पञ्चमोऽध्यायः
भगवान्के यश-कीर्त्तनकी महिमा और देवर्षि नारदका पूर्वचरित
श्रीसूत उवाच – अथ तं सुखमासीन उपासीनं बृहच्छ्रवाः ।
देवर्षिः प्राह विप्रर्षि वीणापाणिः स्मयन्निव ॥ १ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- तदनन्तर हाथोंमें वीणाको धारण करनेवाले महायशस्वी देवर्षि श्रीनारद सुखपूर्वक बैठ गये और पासमें बैठे हुए विप्रर्षि श्रीवेदव्याससे मृदु-मन्द मुसकानके साथ कहने लगे – ॥१॥
श्रीनारद उवाच –
पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना।
परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥२॥
देवर्षि नारदने कहा- हे महात्मा पराशरनन्दन ! क्या आपकी आत्मा शरीर (कर्म) और मन (चिन्तन) सहित सन्तुष्ट तो है? ॥ २॥
जिज्ञासितं सुसम्पन्नमपि ते महदद्भुतम् ।
कृतवान् भारतं यस्त्वं सर्वार्थपरिबृंहितम् ॥ ३ ॥
धर्मादिके विषयमें आपकी जो कुछ जाननेकी इच्छा थी, उस सबको तो आपने सम्पूर्ण रूपसे जान ही लिया है और उसका अनुष्ठान भी कर लिया है, क्योंकि आपने परमाश्चर्यमय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इस चतुर्वर्गसे परिपूर्ण महाभारतकी रचना की है ॥ ३॥
जिज्ञासितमधीतञ्च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।
तथापि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥४॥
हे तत्त्ववेत्ता ! नित्य-सनातन परब्रह्म-स्वरूप भगवान्को भी आपने पर्याप्त विचार करके प्राप्त कर लिया है, फिर भी आप स्वयंको विफल मनोरथ समझकर अकृतार्थ-पुरुषके समान किसलिए शोक कर रहे हैं? ॥४॥
श्रीव्यास उवाच –
अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तंतथापि नात्मा परितुष्यते मे।
तन्मूलमव्यक्तमगाधबोधंपृच्छाम हे त्वात्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥
श्रीव्यासदेवने कहा- आपने मेरे विषयमें जो कुछ भी कहा, वह सब ठीक ही है, तथापि मेरा चित्त (आत्मा) प्रसन्न नहीं है। हे देवर्षि नारद ! आप स्वयम्भू ब्रह्माके पुत्र होनेके कारण अगाध ज्ञानसे सम्पन्न हैं, अतएव मैं आपसे अपने चित्तकी अप्रसन्नताका गूढ़ कारण जानना चाहता हूँ ॥ ५॥
स वै भवान् वेद समस्तगुह्य-मुपासितो यत् पुरुषः पुराणः ।
परावरेशो मनसैव विश्वंसृजत्यवत्यत्ति गुणैरसङ्गः ॥ ६ ॥
आप सभी गूढ़ रहस्योंको अवश्य ही जानते हैं, क्योंकि विश्वके कार्य-कारणके नियन्ता तथा स्वयं अनासक्त अर्थात् निर्विकार रहकर भी सङ्कल्पमात्रसे ही तीनों गुणों द्वारा इस विश्वकी सृष्टि, पालन और ध्वंस करनेवाले आदिपुरुष श्रीविष्णुकी आप उपासना करते हैं ॥ ६॥
त्वं पर्यटन्नर्क इव त्रिलोकी-मन्तश्चरो वायुरिवात्मसाक्षी ।
परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैःस्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ॥ ७॥
सूर्यकी भाँति तीनों लोकोंमें परिभ्रमण करनेके कारण आप सर्वदर्शी हैं। अपने योगबलके प्रभावसे प्राण-वायुके समान समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरण करनेके कारण आप सबकी बुद्धिकी वृत्तियोंके भी ज्ञाता हैं। अतः आप विचार करके कहिये कि योगानुष्ठानसे परमब्रह्ममें और स्वाध्याय-नियमादि अर्थात् व्रत-ध्यान आदिके द्वारा शब्द-ब्रह्ममें प्रवीण होनेपर भी मुझे इतना अधिक अभाव क्यों अनुभव हो रहा है? ॥७॥
श्रीनारद उवाच –
भवतानुदितप्रायं यशो भगवतोऽमलम् ।
येनैवासौ न तुष्येत मन्ये तद्दर्शनं खिलम् ॥ ८ ॥
देवर्षि नारदने कहा- हे महर्षे ! आपने श्रीहरिकी पवित्र लीलाओंकी महिमाका स्पष्ट रूपसे वर्णन नहीं किया है। श्रीभगवान्की कथाओंके गानके अतिरिक्त जो धर्मादिके ज्ञानका अनुशीलन है, उससे भगवान् श्रीहरि सन्तुष्ट नहीं होते। इसीलिए ऐसा ज्ञान अपूर्ण और हेय है-मेरा यह विचार है ॥ ८॥
यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः ।
न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥
हे ऋषिवर ! आपने स्वरचित समस्त ग्रन्थोंमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इस चतुर्वर्गको प्रधान पुरुषार्थके रूपमें जिस प्रकारसे वर्णन किया है, इन सबके ऊपर विराजमान पुरुषार्थ शिरोमणि भगवान् श्रीवासुदेवकी महिमा कथाको उस प्रकारसे मुख्य पुरुषार्थके रूपमें वर्णन नहीं किया ॥ ९ ॥
न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशोजगत्पवित्रं प्रगृणीत कर्हिचित्।
तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसान यत्र हंसा निरमन्त्युशिक्क्षयाः ॥ १०॥
मानस-सरोवरके कोमल-कमलके वनमें रहनेवाले राजहंस जिस प्रकार कौओंके क्रीड़ा-स्थल अपवित्र अन्नादिसे पूर्ण उच्छिष्ट (जूठन) के गड्ढे में कभी भी उल्लसित नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्म-धाममें विचरण करनेवाले भगवान्के चरणकमलोंके आश्रित परमहंस भक्त भी विचित्र रस, भाव, अलङ्कारादि पदोंसे युक्त उन आडम्बरपूर्ण शब्दों और विचारोंसे उल्लसित नहीं होते, जो भुवन-पावन श्रीवासुदेवकी महिमा सूचक हरिकथाके रससे हीन होते हैं अर्थात् वे ऐसे शुष्क वचनों अथवा ग्रन्थोंको कौओंके तुल्य कामीजनोंका रतिस्थान जानकर परित्याग कर देते हैं ॥ १०॥
तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवोयस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि ।
नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि यत्शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः ॥ ११॥
इसके विपरीत जिन वाणियों अथवा ग्रन्थोंमें भगवान् अनन्तदेवकी महिमासूचक नामोंका वर्णन है, उसका प्रत्येक श्लोक अथवा आख्यान दूषित अपशब्दादिसे युक्त रहनेपर भी, तथा सुर, मान, लय, ताल आदि साहित्यगत अलङ्कार-गुणोंसे रहित होनेपर भी लोगोंके पापोंका विनाश करता है। ऐसी वाणीका वक्ता मिलनेपर ही साधुजन उसका श्रवण करते हैं, श्रोता मिलनेपर कीर्त्तन करते हैं और यदि कोई न हो तो स्वयं ही गान करते हैं ॥ ११ ॥
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितंन शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरेन चार्पितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२॥
समस्त प्रकारकी कर्म-वासनाओंसे रहित होनेपर भी मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन – निर्मल ब्रह्मज्ञान यदि भगवान् श्रीहरिकी भक्तिसे रहित हो, तो वह भी शोभा नहीं देता। अतएव जो साधन और सिद्धि दोनों ही अवस्थाओंमें सदा ही अमङ्गलस्वरूप तथा दुःखप्रद है, वह काम्य कर्म और यहाँ तक कि निष्काम कर्म भी यदि भगवान्को अर्पण नहीं किये गये हों, तो वह कर्म भी कैसे सुशोभित हो सकते हैं? इसका कारण है कि वह भगवत्-सेवा और सत्त्व-शुद्धिके भावसे रहित होते हैं ॥ १२ ॥
अथो महाभाग भवानमोघदृक्शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः।
उरुक्रमस्याखिल-बन्धमुक्तयेसमाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥
अतएव हे महाभाग वेदव्यासजी ! आपकी दृष्टि अमोघ अर्थात् यथार्थ बुद्धिसे युक्त है। आपका यश पवित्र है। आप हरिकथा श्रवणरत, सत्यनिष्ठ और नियमपरायण हैं। अतः सभी जीवोंको मायाके बन्धनसे मुक्त करानेके लिए आप अचिन्त्यशक्ति भगवान् उरुक्रमकी विविध लीला-चेष्टाओंका समाधि द्वारा (एकाग्र चित्तसे) ध्यान कीजिये और फिर वर्णन कीजिये। विशुद्ध चित्तमें श्रीभगवान्की लीलाएँ स्वयं प्रकाशित होती हैं ॥ १३॥
ततोऽन्यथा किञ्चन यद्विवक्षतःपृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः
न कर्हिचित् क्वापि च दुःस्थिता मति-र्लभेत वाताहत-नौरिवास्पदम् ॥ १४॥
भगवान् श्रीहरिकी लीला-चेष्टा अर्थात् उनकी महिमाके वर्णनके अतिरिक्त यदि कोई किसी अन्य विषयको वर्णन करनेकी इच्छा करता है, तो वह अनर्थका परिचायक मनोधर्म है। उस मनोधर्ममें विभिन्न नाम और रूप स्फुरित होते हैं, जिनसे विक्षिप्त होकर बुद्धि उसी प्रकार स्थिर नहीं रह पाती, जिस प्रकार वायुवेगसे डगमगाती हुई नौका ॥ १४ ॥
जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतःस्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।
यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितोन मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥
स्वभावतः ही निन्दित काम्य-कर्मोंमें आसक्त संसारी लोगोंके धर्मके लिए आपने जो काम्यकर्मोंकी विधि दी है- जैसे ‘देवता और पितरोंका भलीभाँति अर्चन करके मांस खानेपर दोषका भागी नहीं होना पड़ता’ इत्यादि- आपके द्वारा दिये गये इन विधि-वाक्योंको ही विषयलोलुप मूर्खलोग मुख्य-धर्मके रूपमें मान लेते हैं। अतः आपसे यह महा-अनर्थ हो गया है। यदि कोई तत्त्वज्ञ व्यक्ति इस प्रकारके पशु-हिंसा आदि विधि-विधानके अनुष्ठानका निषेध भी करें, तो भी संसारमें आसक्त लोग उसके उपदेशको न तो समझेंगे और न ही मानेंगे ॥ १५ ॥
विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।
प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभो ॥ १६ ॥
तत्त्व-विचारोंमें अति निपुण कोई-कोई व्यक्ति ही समस्त सांसारिक विषयोंको छोड़कर असीम, अनन्त, सर्वव्यापी भगवान् श्रीहरिके सेवासुखरूप परमानन्दको जाननेमें समर्थ हो सकता है, किन्तु पारमार्थिक बुद्धिसे रहित व्यक्ति नहीं। इसलिए हे सर्वज्ञ ! आप सत्त्वादि तीनों गुणों द्वारा नचाये जानेवाले देहाभिमानी समस्त लोगोंके कल्याणके लिए भगवान्की नव-नवायमान लीलाओंका वर्णन कीजिये ॥ १६ ॥
त्यक्त्वा स्वधर्म चरणाम्बुजं हरे-र्भजन्नपक्वोऽथ पतेत्ततो यदि ।
यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य किंको वार्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः ॥ १७ ॥
जो अपने वर्णाश्रमधर्मका परित्यागकर श्रीहरिके चरणकमलोंका भजन करता है, सिद्ध होनेकी बात तो दूर रहे, असिद्ध अवस्थामें भी यदि वह भजनसे किसी प्रकारसे भ्रष्ट हो जाये अथवा उसकी मृत्यु हो जाये, तो भी कर्म-त्यागवशतः उसका कभी भी अमङ्गल अथवा पतन नहीं हो सकता। अर्थात् वह किसी भी अवस्थामें रहे, यहाँ तक कि नीच योनिमें भी रहे, तो भी ऐसे भगवत्-रसिकमें सेवाकी वासना रहनेके कारण क्या कभी उसका अमङ्गल हो सकता है? किन्तु भक्तिहीन स्वधर्मका पालन करनेवाले मनुष्योंको न तो कोई लाभ मिलता है और न ही उनका कोई प्रयोजन सिद्ध होता है ॥ १७ ॥
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदोन लभ्यते यद् भ्रमतामुपर्यधः ।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखंकालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥ १८॥
विवेकी पुरुष कभी भी उन लोभपूर्ण वचनोंसे प्रभावित नहीं होते, जो वचन स्वधर्मके पालनसे प्राप्त होनेवाले लौकिक फलोंका निरूपण करते हैं। वे तो उस नित्य सुखके लिए प्रयत्न करते हैं, जो उच्च ब्रह्मासे लेकर निम्न स्थावर-तृण तककी योनियोंमें भ्रमण करनेवाले जीवको भी कभी प्राप्त नहीं होता। जिस प्रकार बिना चेष्टाके भी दुःख प्राप्त होता है, उसी प्रकार गम्भीर वेगशाली कालके प्रभावसे विषय-सुख भी पूर्व कर्मफलोंके कारण सभी अवस्थाओंमें, यहाँ तक कि नारकीय शूकरादि योनियोंमें भी प्राप्त होता है ॥ १८॥
न वै जनो जातु कथञ्चनाव्रजे-न्मुकुन्दसेव्यन्यवदङ्ग संसृतिम् ।
स्मरन् मुकुन्दाङ्घ्युपगूहनं पुन-र्विहातुमिच्छेन्न रसग्रहो जनः ॥ १९ ॥
अहो ! भक्तिसे रहित कर्मी जिस प्रकार संसार-दशा प्राप्त करते हैं, श्रीहरिके चरणकमलोंकी सेवामें रत व्यक्तिको कभी भी वैसी दशा प्राप्त नहीं होती। किसी कारणवश यदि वे कुयोनि भी प्राप्त कर लें, तो भी वे कदापि कर्मीकी भाँति भोगमय संसारमें प्रवेश नहीं करते। भक्तोंको श्रीभगवान्की इच्छासे ही शुभ अथवा अशुभ फल प्राप्त होता है तथा वे कभी भी इससे विचलित नहीं होते। रसस्वरूप श्रीभगवान्में आग्रहपूर्वक अनुरक्त रसिक भक्त बारम्बार भगवान्के चरणकमलोंके आलिङ्गनका स्मरण करके उनका परित्याग करनेकी कभी इच्छा नहीं करते ॥ १९ ॥
इदं हि विश्वं भगवानिवेतरोयतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवाः।
तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि तेप्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २०॥
जिनकी शक्तिसे विश्वकी सृष्टि, स्थिति और प्रलय होती है, उन भगवान्से यह विश्वरूप प्रपञ्च अभिन्न होनेपर भी भगवान् विश्वसे पृथक् हैं। चेतन (जीव) और अचेतन (जगत्) तत्त्वका भगवान्से अलग अवस्थान नहीं है। यद्यपि श्रुतियोंके प्रमाणके बलसे आप इस तत्त्वको स्वयं ही जानते हैं, तथापि मैंने आपको यत्किञ्चित् सङ्केतमात्रसे बतलाया है ॥ २०॥
त्वमात्मनात्मानमवेह्यमोघदृक्परस्य पुंसः परमात्मनः कलाम् ।
अजं प्रजातं जगतः शिवाय त-न्महानुभावाभ्युदयो ऽधिगण्यताम् ॥ २१॥
हे सत्यदर्शिन् ! आप परमात्मा परमपुरुष श्रीहरिके कलावतार हैं। अजन्मा होकर भी आपने जगत्के मङ्गलके लिए जन्म-ग्रहण किया है-यह आप स्वयं जानते हैं। अतः सभी अवतारोंकी अपेक्षा प्रभावशाली श्रीहरिके परम-मङ्गलमय लीला-पराक्रमका विशेष रूपसे कीर्त्तन कीजिये ॥ २१ ॥
इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वास्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः ।
अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितोयदुत्तमः श्लोक-गुणानुवर्णनम् ॥२२॥
महर्षियोंने निरूपित किया है कि पुरुषोंकी तपस्या, वेदाध्ययन, यथाविधिसे अनुष्ठित यज्ञ, भलीभाँति उच्चारित वेदमन्त्र, ब्रह्मज्ञान तथा दानका एकमात्र नित्य फल उत्तमश्लोक श्रीकृष्णकी लीलाओंका गुण-कीर्त्तन है। श्रीहरिका कीर्त्तन तो हरि-सेवनका ही मुख्य अङ्ग है ॥ २२ ॥
अहं पुरातीतभवेऽभवं मुनेदास्याश्च कस्याश्चन वेदवादिनाम् ।
निरूपितो बालक एव योगिनांशुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ॥ २३॥
हे महर्षे ! पिछले कल्पमें हुए अपने पूर्वजन्ममें मैंने वेदज्ञ ब्राह्मणोंकी किसी एक दासीके गर्भसे जन्म-ग्रहण किया था। एकबार वर्षाकालमें चातुर्मास्य व्रतके उपलक्ष्यमें किसी एक स्थानपर एक साथ वास करनेके इच्छुक कृष्णकथाका गान करनेवाले भक्त-योगियोंकी सेवा-शुश्रूषाके लिए बालक होनेपर भी मैं नियुक्त हुआ था ॥ २३॥
ते मय्यपेताखिल-चापलेऽर्भकेदान्तेऽधृतक्रीडनके ऽनुवर्तिनि ।
चक्रुः कृपां यद्यपि तुल्यदर्शनाःशुश्रूषमाणे मुनयोऽल्पभाषिणि ॥ २४॥
मैं बालक होनेपर भी बाल-सुलभ चञ्चलतासे सर्वथा रहित था तथा बालक्रीड़ासे दूर रहता था। मैं जितेन्द्रिय था तथा मैंने वाणीको संयतकर अर्थात् प्रगल्भता त्यागकर आज्ञानुवर्ती अनुचरके रूपमें उन ऋषियोंकी सेवा-शुश्रूषा की थी। इस प्रकार समदर्शी होनेपर भी उन ऋषियोंने शील-स्वभाववाले मुझ बालकके प्रति अनुग्रह किया ॥ २४॥
उच्छिष्टलेपाननुमोदितो द्विजैःसकृत् स्म भुजे तदपास्तकिल्बिषः ।
एवं प्रवृत्तस्य विशुद्ध-चेतस-स्तद्धर्म एवात्मरुचिः प्रजायते ॥ २५ ॥
मैंने उन ब्राह्मणोंकी अनुमति प्राप्तकर उनके भोजन-पात्रमें लगे हुए उच्छिष्ट अन्नका मात्र एकबार भोजन किया था। इसके परिणामस्वरूप मेरे समस्त पाप अर्थात् भक्तिके प्रतिबन्धक अनर्थ दूर हो गये। उनकी सेवा करते-करते मेरा चित्त निर्मल हो गया तथा परमेश्वर श्रीहरिकी श्रवण-कीर्त्तनादि रूप भक्तिमें अनायास ही मेरी रुचि उदित हो गयी ॥ २५ ॥
तत्रान्वहं कृष्णकथाः प्रगायता-मनुग्रहेणाशृणवं मनोहराः ।
ताः श्रद्धया मेऽनुपदं विशृण्वतःप्रियश्रवस्यङ्ग ममाभवद्रतिः ॥ २६ ॥
हे व्यासजी ! वे ऋषिगण उस स्थानपर प्रतिदिन निरन्तर चित्तको उन्मत्त कर देनेवाली श्रीहरिकी लीला और गुणोंका गान करते थे। उनके अनुग्रहसे मैं उन मनोहर लीला-कथाओंका श्रवण किया करता था। इस प्रकार प्रत्येक पदको परम श्रद्धाके साथ सुनते-सुनते प्रियकीर्ति भगवान् श्रीहरिमें मेरी प्रीति और आसक्ति (रति) उत्पन्न हो गयी ॥ २६ ॥
तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामतेप्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।
ययाहमेतत् सदसत् स्वमाययापश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥
हे महामुने ! तदनन्तर उन मनोहरकीर्ति भगवान्में रुचिका उदय होनेसे मेरी उनमें निश्चला बुद्धि हो गयी। उस बुद्धिके प्रभावसे मैं तत्काल ही अनुभव करने लगा कि मेरे प्रपञ्चातीत शुद्ध स्वरूपपर यह स्थूल और सूक्ष्म शरीर अविद्यासे विरचित है। मैं यह भी जान गया कि यह स्थूल और सूक्ष्म शरीर श्रीकृष्णकी सेवाके लिए ही है ॥ २७ ॥
इत्थं शरत्प्रावृषिकावृतू हरे-र्विशृण्वतो मेऽनुसवं यशोऽमलम् ।
सङ्कीर्त्यमानं मुनिभिर्महात्मभि-र्भक्तिः प्रवृत्तात्मरजस्तमोपहा ॥ २८ ॥
इस प्रकार शरत् और वर्षा – इन दो ऋतुओं अर्थात् चार मास तक उन महात्मा ऋषियोंके मुखसे प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओंमें गान किये जानेवाले श्रीहरिके निर्मल लीला-यशके विशेष रूपसे श्रवण करनेके कारण मेरे हृदयमें रज और तम गुणोंको नष्ट करनेवाली भक्तिका प्रादुर्भाव हो गया ॥ २८॥
तस्यैवं मेऽनुरक्तस्य प्रश्रितस्य हतैनसः ।
श्रद्दधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च ॥ २९ ॥
ज्ञानं गुह्यतमं यत्तत् साक्षाद्भगवतोदितम् ।
अन्ववोचन् गमिष्यन्तः कृपया दीनवत्सलाः ॥ ३० ॥
इस प्रकार अत्यन्त अनुरागके साथ बड़े विनीतभाव, निष्पाप मन और श्रद्धासे युक्त होकर तथा संयत चित्त, वाणी और मनसे मैं उन महात्माओंका आज्ञाकारी होकर निरन्तर उनकी सेवा करने लगा। चातुर्मास्य समाप्त होनेपर जब वे दीनवत्सल मुनि जाने लगे, तब उन्होंने मुझ जैसे बालकको साधन-स्वरूप गुह्य धर्मतत्त्वका ज्ञान, गुह्यतर नैष्कर्म्यरूप आत्म अथवा ब्रह्म-ज्ञान एवं उससे भी अधिक परम रहस्यमय उस भगवत्-ज्ञान अर्थात् एकमात्र भक्ति-तात्पर्यसे विशिष्ट भागवत-धर्मका कृपापूर्वक उपदेश दिया, जिस उपदेशको स्वयं भगवान्ने ब्रह्मा, उद्धव और अर्जुनको प्रदान किया था ॥ २९-३०॥
येनैवाहं भगवतो वासुदेवस्य वेधसः ।
मायानुभावमविदं येन गच्छन्ति तत्पदम् ॥ ३१ ॥
ऐसे परम गोपनीय भक्ति-तात्पर्ययुक्त भगवत्-ज्ञानके प्रभावसे ही मैं विश्वके विधाता भगवान् श्रीवासुदेवकी चित्-शक्ति अथवा स्वरूप-शक्तिके वैभवको जान पाया हूँ। उस भगवत्-ज्ञानके प्रभावसे ही जीव श्रीविष्णुके परम पदको प्राप्त करते हैं ॥ ३१ ॥
एतत् संसूचितं ब्रह्मंस्तापत्रयचिकित्सितम् ।
यदीश्वरे भगवति कर्म ब्रह्मणि भावितम् ॥ ३२ ॥
हे ब्रह्मज्ञ ! सर्वनियन्ता ईश्वर भगवान्में जो कर्म समर्पित होते हैं, वे कर्म ही आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक-इन तीन तापोंको दूर करनेवाले अर्थात् उनका उपशम करनेकी औषधि-स्वरूप हैं। यही शास्त्रोंके मर्मको जाननेवालों द्वारा कथित हुआ है ॥ ३२॥
आमयो यश्च भूतानां जायते येन सुव्रत ।
तदेव ह्यामयं द्रव्यं न पुनाति चिकित्सितम् ॥ ३३ ॥
हे भगवन्निष्ठ व्यासदेव ! जिन-जिन द्रव्योंके भोजनसे प्राणियोंमें रोग उत्पन्न होते हैं, केवल उन रोग उत्पन्न करनेवाले द्रव्योंका सेवन करनेमात्रसे वे रोग कभी भी दूर नहीं हो सकते, किन्तु यदि उन सभी द्रव्योंका चिकित्सा-विधिके अनुसार अर्थात् अन्य द्रव्यों या औषधियोंके मिश्रणके साथ सेवन किया जाये, तो वे रोग अवश्य ही दूर हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः ।
त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परे ॥ ३४ ॥
इसी प्रकार मनुष्योंके नैमित्तिक काम्यकर्म ही संसार-बन्धनके अथवा विभिन्न योनियोंमें भ्रमणके कारण होते हैं। किन्तु यदि इन समस्त कर्मोंको ईश्वरको समर्पित कर दिया जाये, तो उन कर्मोंमें कर्त्तापनका भाव ही नहीं रहता, अर्थात् वही कर्म भगवत्-विमुख अहङ्कारमय बुद्धिका विनाश करनेमें समर्थ होते हैं ॥ ३४॥
यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम् ।
ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् ॥ ३५ ॥
श्रवण-कीर्त्तनादि रूप भक्तियोगसे युक्त भागवत-ज्ञान ही इस संसारमें भगवान्के सन्तोषके लिए अनुष्ठित शास्त्र विहित कर्मोंका नित्य फल है ॥ ३५ ॥
कुर्वाणा यत्र कर्माणि भगवच्छिक्षयाऽसकृत्।
गृणन्ति गुणनामानि कृष्णस्यानुस्मरन्ति च ॥ ३६ ॥
जिस समय मानव (हे अर्जुन ! जो कुछ भी करो, वह समस्त मुझे ही अर्पित करो – इत्यादि) भगवान्की शिक्षाके अनुसार कर्मों को करनेके लिए प्रस्तुत हो जाता है, उसी समय वह पुनः पुनः श्रीकृष्णके नाम और गुणोंका कीर्त्तन एवं स्मरण करने लग जाता है ॥ ३६ ॥
ॐ नमो भगवते (तुभ्यं) वासुदेवाय धीमहि।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः सङ्कर्षणाय च ॥ ३७ ॥
हे श्रीकृष्ण ! आप ही प्रणव-स्वरूप हैं। आप ही वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध रूपमें चतुर्व्यूहात्मक स्वरूप हैं। हम आपको हृदयसे नमस्कार करते हैं। हम आपका ध्यान करते हैं ॥ ३७॥
इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम् ।
यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शनः पुमान् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार जो लोग वासुदेवादि चारों भगवत्-मूर्तियोंके (पञ्चरात्रात्मक विधिके अनुसार) ‘वासुदेवाय नमः’, ‘प्रद्युम्नाय नमः’ आदि नामात्मक मन्त्रोंके द्वारा उन-उन मन्त्रोंमें उक्त चिन्मय रूपसे युक्त अथवा प्राकृत-मूर्ति-रहित भगवान् यज्ञपुरुषकी पूजा करते हैं, उन्हीं लोगोंका ज्ञान पूर्ण और यथार्थ है ॥ ३८॥
इमं स्वनिगमं ब्रह्मन्नवेत्य मदनुष्ठितम् ।
अदान्मे ज्ञानमैश्वर्यं स्वस्मिन् भावञ्च केशवः ॥ ३९ ॥
हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने भगवान्की आज्ञाका भलीभाँति पालन किया। यह जानकर भगवान् श्रीहरिने मुझे अपना अनुभव (आत्म-ज्ञान) और अणिमादि ऐश्वर्य प्रदान किये। तत्पश्चात् मेरे इन सबसे अनासक्त होनेके कारण उन्होंने मुझे प्रेमाभक्ति प्रदान की ॥ ३९॥
त्वमप्यदभ्र-श्रुतविश्रुतं विभोःसमाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।
प्रख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनांसंक्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥
हे महर्षे ! आप भी सर्वव्यापी श्रीविष्णुके उस यशका भलीभाँति कीर्त्तन कीजिये, जिसे जाननेसे विद्वानोंकी भी समस्त जिज्ञासाएँ समाप्त हो जाती हैं। मुनियोंने भी कहा है कि जो मनुष्य बारम्बार त्रिविध दुःखोंसे तापित हैं, श्रीहरिके गुण-गानके अतिरिक्त उनके सांसारिक क्लेशोंको शान्त करनेका अन्य कोई उपाय नहीं है॥ ४० ॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे ब्रह्मसूत्र-भाष्ये पारमहंस्यां संहितायां वैयासिक्यां प्रथमस्कन्धे व्यास-नारदसंवादो नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥