तबे त’ करिला प्रभु दक्षिण गमन।
कूर्मक्षेत्रे कैल वासुदेव विमोचन॥
(चै.च.म. 1/102)
[अर्थात् तब महाप्रभु जी दक्षिण को चले गये और कूर्मक्षेत्र में जाकर उन्होंने वासुदेव का उद्धार किया।]
श्रीश्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद जी ने ‘कूर्मक्षेत्र’ या कूर्म स्थान के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है: –
“गन्जाम ज़िले में बी. एन्. आर. लाइन पर चिकाकोल रोड’ स्टेशन से आठ मील पूर्व की ओर कूर्माचलम् या श्रीकूर्मम् है। यह तेलगु वासियों का सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है। वहीं पर कूर्ममूर्ति विराजमान है। ग्यारहवीं शताब्दी में जब श्रीरामानुज, श्रीजगन्नाथ जी द्वारा कूर्माचल में फेंके गये थे तब उन्होंने कुर्ममुर्ति के सामने, उसे शिवमूर्ति समझकर उपवास किया था। किन्तु बाद में जब उन्हें मालूम पड़ा कि यह विष्णु मूर्ति है, तो उन्होंने वहाँ कूर्मदेव की सेवा को प्रकाशित किया। गन्जाम ज़िला उड़ीसा के अन्तर्गत है।”
अब इस स्टेशन का नाम चिकाकोल रोड के स्थान पर श्रीकाकुलाम रोड हो गया है। यह आन्ध्रप्रदेश के अन्तर्गत है। इसके अतिरिक्त बी. एन्. आर. के स्थान पर अब उसका दक्षिण-पूर्वी रेलवे (South Eastern Railway) नाम हो गया है।
श्रीवासुदेव विप्र दक्षिण के रहने वाले थे। आप महाप्रभु जी के परम भक्त थे। भक्त चरित्र अतीव दुर्ज्ञेय है। अत्यन्त दीन हीन भाव से रहने के कारण भक्तों का चरित्र समझना साधारण लोगों के लिये बहुत ही कठिन है। महाप्रभु जी ने ही वासुदेव विप्र की महिमा को उजागर किया। दक्षिण-भारत भ्रमण के समय महाप्रभु जी ने ‘कूर्म’ नामक विप्र को कृतार्थ किया। महाप्रभु ‘कूर्म’ विप्र के घर पर है, यह जानकर सर्वांगों से गलित कुष्ठ युक्त वासुदेव विप्र उनके दर्शनों के लिये अत्यन्त व्याकुलता के साथ वहाँ पर आये। किन्तु कूर्म विप्र से यह सुनकर कि महाप्रभु जी यहाँ से चले गये हैं अतीव दुःख से मूर्च्छित हो गये तथा भूमि पर गिर पड़े। भक्त वत्सल परमकरुणामय-भक्तार्तिहर-सर्वान्तर्यामी महाप्रभु जी तब तक काफी दूर चले गये थे परन्तु वहाँ से वापस आकर उन्होंने भक्त वासुदेव विप्र को दर्शन दिये तथा उसका आलिंगन किया। महाप्रभु जी के स्पर्श मात्र से विप्र की कुष्ठ व्याधि दूर हो गई और उनका शरीर परमसुन्दर सुपुरुष की तरह हो गया। भगवान् सर्वत्र ही विराजित हैं, उनके लिये व्याकुलता रहने से ही उन्हें देखा जा सकता है। भगवान् केवल मात्र भक्ति द्वारा वशीभूत होते हैं। जागतिक किसी भी योग्यता या गुणों को वे नहीं देखते। उन्होंने वासुदेव विप्र की भीषण गलित कुष्ठ व्याधि की ओर ध्यान नहीं दिया बल्कि अपना परम प्रिय समझकर उनका आलिंगन किया। वासुदेव विप्र का अद्भुत चरित्र है। उनका सारा शरीर कोढ़ से गला हुआ था। उनके सारे शरीर में कीड़े ही कीड़े भरे पड़े थे जोकि उनके शरीर का माँस खाते रहते थे। माँस खाते-खाते यदि कोई कीड़ा नीचे गिर जाता तो गिरे हुये कीड़े को वे दुबारा उठाकर उसी स्थान पर रख देते। कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी लिखते हैं: –
‘वासुदेव’-नाम एक द्विज महाशय।
सर्वाङ्गे गलित कुष्ठ, ताते कीड़ामय॥
अङ्ग हैते जेइ कीड़ा खसिया पड़य।
उठाञा सेइ कीड़ा राखे सेइ ठाञ॥ 1
(चै.च.म. 7/136-137)
वासुदेव विप्र महाप्रभु जी की असीम दया को देखकर आश्चर्यान्वित हो गये और भागवत का एक श्लोक उच्चारण करके उन्होंने महाप्रभु जी का स्तव किया: –
‘क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः।
ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥2
(भा. 10/81/16)
जीव में ऐसे गुण होना कभी भी सम्भव नहीं है। दुर्गन्ध के कारण जिसे देखकर लोग दूर से ही भाग जाते हैं, किन्तु स्वतन्त्र ईश्वर महाप्रभु जी ने कृपाविष्ट होकर उन्हें केवल स्पर्श ही नहीं बल्कि आलिंगन भी किया।3
सुन्दर शरीर की प्राप्ति होने पर वासुदेव विप्र इस आशंका से भयभीत हो गये कि कहीं यह शरीर का अभिमान उनके पतन का कारण न बन जाये। कारण, अभिमानी व्यक्ति कृष्ण कीर्त्तन के लिये अनाधिकारी है। महाप्रभु जी ने वासुदेव विप्र को श्रेष्ठ अधिकारी समझकर उसे जीवोद्धार करने के लिये आचार्य का कार्य करने का आदेश दिया –
प्रभु कहे,-“कभु तोमार ना हबे अभिमान।
निरन्तर कर तुमि ‘कृष्ण’ ‘कृष्ण’ नाम॥
कृष्ण उपदेशि’ कर जीवेर निस्तार।
अचिराते कृष्ण तोमा करिवेन अङ्गीकार॥
(चै.च.म. 7/147)
[अर्थात् महाप्रभु जी ने कहा कि आपको कभी भी अभिमान नहीं होगा। निरन्तर आप कृष्ण-कृष्ण गाते रहो। कृष्ण का उपदेश करते हुये लोगों का उद्धार करो। जल्दी ही श्रीकृष्ण आपको अंगीकार कर लेंगे।]
1 अर्थात् वासुदेव नामक एक द्विज महाशय थे जिनके सारे शरीर में गलित कुष्ठ (कोढ़) हो गया था, जिसके कारण सारा शरीर कीड़ों से भर गया था। किसी अंग से कोई कीड़ा यदि नीचे गिर जाता तो वे उसे उठाकर पुनः उसी स्थान पर रख देते थे।
2 सुदामा विप्र ने कहा कि कहाँ तो मैं अतिपापिष्ठ, दरिद्र, विप्राधम और कहाँ वे लक्ष्मी के एकमात्र आश्रय-भगवान् श्रीकृष्ण। अयोग्य ब्राह्मण सन्तान जानकर भी आज उन्होंने मुझे आलिंगन किया-कितने आश्चर्य की बात है।
3 वैष्णव का शरीर कभी भी प्राकृत नहीं होता, वह हमेशा ही अप्राकृत है व परम पवित्र है। महाप्रभु जी अपूर्व भक्त-वात्सल्य, हरिदास ठाकुर जी के माध्यम् से श्रीचैतन्य चरितामृत की आदि लीला के चौथे परिच्छेद में निम्न प्रकार से वर्णित है:-
हरिदास कहे,-तुमि ईश्वर दयामय।
तोमार गम्भीर हदय बुझन ना जाय॥
वासुदेव-गलत्कुष्ठी, ताते अङ्ग-कीड़ामय।
तारे आलिङ्गन कैला हैञा सदय॥
आलिङ्गिया कैला तार कन्दर्प-सम अङ्ग।
बुझिते न पारि तोमार कृपार तरङ्ग॥
प्रभु कहे,-‘वैष्णव-देह ‘प्राकृत’ कभु नय।
‘अप्राकृत’ देह भक्तेर ‘चिदानन्दमय’॥
(चै.च.अ. 4/188-191)
[अर्थात् हरिदास ठाकुर जी कहते हैं -हे प्रभु! आप दयामय हैं। आपके गम्भीर हृदय को समझा नहीं जा सकता। वासुदेव विप्र को गलित कुष्ठ था, उसका सारा शरीर कीड़ों से भरा पड़ा था, उसको भी आपने दया करके आलिगंन किया था और आलिंगन करके उसके सारे अंगों को कामदेव की तरह सुन्दर बना दिया था। अतः हे प्रभु! आपकी कृपा तंरग को मैं नहीं समझ सकता। महाप्रभु जी कहते हैं कि वैष्णव का शरीर कभी भी प्राकृत नहीं होता। भक्त का शरीर अप्राकृत व चिदानन्दमय होता है। बाहिर्मुख व्यक्ति वैष्णवों के अंगों की बाहरी विकृति देखकर वन्चित रह जाते हैं। वे उनके अप्राकृत चिन्मय स्वरूप को नहीं देख पाते।
स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से