चतुर्थोऽध्यायः

वक्ता एवं श्रोताकी श्रेष्ठता, श्रीव्यासदेवका असन्तोष
श्रीव्यास उवाच – इति ब्रुवाणं संस्तूय मुनीनां दीर्घसत्रिणाम्।
वृद्धः कुलपतिः सूतं बह्वचः शौनकोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
श्रीव्यासदेवने कहा- श्रीसूतके इस प्रकार कहनेपर मुनियोंने उनका बहुत आदर किया। दीर्घकालीन सत्रमें होनेवाले यज्ञ कार्योंमें दीक्षित, वयोवृद्ध, कुलपति, वेदाभ्यास ज्ञानमें प्रवीण और ऋग्वेदी शौनक मुनि ही समस्त मुनियोंके द्वारा प्रश्न-कर्त्ताके रूपमें नियुक्त हुए थे। तब श्रीशौनकमुनिने श्रीसूत गोस्वामीकी प्रशंसा करते हुए कहा- ॥१॥

श्रीशौनक उवाच –
सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर।
कथां भागवतीं पुण्यां यदाह भगवाञ्छुकः ॥ २ ॥
श्रीशौनक ऋषिने कहा- हे श्रीसूत ! हे परम भाग्यवान् ! आप वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। अतएव भगवान् श्रीशुकदेव गोस्वामीने जो भगवत्-सम्बन्धित पवित्र और पुण्यमयी कथाएँ कही हैं, कृपया आप उन सब कथाओंको हमें सुनाइये ॥ २ ॥

कस्मिन् युगे प्रवृत्तेयं स्थाने वा केन हेतुना।
कुतः सञ्चोदितः कृष्णः कृतवान् संहितां मुनिः ॥ ३ ॥
हे सूतजी ! यह कथाएँ किस युगमें तथा किस स्थानपर हुई? महाभारतादि धर्मशास्त्रोंकी रचना करनेपर भी कृष्णद्वैपायन मुनिवरने किस कारणसे इस पारमहंसी संहिताका आरम्भ किया? तथा इस भागवती संहिताकी रचना करनेकी प्रेरणा उन्हें किससे प्राप्त हुई ? ॥ ३ ॥

तस्य पुत्रो महायोगी समदृङ्निर्विकल्पकः ।
एकान्तमतिरुन्निद्रो गूढो मूढ़ इवेयते ॥४॥
श्रीव्यासदेवके पुत्र श्रीशुकदेव महायोगी (भक्तियोगी) तथा ब्रह्मदर्शी होनेके कारण समदर्शी थे। वे मायारूपी निद्रा (अविद्या) से जगे हुए और परब्रह्म श्रीकृष्णमें एकान्तिक रूपसे अनुरक्त परमहंस थे। जो उनके परिचयसे अनजान थे, वे ही उन्हें पागल अथवा जड़के समान समझते थे ॥४॥

दृष्ट्वानुयान्तमृषिमात्मजमप्यनग्नंदेव्यो ह्रिया परिदधुर्न सुतस्य चित्रम् ।
तद्वीक्ष्य पृच्छति मुनौ जगदुस्तवास्तिस्त्रीपुंभिदा न तु सुतस्य विविक्तदृष्टेः ॥५॥
जब श्रीशुकदेव गोस्वामीने नग्नावस्थामें ही संन्यासके लिए वनकी ओर गमन किया, तब उन्हें देखकर जल-क्रीड़ामें रत अप्सराओंने अपने अङ्गोंको वस्त्रोंसे नहीं ढका, परन्तु श्रीशुकदेवजीका पीछा करते हुए वस्त्रोंसे आवृत उनके पिता श्रीव्यासदेवको देखकर उन स्त्रियोंने लज्जासे अपने वस्त्र पहन लिये। इस आश्चर्यजनक घटनाको देखकर जब श्रीव्यासदेवने उन स्त्रियोंसे इसका कारण पूछा, तब उन अप्सराओंने उत्तर दिया- “यह स्त्री है, यह पुरुष है – इस प्रकारका भेद-ज्ञान आपमें विद्यमान है, किन्तु आपके पुत्रमें ऐसा कोई भेद-ज्ञान नहीं है। आपका पुत्र विविक्त अर्थात् पवित्र दृष्टिसे युक्त है। हम स्त्रियाँ किसीकी आँखोंसे ही उसके हृदयके समस्त भावोंको जाननेमें समर्थ हैं ॥ ५॥

कथमालक्षितः पौरैः सम्प्राप्तः कुरुजाङ्गलान्।
उन्मत्त-मूकजडवद्विचरन् गजसाह्वये ॥ ६ ॥
इसी अवस्थामें श्रीशुकदेव गोस्वामीने पहले कुरु और जाङ्गल प्रदेशमें भ्रमण किया था। इसके बाद वे हस्तिनापुरमें कभी पागलकी भाँति, तो कभी गूँगे और कभी मूढ़की भाँति विचरण किया करते थे। (हे सूतजी !) उस समय हस्तिनापुरके वासियोंने उन्हें किस प्रकार पहचाना ? ॥ ६ ॥

कथं वा पाण्डवेयस्य राजर्षेर्मुनिना सह।
संवादः समभूत्तात यत्रैषा सात्वती श्रुतिः ॥ ७॥
हे तात ! ऐसे भेद-ज्ञानसे रहित महामुनि श्रीशुकदेवके साथ पाण्डव-वंशके राजर्षि परीक्षित्का कैसा वार्तालाप हुआ, जिसके फलस्वरूप यह भागवती संहिता प्रकट हुई ॥७॥

स गोदोहनमात्रं हि गृहेषु गृहमेधिनाम् ।
अवेक्षते महाभागस्तीर्थीकुर्वंस्तदाश्रमम् ॥ ८ ॥
परम भाग्यवान श्रीशुकदेव गोस्वामी गृहस्थोंके घरके द्वारपर भिक्षाके छलसे उतनी ही देर रुकते थे, जितनी देरमें एक गाय दुही जाती है। उनके द्वारा भिक्षा करनेका एकमात्र उद्देश्य था- गृहस्थोंके घरोंको पवित्र तीर्थ स्वरूप बनाना ॥ ८ ॥

अभिमन्यु-सुतं सूत प्राहुर्भागवतोत्तमम् ।
तस्य जन्म महाश्चर्यं कर्माणि च गृणीहि नः ॥ ९ ॥
हे सूत गोस्वामी ! हमने सुना है कि लोग अभिमन्यु-पुत्र परीक्षित्‌को महाभागवत और भगवान्‌का बड़ा प्रेमी मानते थे। कृपया उन राजा परीक्षित्के अत्यन्त आश्चर्यमय जन्म और कर्मोंका भी वर्णन कीजिये ॥ ९ ॥

स सम्राट् कस्य वा हेतोः पाण्डूनां मानवर्द्धनः ।
प्रायोपविष्टो गङ्गायामनादृत्याधिराट्श्रियम् ॥ १० ॥
राजाधिराज परीक्षित् पाण्डव-वंशके गौरव थे, अतः वे किस कारणसे युधिष्ठिरादिकी राज्यलक्ष्मीका परित्याग करके गङ्गाके तटपर मृत्यु तक अनशन-व्रतका सङ्कल्प करके बैठ गये ? ॥१०॥

नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मनःशिवाय हानीय धनानि शत्रवः ।
कथं स वीरः श्रियमङ्ग दुस्त्यजांयुवैषतोत्स्रष्टुमहो सहासुभिः ॥ ११ ॥
हे सूत गोस्वामी ! विपक्षी राजा अपने मङ्गलके लिए धन-रत्नादि उपहार सहित जिनकी चरण रखनेवाली चौकीमें प्रणाम किया करते थे, ऐसे महावीर राजा परीक्षित्ने यौवनकालमें ही अपने प्राणोंके साथ-साथ उस दुस्त्यज राज्यलक्ष्मीका किस कारणसे परित्याग करनेकी इच्छा की ? ॥ ११॥

शिवाय लोकस्य भवाय भूतयेय उत्तमःश्लोकपरायणाः जनाः।
जीवन्ति नात्मार्थमसौ पराश्रयंमुमोच निर्विद्य कुतः कलेवरम् ॥ १२॥
जो व्यक्ति भगवान्में अनुरक्त होते हैं, वे संसारके परम कल्याण और सुख-समृद्धिके लिए ही जीवन धारण करते हैं। उनकी देह दूसरोंके उपकारके लिए होती है, अपने स्वार्थके लिए नहीं। अतः ऐसी राजदेह धारण करनेवाले महाराज परीक्षित्ने विरक्त होकर प्रजाके आश्रय-स्वरूप अपनी देहका किस कारणसे परित्याग किया था? ॥ १२॥

तत् सर्वं नः समाचक्ष्व पृष्टो यदिह किञ्चन।
मन्ये त्वां विषये वाचां स्नातमन्यत्र छान्दसात् ॥ १३॥
हम यह जानते हैं कि आप वेद-शास्त्रोंके कुछेक कर्मकाण्ड प्रतिपादक विषयोंके अतिरिक्त अन्यान्य समस्त श्रेष्ठ शास्त्रोंमें पारङ्गत हैं। अतएव हमने इस समय आपसे जो कुछ भी पूछा है, कृपया वह सब हमें बतलाइये ॥ १३ ॥

श्रीसूत उवाच –
द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।
जातः पराशराद् योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १४॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- वैवस्वत मन्वन्तरकी इस वर्त्तमान चतुर्युगीके तृतीय युगके परिवर्तनके समय द्वापरके समुपस्थित होनेपर महर्षि पराशरके द्वारा उपरिचर-वसुकी कन्या सत्यवतीके गर्भसे भगवान् श्रीविष्णुके अंशके अंश (कलावतार) महाज्ञानी कृष्णद्वैपायन श्रीवेदव्यासने जन्म-ग्रहण किया था ॥ १४॥

स कदाचित् सरस्वत्या उपस्पृश्य जलं शुचिः।
विविक्त एक आसीन उदिते रविमण्डले ॥ १५॥
पराशर-पुत्र श्रीव्यासदेव एक दिन सूर्योदय होनेपर सरस्वती नदीके जलमें स्नानादि क्रिया समापन करके पवित्र होकर बदरिकाश्रममें किसी एक एकान्त स्थानमें अकेले बैठे हुए थे ॥ १५॥

परावरज्ञः स ऋषिः कालेनाव्यक्तरंहसा ।
युगधर्मव्यतिकरं प्राप्तं भुवि युगे युगे ॥ १६ ॥
भौतिकानाञ्च भावानां शक्तिह्रासञ्च तत्कृतम्।
अश्रद्दधानान् निःसत्त्वान् दुर्मेधान् ह्रसितायुषः ॥ १७ ॥
दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुषा ।
सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ हितममोघदृक् ॥ १८ ॥

महर्षि श्रीव्यासदेव भूत-भविष्यको जाननेवाले तथा समस्त प्रकारके ज्ञानसे सम्पन्न थे। उन्होंने अपनी दिव्य-दृष्टिसे देखा कि प्रत्येक युगमें कालके प्रभावसे पृथ्वीपर युगधर्ममें अव्यवस्था उपस्थित हो जाती है, जिसके फलस्वरूप पञ्च-भौतिक वस्तुओंकी शक्ति अर्थात् देहादिके सामर्थ्यका भी हास होता रहता है। ऐसे समयमें मनुष्य श्रद्धाहीन, धैर्यहीन, मन्दमति, अल्पायु और भाग्यरहित हो जाते हैं। वे विचार करने लगे कि ऐसी परिस्थितिमें सभी वर्णों एवं सभी आश्रमोंका कल्याण कैसे हो ? ॥ १६-१८ ॥

चातुर्होत्रं कर्मशुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम् ।
व्यदधाद् यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम् ॥ १९ ॥
ऋक् आदि चारों वेदोंके होता, उद्‌गाता, अध्वर्यु और ब्रह्मा नामक चार ऋत्विक (पुरोहित) हैं। इन पुरोहितोंके द्वारा अनुष्ठित होनेवाले वैदिक यज्ञादि चातुर्होत्र कर्म लोगोंको शुद्ध करनेवाले हैं- यह जानकर श्रीवेदव्यासने निरन्तर यज्ञानुष्ठान द्वारा यज्ञोंका विस्तार करनेके लिए एक ही यजुः वेदको चार भागोंमें विभक्त कर दिया ॥ १९ ॥

ऋग्यजुःसामाथर्वाख्या वेदाश्चत्वार उद्धृताः ।
इतिहास-पुराणञ्च पञ्चमो वेद उच्यते ॥ २०॥
तब श्रीवेदव्यासने ऋक्, यजुः, साम और अथर्व नामक चार वेदोंको पृथक् किया। इतिहास और पुराण पञ्चम वेदके नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २०॥

तत्रग्र्वेदधरः पैलः सामगो जैमिनिः कविः।
वैशम्पायन ऐवैको निष्णातो यजुषामुतः ॥ २१ ॥
अथर्वाङ्गिरसामासीत् सुमन्तुर्दारुणो मुनिः।
इतिहास-पुराणानां पिता मे रोमहर्षणः ॥ २२ ॥
इन चारों वेदोंमें एकमात्र पैलऋषि ही ऋग्वेदके वेत्ता, स्तवगान करनेवाले जैमिनी कवि सामवेदके विद्वान, वैशम्पायन ऋषि यजुर्वेदमें प्रवीण, अथर्व-वेदोक्त अभिचार-क्रियादिमें प्रवृत्तिवशतः निष्ठुर-स्वभाववाले सुमन्तु मुनि अथर्ववेदमें तथा मेरे पिता रोमहर्षण इतिहास एवं पुराणोंके स्नातक थे ॥ २१-२२॥

त एत ऋषयो वेदं स्वं स्वं व्यस्यन्ननेकधा ।
शिष्यैः प्रशिष्यैस्तच्छिष्यैर्वेदास्ते शाखिनोऽभवन् ॥ २३ ॥
पूर्वोक्त पैलादि ऋषियोंने जिन-जिन वेदोंमें प्रवीणता प्राप्त की थी, उन्होंने अपनी-अपनी उसी शाखाको और भी अनेक भागोंमें विभक्त कर दिया। ये विभक्त वेद पुनः शिष्य-प्रशिष्यकी परम्पराक्रमसे बहुत-सी शाखाओंमें विभाजित हो गये ॥ २३॥

त एव वेदा दुर्मेधैर्धार्यन्ते पुरुषैर्यथा।
एवं चकार भगवान् व्यासः कृपणवत्सलः ॥ २४ ॥
ये विभक्त वेद भी केवल मेधावी व्यक्तियोंके ही बोधगम्य थे। अतः अल्पबुद्धि और कम स्मरणशक्तिवाले लोग भी इन्हें समझ सकें-ऐसा विचार करके दीनवत्सल कृपालु भगवान् श्रीवेदव्यासने इन वेदोंका उसी प्रकार विभाग किया ॥ २४ ॥

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा।
कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह।
इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २५ ॥
स्त्री, शूद्र तथा द्विजबन्धु अर्थात् सावित्री-पतित ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुलमें उत्पन्न व्यक्तियोंका वेदत्रयी (ऋक्, यजु और साम) के श्रवणमें अधिकार नहीं है। अतएव इस संसारमें वेदोक्त शुभ-कर्मोंसे अनजान लोगोंका मङ्गल किस प्रकार हो- यह सोचकर महर्षि श्रीवेदव्यासने कृपापूर्वक महाभारत नामक इतिहासकी रचना की ॥ २५ ॥

एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।
सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धृदयं ततः ॥ २६ ॥
नातिप्रसीदद्धृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।
वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं प्रोवाच धर्मवित् ॥ २७ ॥
हे शौनकादि ऋषियो ! इस प्रकार श्रीव्यासदेव अपनी सम्पूर्ण शक्तिके साथ सदैव प्राणियोंके हित-साधनमें ही लगे रहे। बहुत-से उद्देश्यों तथा बहुत-से कर्मानुष्ठानोंके द्वारा भी जब धर्मवेत्ता श्रीव्यासदेवका मन सन्तुष्ट नहीं हुआ, तब वे अत्यधिक खिन्न होकर सरस्वती नदीके तटपर निर्जनमें एकान्त भावसे पवित्र होकर बैठ गये और अपने मनकी अप्रसन्नताके कारणका चिन्तन करते-करते अपने आपसे इस प्रकार कहने लगे – ॥ २६-२७॥

धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।
मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतञ्चानुशासनम् ॥ २८ ॥
मैंने निष्कपट रूपसे ब्रह्मचर्यादि व्रतोंका पालन करते हुए निश्चित रूपसे वेद, गुरुवर्ग और यज्ञ-अग्निकी पूजा की है तथा उनके अनुशासनका भी अनुसरण किया है ॥ २८ ॥

भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थः प्रदर्शितः ।
दृश्यते यत्र धर्मादि स्त्रीशूद्रादिभिरप्युत ॥ २९ ॥
इसके अतिरिक्त महाभारतकी रचनाके छलसे मैंने गुरु-शिष्य परम्पराक्रमसे प्राप्त वेदके अर्थको सरल-सहज रूपमें प्रकाशित किया है, जिससे अन्योंकी तो बात ही क्या, स्त्री, शूद्रादि भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इस चतुर्वर्ग-साधक धर्मको पालन करनेके योग्य हो जाते हैं ॥ २९ ॥

तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः।
असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः ॥ ३० ॥
किन्तु हाय ! वेदोंका विभाग और महाभारतकी रचना करके भी देहस्थित मेरी आत्मा-वस्तुतः तपस्या और ज्ञानादिके द्वारा परिपूर्ण तथा अति श्रेष्ठ वेदादि अध्ययनादिके द्वारा ब्रह्म-तेजसे सम्पन्न होकर भी स्वरूपतः अभावग्रस्त और अपूर्ण कामके समान जान पड़ती है ॥ ३०॥

किंवा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः।
प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३१ ॥
अब तक मैंने भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले तथा परमहंसों अर्थात् वर्णाश्रमसे अतीत चारों वर्णाश्रमोंके गुरु महाभागवत वैष्णवोंके प्रिय भागवत-धर्मका भलीभाँति निरूपण नहीं किया। निश्चय ही यही मेरे चित्तकी खिन्नताका कारण है, क्योंकि नित्य भागवत धर्म ही भगवान् श्रीविष्णुका प्रिय है ॥ ३१॥

तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।
कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३२ ॥
इस प्रकार स्वयंको अपूर्ण मानकर जब श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास खिन्न हो रहे थे, तभी पूर्वोक्त सरस्वती नदीके तटपर स्थित उनके आश्रममें देवर्षि श्रीनारद उपस्थित हुए ॥ ३२ ॥

तमभिज्ञाय सहसा प्रत्युत्थायागतं मुनिः।
पूजयामास विधिवन्नारदं सुरपूजितम् ॥ ३३ ॥
देवताओंके द्वारा वन्दित देवर्षि श्रीनारदको वहाँ आया देखकर श्रीव्यासदेवजी तुरन्त ही अपने आसनसे उठ खड़े हुए और उन्होंने अपने गुरु ब्रह्माकी भाँति श्रीनारदजीकी यथाविधि पूजा की ॥ ३३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे ब्रह्मसूत्र-भाष्ये पारमहंस्यां संहितायां वैयासिक्यां प्रथमस्कन्धे नारदागमनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥