तेरहवाँ परिच्छेद
श्रुतेऽपि नाममाहात्म्ये यः प्रीतिरहितोऽधमः।
अहंममादिपरमो नाग्नि सोऽप्यपराधकृत्।।
अर्थात् हरिनाम की महिमा सुनते हुए भी या दीक्षित होते हुए भी अधिकांश विषयी लोग इस नाशवान शरीर में “मैं और मेरेपन” की बुद्धि बनाये रखते है, जो कि गलत है व ऐसी बुद्धि भक्ति-पथ से भ्रष्ट कर देती है तथा यह नामापराधों में से एक नामापराध भी है।
गदाइ गौरांग जय जाहवा–जीवन।
सीताद्वैत जय जय गौरभक्तगण ।।1।।
प्रेमे गद गद हरिदास महाशय।
शेष नाम–अपराध प्रभु पदे कय ।।२।।
शुन प्रभु एइ अपराध सर्वाधम।
एइ दोषे नामप्रेम ना हय उद्गम ।।३।।
श्रीगदाधर पंडित जी की जय हो, श्रीगौरांग महाप्रभु जी की जय हो, सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी की जय हो तथा महाप्रभु जी के जितने भी भक्त हैं, सभी की जय हो–जय हो।
श्रीहरिदास ठाकुर महाशय जी भगवद्–प्रेम में गद्गद् होकर श्रीमन् महाप्रभु जी के श्रीचरणों में अन्तिम नामापराध निवेदन करते हैं। वे कहते हैं— हे प्रभु! इस अपराध के बारे में सुनें, ये अपराध सबसे निकृष्ट है। इस अपराध के कारण भी साधक के हृदय में भगवद्–प्रेम उदित नहीं होता।
हरिनाम में शरणागति की आवश्यकता
अन्य नय अपराध करिया वर्जन।
नामेते शरणापन्न हइवे सज्जन ।।४।।
षड्विध शरणागति सर्वशास्त्रे कय।
विस्तारित बलिते आमार साध्य नय ।।५।।
ठाकुर श्रीहरिदास जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्तियों को चाहिए कि वे पहले वर्णन किये नौ अपराधों को छोड़कर श्रीहरिनाम में शरणागत हों। हे गौरहरि! हमारे शास्त्रों में 6 प्रकार की शरणागति के बारे में कहा गया है। हे प्रभो! मेरी तो सामर्थ्य नहीं जो मैं विस्तृत भाव से शरणागति के बारे में वर्णन कर सकूँ, तब भी आपकी प्रसन्नता के लिए संक्षेप में कहना चाहूँगा।
शरणागति के प्रकार
संक्षेपे चरणे तब करि निवेदन।
आनुकूल्ये संकल्प, प्रातिकूल्य–विसर्जन ।।६।।
कृष्णे रक्षाकारी बुद्धि, पालक–भावन।
निजे दीनबुद्धि, आर आत्मनिवेदन ।।७।।
ए जीवन ना रहिले ना हय भजन।
जीवनरक्षाय मात्र विषय ग्रहण ।।८।।
भक्ति अनुकूल ये विषय अनुक्षण।
ताहे रोचमान वृत्त्ये जीवन यापन ।।९।।
भक्ति–प्रतिकूल ये विषय यबे हय।
ताहाते अरुचि, ताहा वर्जिवे निश्चय ।।१०।।
कृष्ण बिना रक्षाकर्त्ता नाहि केह आर।
कृष्ण से पालक मात्र जानिवे आमार ।।११।।
आमि दीन अकिंचन सकलेर छार।
अधम दुर्गत किछु नाहिक आमार ।।१२।।
कृष्णेर संसारे आमि आछि चिर–दास।
कृष्ण–इच्छामत क्रिया आमार प्रयास ।।१३ ।।
पहली व दूसरी शरणागति है कि संसार में रहने के लिए जो विषय भगवान की प्रसन्नता के व भगवान की भक्ति के अनुकूल हों, उन्हें ग्रहण करना तथा जो विषय भगवान की भक्ति के प्रतिकूल हों, उन्हें छोड़ देना। भगवान श्रीकृष्ण ही मेरे रक्षाकर्त्ता हैं— प्रकार की सोच रखना। भगवान श्रीकृष्ण मेरे पालनकर्त्ता हैं— इस प्रकार की भावना रखना, अपने अन्दर हमेशा दीनता का भाव बनाये रखना तथा अपना सब कुछ भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में निवेदन कर देना ही शरणागति के बाकी चार लक्षण हैं। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि दुनियाँ में वस्त्र, भोजन व दवाई इत्यादि इस भावना से स्वीकार करना कि ये सभी तो इस शरीर की रक्षा के लिए ज़रूरी हैं, क्योंकि जब मैं ज़िन्दा ही नहीं रहूँगा तो मुझसे भजन भी न हो पाएगा। अपने जीवन की गाड़ी को चलाने के लिए केवल उन्हीं भक्ति के अनुकूल विषयों को ग्रहण करो जो श्रीकृष्ण को भाते हों। भक्ति के प्रतिकूल विषय जब आपके सामने आयें तो उनके प्रति अरुचि दिखाते हुए अवश्य ही उन्हें त्याग देना। इस बात को अपने दिल में बिठा लेना कि श्रीकृष्ण के बिना मेरा और कोई रक्षाकर्त्ता व पालनकर्त्ता नहीं है। हृदय में हर समय दीनता के ऐसे भाव रहने चाहिएँ कि मैं तो सबसे निकृष्ट हूँ, अधम हूँ, मुझमें कोई भी गुण नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण के संसार में मैं उनका नित्य दास हूँ, उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करना ही मेरा प्रयास है।
आमि कर्त्ता, आमि दाता, आमि पालयिता।
आमार ए देह–गेह, सन्तान, वनिता ।।१४।।
आमि विप्र, आमि शूद्र, आमि पिता, पति।
आमि राजा, आमि प्रजा, सन्तानेर गति ।।१५।।
ए सब बुद्धि छाड़ि’ कृष्णे करि मति।
कृष्ण कर्त्ता, कृष्ण–इच्छामात्र बलवती ।।१६।।
शरणागति का और लक्षण है कि मैं कर्त्ता हूँ, मैं दाता हूँ, मैं ही अपने परिवार का पालन करने वाला हूँ, ये मकान, ये शरीर, ये सन्तान तथा ये स्त्री— ये सब मेरे हैं। मैं ब्राह्मण हूँ या मैं शूद्र हूँ, मैं इसका पिता या इसका पति हूँ, मैं राजा हूँ या मैं प्रजा हूँ। अपनी सन्तानों का सब कुछ मैं ही तो हूँ……
इत्यादि, इस प्रकार की बुद्धि को छोड़कर अपने ध्यान को, अपनी बुद्धि को, अपनी मति को श्रीकृष्ण में लगाए रखना। इस प्रकार की भावना मन में रखना कि श्रीकृष्ण ही सबके मालिक हैं, वास्तविक कर्त्ता तो वे ही हैं, उनकी इच्छा ही बलवान है।
कृष्णेर ये हय इच्छा, ताहाइ करिव।
निज इच्छा अनुसारे किछु ना चिन्तिव ।।१७।।
कृष्ण इच्छामते हय आमार संसार।
कृष्ण इच्छामते आमि हइ भवपार ।।१८।।
दुःखे थाकि, सुखे थाकि, आमि कृष्णदास।
कृष्णेच्छाय सर्वजीवे दयार प्रकाश ।।१९ ।।
मम भोग कर्मभोग कृष्ण–इच्छामत।
आमार वैराग्य कृष्ण–इच्छा–अनुगत ।।२०।।
ठाकुर हरिदास जी कहते हैं कि इस प्रकार भावना बनाकर रखना कि मैं अपने जीवन में केवल वही कार्य करूँगा जो श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुकूल हों, अपनी इच्छा के अनुसार तो मैं कुछ सोचूँगा भी नहीं। श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार ही मेरा जीवन व मेरा परिवार चलेगा और उनकी इच्छा के अनुसार ही मैं इस भवसागर से पार होऊँगा। चाहे मैं दुःख में रहूँ या सुख में रहूँ लेकिन मैं हमेशा ही श्रीकृष्ण का दासत्व करता रहूँगा। श्रीकृष्ण अपनी इच्छानुसार जगत् के सभी जीवों पर अपनी दया बिखेरते हैं। मेरी सुख–सुविधाएँ व मेरे कर्म–भोग सब श्रीकृष्ण की इच्छा से ही होने हैं, यहाँ तक कि मेरा वैराग्य भी श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुसार होगा।
शरणागति होने से ही आत्मनिवेदन होता है
सरल भावेते यबे एइ भाव हय।
आत्मनिवेदन ता’रे बलि महाशय ।।२१।।
सरल भाव से जब उपरोक्त शरणागति के भाव किसी के हृदय में होते हैं, तब उसे आत्मनिवेदन कहा जाता है।
शरणागति के बिना हरिनाम करते हुए जो होता है
षड् विध शरणागति नाहिक याहार।
से अधम अहंमम–बुद्धि दोषे छार ।।२२।।
से बले आमि त’ कर्त्ता संसार आमार।
निजकर्म–फलभोग सुख–दुःख आर ।।२३ ।।
आमार रक्षक आमि, आमि त’ पालक।
आमार वनिता, भ्राता, बालिका, बालक ।।२४।।
आमि त’ अर्जन करि, आमार चेष्टाय।
सर्वकार्य सिद्ध हय, सर्व शोभा पाय ।।२५।।
अंहमम बुद्धिक्रमे बहिर्मुख जन।
निजज्ञान–बले बहु करये मानन ।।२६।।
सेइ ज्ञानबले शिल्प–विज्ञान विस्तारे।
ईश्वरेर ईशिता ना माने दुष्टाचारे ।।२७।।
श्रीनाम–माहात्म्य शुनि’ विश्वास ना करे।
लोकव्यवहारे कभु कृष्णनामोच्चारे ।।२८।।
कृष्णनाम करे, तबु नाहि पाय प्रीति।
धर्मध्वजी शठ–जन–जीवने ए रीति ।।२९।।
हेलाय उच्चारे नाम, किछु पुण्य हय।
प्रीतिफल नाहि फले, सर्वशास्त्र कय ।।३०।।
छः प्रकार की शरणागति जिसमें नहीं होती, वह तो अधम है। ‘मैं’, ‘मेरा’ के दोष में ही उस बेचारे की बुद्धि उलझी होती है। ऐसी अवस्था में वह अपने-आप को कर्त्ता मानता हुआ कहता है कि ये संसार मेरा है। कर्मों के दुःख हों या सुख ये सब मेरे ही भोग हैं। मैं अपना रक्षक व पालक हूँ, ये मेरी पत्नी, मेरा भाई, मेरी लड़की व मेरे लड़के हैं। मैं रुपया कमाता हूँ, मेरी कोशिशों से ही ये अच्छे–अच्छे सब काम हो रहे रहे हैं। ठाकुर श्रीहरिदास जी कहते हैं कि भगवान के विमुख व्यक्ति की शरीर में ‘मैं’ तथा शरीर से सम्बंधित व्यक्ति व वस्तुओं में ‘मेरी’ बुद्धि होने से वह अपने दिमाग को बड़ा समझता है। वह सोचता है कि मेरे दिमाग के कारण ही दुनियाँ में शिल्प कला व विज्ञान आदि इतनी उन्नति कर रहे हैं। इसी अभिमान में वह दुष्ट व्यक्ति भगवान की शक्तियों को भी स्वीकार नहीं करता। हरिनाम की महिमा सुनते हुए भी वह उसमें विश्वास नहीं करता। हाँ, लोकाचार की दृष्टि से वह कभी–कभी देखा–देखी कृष्ण नाम का भी उच्चारण कर लेता है। अक्सर धर्मध्वजी, दुष्ट प्रकृति के लोग ऐसा करते हैं। श्रीकृष्ण–नाम उच्चारण करते हुए भी उनकी श्रीकृष्ण–नाम में प्रीति नहीं होती। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि ‘हेला’ से हरिनाम का उच्चारण करने से अर्थात् अनायास ही मुख से श्रीकृष्ण नाम निकल जाय तो उसे कुछ–न–कुछ पुण्य अवश्य मिलता है परन्तु भगवद्–प्रेम नहीं मिलता।
इसका मूल कारण क्या है
मायाबद्ध हैते एइ अपराध हय।
इहाते निष्कृतिलाभ कठिन निश्चय ।।३१।।
शुद्ध भक्तिफले याँ’र विरक्ति हइल।
संसार छाड़िया सेइ नामाश्रय निल ।।३२।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हरिनाम की महिमा सुनते हुए भी हरिनाम में विश्वास न होना व हरिनाम की महिमा सुनते हुए भी नाशवान शरीर में ‘मैं’ और ‘मेरे पन’ को बुद्धि में बनाये रखना रूप जो दसवाँ नामापराध है, ऐसा अपराध माया में फँसे होने के कारण ही होता है।
इस दोष को त्यागने का उपाय
निष्किंचनभावे भजे श्रीकृष्ण–चरण।
विषय छाड़िया करे नामसंकीर्त्तन ।।३३ ।।
सेइ साधुजने अन्वेषिया ताँर संग।।
करिबे सेविबे छाड़ि’ ता’र विषयतरंग ।।३४।।
क्रमे क्रमे नामे मति हइबे सञ्चार।
अहंता-ममता या’बे माया ह’बे पार ।।३५।।
नामेर माहात्म्य शुनि अहंमम भाव।
छाड़िआ शरणागति भक्तेर स्वभाव ।।३६।।
नामेर शरणागत येइ महाजन।
कृष्णनाम करे, पाय प्रेम-महाधन ।।३७।।
अतः हमें एक ऐसे निष्किंचन भक्त की खोज करनी होगी जिसके अन्दर दुनियाँ के भोगों की ज़रा सी भी कामना न हो तथा जो हर समय विषय भोगों को छोड़कर नाम-संकीर्तन करता रहता हो। ऐसा निष्किंचन भक्त जब मिल जाये तब साधक को उसकी संगति में रहना होगा तथा अपनी विषय-भावनाओं को छोड़कर उसकी सेवा करनी होगी। ऐसा करने से धीरे-धीरे साधक के अन्दर हरिनाम में रुचि होने वाले भावों का संचार होगा तथा मैं-मेरेपन को छोड़कर वह माया से पार हो जाएगा। हरिनाम की महिमा को सुनकर “मैं” और “मेरा” के भावों को छोड़कर हरिनाम के शरणागत होना ही भक्त का स्वभाव है। जो भक्त हरिनाम के शरणागत रहकर श्रीकृष्णनाम करते हैं, वे श्रीकृष्ण-प्रेम रूपी महाधन को प्राप्त कर लेते हैं।
दस-अपराध से रहित व्यक्ति के लक्षण
अतएव साधुनिन्दा यतने छाड़िया।
परतत्त्व विष्णु शुद्ध मनेते जानिया ।।३८।।
नामगुरु नामशास्त्र सर्वोत्तम जानि।
विशुद्ध चिन्मय नाम हृदयेते मानि ।।३९।।
पापस्पृहा पापबीज त्यजिया यतने।
प्रचारिया शुद्ध नाम श्रद्धालु जने ।।४०।।
अन्य शुभकर्म हैते लइया विराम।
स्मरे ये शरणागत अप्रमादे नाम ।।४१।।
अतएव, बड़े यत्न के साथ साधु-निन्दा को छोड़कर, शुद्ध-मन से भगवान के श्रेष्ठत्त्व को समझे। हृदय से ये माने कि भगवान विष्णु ही परम तत्त्व हैं। जो हरिनाम के गुरु हैं, जो हरिनाम की महिमा बखान करने वाले शास्त्र हैं, उन्हें सर्वोत्तम समझे तथा भगवान के ये नाम विशुद्ध हैं व चिन्मय हैं, इसे हृदय से माने। साधकों को चाहिए कि वे पापों की लालसा व पापों के कारण को यत्न के साथ छोड़ें तथा जो श्रद्धालु लोग हैं, उनके पास जाकर शुद्ध-हरिनाम का प्रचार करें। शरणागत-भक्त के अलावा सभी शुभ-कर्मों से अपने-आप को हटाकर तथा प्रमाद को छोड़कर हर समय भगवान का स्मरण रहे।
अपराध रहित हरिनाम करने से थोड़े दिनों में ही भावों का उदय हो जाता है
सेइ धन्य त्रिजगते, सेइ भाग्यवान्।
कृष्ण-कृपा-योग्य सेइ, गुणेर निदान ।।४२।।
अति अल्पदिने ताँ’र श्रीनामग्रहणे।
भावोदय हय आर पाय प्रेमधने ।।४३ ।।
नामाचार्य हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि भगवान के शरणागत होकर जो हर समय हरिनाम करता रहता है, इस सारे त्रिभुवन में वह ही धन्य है तथा ऐसा हरिनाम करने वाला ही भाग्यवान है। सचमुच ऐसे व्यक्ति को ही गुणों की खान कहा जाएगा तथा ऐसा व्यक्ति ही श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त करने के योग्य है। हरिनाम करते-करते ऐसे साधक के हृदय में थोड़े दिनों में ही भगवान के भाव उदित होने लगते हैं तथा उसके कुछ समय बाद उसे श्रीकृष्ण-प्रेम की प्राप्ति हो जाती है।
उन्नति का क्रम
एवम्भूत जनेर साधनदशा-प्राय।
अति स्वल्पदिने याय कृष्णेर इच्छाय ।।४४।।
भावदशा हैते हैते प्रेमदशा हय।
प्रेमदशा सर्वसिद्धि, सर्वशास्त्रे कय ।।४५।।
तुमि बलियाछ, नाम येइ महाजन।
लइबे निरपराधे, पावे प्रेमधन ।।४६।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि शरणागत-भाव से निरन्तर हरिनाम करने वाले साधक अक्सर थोड़े दिनों के बाद ही भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से भाव की स्थिति से भगवद्-प्रेम की स्थिति में पहुँच जाते हैं। तमाम शास्त्रों के अनुसार भगवद्-प्रेम की स्थिति को प्राप्त करना ही सर्वसिद्धि है।
हे प्रभु! आपने ही तो कहा था कि जो भक्त अपराध रहित होकर हरिनाम करेगा, वही प्रेम-धन को प्राप्त करेगा।
व्यतिरेक भाव से इसकी चिन्ता
अपराध नाहि छाड़ि नाम यदि लय।
सहस्त्रसाधने ता’र भक्ति नाहि हय ।।४७।।
ज्ञाने मुक्ति’ कर्मे भुक्ति’ ज्ञानी कर्मी जने।
सुदुर्लभा कृष्णभक्ति निर्मल साधने ।।४८।।
भुक्तिमुक्ति शुक्तिसम, भक्ति-मुक्ताफल।
जीवेर महिमा-भक्तिप्राप्ति-सुनिर्मल ।।४९।।
साधने नैपुण्य-योगे अत्यल्प साधने।
भक्तिलता प्रेमफल देन भक्तजने ।।५० ।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपराधों को न छोड़कर, हरिनाम करता भी है तो कड़ी मेहनत करने पर भी वह भगवान की प्रेम-भक्ति को प्राप्त नहीं कर पाता है। ज्ञानी को ज्ञान से मुक्ति एवं कर्मी को कर्मों से भोगों की प्राप्ति तो हो जाती है, परन्तु सुदुर्लभा-भक्ति केवल शुद्ध-साधुओं के आनुगत्य में निर्मल भाव से रह करके हरिनाम की साधना करने से ही प्राप्त होती है, जो कि जीवों का परम लक्ष्य है। शुद्ध-भक्ति की तुलना में मुक्ति और भोग नगण्य हैं। साधन की निपुणता के द्वारा अति ही अल्प-समय में एवं अति ही अल्प-साधना द्वारा भक्ति-लता, भक्तों को प्रेम-फल देती है।
हरिभजन में निपुणता
दश अपराध छाड़ि नामेर ग्रहण।
इहाइ नैपुण्य हय साधन भजन ।।५१।।
दसों अपराधों को छोड़कर हरिनाम करना ही भजन-साधना में निपुणता है।
नाम-अपराध का गुरुत्व
अतएव भक्तिलाभे यदि लोभ हय।
दश अपराध छाड़ि’ करि नामाश्रय ।।५२।।
एक एक अपराध सतर्क हइया।
यतनेते छाड़ि’ चित्ते विलाप करिया ।।५३ ।।
नामेर चरणे करि दृढ़ निवेदन।
नामकृपा ह’ले अपराध विध्वंसन ।।५४।।
अन्य शुभकर्मे नाम अपराध क्षय।
कोन प्रायश्चित-योगे कभु नाहि हय ।।५५।।
यदि किसी को भक्ति प्राप्त करने का लोभ है तो उसको दस प्रकार के नामापराधों को यत्नपूर्वक छोड़ करके हरिनाम करना चाहिये। एक-एक अपराध से सतर्क रह करके, चित्त में विलाप करते हुए, यत्न से इनका त्याग करना चाहिये। हरिनाम प्रभु के चरणों में निवेदन करना चाहिये कि आप कृपा करके मेरे सभी अपराधों को ध्वंस कर दो क्योंकि हरिनाम प्रभु की कृपा होने से ही ये अपराध खत्म होंगे। नाम-प्रभु की कृपा के बिना अन्य किसी भी प्रकार के प्रायश्चित से अपराध क्षय नहीं हो सकते।
नाम-अपराधों को त्यागने का उपाय
अविश्रान्त नामे नाम-अपराध याय।
ताहे अपराध कभु स्थान नाहि पाय ।।५६।।
दिवारात्र नाम लय अनुताप करे।
तबे अपराध याय नामफल धरे ।।५७।।
अपराध गते शुद्ध नामेर उदय।
शुद्धनाम भावमय आर प्रेममय ।।५८।।
दश अपराध येन हृदये ना पशे।
कृपा कर महाप्रभु, मजि नामरसे ।।५९।।
ए भक्तिविनोद हरिदास-कृपाबले।
हरिनामचिन्तामणि गाय कुतूहले ।।६०।।
भोजन व विश्राम आदि आवश्यक दैहिक कार्यों को छोड़कर बाकी किसी भी काम में समय को व्यर्थ न गँवाकर हरिनाम करते रहने से तथा भोजन आदि के समय में भी हरिनाम का भजन करते रहने से सारे नामापराध चले जाते हैं क्योंकि निरन्तर हरिनाम करते रहने से अपराध करने का अवसर ही नहीं रहता। यदि कभी अपराध हो भी जाये तो रात-दिन नाम लेते हुए पश्चात्ताप् करना चाहिये, जिससे अपराध नष्ट हो जाते हैं और हरिनाम का मुख्य-फल मिलता है। अपराध नष्ट होने से ही शुद्ध-नाम उदित होता है। जो कि भावमय और प्रेममय होता है।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी बड़ी दीनता के साथ भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के चरणों में प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे महाप्रभु! मुझ पर ऐसी कृपा करो, जैसे मैं सदा-सर्वदा इन सभी अपराधों से बचकर शुद्ध नाम के रस में ही मग्न रहूँ।
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि मैं नामाचार्य श्री हरिदास ठाकुर की कृपा से ही कौतूहल पूर्वक ‘हरिनाम चिन्तामणि’ का गान करता हूँ।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ अहंममभावपराध-विचारो नाम त्रयोदशः परिच्छेद