आठवाँ परिच्छेद
तथार्थवादो हरिनाम्रि कल्पनम्
जय गौर-गदाधर श्रीराधामाधव।
जय गौरलीलास्थली, जाह्नवी, वैष्णव ॥1॥
हरिनामे अर्थवादकल्पना चिन्तन।
पञ्चमापराध प्रभो श्रीशचीनन्दन ॥2॥
अनुवाद: श्रीगौर-गदाधर तथा श्रीश्रीराधा माधव जी की जय हो। श्रीमन्महाप्रभु जी की सभी लीला-स्थलियों की जय हो, गंगा जी की एवं वैष्णवों की सर्वदा जय हो।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे शचीनन्दन! हे गौरहरि! श्रीहरिनाम में अर्थवाद की कल्पना अर्थात् शास्त्रों में हरिनाम की महिमा बढ़ा-चढ़ा कर लिखी गई है, ऐसा मानना पाँचवाँ अपराध है।
नाम-महिमा
स्मृति कहे, हेलाय श्रद्धाय नाम लय।
कृष्ण ता’रे कृपा करि’ हयेन सदय ॥3॥
नामेर सदृश ज्ञान नाहिक निर्मल।
नामेर सदृश व्रत नाहिक प्रबल ॥4॥
नामेर सदृश ध्यान नाहि ए जगते।
नामेर सदृश फल नाहि कोनमते ॥5॥
नामेर सदृश त्याग कोनरूपे नय।
नामेर सदृश सम कभु नाहि हय ॥6॥
नामेर सदृश पुण्य नाहि ए संसारे।
नामेर सदृश गति ना देखि विचारे ॥7॥
नामइ परम-मुक्ति, नाम उच्चगति।
नामइ परम-शान्ति, नाम उच्चस्थिति ॥8॥
नामइ परमभक्ति, नाम शुद्धा मति।
नामइ परमप्रीति, नाम परा स्मृति ॥9॥
नामइ कारणतत्त्व, नाम सर्वप्रभु।
परम आराध्य नाम गुरूरूपे विभु ॥10॥
अनुवाद: स्मृति-शास्त्र कहते हैं कि श्रद्धा से अथवा अनायास ही यदि कोई श्रीकृष्ण नाम लेता है तो दयालु श्रीकृष्ण दया-परवश होकर उस पर कृपा करते हैं। श्रीहरिनाम के समान कोई भी निर्मल-ज्ञान नहीं है। श्रीहरिनाम करने के समान और कोई भी प्रबल व्रत नहीं है। इस जगत् में श्रीहरिनाम के समान कोई भी ध्यान नहीं है। श्रीहरिनाम के समान कोई श्रेष्ठ फल नहीं है। श्रीहरिनाम के समान कोई भी त्याग नहीं है। इस संसार में श्रीहरिनाम के समान कोई पुण्य नहीं है। हरिनाम के बराबर तो कुछ भी नहीं है। विचार करने से मालूम पड़ेगा कि श्रीहरिनाम के समान गति किसी भी साधन में नहीं है। अतः श्रीहरिनाम ही परम-मुक्ति है। श्री हरिनाम ही श्रेष्ठ नाम हैं। श्रीहरिनाम से ही उच्चतम गति की प्राप्ति होती है। श्रीहरिनाम ही परम शान्ति स्वरूप हैं। श्रीहरिनाम ही उच्चतम स्थिति हैं। श्रीहरिनाम करना ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। श्रीहरिनाम से ही शुद्ध मति होती है। श्रीहरिनाम से ही श्रीकृष्ण में परम प्रीति होती है। श्रीहरिनाम ही श्रेष्ठतम् स्मृति हैं। श्रीहरिनाम ही कारण तत्त्व हैं। श्रीहरिनाम ही सब के प्रभु हैं। श्रीहरिनाम ही परमाराध्य हैं तथा श्रीहरिनाम ही सब गुरुओं में से श्रेष्ठतम् गुरु हैं।
श्रीकृष्ण नाम की सर्वोत्तमता
सहस्र (विष्णु) नामेर तुल्य हय (एक) राम नाम।
तिन राम-नामतुल्य एक कृष्णनाम ॥11॥
अनुवाद: एक हज़ार विष्णु-नाम के बराबर एक राम नाम होता है, जबकि तीन राम नाम के बराबर एक कृष्ण नाम होता है।
नाम में अर्थवाद करने से अवश्य ही नरक-गति होती है
श्रुतिगण नामेर माहात्म्य सदा गाय।
नामेर चित्-तत्त्व बलि’ जगते जानाय ॥12॥
श्रुति-स्मृति-प्रदर्शित नामेर येइ फल।
ताहे अर्थवाद करे पाषण्डप्रबल ॥13॥
हरिनामे अर्थवाद येइ अधम करे।
से पापिष्ठ नरकेते पचि’ पचि’ मरे ॥14॥
येइ बले, – “नामेर फलश्रुति सत्य नय।
नामे रुचि दिते मात्र तत फल कय ॥15॥
शास्त्रेर तात्पर्य, आर जीवहिताहित।
से अधम नाहि जाने, बुझे विपरीत ॥16॥
अनुवाद: श्रुति-शास्त्र हमेशा ही श्रीहरिनाम की महिमा गान करते रहते हैं तथा जगतवासियों को बताते हैं कि भगवदनाम चिन्मयतत्त्व है। श्रुति व स्मृति शास्त्रों के द्वारा प्रदर्शित हरिनाम की महिमा को पाषण्डी लोग अर्थवाद कहते हैं। उनका कहना है कि ये महिमा तो बढ़ा-चढ़ा कर लिखी गयी है। जो अधम जीव श्रीहरिनाम में अर्थवाद करते हैं, वह पापी नरक में सड़-सड़ कर मरते हैं।
श्रीहरिनाम की जो महिमा व श्रीहरिनाम का जो फल श्रुति-शास्त्रों में वर्णित है, वह सत्य नहीं है, केवल मात्र श्रीहरिनाम में रुचि उत्पन्न कराने के लिए इतना फल कहा गया है — ऐसा जो कहते हैं, वह शास्त्रों के सही तात्पर्य को नहीं जानते हैं तथा वह अधम जीव यह भी नहीं जानते कि जीव का मंगल या अमंगल किस बात में है। वह तो अपने दिमाग से हर बात का उल्टा अर्थ ही सोचते हैं।
श्रीहरिनाम का फल सत्य है
कर्मकाण्डे आछे त’ कैतव स्वार्थज्ञान।
भक्तितत्त्वे नामे ताहा नहे विद्यमान ॥17॥
कर्मकाण्डे फलश्रुति रोचनार्थ जानि।
भक्तितत्त्वे फलश्रुति नित्य सत्य मानि ॥18॥
नामतत्त्वे शाम्य नाहि पाय कभु स्थान।
निजेर नाहिक स्वार्थ नाम करि’ दान ॥19॥
अनुवाद: कर्मकाण्ड में जैसी कपटता व स्वार्थबुद्धि भरी पड़ी है, वह भक्तितत्त्व में अर्थात् श्रीहरिनाम में नहीं है। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि मेरा ऐसा मानना है कि कर्मकाण्ड में रुचि उत्पन्न करने के लिए उसमें बहुत तरह के फलों का प्रलोभन दिया गया है परन्तु भक्तितत्त्व में वर्णित फल, मात्र प्रलोभन नहीं, वरन् नित्य-सत्य हैं। श्रीहरिनाम के समान कुछ भी नहीं है तथा श्रीहरिनाम देने वालों का अपना कोई भी स्वार्थ नहीं होता।
नामदान श्रद्धावाने येइ जन करे।
कृष्णदास्य करे सेइ स्वार्थपरिहारे ॥20॥
कर्म कराइले याजकेर अर्थलाभ।
अतएव ताहे कैतवेर त’ प्रभाव ॥21॥
वेद-स्मृति नाम फल अनन्त बारखाने।
स्वार्थबुद्धि शून्य से येइ ताहा नाहि माने ॥22॥
कर्म सब शुभाशुभ जड़ेर आश्रये।
जड़मयफल याचे यजमानचये ॥23॥
कर्मफल दूरे फेलि’ येवा करे कर्म।
हृदय विशुद्ध ता’र हय एइ मर्म ॥24॥
विशुद्ध हृदये आत्मरति सुनिर्मल।
उदय हइया हय क्रमशः प्रबल ॥25॥
अनुवाद: जो श्रद्धावान व्यक्ति को श्रीहरिनाम प्रदान करते हैं, वह ऐसा करके श्रीकृष्ण-भक्ति ही करते हैं जबकि कर्मकाण्ड के यज्ञ कराने वालों को धन का लोभ रहता है। इसलिए उसमें कपटता का प्रभाव आ ही जाता है। वेद व स्मृतियाँ भगवान के नाम के फल की अनन्त महिमा का बखान करती हैं परन्तु स्वार्थी व्यक्ति इसे नहीं मानते। कर्मकाण्डी व्यक्ति हरिनाम करते हुए बहुत प्रकार के शुभ व अशुभ सांसारिक फलों की इच्छा रखते हैं। फल की कामना को त्याग कर जो कर्म करते हैं, उनका हृदय विशुद्ध हो जाता है तथा विशुद्ध-हृदय में ही सांसारिक विषयों से वैराग्य तथा आत्मतत्त्व में अनुराग उदित होता है। धीरे-धीरे यह अनुराग ही प्रगाढ़-प्रेम में परिवर्तित हो जाता है।
श्रीहरिनाम चिन्मय हैं, उनमें अर्थवाद हो ही नहीं सकता
नाम सेइ आत्मरति निजे उपस्थित।
साधनकालेते साध्यवस्तुर विहित ॥26॥
कर्मेर चरम फल नामरस हय।
साधुरूपे अनुष्ठित कर्मेते निश्चय ॥27॥
अतएव चौदहलोक भ्रमिया ब्राह्मण।
येइ फल नाहि पान, नाम ताहा हन ॥28॥
नामफल सर्वोपरि अवश्य हइवे।
कर्मी ज्ञानी हिंसा करि’ नामे कि करिवे ॥29॥
अनुवाद: श्रीहरिनाम करने से आत्म साक्षात्कार व आत्मरति स्वतः ही हो जाती है। साधनकाल में ही हरिनाम साध्य-वस्तु का कुछ अनुभव करवा देते हैं। निष्काम-कर्म का चरमफल, हरिनाम में रुचि उत्पन्न होना है। सत्य-वस्तु के लिए किया गया निष्काम-कर्म निश्चित रूप से हरिनाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करता है। हरिनाम उस फल को, बड़ी सरलता एवं शीघ्रता से प्रदान करते हैं, जोकि चौदह लोकों में भ्रमण करने वाला ब्राह्मण भी प्राप्त नहीं कर सकता। प्रत्येक दृष्टि से हरिनाम का फल सर्वोपरि ही होगा। कर्मी व ज्ञानी अपनी ईर्ष्या के कारण जितना भी प्रयास क्यों न कर लें वे नाम की महिमा का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।
नामाभास के द्वारा सभी कर्मों का व ब्रह्मज्ञान का फल प्राप्त होता है
सर्वकर्मफल नामाभासे लब्ध हय।
सर्वकर्मफल नामाभासेते मिलय ॥30॥
आभासे मिलिल यदि एत उच्चफल।
नामवस्तु ततोधिक प्रदाने प्रबल ॥31॥
अतएव शास्त्र यत नामफल गाय।
शुद्ध नामाश्रित जन निश्चय ता’ पाय ॥32॥
अनुवाद: नामाभास होने मात्र से ही सभी कर्मों का और ज्ञान का फल प्राप्त हो जाता है। हरिनाम के नामाभास से ही यदि इतना फल मिलता है तब शुद्ध नाम क्या दे सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अतएव शास्त्रों में जितनी भी श्रीहरिनाम की महिमा कही गई है, शुद्ध-नामाश्रित-भक्त उसको निश्चित रूप से प्राप्त करता है।
नाम के फल में जिसका सन्देह हैं, उसका मंगल नहीं हो सकता
इहाते सन्देह या’र, से अधम जन।
नाम-अपराधे ता’र अवश्य पतन ॥33॥
वेदे रामायणे आर भारते पुराणे।
आदि अन्त्य मध्ये हरिनामेर बारखाने ॥34॥
नामफल श्रुतिवाक्य अनादि निश्चल।
ताहे अर्थवाद कल्पनार किवा फल ॥35॥
अनुवाद: इसमें जिसको संदेह है, वह व्यक्ति अधम है तथा नामापराध से उसका अवश्य ही पतन हो जायेगा। वेदों में, रामायण में महाभारत में तथा पुराणों के प्रारम्भ में, मध्य में तथा अन्त में हरिनाम की महिमा ही वर्णित की गई है। वेद-वाक्यों में जो हरिनाम की महिमा गाई गई है, वह अनादि और अटल है। उसमें अर्थवाद की कल्पना करने से भला क्या फल मिलेगा? अर्थात् हमारे द्वारा ये बड़ी भूल होगी या ये हमारा अपराध ही होगा कि हम ये गलत धारणा मन में बनाये रखें कि हरिनाम की जो इतनी महिमा हमारे शास्त्रों में कही गयी है, ये सब काल्पनिक है।
श्रीहरिनाम की शक्ति, ज्ञान एवं कर्म की शक्ति की अपेक्षा अनन्त गुणा अधिक है
नामनामी एक, नामे दिया सर्वशक्ति।
सर्वोपरि करियाछ तव नामभक्ति ॥36॥
तुमि त’ स्वतन्त्र तत्त्व सर्वशक्तिमान्।
तोमार इच्छाय यत विधिर विधान ॥37॥
कर्मके क’रेछ जड़, आर ब्रह्मज्ञाने।
दियाछ निर्वाणशक्ति स्वतन्त्र विधाने ॥38॥
इच्छामय तुमि प्रभु, स्वीय नामाक्षरे।
अर्पियाछ सब शक्ति आर के कि करे ॥39॥
अतएव तब नाम सर्वशक्तिमान्।
नामे अर्थवाद नाहि करिवे विद्वान् ॥40॥
अनुवाद: नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभुजी को कहते हैं कि नाम और नामी एक ही हैं। हे प्रभु! आपने अपने नाम में तमाम शक्तियों का समावेश करके श्रीहरिनाम-संकीर्तन को सर्वश्रेष्ठ-भक्ति बना दिया है। हे प्रभु! आप पूर्ण-स्वतन्त्र हैं तथा सर्वशक्तिमान हैं। आपकी इच्छा से ही विधि का विधान चलता है। आपने अपनी इच्छानुसार कर्म को जड़ बनाया है अर्थात् कर्म से केवल दुनियावी वस्तुओं की ही प्राप्ति हो सकती है जबकि आपने ही ज्ञान में मोक्ष प्रदान करने की शक्ति भर दी है। हे प्रभु! आप स्वतन्त्र इच्छामय हो। आपने अपने नामाक्षरों में सारी की सारी शक्तियाँ भर दी हैं, इसीलिए आपका नाम भी आपकी ही तरह सर्वशक्तिमान है। अतः जो बुद्धिमान पुरुष हैं, वे नाम में अर्थवाद नहीं करते।
इस अपराध से मुक्त होने का उपाय
नामे अर्थवाद – अपराध घटे यदि।
दन्ते तृण धरि’ याइ वैष्णव संसदि ॥41॥
अपराध जानाइया वैष्णवचरणे।
क्षमा मागि काकुति करिया ऋजुमने ॥42॥
नामेर महिमा-ज्ञाता भगवत जन।
क्षमा करि’ कृपा करि’ दिवे आलिंगन ॥43॥
नामे अर्थवाद आर कल्पन मनन।
कभु नाहि ह’वे चित्ते माया-विडम्बन् ॥44॥
अर्थवादकारी सह हैले सम्भाषण।
सचेले जाह्नवी-जले करिव मज्जन ॥45॥
कृष्णप्रिया वंशीकृपा भरसा याहार।
हरिनाम-चिन्तामणि ता’र अलंकार ॥46॥
अनुवाद: नाम के प्रति यदि अर्थवाद रूपी अपराध हो जाये तो बड़ी दीनता के साथ वैष्णव सभा में जाकर वैष्णवों से अपने अपराध के बारे में निवेदन करना चाहिए तथा दुःखी मन से अर्थात् गलती का पश्चाताप करते हुए नामापराध के प्रति क्षमा-याचना करनी चाहिए। हरिनाम की महिमा को जानने वाले भगवान के भक्त आप पर कृपा करते हुये आप को क्षमा करेंगे। श्रीहरिनाम की अनन्त महिमा पर विश्वास न करते हुये हरिनाम में अर्थवाद की कल्पना करने की चेष्टा करना केवल मात्र माया की विडम्बना है। नाम में अर्थवाद रूपी अपराध करने वाले के साथ यदि कभी बातचीत हो जाये तो उसी अवस्था में कपड़ों के साथ गंगा जी के जल से स्नान करना चाहिए।
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण की प्रिय वंशी की कृपा में जिनका विश्वास है, ‘श्रीहरिनाम चिन्तामणि’ उनका अलंकार है।.
इति श्रीहरिनाम-चिन्तामणौ नाम्नि अर्थवादापराधविचारो नाम अष्टमः परिच्छेदः।