श्रीमानुद्धवदासोऽपि चन्द्रावेशावतारकः ।
गौ.ग. 112

श्रीमान् उद्धवदास चन्द्रावेशावतार॥
अतिदीनजने पूर्णप्रेमवित्तप्रदायकम्।
श्रीमदुद्धवदासाख्यं वन्देऽहं गुणशालिनम्॥
शाखा निर्णयामृत ग्रन्थ, 35
(श्रील गदाधर पण्डित गोस्वामी के शिष्य श्रीयदुनाथ दास द्वारा रचित)

इनका नाम गदाधर पण्डित गोस्वामी की शाखा में गिना जाता है।

श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर उद्धव दास।
जितामित्र, काष्ठकाटा जगन्नाथदास॥
चै.च.आ. 12/83

श्रीवृन्दावनधाम में रहकर भजन करने के समय श्रीरूप गोस्वामी बूढ़े होने के कारण गोवर्धन में जाकर गोवर्धनधारी श्रीगोपालदेव का दर्शन कर पाने में असमर्थ से हो गये थे। इसलिये जब वे श्रीगोपालदेव के दर्शन पान के लिये व्याकुल से हो उठे, तब श्रीगोपाल ने म्लेच्छों का भय फैलाकर मथुरा में श्रीवल्लभ भट्ट के कनिष्ठ पुत्र श्रीविठ्ठलनाथ के घर आकर एक महीने तक अवस्थान किया और इस बहाने श्रीरूप गोस्वामी को भी मथुरा में श्रीगोपालदेव के दर्शनों का सौभाग्य मिल गया। एक महीने से भी अधिक समय तक श्रीगोपालदेव श्रीविट्ठलेश्वर के घर पर ही रहे। श्रीरूप गोस्वामी प्रतिदिन श्रीगोपाल का दर्शन करने के लिए जाते थे। श्रीरूप गोस्वामी जिन भक्तों के साथ मथुरा में श्रीविट्ठलेश्वर के घर श्रीगोपालदेव के दर्शनों को जाते थे, उनमें से एक श्रीउद्धव दास भी थे।

श्रीउद्धवदास, आर माधव दुइजन।
श्रीगोपाल दास, आर दास नारायण॥
चै.च.म. 18/51

श्रीउद्धव दास, माधवादि ये ये छिला।
परस्पर मिलि’ सबे महाहर्ष हैला॥
भ.र. 5/1333

श्रीउद्धव दास श्रीवृन्दावन में रहते थे। श्रीनिवासाचार्य प्रभु और श्रीराघव गोस्वामी वृन्दावनधाम में परिक्रमा के समय इनकी ही कुटिया में आया करते थे तथा ये भी बड़े आदरभाव से उनका सेवा-सत्कार करते थे। श्रीजीव गोस्वामी ने तमाम गौड़ीय ग्रन्थों को एक बक्से में रखकर उसे श्रीनिवास आचार्य, श्री नरोत्तम ठाकुर व श्री श्यामानन्द प्रभु के साथ एक बैलगाड़ी के द्वारा मथुरा से उत्तर बंगाल की ओर भेजा था। श्रीजीव गोस्वामी ने इन भक्तों को जब मथुरा से उत्तर बंगाल की ओर भेजा था तो उस समय ये उद्धवदास भी उन्हें विदा करने के लिए कुछ दूर तक गये थे।

श्रीनिवास की विदाई के समय इकट्ठे हुए वैष्णववृन्द –

श्रीगोविन्द, वाणी कृष्णदास, अत्युदार।
श्रीउद्धव मध्ये मध्ये गौड़े गति यार॥
भ. र. 6/514

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से