पन्द्रहवाँ परिच्छेद
गदाइ गौरांग जय, जय नित्यानन्द।
जय सीतानाथ, जय गौरभक्तवृन्द ।।1।।
सब छाड़ि’ हरिनाम ये करे भजन।
जय जय भाग्यवान सेइ महाजन ।।2।।
प्रभु बले हरिदास तुमि भक्तिबले।
पेयेछ सकल ज्ञान ए जगतीतले ।।3।।
सर्ववेद नाचे देखि तोमार जिह्वाय।
सकल सिद्धान्त देखि तोमार कथाय ।।4।।
श्रीगदाधर पंडित जी, श्रीगौरांग महाप्रभु जी व श्रीमती जाहवा देवी जी के प्राणस्वरूप श्रीनित्यानन्द जी की जय हो, श्रीसीतापति, श्रीअद्वैताचार्य जी तथा श्रीवास आदि जितने भी महाप्रभु जी के भक्त हैं, सभी की जय हो, जय हो। अन्य सभी पथों का परित्याग करके जो हरिनाम का जप या कीर्तन करता है, उस भाग्यवान् पुरुष की जय हो।
श्रीमन् महाप्रभु बोले- हे हरिदास ! आपने इस पृथ्वी पर अपनी भक्ति के बल से दिव्यज्ञान को प्राप्त किया है। चारों वेद आपकी जिहा पर नृत्य करते हैं तथा मैं आपकी कथा में सारे सुसिद्धान्तों को अनुभव करता हूँ।
नाम रस की जिज्ञासा
एबे स्पष्ट नामरस कि प्रकार।
किरूपे लभिवे जीव ता हे अधिकार ।।5।।
हरिदास महाप्रेमे करे निवेदन।
तोमार प्रेरणाबले करिव वर्णन ।।6।।
महाप्रभु जी बोले- हे हरिदास ! अब मुझे यह बताईये कि हरि नाम रस कितने प्रकार के हैं और अधिकार के अनुसार साधकों को किस प्रकार प्राप्त होंगे। हरिनाम के प्रेम में विभोर होकर नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी निवेदन करते हुए श्रीमन् महाप्रभु जी से कहते हैं कि हे गौरहरि ! आपकी प्रेरणा के बल से मैं इसका वर्णन करूँगा।
रस तत्त्व
शुद्धतत्त्व परत्तत्त्व येइ वस्तु – सिद्ध।
रसनामे सर्ववेदे ताहाइ प्रसिद्ध ।।7।।
सेइ से अखण्ड रस परब्रह्मतत्त्व ।
अनन्त आनन्दधाम चरम महत्त्व ।।8।।
शक्ति – शक्तिमान्रूप विशेष ताहाय।
भेद नाइ, भेद-सम दर्शनेते भाय ।।9।।
शक्तिमान् सुदुर्लक्ष्य शक्तिप्रकाशिनी।
त्रिविध शक्तिर क्रिया विश्वविकाशिनी ।।10।।
शुद्ध तत्त्व और पर-तत्त्व के रूप से जो वस्तु सिद्ध है, वो रस के नाम से वेदों में प्रसिद्ध है। वह रस अखंड है, परब्रह्म तत्त्व है। ये चरम वस्तु असीम आनन्द का समुद्र है। शक्ति और शक्तिमान रूप से वो परत्तत्त्व दो रूपों में विद्यमान है। शक्ति और शक्तिमान के रूप से, इसमें कोई भेद नहीं है, केवल दर्शन में भेद दिखाई देता है। शक्तिमान अदृश्य सा है जबकि शक्ति उसको प्रकाशित करती है। तीनों प्रकार की शक्तियाँ (चित्, जीव और माया शक्ति) ही विश्व को प्रकाशित करती हैं।
चित् शक्ति के द्वारा वस्तु का प्रकाश
चिच्छक्तिस्वरूपे प्रकाशये वस्तुरूपे।
वस्तुनाम, वस्तुधाम, तत्क्रिया – स्वरूप ।।11।।
कृष्ण से परम वस्तु, श्याम ताँ’र रूप।
कृष्णधाम गोलोकादि, लीलार स्वरूप ।।12।।
नाम, धाम, रूप, गुण, लीला आदि यत।
सकलइ अखण्डाद्वय ज्ञान अन्तर्गत ।।13।।
विचित्रता यत सब पराशक्ति कर्म।
कृष्ण धर्मी, पराशक्ति कृष्ण – नित्यकर्म ।।14।।
धर्मधर्मी भेद नाइ अखण्ड अगये।
विचित्र विशेषमात्र सचिन्निालये ।।15।।
चित् शक्ति के स्वरूप में वस्तु का रूप, वस्तु का नाम, वस्तु का धाम, वस्तु की क्रिया व वस्तु का स्वरूप आदि प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण ही वह परम वस्तु हैं और उनका श्याम वर्ण है। गोलोक, मथुरा, वृन्दावन इत्यादि श्रीकृष्ण के धाम हैं, जहाँ वह अपनी लीला प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण के नाम, धाम, रूप, गुण, लीला इत्यादि जो भी हैं, सबके सब अखंड और अद्वय ज्ञान के अन्तर्गत हैं। श्रीकृष्ण में जितनी भी विचित्रता है ये सब परा शक्ति के द्वारा ही की गई है। श्रीकृष्ण धर्मी हैं, जबकि श्रीकृष्ण की पराशक्ति ही उनका नित्यधर्म है। धर्म और धर्मी में भेद नहीं है। दोनों ही अखंड और अद्वय हैं। ये दोनों अभेद होते हुए भी विचित्र विशेषता के द्वारा इनमें भेद दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की विशेषता केवल चिद् जगत में ही दिखाई देती है।
माया-शक्ति का स्वरूप
सेइ शक्ति-छाया एक माया संज्ञा पाय।
बहिरंग – विश्व सृजे कृष्णेर इच्छाय ।।।6।।
जो छाया – शक्ति श्रीकृष्ण की इच्छा से इस सारे विश्व का सृजन करती है, श्रीकृष्ण की उसी बहिरंगा शक्ति को माया-शक्ति के नाम से जाना जाता है।
जीव शक्ति
दाभेदमयी जीवशक्ति जीवगणे।
ताटस्थ्ये प्रकाशे, कृष्ण – सेवार कारणे ।।17।।
भेदाभेदमयी जीव-शक्ति अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण जी की तटस्था – शक्ति श्रीकृष्ण की सेवा के उद्देश्य से जीवों को प्रकाशित करती है।
दो प्रकार की दशा वाले जीव
नित्यबद्ध, नित्यमुक्त – जीव द्विप्रकार।
नित्यमुक्ते नित्यकृष्ण – सेवा – अधिकार ।।18 ।।
नित्यबद्ध – मायागुणे करये संसार।
बहिर्मुख – अन्तर्मुख – भेदे द्विप्रकार ।।19।।
अन्तर्मुख साधुसंगे कृष्णनाम पाय।
कृष्णनामप्रभावेते कृष्णधामे याय ।।20।।
जीव दो प्रकार के हैं- नित्य बद्ध और नित्यमुक्त। नित्य मुक्त जीवों का नित्य ही कृष्ण सेवा में अधिकार होता है जबकि नित्य बद्ध जीव माया के द्वारा संसार में फंस जाते हैं और उनमें भी बहिर्मुखी और अंतर्मुखी भेद से दो प्रकार का विभाग है।
जो अंतर्मुखी जीव हैं, वो साधु-संग के द्वारा कृष्ण – नाम को प्राप्त करते हैं और श्रीकृष्ण नाम के प्रभाव से श्रीकृष्ण जी के धाम को जाते हैं।
रस और रस का स्वरूप
नाम त’ अखण्ड रस कलिका ताहार।
कृष्ण आदि संज्ञारूपे विश्वेते प्रचार ।।21।।
स्वल्पस्फुट कलिका से रूप मनोहर।
श्रीगोलोके वृन्दावने श्रीश्यामसुन्दर ।।22।।
सौरभित कलिका से चतुःषष्टिगुण।
प्रकाशे नामेर तत्त्व जानेल निपुण ।।23।।
पूर्ण प्रस्फुटित नाम कुसुम सुन्दर ।
अष्टकाल नित्यलीला प्रकृतिर पर ।।24।।
भगवान श्रीहरि ही अखंड रस के भण्डार हैं और उस रस रूपी फूल की थोड़ी सी प्रस्फुटित हुई हरिनाम रूपी कलि का रूप अति मनोहर होता है। गोलोक – वृन्दावन में यही रूप श्यामसुन्दर के रूप में विद्यमान है।
प्रभु के चौंसठ गुण उस कलि की सुगन्ध हैं, वे गुण ही भगवान के नाम के तत्त्व को पूरे जगत् में प्रकाशित करते हैं।
श्रीकृष्ण की लीला पूरी तरह से खिले हुए फूल के समान है। ये भगवद् लीला प्रकृति से परे है, नित्य है और आठों प्रहर चलती है।
भक्ति का स्वरूप
जीवे नामकृपोदये स्वरूप हलादिनी।
सम्वितेर सारयुता भक्तिस्वरूपिणी ।।25।।
जीवों पर हरिनाम की कृपा होने से यह कृपा संवित-शक्ति और हादिनी शक्ति के समावेश से भक्ति के रूप में जीव के हृदय में प्रवेश करती है।
भक्ति-क्रिया
आविर्भूत ह’ये नामे प्रस्फुटित करि।
रसेर सामग्री प्रकाशये सर्वेश्वरी ।।26।।
विशुद्ध चिन्मय जीव लभिया स्वरूप।
सेइ रसे प्रवेशय एइ अपरूप ।।27।।
वही सर्वेश्वरी शक्ति अर्थात् भक्ति जीवों के हृदय में आविर्भूत होकर श्रीकृष्ण नाम के रसों की सारी सामग्री को प्रकाशित करती है। जीव भक्ति के प्रभाव से अपने चिन्मय स्वरूप को प्राप्त करता है और फिर उसी शक्ति के द्वारा ही उसमें रस प्रकाशित होता है।
रस के विभाव-आलम्बन
रसेर विभाव सेइ तत्त्व आलम्बन ।
तदाश्रय – भक्त, तद्विषय कृष्णधन ।।28।।
नाम करे अविरत भक्त महाशय।
कृपा करि’ रूप-गुण- लीलार उदय ।।29।।
रस के विभाव आलम्बन में परम धनस्वरूप तो श्रीकृष्ण हैं एवं आश्रय उनके भक्त हैं। जब भक्त सदा ही हरिनाम लेता है तब हरिनाम कृपा करके भक्त के अतःकरण में भगवान के रूप, गुण व लीला को उदित करवाता है।
रस का विभाव उद्दीपन
उद्दीपन कृष्ण-रूप-गुणादिक यत।
आलम्बन, उद्दीपन विभावे संयुत ।।30।।
श्रीकृष्ण के रूप, गुण इत्यादि सभी उद्दीपन हैं। ये आलम्बन व उद्दीपन दोनों विभाव के अन्तर्गत हैं।
विभाव से अनुभाव प्रकट होता है
विभाव सम्पूर्ण हैले अनुभाव हय।
प्रेमेर विकार सब शुद्ध प्रेममय ।।31।।
विभाव सम्पूर्ण होने से अनुभाव होता है। श्रीकृष्ण के शुद्ध-प्रेम के सभी विकार अनुभाव कहलाते हैं। ये सभी विकार विशुद्ध प्रेम से ओत-प्रोत ही होते हैं।
जब संचारी भाव और सात्विक भाव के मिलन में विभाव किया करता है तब स्थायी भाव ही रस होता है
सन्चारी सात्त्विक क्रमे उदित हइले।
स्थायीभाव रस हय सर्वशास्त्र बले ।।32।।
सभी शास्त्रों में कहा गया है कि संचारी भाव व सात्विक भाव के क्रम से उदित होने के बाद जो स्थायी भाव होता है, वही रस कहलाता है।
रस पान का क्रम
सेइ रस सर्वसार सिद्धिसार जानि।
परम पुरुष अर्थ सर्वशास्त्रे मानि ।।33।।
भक्त्युन्मुख जीव शुद्ध गुरुर कृपाय।
श्रीयुगल ब्रह्मनाम सौभाग्येते पाय ।।3 4।।
तुलसीमालाय नाम संख्या करि’ स्मरे।
अथवा कीर्त्तन करे परम आदरे ।।35।।
एक ग्रन्थ संख्या करि’ आरम्भिवे नाम।
क्रम तिन लक्ष स्मरि’ पूरे मनस्काम ।।36।।
संख्या – मध्ये किछु नाम करिवे कीर्त्तन।
ताते सर्वेन्द्रिय – स्फूर्त्ति, आनन्दनर्त्तन ।।37।।
नामे नवविध अंग करय आश्रय।
तथापि कीर्त्तन – स्मृति सर्वश्रेष्ठ हय ।।38।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को कहते हैं कि मैं तो इस दिव्य रस को ही सभी रसों का सार व सभी सिद्धियों का सार समझता हूँ- सभी शास्त्र कहते हैं कि ये रस ही जीवों का परम – पुरुषार्थ है। भक्ति के उन्मुख जीव शुद्ध गुरु की कृपा से श्रीराधा – कृष्ण जी के युगल-मन्त्र को अर्थात् “हरे कृष्ण” महामन्त्र को सौभाग्य से प्राप्त करते हैं तथा परम आदर के साथ तुलसी माला पर संख्या पूर्वक नाम स्मरण कीर्तन आदि करते हैं। एक ग्रन्थि अर्थात् 16 माला (यानि कि लगभग पच्चीस हज़ार हरिनाम) से आरम्भ करके धीरे-धीरे तीन लाख माला का नाम जप करें, इससे आपके मन की इच्छा पूर्ण हो जाएगी।
माला में जो भी निश्चित संख्या रखकर आप हरिनाम करते हैं
उसमें से कुछ नाम आप थोड़ा ज़ोर-ज़ोर से उच्चारण करते हुए करें। इससे आपकी सभी इन्द्रियों में स्फूर्ति होगी तथा आनन्द से नृत्य करने को आपका मन करेगा और तुम नाचोगे। भक्ति के नौ प्रकार के अंग हरिनाम का ही आश्रय करते हैं। फिर भी इनमें कीर्तन और स्मरण सर्वश्रेष्ठ हैं।
अर्चन-मार्ग और श्रवण-कीर्तन के अधिकार भेद से किया में भेद
अर्चनमार्गते गाढ़तर रुचि याँ’र।
प्रवण कीर्त्तन सिद्धि ताहाते ताँहार ।।39।।
नामे ऐकन्तिकी रति हइवे याँहार।
श्रवण – कीर्त्तन – स्मृति केवल ताँहार ।।140।।
अर्चन-मार्ग में जिसकी गाढ़ रुचि है, वह भगवान का अर्चन तो करेगा परन्तु उसे भी भगवान के नाम, रूप, गुण लीला व धामों की महिमा का श्रवण – कीर्तन करना होगा, तब ही उसको अर्चन मार्ग में ही सिद्धि मिलेगी। हरिनाम में जिसकी ऐकान्तिकी प्रीति होगी, वह केवल भगवान की कथा श्रवण, कीर्तन और स्मरण ही करेंगे, अर्चन इत्यादि में उनकी ज्यादा रुचि नहीं होती।
नाम श्रवण, कीर्तन और स्मरण में क्रम
सेवा, नति, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन।
सहजे नामेर संगे हय प्रवर्त्तन ।।41।।
नाम-नामी एक तत्त्व विश्वास करिया।
दश अपराध छाड़ि’ निर्जने बसिया ।।42।।
अति स्वल्प दिने नाम हइया सदय।
श्रीश्यामसुन्दर रूपे हयेन उदय ।।43।।
यबे नाम रूपे ऐक्य हयत साधने।
नाम लैते रूप आइसे चित्ते सर्वक्षणे ।।44।।
तार किछुदिने रूपे गुण करि’ योग।
श्रीनाम – स्मरणे गुन करय सम्भोग ।।45।।
स्वल्पदिने नाम, रूप, गुण एक हय।
नाम लैते सर्वक्षण तिनेर उदय ।।46।।
हरिनाम का जप करने से अपने आप ही बड़ी आसानी से भक्ति के अन्य अंग जैसे सेवा, प्रणाम, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन आदि का पालन हो जाता है। नाम और नामी एक तत्त्व हैं, ऐसा विश्वास करके दस नामापराधों को त्यागकर जो साधक निर्जन स्थान में बैठ कर के भजन करता है, उस पर हरिनाम प्रभु दया परवश होकर अपने श्यामसुन्दर रूप में उसके हृदय में प्रकाशित हो जाते हैं। जब साधना में नाम और रूप एक ही हैं ऐसा अनुभव हो जाता है, तब नाम लेने से ही हर समय भगवान का रूप भी चित्त में आ जाता है। यही नहीं, थोड़े दिन बाद जब भगवान का नाम, भगवान का रूप और भगवान के गुण ये एक ही हैं, ऐसा अनुभव में आ जाता है, तब हरिनाम उच्चारण करने के साथ-साथ भगवान के नाम, रूप व गुणों की दिव्य स्फूर्ति भक्त के चित्त में होने लगती है।
मन्त्र-ध्यानमयी उपासना
मन्त्रध्यानमयी एइ नाम उपासना।
प्राथमिक धारा जानि’ करे विभावना ।।47।।
स्मृतिकाले योगपीठे कल्पद्रुमतले ।
गोप-गोपीवृत कृष्णे देखे कुतूहले ।।48।।
सात्त्विकविकार सब हय प्रस्फुटित।
भजन – आनन्दे भक्त हय पुलकित ।।49।।
क्रमे यबे नाम स्व-सौरभे प्रफुल्लित ।
अष्टकाल कृष्णलीला हइवे उदित ।।50।।
मन्त्र – ध्यानमयी नामक इस हरिनाम की उपासना में साधक प्राथमिक धारा के रूप में हरिनाम का ही विशेष रूप से चिन्तन करता है। स्मरण के समय योगपीठ में कल्पवृक्ष के नीचे ब्रज के गोप एवं गोपियों के बीच में श्रीकृष्ण का कौतूहल पूर्वक दर्शन करता है। तभी उसके शरीर में सारे सात्विक भाव प्रकट होते हैं और वो भक्त भजन के आनन्द से पुलकित हो जाता है। धीरे-धीरे जब हरिनाम अपनी और अधिक सुगन्ध बिखेरता है तो तब भक्त उसमें प्रफुल्लित हो जाता है और तभी अष्टकालीय श्रीकृष्ण लीला उसके चित्त में उदित हो जाती है।
अपने रस की उपासना
स्वारसिकी उपासना हइवे उदय
लीलोचित पीठे कृष्णे दर्शन करय ।।51।।
संगे संगे गुरुकृपा सिद्ध स्वरूपेते।
लीलाय प्रवेशे भक्त सरवीर संगेते ।।52।।
महाभाव – स्वरूपिणी वृषभानुसुता।
ताँ’र अनुगत – भक्ति सदा प्रेमयुता ।।53।।
सखी – आज्ञामते करे युगल – सेवन ।
महाप्रेमे मग्न हय से रसिक जन ।।54।।
साधन – भजन – सिद्धि लागालागि ताय।
लिंगभंगे वस्तुसिद्धि तोमार कृपाय ।।55।।
अपने रस की उपासना जब उदित होगी तब साधक भगवान नन्दनन्दन श्रीकृष्ण के धाम में उनका दर्शन करता है एवं सद्गुरु की कृपा से अपनी सिद्ध देह से सखियों के साथ भगवान की लीला में प्रवेश करता है। महाभावस्वरूपिणी जो राधा जी हैं, उनके अनुगत में सदा सर्वदा भक्ति करता है। उस लीला में वह रसिक-भक्त, श्रीकृष्ण के मधुर रस की जो भक्त हैं- गोपियाँ, उनकी आज्ञानुसार भगवान श्रीराधा – कृष्ण जी के युगल रूप की सेवा करता है और महाप्रेम में मग्न हो जाता है।
हे गौरहरि ! आपकी कृपा से इस साधना में भजन-साधन और भजन की सिद्धि वाली स्थिति काफी नज़दीक हो जाती है अर्थात् दोनों की दूरियाँ काफी कम हो जाती हैं। यहीं नहीं, आपकी कृपा से साधक का सूक्ष्म शरीर का आभास तब खत्म हो जाता है और उसे स्वरूप-सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है।
इससे श्रेष्ठ अवस्था का वर्णन नहीं किया जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है
इहार अधिक आर वाक्य नाहि चले।
तदुत्तर अनुभव लभि कृपाबले ।।56।।
एइ त’ उज्जवल रस परम साधन।
पाइहाते निश्चय मिले कृष्ण प्रेमधन ।।57।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि इससे आगे तो मुझसे बोला नहीं जा रहा है। इससे आगे की स्थिति का तो आपकी कृपा से मैं अनुभव ही कर सकता हूँ। हे गौरहरि ! ये ही सर्वश्रेष्ठ साधना व उज्जवल रस है; इससे अर्थात् शुद्ध हरिनाम की साधना से बिल्कुल निश्चित है-श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति ।
साधना के ग्यारह भाव तथा पांच दशायें
साधिते उज्जवल रस, आछे भाव एकादश,
सम्बन्ध, वयस, नाम, रूप।
यूथ, वेश, आज्ञावास, सेवा, पराकाष्ठाश्वास,
पाल्यदासी एइ अपरूप ।।58।।
एइ एकादश भाव सम्पूर्ण साधने।
पंच दशा लक्ष हय साधक जीवने ।।59।।
श्रवण, वरण आर स्मरण, आपन।
सम्पत्ति-ए पंचविध दशाय गणन ।।60।।
उज्जवल-रस की साधना में ग्यारह प्रकार के भाव होते हैं जो कि बड़े ही चमत्कारिक होते हैं। वे हैं- सम्बन्ध, उम्र, नाम, रूप, यूथ प्रवेश, वेश, आज्ञा, वास स्थान, सेवा, पराकाष्ठा तथा पाल्य दासी भाव।
सम्पूर्ण साधना में तो उपरोक्त ग्यारह भाव होते हैं जबकि भाव की साधना करते समय साधक के जीवन में निम्नलिखित पाँच दशायें उदित होती हैं दशा। श्रवण दशा, वरण दशा, स्मरण दशा, आपन दशा और सम्पत्ति प्रथम श्रवण-दशा निजापेक्षा श्रेष्ठ शुद्ध भावुक ये जन।
प्रथम श्रवण-दशाप्रथम श्रवण-दशा
निजापेक्षा श्रेष्ठ शुद्ध भावुक ये जन।
भावमार्गे गुरुदेव सेइ महाजन ।।61।।
ताँहार श्रीमुखे भावत्तत्त्वेर श्रवण।
हइले श्रवण-दशा हय प्रकटन ।।62।।
भाव-मार्ग में अपने से श्रेष्ठ जो शुद्ध भावुक महापुरुष होता है, वही गुरु कहलाता है। उनके मुख से भाव तत्त्व के बारे में श्रवण करने से श्रवण-दशा की प्राप्ति होती है।
भाव-तत्त्व
भावतत्त्व द्विप्रकार करह विचार।
निज एकादश भाव कृष्णलीला आर ।।63।।
ये भाव-तत्त्व दो प्रकार का होता है। पहला तो अपना सम्बन्ध, उम्र तथा नामादि ग्यारह भाव और दूसरा श्रीकृष्ण की लीला में शान्त – दास्य व सख्यादि जिस भाव की सेवा हमें मिली होती है ये दोनों ही भाव-तत्व हैं।
क्रम से वरण-दशा की प्राप्ति
राधाकृष्ण अष्टकाल येइ लीला करे।
ताहार श्रवणे लोभ हय अतः परे ।।64।।
लोभ हइले गुरुपदे जिज्ञासा उदय।
केमने पाइव लीला कह महाशय ।।65।।
गुरुदेव कृपा करि’ करिवे वर्णन।
लीलातत्त्वे एकादश भावसंघटन ।।66।।
प्रसन्न हइया प्रभु करिवे आदेश।
एइ भावे लीलामध्ये करह प्रवेश ।।67।।
शुद्ध रूपे सिद्ध भाव करिया श्रवण।
सेइ भाव स्वीय चित्ते करिवे वरण ।।68।।
भगवान श्रीराधा-कृष्ण जी जो अष्टकालीय लीला करते हैं, उन दिव्य अष्ट कालीय लीलाओं को श्रवण करके उन लीलाओं के प्रति जब लोभ उत्पन्न होता है तथा लोभ होने के कारण साधक अपने गुरुदेव जी से लीला विषयक जिज्ञासा करता है। साधक अपने गुरुदेव जी से कहता है, हे भक्त-प्रवर गुरुदेव ! आप मुझ पर कृपा करें और मुझे ये बताऐं कि मैं भगवान की लीलाओं का रसास्वादन कैसे कर सकता हूँ।
तब निष्कपट साधक पर कृपा करके उसके गुरुदेव उसकी साधना के अन्तर्गत आये ग्यारह भावों का तथा साध्यावास्था की अष्टकालीन – लीला का परस्पर मिलन करवा देंगे। यही नहीं, इस प्रकार वे अपने उस योग्य शिष्य को भगवान श्रीराधा – श्रीकृष्ण जी की लीला में प्रवेश करने के लिए आदेश दे देंगे।
आगे नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि अपने गुरुदेव जी द्वारा दिये सिद्ध – भाव को शुद्ध रूप से श्रवण करके, उस भाव को अपने चित्त में बिठा लेना।
अपनी रुचि भी गुरुदेव जी को बतानी चाहिए
वरण कालेते निज रुचि विचारिया।
गुरुपदे जानाइवे सरल हइया ।।69।।
प्रभु तुमि कृपा करि’ येइ परिचय।
दिले मोरे, ताहे मोर पूर्ण प्रीति हय ।।70।।
स्वभावतः मोर एइ भावे आछे रुचि।
अतएव आज्ञा शिरे धरि ह’ये शुचि ।।71।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि वरण-काल के समय अर्थात् जब शिष्य को गुरु जी द्वारा ये सिद्ध भाव दिया जा रहा हो, उस समय शिष्य को चाहिए कि भली भाँति विचार करके सरल भाव से अपनी रुचि भी गुरु पादपद्मों में निवेदन करे। शिष्य अपने गुरुदेव जी से कहे कि हे गुरुदेव ! आपने मुझ पर कृपा करके मुझे मेरा जो परिचय दिया है, उसमें मेरी पूरी श्रद्धा व प्रीति है परन्तु स्वाभाविक रूप से मेरी फलां भाव में रुचि है। अतएव, यदि आप उचित समझें तो आप मुझे आज्ञा दें। आपकी आज्ञा ही मुझे शिरोधार्य होगी।
दूसरी रुचि होने से गुरु दूसरा भाव देंगे
रूचि यदि नहे तबे अकपट मने।
निवेदिवे निज – रूचि श्रीगुरुचरणे ।।72।।
विचारिया गुरुदेव दिवे अन्यभाव।
ताहे रूचि हइले प्रकाशिवे निजभाव ।।73।।
वह भाव जो गुरु द्वारा प्रदान किया गया है, यदि उसमें आपकी रुचि नहीं है, तब निष्कपट होकर के अपनी रुचि को गुरु के समीप निवेदन करना चाहिए। गुरुदेव विचार करके हो सकता है कि आपको दूसरा भाव देंगे और उसी भाव में रुचि होने से तब साधक अपने स्वरूप को जल्दी प्राप्त करेगा।
अपना सिद्ध भाव गुरु को बताना चाहिये
एइ रूपे गुरु-शिष्य-संवाद घटने।
निज-सिद्ध भाव स्थिर हइवे ये क्षणे । ।।74।।
शिष्य गुरुपदे पड़ि’ करिवे मिनति ।
मागिवे भावेर सिद्धि करिया काकुति ।।75।।
कृपा करि’ गुरुदेव करिवे आदेश।
शिष्य सेइभावे तबे करिवे प्रवेश ।।76।।
इस प्रकार गुरु-शिष्य-संवाद होने के उपरान्त जब अपना सिद्ध – भाव स्थिर हो जाये, तब शिष्य को चाहिए कि वह अपने गुरुदेव जी के चरणों में पड़ करके बड़ी दीनता के साथ विनती करते हुए उस भाव की सिद्धि को माँगे। गुरुदेव शिष्य का ऐसा शरणागत भाव देखकर कृपा करके आदेश देंगे और तब शिष्य उस आदेश का पालन करते हुए उस भाव में प्रवेश करेगा।
दृढ़ – वरण
श्रीगुरुचरणे पड़ि’ बलिबे तखन।
तवादिष्ट भाव आमि करिनु वरण ।।77।।
ए भाव कखन आमि ना छाड़िव आर।
जीवने मरणे एइ संगी ये आमार ।।78।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि ऐसे समय में अपने सद्गुरु के चरणों में पड़कर शिष्य कहेगा कि हे गुरुदेव ! आपके द्वारा दिये हुए भाव को मैं वरण करता हूँ और अब इस भाव को मैं कभी भी नहीं छोडूंगा। ये भाव जीवन और मरण दोनों समय में ही मेरे साथ रहेगा।
भजन में रुकावट डालने वाले विचार
निज सिद्ध एकादश भावे वती ह’ये।
स्मरिवे सुदृढ़चित्ते निजभावचये ।179।।
स्मरणे विचार एक आछे त’ सुन्दर।
आपनेर योग्यस्मृति कर निरन्तर ।।80।।
आपनेर अयोग्य स्मरण यदि हय।
बहुयुग साधिलेओ सिद्धि कभु नय ।।81।।
अपने सिद्ध ग्यारह भाव में व्रती हो के सुदृढ़-चित्त से अपने भावों को याद करना चाहिये। स्मरण में एक बात बड़ी अच्छी है, वह ये कि साधक अपने गुरु जी के उपदेशानुसार अपनी योग्यता के अनुसार निरन्तर स्मरण कर सकता है। हाँ, यदि कोई साधन अपने गुरु के उपदेशों को छोड़कर अपनी मनघड़न्त रुचि के अनुसार स्मरण करता है तो कई युग साधना करने पर भी उसे सिद्धि नहीं मिलती है।
आपन-दशा
आपनसाधने स्मृति यबे ह’ये व्रती।
अचिरे आपनदशा हय शुद्ध अति ।।82।।
निज शुद्ध भावेर ये निरन्तर स्मृति।
ताहे दूर हय शीघ्र जड़बद्ध मति ।।83।।
अपनी साधना में जब साधक स्मरण में दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाता है तब जल्दी ही साधक आपन दशा को प्राप्त कर लेता है। अर्थात् साधक को अपने शुद्ध-भाव में जब नित्य-स्मृति होती चली जाती है, तब शीघ्र ही साधक की दुनियावी चीजों में जो बद्धमति है, वह दूर हो जाती है और उसे अपने गुरुदेव जी द्वारा बताये भावों का अनुभव होने लगता है।
बद्ध-जीव जिस क्रम से भाव प्राप्त करते हैं
जड़बद्ध जीव भूलि’ निज सिद्ध सत्त्व ।
जड़ – अभिमाने हय जड़देहे मत्त ।।84।।
तबे यदि कृष्णलीला करिया श्रवण ।
लोभ हय पाइवारे निज सिद्धधन ।।85।।
तबे भावतत्त्व स्मृति अनुक्षण करे।
भाव यत बाड़े, ता’र भ्रान्ति तत हरे ।।86।।
दुनियावी – भावों से ग्रसित बद्ध जीव अपने सिद्ध स्वरूप को भूलकर दुनियावी – अभिमान के द्वारा अपने इस जड़ीय शरीर में ही मत्त रहता है। ऐसे समय में श्रीकृष्ण लीला श्रवण करके उसके चित्त में अपना नित्य सिद्ध-धन (कृष्ण-प्रेम) पाने का लोभ जागृत होता है। इसी लोभ में वह हमेशा भाव तत्व का स्मरण करता है। साधक द्वारा भावों का स्मरण जितना बढ़ता है, संसार के भोगों के प्रति व संसार के स्वरूप के प्रति उसकी भ्रान्तियां दूर होती चली जाती हैं।
स्मरण दशा
स्मरण द्विविध – वैध, रागानुग आर।
रागानुगा स्मृति युक्तिशास्त्र हैते पार ।।87।।
माधुर्य आकृष्ट हये करये स्मरण।
अचिराते प्राप्त हय दशा भावापन ।।88।।
हमारे शास्त्रों के अनुसार स्मरण भी दो प्रकार का होता है- विधि मार्ग का श्रीकृष्ण लीला स्मरण तथा रागानुग पद्धति से श्रीकृष्ण जी की लीलाओं का स्मरण। जिस भी विधि से स्मरण हो, जब ये श्रीकृष्ण-स्मरण हमारे चित्त को बरबस श्रीकृष्ण की ओर आकर्षित करता है तो जल्दी ही साधक को भाव दशा की प्राप्ति होती है।
विधि-मार्ग में भक्त की उन्नति के क्रम
वैधभक्त स्मृतिकाले सदा विचारय।
अनुकूल युक्तिशास्त्र यखन ये हय ।।89।।
भावापने हय भाव – आविर्भावकाल ।
शास्त्रयुक्ति छाड़े तबे जानिया जन्जाल ।।90।।
श्रद्धा निष्ठा रुच्यासक्ति क्रमे येइ भाव।
आपन समये ताहा हय आविर्भाव ।।91।।
भावापने रागानुगा, वैधभक्त – भेद ।
नाहि थाके कोन मते गाय स्मृति, वेद ।।92।।
विधि-मार्ग के जो भक्त हैं, स्मरण के समय शास्त्रों की अनुकूल – युक्तियों का विचार करते हैं परन्तु जब भाव का आविर्भाव होता है तो वह शास्त्र – युक्तियों को झंझट समझकर छोड़ देते है। श्रद्धा, रुचि, आसक्ति आदि के क्रम से जो भाव हैं, ये सभी धीरे-धीरे साधक के जीवन में क्रमानुसार आने लगते हैं।
स्मृति ओर वेदों के मत के अनुसार आपन-दशा में रागानुगा – भक्त और विधि मार्ग पर चलने वाले भक्त में कोई भेद नहीं होता है।
पांच प्रकार के स्मरण
स्मरण, धारणा, ध्यान, अनुस्मृति आर।
समाधि ए पन्चविध स्मरण- प्रकार ।।93।।
सम्वरण, धारणा, ध्यान, अनुस्मृति और समाधि इस प्रकार स्मरण पाँच प्रकार के हैं।
भावापन्न दशा के उदय का समय
समाधि – स्वरूप – स्मृति ये समये हय।
भावापन – दशा आसि’ हइवे उदय ।।94।।
जब समाधि में स्वरूप – स्मृति होती है, तब साधक के अन्दर भाव की वह स्थिति पूरी तरह प्रकट होती है जो उसके सद्गुरु ने उसे बतायी थी।
आपन-भाव की दशा में जैसी अवस्था होती है
सेइ काले निज सिद्धदेह – अभिमान ।
पराजिया जड़देह ह ‘वे अधिष्ठान ।।95।।
तवन स्वरूपे व्रजवास क्षणे क्षण।
भावापने स्व – स्वरूपे हेरि व्रजवन ।।96।।
उस समय अपने सिद्ध देह के अभिमान में स्थित होने के कारण जड़-देह का झूठा अभिमान स्वयं ही नष्ट हो जाता है। तब वह साधक अपने
सिद्ध-स्वरूप में सदा ही ब्रजवास करता है तथा इस दशा में अपने स्वरूप के द्वारा वह भाग्यवान साधक वृन्दावन का दर्शन करता रहता है।
आपन-अवस्था में स्वरूप सिद्धि होती है
आपने स्वरूपसिद्धि लभे भाग्यवान्।
लिंगभंगे वस्तुसिद्धि सम्पत्ति विधान ।।97।।
आपन – अवस्था में भाग्यवान् व्यक्ति भजन करते-करते स्वरूप – सिद्धि को प्राप्त करता है। इस अवस्था में सबसे बड़ा कार्य ये होता है कि भगवान की इच्छा से उसकी सूक्ष्म-देह नष्ट हो जाती है।
साधन-सिद्धि का फल
हड्या साधनसिद्धा नित्यासिद्धा सह।
समता लभिया कृष्ण-सेवे अहरहः ।।98।।
इसी अवस्था में साधन सिद्ध होकर गुरुकृपा प्राप्त वह साधक नित्य सिद्ध – भक्तों के साथ समता प्राप्त करके निरन्तर श्रीकृष्ण की सेवा करता रहता है।
नाम द्वारा सिद्धि लाभ
सेवाभंग आर तार कभु नाहि हय।
परम उज्जवल रसे सतत मातय ।।99।।
नाम से परमधन नामेर आश्रये।
एत सिद्धि पाय जीव शुद्ध सत्त्व ह’ये ।।100।।
सिद्धावस्था में उसकी सेवा कभी भी नहीं छूटती, वह तो हर समय भगवान श्रीकृष्ण के परम उज्जवल रस से मतवाला बना रहता है। उस अवस्था में उसे इस बात का स्पष्ट अनुभव होता है कि श्रीहरिनाम ही परम धन है तथा इस हरिनाम के आश्रय में ही जीव को इस शुद्ध सत्त्व स्थिति की व इस रसमयी भूमिका की सिद्धि प्राप्त होती है।
संक्षेप में क्रम-परिचय
अतएव भक्त्युन्मुखजन साधुसंगे।
निर्जने करिवे नाम क्रमेर अभंगे ।। 101।।
क्रमे क्रमे अल्पकाले सर्वसिद्धि हय।
कुसंग वर्जिया साधुसंगे फलोदय ।।102।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि भक्ति – उन्मुख व्यक्ति को चाहिए कि वह साधु-संग में क्रम को तोड़े बगैर एकान्त में निष्कपट भाव से हरिनाम करता रहे। ऐसा करने से धीरे धीरे थोड़े ही समय में उसे सर्वसिद्धि की प्राप्ति हो जायेगी। हाँ, कुसंग को छोड़ कर साधु संग में रहने से ही ये सब फल प्राप्त होता है।
नाम का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिये तीन उपाय
साधुसंग, सुनिर्जन, निजदृढ़भाव ।
एइ तिन बले लभि महिमा स्वभाव ।।103।।
आमि हीन क्षुद्रमति विषये विभोर ।
साधुसंग – विवर्जित सदा आत्मचोर ।।104।।
अहैतुकी कृपा कभु करिया विस्तार।
भक्तिरसे गति देह प्रार्थना आमार ।।105।।
एत बलि’ हरिदास प्रेमे अचेतन।
श्रीगौरांग – पदे करे देह समर्पण ।।106।।
प्रेमे गद्गद प्रभु ताँहारे उठाय।
आलिंगन दिया चित्तकथा बले ताय ।।107।।
साधु-संग, सु-निर्जन स्थान तथा अपना दृढ़ भाव- इन तीनों के प्रभाव से साधक सिद्धि को प्राप्त कर सकता है। नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी अपनी स्वाभाविक दीनता के साथ कहते हैं कि हे गौरांग महाप्रभु जी! मेरी प्रार्थना है कि मैं तो दीन-हीन हूँ, मेरी तो समझ भी कम है,
क्या बताऊँ मेरा मन तो हमेशा ही सांसारिक विषयों में रमा रहता है, हे गौरहरि! मैं साधु-संग से रहित हूँ और श्रीकृष्ण का भजन नहीं करने के कारण आत्मचोर हूँ, आप अपनी अहैतुकी कृपा मुझ पर करें ताकि भक्ति रस में मेरी मति हो जाये, इतनी कृपा तो अवश्य करो।
इतना कहने के साथ ही हरिदास जी प्रेम से मूर्छित हो गए और उन्होंने अपनी देह महाप्रभु जी के चरण कमलों में समर्पित कर दी। महाप्रभु जी ने भी प्रेम से गद्गद् होकर उनको उठाया और उनका गाढ़ आलिंगन किया एवं अपने दिल की बातें उनसे कहने लगे।
महाप्रभु जी की आज्ञा
शुन हरिदास, एइ लीला संगोपने।
विश्व अन्धकार करिवेक दुष्ट जने ।।108।।
सेइ काले तोमार ए चरमोपदेश।
अवशिष्ट साधुजने बुझिवे विशेष ।।109।।
एइ तत्त्व नामाश्रये निष्किन्चन जन।
निर्जने बसिया कृष्ण करिवे भजन ।।110।।
निज निज भाग्यबले जीव पाय भक्ति ।
भक्ति लभिवारे सकलेर नाहि शक्ति ।।111।।
सुकृतिजनेर भक्ति दृढ़ करिवारे।
आइलाम युगधर्म नामेर प्रचारे ।।112।।
श्रीमन् महाप्रभु जी बोले- हे हरिदास ! मेरी लीला के संगोपन के बाद जिस समय दुष्ट – प्रकृति के लोग विश्व को अन्धकार से भर देंगे, उस समय आपके ये श्रेष्ठ उपदेश उस समय के साधु लोगों को रास्ता दिखायेंगे। नामाश्रय करके निष्किंचन-व्यक्ति इस तत्त्व के द्वारा एकान्त में बैठकर श्रीकृष्ण का भजन करेंगे। अपने अपने भाग्य के बल से जीव भक्ति को प्राप्त करता है, भगवान की भक्ति को प्राप्त करने की शक्ति सबकी नहीं है। सुकृतिवान व्यक्तियों की भक्ति में दृढ़ता हो, इसके लिए मैं युगधर्म – नाम संकीर्तन का प्रचार करने के लिए इस धरातल पर आया हूँ।
हरिदास ठाकुर का नाम प्रचार में सहयोग
तुमि त’ सहाय मोर ए कार्य साधने।
तव मुखे नामतत्त्व शुनि ए कारणे ।।113।।
हरिनाम चिन्तामणि, अखिल अमृत-खानि,
कृष्णकृपा-बले ये पाइल।
कृतार्थ से महाशय, सदा पूर्णानन्दमय,
रागभावे श्रीकृष्ण भजिल ।।।14।।
ताँहार चरण धरि, सदाइ काकुति करि,
काँदे एइ अकिन्चन छार।
ए अमृतरस – लेश, पियाइया अवशेष,
कर सार आनन्द विस्तार ।।115।।
भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी को कहते हैं कि आप मेरे इस नाम प्रचार रूपी कार्य के सहयोगी हो इसीलिये मैंने आपके मुख से नाम-तत्त्व का श्रवण किया है।
भगवान भगवान श्रीकृष्ण की कृपा के बल से तमाम अमृत की स्वान स्वरूप इस ‘हरिनाम चिन्तामणि’ को जिसने प्राप्त किया है, वह महापुरुष ही कृतार्थ है तथा वह ही सदा पूर्णानन्द में मग्न होकर राग मार्ग से श्रीकृष्ण का भजन करता है। अन्त में दीनता के मूल स्रोत व दीनता के शिक्षक श्रीचैतन्य महाप्रभु जी कहते हैं कि हे हरिदास ! आप मुझ जैसे दीन-हीन, अकिंचन को श्रीहरिनाम रूपी इस अमृत रस की कुछ बूँदें पिला कर के मेरे आनन्द की वृद्धि करो।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ भजनप्रणाली – प्रदर्शनं नाम पन्चदशः परिच्छेदः ।
समाप्तश्चायं ग्रन्थः ।
श्री हरिदास ठाकुर प्रतिदिन ३ लाख हरे कृष्ण महामंत्र का जाप किया करते थे