श्रीसुबुद्धि राय के माता पिता के परिचय व जन्म स्थान के विषय में कुछ भी नहीं जाना जाता है। इन्होंने कलियुग पावनावतारी श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन किये थे और इन्हें महाप्रभु की विशेष कृपा प्राप्त हुयी थी। इसीलिये इनका पावन जीवन चरित्र स्मरणीय एवं कीर्त्तनीय है। बाहरी विचारों से पहले यह गौड़देश1 के प्रसिद्ध राजा थे। ब्राह्मण घर में प्रकटे सुबुद्धि राय के पाण्डित्य की भी अच्छी प्रसिद्धि थी। सुबुद्धि राय जब गौड़देश के राजा थे तब हुसैन शाह उनके अधीन नौकरी करते थे। श्री चैतन्य चरितामृत में वर्णन मिलता है।

पूर्वे यवे सुबुद्धि राय छिला गौड़े अधिकारी ।
हुसैन खां – सैयद करे ताँहार चाकरी ॥
(चै. च. म.25/180)

ऐसा कहा जाता है कि बड़े तालाब की खुदायी करते समय एक बार हुसैन शाह ने कोई गलती की थी, जिसके फलस्वरूप सुबुद्धि राय ने दण्ड के रूप में उसे चाबुक मारा था। दैववशतः यही हुसैन शाह कुछ समय बाद गौड़देश का बादशाह बन गया। किन्तु हुसैन शाह सुबुद्धि राय द्वारा किये गये उपकारों का स्मरण कर उनका बहुत सम्मान करता था। सुबुद्धि राय द्वारा मारे गये चाबुक का निशान अभी तक हुसैन शाह बादशाह की पीठ पर विद्यमान था। एक दिन उनकी पत्नी ने वह निशान देख कर जब उस विषय पूछा में तो उसे पता लगा कि जब सुबुद्धि राय राजा थे उन्होंने बादशाह को चाबुक मारे थे। ये सुनने के साथ-साथ क्रोधित सी होकर उसने सुबुद्धि राय को प्राणदण्ड देने के लिए पति को उकसाया। किन्तु बादशाह द्वारा ये स्वीकार न करने पर बेगम ने सुबद्धि राय की जाति नाश करने की बात कही। किन्तु बादशाह ने ये सोचकर कि जाति नाश करने पर सुबद्धि राय आत्महत्या कर लेगा, बेगम की ये बात भी अस्वीकार कर दी। बेगम ने तब आत्महत्या करने की धमकी दी। तब बादशाह ने कोई उपाय न देखकर स्त्री के कहने के अनुसार सुबुद्धि राय को अपने करवे (मिट्टी का बर्तन) का पानी पिलवा दिया। हिन्दू धर्म के विधान के अनुसार वह पानी पीने से सुबुद्धि राय की जाति नष्ट हो गयी। सुबुद्धि राय को पहले ही विषयों के प्रति वैराग्य हो गया था। इसलिये मौका पाकर वे घर- परिवार सब को छोड़कर काशी धाम में चले गये और वहाँ पण्डितों से अपने प्रायश्चित्त के बारे में पूछने लगे। ब्राह्मणों ने उन्हें खौलता हुआ घी पीने को कहा। गौड़ीय वैष्णव शब्दकोश में लिखा है कि ब्राह्मणों ने उन्हें जलती हुई भूसी के ढेर के ऊपर लेटकर वहीं जल – जल कर मरने की विधि बतायी थी। इस प्रकार की व्यवस्था की बात सुनकर किसी – किसी व्यक्ति ने कहा कि ये छोटे से दोष के बदले बड़ा भारी प्रायश्चित्त है। लोगों की बात सुनकर सुबुद्धिराय के मन में संदेह जाग उठा। अतः श्रीमन्महाप्रभु जी ने जब वाराणसी में शुभपदार्पण किया, तब सुबुद्धि राय ने सारा वृतांत उन्हें सुनाया। सारा वृतांत सुनने के पश्चात महाप्रभु जी ने उन्हें वृन्दावन में जाकर कृष्णनाम संकीर्त्तन करने का उपदेश दिया। श्रीचैतन्य चरितामृत (मध्य 191-193) में लिखा है –

प्रभु कहे -इँहा हैते याह वृन्दावन।
निरन्तर कर कृष्ण नाम संकीर्त्तन॥
एक ‘नामाभासे’ तोमार पाप दोष यावे।
आर नाम लइते कृष्णचरण पाइवे॥
आर कृष्ण नाम लैते कृष्णस्थाने स्थिति।
महापातकेर हय एइ प्रायश्चित्त॥

अर्थात् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा कि तुम यहाँ से सीधा वृन्दावन चले जाओ और निरन्तर श्रीकृष्ण का नाम संकीर्तन करो। एक नामाभास से ही तुम्हारे पाप दोष दूर हो जायेंगे, कृष्ण चरण पाओगे और उनके धाम की प्राप्ति हो जायेगी। महान से महान पाप का यही प्रायश्चित्त है। श्रीमहाप्रभु की आज्ञा से सुबुद्धि राय वृन्दावन की ओर जाते समय प्रयाग, अयोध्या होते हुए नैमिषारण्य में पहुंच कर कुछ दिन वहां रहे। क्रमशः नैमिषारण्य से मथुरा पहुंचे तो मालूम हुआ कि महाप्रभु तो वृन्दावन से प्रयाग चले गये हैं। श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन न होने के कारण सुबुद्धि राय मर्माहत हुये।श्रीमन् महाप्रभु के विरह से उनमें वैराग्य और उदासीनता आ गयी। अब सब प्रकार के कष्टों को सहन करते हुए वे जंगल से सूखी लकड़ियां इकट्ठी करके लाते थे और मथुरा में बेचते थे। उससे जो उन्हें थोड़ा पैसा मिलता, उससे ही वे मात्र चने चबा कर जीवन धारण करते थे। हाँ कुछ पैसे जमा करके गौड़ीय वैष्णवों को दही व चावल इत्यादि खिलाते थे।

शुष्क काष्ठ आनि राय बेचे मथुराते।
पाँच छय पयसा हय एक बोझाते॥
आपने रहे एक पयसार चाना चाबाइया।
आर पयसा वाणियास्थाने राखेन धरिया॥
दुःखी वैष्णव देखी तारे करान भोजन।
गौड़ीया आइले दधी, भात, तैलमर्दन॥
चै.च. म. 25/197-199

इस प्रकार उनका वैराग्य और उनकी वैष्णव सेवा के लिये निष्कपट सेवा – प्रचेष्टा देखकर श्रील रूप गोस्वामी बहुत ही प्रसन्न हुये थे। श्रील रूप गोस्वामी जी ने सुबुद्धि राय को अपने साथ व्रजमण्डल की श्रीकृष्ण लीला स्थलियों का दर्शन करवाया था।

रूप गोसाञि आसि’ ताँरे बहु प्रीति कैला।
आपन-संगे लइया ‘द्वादशवन’ देखाइला।।
चै.च.म. 25/ 200

धनवान होने पर ही व्यक्ति विष्णु वैष्णव की सेवा करेगा, ऐसा नहीं होता जहां पर सेवावृत्ति है, वहां पर दरिद्रता रहने पर भी भगवान की इच्छा से विष्णु-वैष्णव की सेवा के लिये वस्तुओं का अभाव नहीं होता। सुबुद्धि राय का पावन चरित्र इस का दृष्टान्त स्वरूप है।

जिस समय सनातन गोस्वामी काशी से प्रयाग आ गये और वहां से राज मार्ग से मथुरा की तरफ जा रहे थे, उसी समय महाप्रभु द्वारा गंगा किनारे वाले मार्ग से वृन्दावन से वापिस आ जाने के कारण दोनों का मिलन नहीं हो सका। सनातन गोस्वामी भी मथुरा में आकर सुबुद्धि राय से मिले थे। जिस रास्ते से महाप्रभु वृन्दावन से वापस लौटे थे उसी रास्ते पर रूप गोस्वामी व अनुपम भी चले परन्तु उनकी सनातन गोस्वामी से भेंट न हो पायी। सनातन ने जब ये घटना सुबुद्धि राय से सुनी तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। सनातन गोस्वामी के पूर्वाश्रम की बातें याद करके सुबुद्धि राय उनके प्रति अधिकाधिक आकृष्ट होने लगे तथा सनातन गोस्वामी के प्रति अत्यधिक स्नेह प्रकट करने लगे। विषयविरक्त सनातन गोस्वामी ने इस स्नेह की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। श्री सुबुद्धि राय ने अपने जीवन का बाकी समय दीन भाव से गोस्वामियों के साथ वृन्दावन में रहकर वैराग्य और निष्ठा के साथ श्रीहरिनाम कीर्तन करते हुए बिताया। उन्होंने श्रीमन् महाप्रभु की आज्ञा का अक्षरश: पालन किया था। उनकी तिरोभाव तिथि के बारे में कहीं भी कुछ भी मालूम नहीं पड़ता।


1 गौड़ देश:- गौड़’ मालदह जिले में अवस्थित बंग की प्राचीन राजधानी थी। एक समय गौड़नाम से समुदय बंगलादेश को ‘गौड़’ कहा जाता था। -आशुतोष देव रचित नूतन बंगला शब्दकोष स्कन्द पुराण में पन्च गौड़ का उल्लेख आया है। पन्च गौड़ कहने से सारस्वत, काव्य कुब्ज, उत्कल, मैथिल और गौड़देश समझाया है । इनमें से मिथिला और बंग के बीच का गौड़राज्य ज्यादा प्रसिद्ध था। सेनवंशीय विजय सेन कर्णाट से आकर गौड़ के अधिपति बने थे। उनके वंश के लोग गौड़ेश्वर के नाम से ख्यात हैं। विजय सेन के पुत्र बल्लाल सेन ने गंगातीर के किनारे गौड़ नामक नगर की राजधानी स्थापन की थी। मालदह जिले के बीच में गंगा के प्राचीन गर्भ में प्राचीन गौड़ अवस्थित है। प्राचीन काल में बंगदेश में रहने वालों को गौड़ीय कहा जाता था। श्रीगौरांग महाप्रभु के आविर्भाव के पश्चात् उनके भक्त ही गौड़ीय शब्द से वाच्य हैं – गौड़ीय वैष्णव शब्दकोष।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से