भट्टाचार्यः सार्वभौमः पुरासीद्गीष्पतिर्दिवि ॥
– गौ. ग. 119
देवलोक में जो पहले वृहस्पति जी थे, वही इस समय गौरलीला में श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जी के रूप में आये हैं। श्रीचैतन्य चरितामृत की आदि लीला के दसवें परिच्छेद में श्रीलकृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीस्वरूप दामोदर इत्यादि श्रीगौरांग महाप्रभु के प्रधान पार्षदों का नाम उल्लेख करने के बाद जब नीलाचल में आये हुये गौड़देशवासी भक्तों के नामों का उल्लेख किया तो उस समय श्रीवासुदेव सार्वभौम को ‘सार्वभौम भट्टाचार्य’ लिखा है –
बड़ शाखा एक, सार्वभौम भट्टाचार्य ।
ताँर भग्नी पति श्रीगोपीनाथ आचार्य॥
चै.च.आ. 10/130
इस पयार के अनुभाष्य में श्रीलभक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने लिखा है –
‘इनका नाम श्रीवासुदेव था। ये वर्तमान नवद्वीप या चाँपाहाटी से 2 1/2 मील दूर विद्यानगर नामक मुहल्ले में रहने वाले महेश्वर विशारद के पुत्र थे। कहा गया है कि इन्होंने उस समय के मिथिला के विख्यात न्याय विद्यालय के प्रधान-अध्यापक एवं भारत के सर्वप्रधान न्यायशास्त्रवेत्ता पक्षधर मिश्र से सारे न्यायशास्त्र को कंठस्थ कर लिया था। यही नहीं, इन्होंने थोड़े ही दिनों में नवद्वीप में न्याय के विद्यालय की स्थापना करके वहां पढ़ाना शुरु कर दिया था। न्यायशास्त्र के इतिहास में ये एक क्रान्ति ले आये थे।
जो भी हो, सार्वभौम जी ने न्याय और वेदान्तशास्त्र में अगाध पाण्डित्य प्राप्त कर लिया था। गृहस्थ आश्रम में रहते हुये भी ये क्षेत्र सन्यास लेकर नीलाचल में वेदान्त पढ़ाते थे। महाप्रभु को शंकराचार्य भाष्य अनुमोदित वेदान्त सुना कर बाद में महाप्रभु द्वारा बताये जाने पर ये वेदान्त के वास्तविक अर्थ से अवगत हुये।
श्रीवासुदेव सार्वभौम राढ़ीय श्रेणी के उत्तम ब्राह्मण कुल में आये थे। श्री गौड़ीय वैष्णव अभिधान में इस प्रकार लिखा है कि श्रीसार्वभौम 14वीं शकाब्द के प्रथम भाग में आविर्भूत हुये थे। श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान को पढ़ने से ऐसा ज्ञात होता है कि मिथिला के पण्डित लोग अपने देश के गौरव को बनाये रखने के लिये न्यायशास्त्र के छात्रों को पढ़ाने के बावजूद भी उन्हें ग्रन्थलिपि नहीं देते थे। इसलिये उन दिनों बंगाल में न्याय का अध्ययन और अध्यापन बन्द था। किन्तु अद्भुत शक्ति सम्पन्न श्रीवासुदेय सार्वभौम भट्टाचार्य ने न्याय के सारे ग्रन्थ को कण्ठस्थ कर लिया और अपने घर वापस आकर दुबारा उसी प्रकार के ग्रन्थ के रूप में पूरा का पूरा ग्रन्थ लिख डाला। किन्तु श्री दिनेश चन्द्र भट्टाचार्य का मत अलग है। उनके मत में श्रीवासुदेव सार्वभौम ने अपने पिता विशारद से ही न्यायशास्त्र पढ़ा था। वे इसके लिए मिथिला नहीं गये। श्रीवासुदेव सार्वभौम के अद्भुत पाण्डित्य की बात सुनकर उड़ीसा के महाराज प्रताप रुद्रदेव ज बड़े सम्मान के साथ उन्हें नवद्वीप से पुरी लाये थे और उन्होंने उन्हें अपनी सभा का सभापण्डित बनाया था।
अपनी योग्यता के बल पर अद्भुत पाण्डित्य प्राप्त करने के कारण गृहस्थ होते हुये भी ये मायावादी- सन्यासियों के गुरु थे। श्रीमन्महाप्रभु की मायावाद – उद्धारलीला की पुष्टि के लिये ही देवगुरु वृहस्पति श्रीवासुदेव सार्वभौम रूप प्रकट हुए थे। इसलिये यदि सार्वभौम अद्वितीय पण्डित हैं तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? शुद्ध भक्ति सिद्धान्त के अन्तर्गत श्रीचैतन्य महाप्रभु एवं सारे वैष्णवाचार्यो ने भगवान, भगवान का भजन करने वाले और भजन – तीनों का नित्यत्व स्वीकार किया है। जहां पर इन तीनों की नित्यता को स्वीकार नहीं किया गया है वहां पर भक्ति नित्य नहीं है। वह शुद्ध भक्ति-सिद्धान्त सम्मत नहीं हो सकती। शुद्धभक्ति सिद्धान्त में उपास्य भगवान के नित्यस्वरूप एवं उनके नाम,रूप, गुण लीला का नित्यत्व भी स्वीकार हुआ है। मायावादी ज्ञानी – सम्प्रदाय के आचार्यों ने भगवान के नित्य चिन्मयस्वरूप एवं उनके नाम-रूप – गुण लीला आदि के नित्यत्व और चिन्मयता को स्वीकार नहीं किया है। वे इन सबको मायिक समझते हैं। ‘माया’ रूपी ‘वाद’ की अवतारणा करने के कारण उन्हें मायावादी कहा जाता है। वे इस प्रकार से कहते हैं कि निम्न स्तर के साधकों के हित के लिये ही ब्रह्म के रूप की कल्पना की गयी है। उनके विचार में निराकार, निर्विशेष, निःशक्तिक ब्रह्म ही चरम तत्व है। एक ब्रह्म को छोड़ और कुछ भी नहीं है एवं जीव ही ब्रह्म है। मायावादी लोगों का विचार है कि ब्रह्म में लीन होने की अवस्था को प्राप्त करने के लिये ही निम्नस्तर के व्यक्तियों को भक्ति का पथ स्वीकार करना पड़ता है। चरम अवस्था में भक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है। इस प्रकार के विचार पन्चम पुरुषार्थ- भगवत्प्रेम की प्राप्ति में बहुत बड़ी बाधा हैं। इसलिये श्रीमन्मध्वाचार्य, श्रीरामानुज आचार्य, श्रीविष्णुस्वामी व श्रीनिम्बार्काचार्य – चारों वैष्णव आचार्यों ने एवं अन्त में स्वयं भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु ने शंकराचार्य के विवर्तवाद विचार-मायावाद विचारों का खण्डन किया। श्रीकृष्ण द्वैपायन वेद् व्यास मुनि का शक्ति-परिणामवाद विचार, वैष्णवों एवं नित्य मंगल चाहने वालों के लिए ग्रहण करने योग्य है। महावदान्य श्रीचैतन्य महाप्रभु बिना ऊँच-नीच के भेदभाव के, सभी को उन्नत -उज्जवल रस – मधुर रस के अन्तर्गत कृष्ण सेवा प्रदान करने के लिये ही धन्य कलियुग में अवतीर्ण हुये हैं जो कि किसी युग में भी दिया नहीं गया। श्रीमन्महाप्रभु ने उसी सर्वोत्तम प्रेम को बिना योग्यता – अयोग्यता देखे सब को दिया। भगवान की प्राप्ति की बाधास्वरूप तमाम सांसारिक वासनाओं का नाश कर प्रत्येक जीव के हृदय में भगवत् प्रेम की प्रतिष्ठा के लिए श्रीचैतन्य महाप्रभु इच्छा और शक्ति लेकर आविर्भूत हुये थे।
मायावाद विचार, भगवत् प्रेम प्राप्ति में बहुत बड़ी रुकावट है। महाप्रभु ने मायावादी श्रीवासुदेव सार्वभौम का भी उद्धार किया। किस प्रकार उद्धार किया, उसे व्यासाभिन्न विग्रह श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने श्रीचैतन्य भागवत में एवं श्रीलकृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में सुन्दर रूपसे वर्णन किया है। श्री चैतन्यभागवत और श्री चैतन्य चरितामृत में वर्णित इस विषय का संक्षिप्त सार नीचे दिया जा रहा है:-
24 साल की आयु में, माघ मास के शुक्ल पक्ष की शुभ घड़ी में महाप्रभु ने श्रीकेशव भारती से सन्यास लिया। श्रीकेशव भारती से सन्यास लेने के पश्चात् श्रीमन्महाप्रभु जब शान्तिपुर से पुरुषोत्तम धाम की ओर गये तो जब वे जगन्नाथ पुरी के पास आठारनाला पहुंचे तो उन्होंने वहां से जगन्नाथ मन्दिर के शिखर पर श्रीकृष्ण के दर्शन किये। श्रीकृष्ण के दर्शन करते ही महाप्रभु प्रेम में विह्वल हो गये। ऐसी अवस्था में जब महाप्रभु जगन्नाथ के मन्दिर में श्री जगन्नाथ जी को आलिंगन करने के लिये दौड़े तो मूर्च्छित होकर गिर पड़े। श्रीमन्दिर के सेवक महाप्रभु को मन्दिर के अन्दर पड़ा देख उन्हें मारने के लिए उनकी ओर दौड़े तो श्रीवासुदेव सार्वभौम ने उनको रोका। श्रीवासुदेव सार्वभौम श्रीमन्महाप्रभु के अपूर्व रूप और प्रेम विकार के दर्शन कर विस्मित् हो गये वे समझ गये कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। श्रीवासुदेव सार्वभौम शिष्यों की सहायता से महाप्रभु को बेहोश अवस्था में ही अपने घर ले आये तथा उन्हें होश में लाने के लिए प्रयत्न करने लगे। तमाम प्रयत्नों के बाद भी होश न आने पर श्रीसार्वभौम बड़े चिन्तित हो गये। चिन्तित होकर उन्होंने महाप्रभु के नाक के आगे रुई रखी। रुई के थोड़ा हिलने पर श्रीसार्वभौम की जान में जान आयी । उन्हें विश्वास हो गया कि महाप्रभु जीवित हैं।
श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुन्द दत्त महाप्रभु के पीछे-पीछे चलते हुये श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर के सिंहद्वार पर पहुंचे। वहां लोगों से मालूम पड़ा कि महाप्रभु को बेहोशी की अवस्था मे ही श्रीवासुदेव सार्वभौम के घर ले जाया गया है। वहां श्रीसार्वभौम के बहनोई गोपीनाथ आचार्य के साथ उनकी भेंट हुई। मुकुन्द से महाप्रभु द्वारा सन्यास लेकर नीलाचल में आने और श्रीवासुदेव सार्वभौम के घर जाने की बात सुनकर गोपीनाथ आचार्य हर्षान्वित हो उठे और सब को लेकर श्रीसार्वभौम के घर आ पहुंचे। श्रीसार्वभौम के घर महाप्रभु को देखकर सभी भक्तों को बड़ा आनन्द हुआ। भक्तों के उच्च संकीर्तन को सुनकर महाप्रभु उठ खड़े हुए। महाप्रभु के द्वारा भेजे जाने पर सभी भक्त जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने स्नेह परवश हो महाप्रभु को अकेले जगन्नाथ के दर्शनों के लिये जाने का निषेध किया। उन्होंने महाप्रभु को, नित्यानन्द प्रभु को, एवं महाप्रभु के साथी भक्तों को दोपहर के भोजन के लिए निमन्त्रण दिया और समुद्र में स्नान करके आने के लिये कहा।
महाप्रभु जब भक्तों के साथ समुद्र में स्नान करके वापस आये तो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने विचित्र महाप्रसाद के द्वारा सभी को परितृप्ति के साथ भोजन करवाया। श्रीमन्महाप्रभु का पिछला परिचय मालूम होने पर श्रीवासुदेव सार्वभौम बड़े प्रसन्न हुये क्योंकि श्रीमन्महाप्रभु के नाना श्री नीलाम्बर चक्रवर्ती के साथ श्रीवासुदेव सार्वभौम के पिता श्री महेश्वर विशारद की विशेष मित्रता थी। आयु में श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की अपेक्षा बहुत बड़े थे। वे स्नेह में भर कर बोले – ‘तुम्हारा कृष्णचैतन्य नाम सर्वोत्तम है, किन्तु तुमने जो भारती सम्प्रदाय से संन्यास लिया है, वह मध्यम सम्प्रदाय है। मैं तुम्हें उत्तम सम्प्रदाय का बना दूंगा। ये सुनकर गोपीनाथ आचार्य आदि भक्त बड़े दुःखी हुये। श्रीगोपीनाथ आचार्य ने सीधा-सीधा प्रतिवाद भी किया कि – श्रीमन्महाप्रभु स्वयं भगवान हैं, उन्हें सम्प्रदाय की अपेक्षा नहीं है। श्रीगोपीनाथ आचार्य के साथ श्रीवासुदेव सार्वभौम एवं उनके शिष्यों का उपरोक्त विषय पर बड़ा तर्क- वितर्क हुआ जिसे श्रीलकृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की मध्यलीला के छटे परिच्छेद में विस्तृत रूप से वर्णन किया है। श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीगोपीनाथ आचार्य को वासुदेव श्रीसार्वभौम से तर्क करने को मना किया। उन्होंने भक्तों को समझाया कि श्रीसार्वभौम स्नेहपरवश हो मेरे हित के लिये ही उपदेश कर रहे हैं। इसमें आप लोगों को क्या आपत्ति है? स्वयं सम्मान की इच्छा कर दूसरों को मान देने के स्वभाव वाले महाप्रभु ने श्रीवासुदेव सार्वभौम का उपदेश सुनने की इच्छा व्यक्त की। श्रीवासुदेव सार्वभौम ने उन्हें कहा कि तुम्हें अपने परम सुन्दर शरीर, नवीन यौवन व सन्यास धर्म की रक्षा के लिये वेदान्त सुनना होगा।
वेदान्त सुनने से तुममें वैराग्य उत्पन्न होगा। श्रीवासुदेव सार्वभौम ने महाप्रभु को सात दिन वेदान्त सुनाया। वेदान्त कठिन ग्रन्थ है, वेदान्त का अर्थ समझ मे न आने पर दुबारा पूछना पड़ता है – श्रीवासुदेव सार्वभौम द्वारा महाप्रभु के प्रति ऐसा कहने पर महाप्रभु ने कहा – ‘आपने मुझे सुनने के लिये कहा, समझ में न आने पर पूछने के लिये नहीं कहा। वेदान्त सूत्रों को समझने में मुझे कष्ट नहीं होता क्योंकि वेदान्त सूत्रों का अर्थ सूर्य की तरह स्वतः सिद्ध रूप से प्रकाशित है। किन्तु आपकी व्याख्या मैं समझ नहीं सका। मुझे ऐसा लगा कि जैसे आकाश में बादल सूर्य को ढक लेते हैं, उसी प्रकार आपकी व्याख्या वेदान्त सूत्रों के स्वतः सिद्ध अर्थों को ढक रही है। महाप्रभु की इस प्रकार की बात सुनकर श्रीवासुदेव सार्वभौम ने इसे अपना अपमान समझा एवं क्षुब्ध हो उठे। श्रीवासुदेव के साथ महाप्रभु का ‘ब्रह्म’ शब्द पर विचार-विमर्श हुआ। श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीवासुदेव सार्वभौम की निर्विशेष मत की व्याख्या का खण्डन किया तथा ब्रह्म के सविशेषत्व को स्थापन किया।
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूत गुणो हरि:॥
– महाप्रभु ने भागवत के इस श्लोक की व्याख्या सुनने की इच्छा की तो वासुदेव सार्वभौम ने इस श्लोक की नौ प्रकार से व्याख्या की। श्रीमन्महाप्रभु ने उस नौ प्रकार की व्याख्या को स्पर्श न कर अठारह प्रकार की व्याख्या की। श्रीमन्महाप्रभु के अलौकिक पाण्डित्य को देखकर श्रीवासुदेव सार्वभौम अत्यन्त विस्मित् और हक्के-बक्के रह गये। अब उन्हें महाप्रभु का ईश्वरत्त्व अनुभव होने लगा। वे अपनी धृष्टता के लिये पश्चाताप करने लगे, महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़े। महाप्रभु ने उन्हें अपनी षड़भुज मूर्ति (पहले चतुर्भुज, बाद में श्यामवंशीधारी द्विभुज रूप) दिखाया।
सार्वभौम प्रति आगे करि’ परिहास।
शेषे सार्वभौमेर षड़भुज प्रकाश॥
चै.भा.आ. 1/159
अपूर्व षड़भुजमूर्ति कोटि सूर्यमय।
देखि’ मूर्च्छा गेला सार्वभौम महाशय॥
चै.भा.अ. 3/107
षड़भुज मूर्ति का दर्शन करके श्रीवासुदेव सार्वभौम ने महाप्रभु की कृपा से एक सौ श्लोकों से महाप्रभु की स्तुति की। उन सौ श्लोकों में से दो श्लोक उन्होंने ताल पत्र में लिख कर जगदानन्द पण्डित के माध्यम से महाप्रभु के पास भेजे। जगदानन्द पण्डित ने उन दो श्लोकों को पहले बाहर दीवार पर लिख लिया फिर अन्दर जाकर वह तालपत्र महाप्रभु के करकमलों में सौंपा। महाप्रभु ने दोनों श्लोकों को पढ़ा और फिर फाड़कर फेंक दिया। किन्तु भक्तों ने दीवार से देखकर दोनों श्लोकों को कण्ठस्थ कर लिया।
वैराग्यविद्या-निजभक्तियोग-शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः
श्रीकृष्णचैतन्य – शरीरधारी कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये॥
अर्थात् वैराग्य का विधान (सन्यासी के आचरण) एवं अपने (श्रीकृष्ण विषयक) भक्तियोग की शिक्षा देने के निमित्त जो करुणासिन्धु एक (अद्वितीय) पुराण – पुरुष (आदि पुरुष – सर्वकारण- कारण) श्रीकृष्ण चैतन्यरूप से अवतीर्ण हुए हैं, मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूं।
कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः प्रादुष्कर्त्तु कृष्णचैतन्यनामा।
आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं लीयतां चित्तभृंगः॥
काल प्रभाव से प्रायः विनष्ट हुआ अपना भक्ति-योग पुनः प्रचार करने के लिये श्रीकृष्णचैतन्य नाम से जो अवतीर्ण हुए हैं, उनके चरण-कमलों में मेरा मन-मधुकर अति गाढ़ रूप से आसक्त हो।
अभी भी श्रीजगन्नाथ मन्दिर में श्रीमन्महाप्रभु की षड़भुजमूर्ति पूजित हो रही है। एक दिन महाप्रभु अरुणोदय के समय श्रीजगन्नाथ का महाप्रसाद लेकर श्रीवासुदेव सार्वभौम के पास गये। वहां जाकर उन्होंने वह प्रसाद श्रीवासुदेव सार्वभौम को दिया। श्रीवासुदेव सार्वभौम ने स्नान व आन्हिक किये बगैर, यहां तक कि दांत साफ किये बिना ही उसे मुंह में डाल लिया और ग्रहण कर गये।
शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूरदेशतः।
प्राप्तिमात्रेण भोक्तव्यं नात्र कालविचारणा॥
श्रीवासुदेव सार्वभौम भट्टाचार्य ने पद्मपुराण के उपरोक्त श्लोक का उच्चारण करते करते परमानन्द के साथ महाप्रसाद ग्रहण किया था। श्रीवासुदेव सार्वभौम का महाप्रसाद में विश्वास हो गया है, यह देख कर महाप्रभु आनन्द से नृत्य करते हुये बोले :-
आजि मुञि अनायासे जिनिलु त्रिभुवन।
आजि मुञि करिनु वैकुण्ठे आरोहण॥
आजि मोर पूर्ण हैल सर्व अभिलाष।
सार्वभौमिक हैल महाप्रसादे विश्वास॥
चै.च.म. 6/230-231
अर्थात् : आज मैंने त्रिभुवन पर विजय प्राप्त कर ली है तथा वैकुण्ठ लाभ कर लिया है। आज मेरी समस्त अभिलाषाएं पूर्ण हो गई हैं। क्योंकि सार्वभौम की महाप्रसाद में निष्ठा और विश्वास उत्पन्न हुआ है। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने जब श्रेष्ठ व्यक्ति के साधनांग के बारे में जानने की इच्छा की तो महाप्रभु ने वृहन्नारदीय पुराण का हरेर्नाम हरेर्नाम….. श्लोक उच्चारण कर ‘नामसंकीर्तन’ करने के लिए उपदेश दिया।
श्रीमन्महाप्रभु की कृपा से श्रीसार्वभौम के चित्त में ऐसा परिवर्तन हुआ कि उन्होंने भागवत के ‘तत्तेऽनुकम्पा सुसमीक्ष्यमानो….’ इस श्लोक के अन्तिम अंश में ‘मुक्तिपद’ के स्थान पर ‘भक्तिपद’ कह कर महाप्रभु को सुनाया। श्लोक सुनकर महाप्रभु ने कहा कि श्रीमद्भागवत के शब्द को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है, कारण, मुक्तिपद’ शब्द कृष्ण को ही समझाता है। इस पर श्रीवासुदेव सार्वभौम ने कहा कि ये ठीक है कि ‘मुक्तिपद’ शब्द कृष्ण का ही वाचक है किन्तु आश्लिष्य दोष के कारण ‘मुक्तिपद’ शब्द का प्रयोग करने की रुचि नहीं होती। सच पूछो तो ‘भक्तिपद” बोलने से मुझे बहुत सुख मिलता है। श्रीवासुदेव के मायावाद से छुटकारे की बात सुनकर नीलाचल वासी सभी विद्वान महाप्रभु के शरणागत हो गये। श्रीमन्महाप्रभु माघमास में सन्यास ग्रहण कर फाल्गुन मास में नीलाचल आये और चैत्रमास में सार्वभौम भट्टाचार्य जी का उद्धार कर, वैशाख मास में दक्षिण की यात्रा पर चले गये। श्रीनित्यानन्द प्रभु जी ने महाप्रभु जी के साथ सेवक रूप से कृष्णदास विप्र को भेजा। दक्षिण यात्रा के समय कौपीन बहिर्वास अर्पण करते हुये वासुदेव सार्वभौम जी ने महाप्रभु से विशेष रूप से अनुरोध किया कि वे गोदावरी के तट पर रामानन्द से जरूर मिलें। श्रीवासुदेव ने श्रीरायरामानन्द से भक्ति रस की बात सुनकर मजाक उड़ाया था। किन्तु अब वह महाप्रभु की कृपा जी से समझ पाये कि श्रीरायरामानन्द कितने उच्च कोटि के भक्त हैं। महाप्रभु के प्रति सार्वभौम जी के वचन इस प्रकार थे :-
रामानन्द राय’ आछे गोदावरी तीरे।
अधिकारी हयेन तिंहो – विद्यानगरे।
शूद्र विषयी – ज्ञाने ताँरे उपेक्षा ना करिवे।
आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिवे।
तोमार संगेर योग्य तिंहो एकजन।
पृथिवीते रसिकभक्त नाहि ताँर सम।
पाण्डित्य आर भक्तिरस, दुँहेर तिँहो सीमा।
सम्भाषिले जानिवे तुमि ताँहार महिमा।
अलौकिक वाक्यचेष्टा तांर ना बुझिया।
परिहास करियाछि ताँरे ‘वैष्णव’ जानिया।
तोमार प्रसादे एबे जानिल तांर तत्त्व।
सम्भाषिले जानिवे तांर येमन महत्त्व।
-चै.च.म. 7 /63-67
अर्थात् : ‘गोदावरी के किनारे श्रीरायरामानन्द रहते हैं और विद्यानगर में वे राजप्रतिनिधि हैं। उन्हें शूद्र एवं राजभोगादि विषयों में लिप्त जानकर उनकी उपेक्षा नहीं करियेगा। मेरे वचन मानकर उनसे अवश्य मिलियेगा। आपके संग करने योग्य वही एक जन है। उसके समान पृथ्वी पर रसिक भक्त और नहीं है। पण्डित्य तथा भक्तिरस – दोनों में वह पूर्ण है। मिलने पर एवं वार्तालाप करने पर उनकी महिमा को आप स्वयं ही जान लेंगे। मैं श्रीरायरामानन्द के अलौकिक वचनों को न समझकर उनकी ‘वैष्णव’ कहकर हंसी उड़ाया करता था। अब मैं आपकी कृपा से उनके तत्त्व को जान सका हूं। आप उनके साथ वार्तालाप करने से उसके महत्व को जान जायेंगे।
जब महाप्रभु दक्षिण-यात्रा पर थे, उस समय महाराज प्रतापरुद्र ने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य से महाप्रभु के तत्व और उनकी महिमा के सम्बन्ध में बहुत कुछ श्रवण किया था। महाराज प्रतापरुद्र जब महाप्रभु के दर्शनों के लिये व्याकुल हो उठे तो श्रीसा्वभोम भट्टाचार्य ने उन्हें समझाते हुये कि महाप्रभु विरक्त संन्यासी हैं, वे राजदर्शन नहीं करते। दक्षिण भारत से वापस आने के बाद जैसे भी हो सकेगा मैं उनके साथ तुम्हें मिलाने की व्यवस्था कर दूंगा।
महाराज प्रतापरुद्र के साथ परामर्श करने के पश्चात् श्रीवासुदेव ने पक्का कर लिया कि श्रीकाशीमिश्र का भवन ही महाप्रभु के ठहरने के उपयुक्त होगा।
दक्षिण भारत की यात्रा से वापस आने के पश्चात् श्रीवासुदेव सार्वभौम के द्वारा की गयी व्यवस्था के अनुसार महाप्रभु श्रीकाशीमिश्र के भवन में ठहर गये। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने श्रीक्षेत्रवासी वैष्णवों का महाप्रभु से परिचय करवा दिया।
श्रीईश्वरपुरीपाद के पूर्व निर्देशानुसार श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर पण्डित ईश्वर पुरी के अप्रकट होने के बाद ही महाप्रभु की सेवा के लिये उनके पास पुरी में आ पहुंचे। गोविन्द के लौकिक परिचय से परिचित होने के पश्चात् श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने महाप्रभु से प्रश्न किया था कि ईश्वर पुरीपाद ने शूद्र जाति के व्यक्ति को सेवक क्यों रखा? उसके उत्तर में महाप्रभु ने कहा कि ईश्वर परम स्वतन्त्र हैं, ईश्वर की कृपा जाति व कुल आदि का विचार नहीं करती, मर्यादा से स्नेह-सेवा कोटिगुणा श्रेष्ठ है। विदुर के घर श्रीकृष्ण ने परमानन्द से भोजन किया था, गुरुर सेवक हुन मान्य आपनार अर्थात गुरु का सेवक पूजनीय होता है, उससे अपनी सेवा करवाना उचित नहीं है, फिर गुरु ने जो आज्ञा की है उसका उल्लंघन भी नहीं किया जा सकता, ऐसी अवस्था में क्या करणीय है। महाप्रभु ने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य से जब यह पूछा तो उन्होंने कहा कि गुरु आज्ञा ही बलवान है, उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता – यही शास्त्र सम्मत है। महाराजा प्रतापरुद्र को महाप्रभु के साथ मिलाने के लिए काफी चेष्टा करने पर भी श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य सफल नहीं हुये। बाद में श्रीनित्यानन्द प्रभु भक्तों को लेकर महाप्रभु के पास गये और राजा की महिमा और व्यवहार की बातें बोल कर महाप्रभु के चित्त को द्रवित करने लगे। परन्तु तब भी महाप्रभु ने स्वीकार नहीं किया। हाँ, अपने पहने हुये बहिर्वास वस्त्र को देने में कोई भी आपत्ति नहीं की। श्रीनित्यानन्द प्रभु ने वह बहिर्वास वस्त्र श्रीसा्वभौम भट्टाचार्य के माध्यम से महाराज प्रतापरुद्र के पास भेजा। उस वस्त्र का स्पर्श कर प्रतापरुद्र जी प्रेमाविष्ट हो गये।
चातुर्मास के बाद गौड़देश के भक्तों द्वारा गौड़देश वापस चले जाने पर एक दिन श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य ने हाथ जोड़ कर महाप्रभु को अपने घर पर एक मास तक भोजन करने के लिये निवेदन किया। किन्तु महाप्रभु ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। फिर श्रीवासुदेव ने 20 दिन के लिए निवेदन किया परन्तु महाप्रभु ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जी द्वारा बार बार प्रार्थना करने पर अन्त में पाँच दिन भिक्षा करनी स्वीकार की। श्रीवासुदेव सार्वभौम ने पाँच दिन परमानन्द पुरी को, चार दिन स्वरूप दामोदर को एवं 8 संन्यासियों को दो दो दिन करके सोलह दिन, इस प्रकार एक मास के लिये अपने घर में भिक्षा की व्यवस्था की। बहुत से सन्यासियों के आने से सेवा सुचारु रूप से नहीं हो पायेगी, इसीलिये महाप्रभु को अकेले या किसी दिन श्रीस्वरूप दामोदर के साथ आकर भिक्षा ग्रहण करने के लिये निवेदन किया। श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य की पत्नी (षाठी की माता) महाप्रभु के प्रति अनन्य भक्ति वाली थी व महाप्रभु भोजन करने घर में आयेंगे, सुनकर परमोल्लासित हो उठी। रसोई बनाने में पारंगत षाठी की माता ने बहुत प्रकार का पीठापाना (बंगाल की एक मिठाई) तैयार किया। श्रीभट्टाचार्य ने घर में प्रसाद सेवन की व्यवस्था की।
महाप्रभु श्रीभट्टाचार्य के घर श्री श्रीराधागोविन्द के भोग की अपूर्व परिपाटी एवं अन्न-व्यन्जनादि देखकर विस्मित हो गये और उन्होंने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य की सेवा का ढंग देखकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। महाप्रभु अभी प्रसाद सेवन करने के लिये बैठे ही थे कि उसी समय श्रीभट्टाचार्य का दामाद – अमोघ, महाप्रभु के भोजन को देखने आया। श्रीभट्टाचार्य अमोघ के स्वभाव को पहले से ही जानते थे इसलिये छड़ी हाथ में लेकर दरवाजे पर बेठे थे ताकि अन्दर न आ पाये। वे जब महाप्रभु को विचित्र – 2 प्रसाद सेवन कराने में व्यस्त थे और उनका ध्यान भी केवल उसी में था, उसी समय अमोघ अन्दर घुस आया और अन्न व्यन्जनादि को देख कर निन्दा करता हुआ कहने लगा – ‘एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन। एकेला सन्यासी करे एतेक भोजन।’ अर्थात जितना भोजन 10-12 आदमी खाते हैं उतना ये अकेला संन्यासी खा रहा है। भट्टाचार्य द्वारा क्रोधित होकर छड़ी मारने के लिये उसके पीछे दौड़ने पर अमोघ भाग गया। महाप्रभु की निन्दा सुनकर षाठी की माता सिर और छाती को पीट-पीट कर क्रन्दन करने लगी और बार – बार कहने लगी कि मेरी बेटी विधवा हो जाये। अमोघ की निन्दा सुनकर महाप्रभु मुस्कराये एवं भट्टाचार्य और उनकी पत्नी के दुःख को देखकर उनको सान्त्वना प्रदान करने लगे। अगले दिन अमोघ को हैज़ा हो गया। इस व्याधि की बात सुनी तो अपराधी को आवश्यक दण्ड मिला है, सोचकर भट्टाचार्य सुखी हुये। गोपीनाथ आचार्य ने महाप्रभु को आकर बताया कि श्रीभट्टाचार्य और उनकी पत्नी ने तब से कुछ खाया नहीं है एवं उनके दामाद को हैज़ा हो जाने के कारण मृत्युशैय्या पर पड़ा है। ये सुनते ही करुणामय महाप्रभु उसी समय अमोघ के पास गये और उसकी छाती पर श्रीहस्त स्पर्श करते हुये कहने लगे –
सहजे निर्मल एई ब्राह्मण-हृदय।
कृष्णेर वसिते एइ योग्यस्थान हय॥
मात्सर्य चण्डाल केने इ’हा बसाइला।
परमपवित्र स्थान अपवित्र कैला।
सार्वभौम – संगे तोमार कल्मष हैल क्षय।
कल्मष घूचिले जीव कृष्णनाम लय॥
उठह अमोघ! तुमि लओ कृष्णनाम।
अचिरे तोमारे कृपा करिवे भगवान्॥
चै.च.म. 274 -77
अर्थात्: “यह ब्राह्मण-हृदय तो सहज ही शुद्ध होता है, यह श्रीकृष्ण के विराजमान होने योग्य स्थल है। तुमने, अमोघ! मात्सर्यरूप (ईर्ष्या- द्वेषरूप) चण्डाल को यहाँ (हृदय में) कैसे बिठा लिया? इस परमपवित्र स्थान को तुमने अपवित्र कैसे कर दिया? श्रीसार्वभौम परमभक्त के संग से तुम्हारे सब पाप नाश हो गये हैं और जब पाप नष्ट हो जाते हैं तभी जीव श्रीकृष्ण नाम उच्चारण करता है अमोघ! उठो, तुम कृष्ण नाम कहो। श्रीभगवान तुम पर शीघ्र कृपा करेंगे।
श्रीमन्महाप्रभु के स्पर्श से अमोघ उसी समय स्वस्थ हो गया और उठकर कृष्ण कृष्ण कहता हुआ नृत्य करने लगा एवं उसके शरीर में अष्टसात्विक विकार प्रकट हो गये। अपने अपराध की बात याद कर अनुताप की अग्नि में जलते हुए थप्पड़ मार-मार कर उसने अपने दोनों गाल फुला लिये। श्रीगोपीनाथ आचार्य ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोका। महाप्रभु ने अमोघ को सान्त्वना प्रदान करते हुये कहा कि श्रीसार्वभौम के सम्बन्ध से अमोघ उनके स्नेह का पात्र हैं।
सार्वभौम-गृहे दास-दासी, ये कुक्कुर।
सेह मोर प्रिय अन्यजन रहु दूर ॥
महाप्रभु ने भट्टाचार्य एवं उनकी पत्नी के पास जाकर बहुत प्रकार से सान्त्वना प्रदान की; बालक अमोघ के अपराध क्षमा करने के लिए कहा एवं उनको बिठा कर भोजन करवाया।
श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीवल्लभ भट्ट के सामने अपने पार्षदों की महिमा वर्णन करते समय सार्वभौम के सम्बन्ध में इस प्रकार कहा
षड्दर्शनवेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम।
षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम।
तेंह देखाइला मोरे भक्तियोगे पार।
ताँर प्रसादे जानिलु कृष्णभक्तियोग सार॥
चै.च.अ. 7/21-22
श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य छः दर्शनों के वेत्ता हैं। षड़ -दर्शनों के लिये तो वे जगद्गुरु हैं और परम भक्त हैं। उन्होंने मुझे भक्ति योग की सीमा का दर्शन करवाया है। उनकी कृपा से ही मैंने श्रीकृष्ण के भक्ति योग के रहस्य को जाना है।