड़े ही असम्माननीय रूपसे लाया गया है। अपने निन्दनीय कर्म-दोषके कारण वह मौन है और नीचेकी ओर मुख किये हुए है। उस अनिष्ट करनेवाले गुरुपुत्र अश्वत्थामाको इस अवस्थामें देखकर शोभनीय स्वभावसे युक्त द्रौपदीका चित्त दयासे भर गया और उसने सम्मानके साथ अश्वत्थामाको नमस्कार किया ॥ ४१-४२ ॥

उवाच चासहन्त्यस्य बन्धनानयनं सती।
मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरुः ॥ ४३ ॥
गुरुपुत्र अश्वत्थामाको इस प्रकार पशुकी भाँति बाँधकर लाना साध्वी द्रौपदीको सहन नहीं हुआ। वह बड़े आदरके साथ अर्जुनसे कहने लगीं – “आप इसे छोड़ दीजिये, छोड़ दीजिये। यह तो ब्राह्मण है और ब्राह्मण तो सब समय ही हमारे लिए पूजनीय हैं ॥४३॥

सरहस्यो धनुर्वेदः सविसर्गोपसंयमः ।
अस्त्रग्रामश्च भवता शिक्षितो यदनुग्रहात् ॥ ४४ ॥
स एव भगवान् द्रोणः प्रजारूपेण वर्तते।
तस्यात्मनोऽर्द्धं पत्न्यास्ते नान्वगाद्वीरसूः कृपी ॥ ४५ ॥
“हे नाथ! जिनकी कृपासे आपने रहस्यपूर्ण मन्त्रोंके साथ धनुर्विद्या तथा प्रयोग एवं उपसंहारके कौशलके साथ समस्त अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है, वे भगवान् द्रोणाचार्य अपने पुत्र इसी अश्वत्थामाके रूपमें विद्यमान हैं। आपने इन्हें क्यों बाँधा ? श्रीद्रोणाचार्यकी अर्द्धाङ्गिनी कृपी भी अभी जीवित हैं। अपने इसी वीरपुत्रकी ममताके कारण ही उन कृपीने अपने पतिका अनुगमनकर मृत्युको स्वीकार नहीं किया ॥ ४४-४५ ॥

तद्धर्मज्ञ महाभाग भवद्भिर्गौरवं कुलम् ।
वृजिनं नार्हति प्राप्तुं पूज्यं वन्द्यमभीक्ष्णशः ॥ ४६ ॥
“हे महायशस्विन् आर्यपुत्र ! आप तो धर्मके ज्ञाता हैं। जिस गुरु-वंशका नित्य पूजन और वन्दन करना चाहिये, उसीको दुःख प्रदान करना आपके लिए उचित नहीं है ॥ ४६ ॥

मा रोदीदस्य जननी गौतमी पतिदेवता।
यथाहं मृतवत्सार्ता रोदिम्यश्रुमुखी मुहुः ॥ ४७ ॥
“जिस प्रकार आज मैं अपने पुत्रोंके मर जानेपर दुःखी होकर रो रही हूँ, बार-बार आँसुओंके आनेके कारण मेरा मुख सूख ही नहीं रहा है, इस अश्वत्थामाकी माता पतिव्रता कृपी उस प्रकारसे न रोयें ॥ ४७ ॥

यैः कोपितं ब्रह्मकुलं राजन्यैरजितात्मभिः ।
तत्कुलं प्रदहत्याशु सानुबन्धं शुचार्पितम् ॥ ४८ ॥
यदि कोई क्षत्रिय राजा अपने असंयमित कार्योंसे ब्राह्मण-कुलको क्रोधित कर देता है, तब वह कुपित ब्राह्मण-कुल भी उस क्षत्रिय-वंशको सपरिवार शोकाग्निमें निमग्नकर शीघ्र ही उसे नष्ट कर देता है ॥ ४८ ॥

श्रीसूत उवाच –
धर्म्यं न्यायं सकरुणं निर्व्यलीकं समं महत् ।
राजा धर्मसुतो राज्ञयाः प्रत्यनन्दद्वचो द्विजाः ॥ ४९ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- हे शौनकादि ब्राह्मणो ! महारानी द्रौपदीके वचन धर्म और न्यायके अनुकूल, कपटतारहित, समता-सूचक और करुणापूर्ण थे। अतएव धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरने रानी द्रौपदीके इन हितपूर्ण, श्रेष्ठ और उदार वचनोंका अनुमोदन किया ॥ ४९ ॥

नकुलः सहदेवश्च युयुधानो धनञ्जयः ।
भगवान् देवकीपुत्रो ये चान्ये याश्च योषितः ॥ ५०॥
स्वयं-भगवान् श्रीवासुदेव, नकुल, सहदेव, सात्यकि, अर्जुन तथा अन्यान्य जो सभी पुरुष एवं नारियाँ उस स्थानपर उपस्थित थे, उन सभीने द्रौपदीकी बात सुनकर उसका समर्थन किया ॥५०॥

तत्राहामर्षितो भीमस्तस्य श्रेयान् वधः स्मृतः ।
न भर्तुर्नात्मनश्चार्थे योऽहन् सुप्तान् शिशून् वृथा ॥५१॥
किन्तु उसी समय भीमसेन क्रोधित होकर बोले- इस दुर्मति अश्वत्थामाने न तो अपने स्वामी दुर्योधनका और न ही अपना हित किया है। इसने बिना किसी कारणके ही सोये हुए बालकोंकी हत्या की है, अतएव इस पापीका वध करनेमें ही इसका कल्याण है अन्यथा निश्चय ही इसका नरकपात होगा ॥ ५१ ॥

निशम्य भीमगदितं द्रौपद्याश्च चतुर्भुजः ।
आलोक्य वदनं सख्युरिदमाह हसन्निव ॥ ५२ ॥
इस प्रकारसे भीमसेन एवं द्रौपदीके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर श्रीकृष्णने सहसा चतुर्भुज रूप धारण कर लिया। (भीम यदि क्रोधित होकर अश्वत्थामाका वध करनेमें उद्यत हों, तब द्रौपदी उन्हें अवश्य ही रोकेगी। अतः दोनोंको ही रोकनेके लिए श्रीकृष्णने चतुर्भुज रूप धारण किया।) अर्जुनका मन स्थिर नहीं हो रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण अपने सखा अर्जुनके मुखकी ओर दृष्टिपात करके (आज तुम्हारी बुद्धिकी गम्भीरताकी परीक्षा होगी, इस अभिप्रायसे) हँसते हुए इस प्रकार कहने लगे – ॥५२॥

श्रीभगवानुवाच –
ब्रह्मबन्धुर्न हन्तव्य आततायी वधार्हणः ।
मयैवोभयमाम्नातं परिपाह्यनुशासनम् ॥ ५३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- ब्राह्मण अधम होनेपर भी वधके योग्य नहीं है, किन्तु शस्त्रधारी प्राणघातक आततायीका वध अवश्य ही कर देना चाहिये। मैंने इन दोनों ही विधानोंकी व्यवस्था शास्त्रोंमें की है। हे अर्जुन ! परस्पर विरोधी होनेपर भी तुम मेरी इन दोनों ही आज्ञाओंका पालन करो ॥ ५३॥

कुरु प्रतिश्रुतं सत्यं यत्तत् सान्त्वयता प्रियाम् ।
प्रियञ्च भीमसेनस्य पाञ्चाल्या मह्यमेव च ॥५४॥
हे सखे ! शोकसे व्याकुल पत्नी द्रौपदीको सान्त्वना प्रदान करते हुए तुमने जो पुत्रोंके हत्यारेके सिरको उपहारके रूपमें प्रदान करनेकी प्रतिज्ञा की थी, तुम उस प्रतिज्ञाको यथार्थ रूपसे सत्य करो। अश्वत्थामाका वध करके भीमका, वध न करके द्रौपदीका, एवं वध तथा अवध-इन दोनों विधियोंकी रक्षा करते हुए अपनी प्रतिज्ञा पूर्णकर मेरा और सभीका प्रिय कार्य करो ॥५४॥

श्रीसूत उवाच –
अर्जुनः सहसाज्ञाय हरेर्हार्दमथासिना ।
मणिं जहार मूर्द्धन्यं द्विजस्य सहमूर्द्धजम् ॥ ५५ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- तदनन्तर सहसा श्रीकृष्णके अभिप्रायको जानकर वध और अवध परस्पर विरुद्ध दोनों कार्योंको साधित करते हुए महावीर धनञ्जयने अपनी तलवारसे ब्रह्मबन्धु अश्वत्थामाके सिरका मुण्डनकर उसके मस्तककी मणिको निकाल लिया ॥ ५५ ॥

विमुच्य रसनाबद्धं बालहत्याहतप्रभम् ।
तेजसा मणिना हीनं शिबिरान्निरयापयत् ॥ ५६ ॥
सोये हुए बालकोंका वध करनेके कारण अश्वत्थामा पहलेसे ही तेजहीन और शोभाहीन हो गया था। अब पुनः मणिसे रहित और ब्रह्मतेजसे भी हीन हो गया। यह देखकर अर्जुनने रस्सीसे बँधे हुए अश्वत्थामाको बन्धनमुक्त करके शिविरसे बाहर निकाल दिया ॥ ५६ ॥

वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा।
एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः ॥ ५७ ॥
शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार सिरका मुण्डन कर देना, धन छीन लेना और अपने स्थानसे बाहर निकाल देना- यह सब पतित ब्राह्मणके लिए उसका वध करनेके समान ही हैं। इसके अतिरिक्त सिर काटना इत्यादि द्वारा ब्राह्मणके शारीरिक-वधकी आज्ञा शास्त्रोंमें नहीं दी गयी है॥ ५७ ॥

पुत्रशोकातुराः सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया।
स्वानां मृतानां यत्कृत्यं चक्रुर्निर्हरणादिकम् ॥ ५८ ॥
तत्पश्चात् पुत्रशोकसे कातर पाँचों पाण्डवों और द्रौपदीने अपने परलोकगत भाई-बन्धुओंके शवोंकी दाहादि समस्त ऊर्ध्व-दैहिक (अन्त्येष्टि) क्रियाएँ सम्पन्न की ॥ ५८॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे ब्रह्मसूत्र-भाष्ये पारमहंस्यां संहितायां वैयासिक्यां प्रथमस्कन्धे द्रौणिदण्डो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥