विभीषणो यः प्रागासीद्रामचन्द्रपुरी स्मृतः।
उवाचातो गौरहरिर्नैतद्रामस्य कारण।
जटिला राधिका श्वश्रु कार्यतोऽविशदेव तं
अतो महाप्रभुर्भिक्षा संकोचादि ततोऽकरोत्।
(गौ.ग.दीपिका 92-93)
जो पहले श्रीरामचन्द्र के प्रिय विभीषण थे वे ही अब रामचन्द्र पुरी हैं। किसी कार्यवश श्रीमती राधाजी की सास का भी इनमें प्रवेश हुआ है। इसिलिए महाप्रभु भिक्षा करने में संकोच आदि करते थे।
तं वन्दे कृष्णचैतन्यं रामचन्द्रपुरी भयात्।
लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं समकोचयत्॥
चै.च.अ..8/1
अर्थात्: जिन्होंने श्रीरामचन्द्र पुरी के भय से अपना भोजन कम कर दिया था, मैं उन्हीं श्रीकृष्णचैतन्य की वन्दना करता हूं। श्रीमन्महाप्रभु की लीला में, श्रीरामचन्द्रपुरी ने व्यतिरेक भाव से जो भूमिका निभाई थी उससे कल्याण चाहने वालों के लिए क्या-क्या शिक्षणीय है, उसे चित्त में धारण करना चाहिए।
1. दूसरे के दोषों को ढूंढते रहना, विशेष भाव से विष्णु व वैष्णवों के दोषों को ढूंढना अथवा उनकी निन्दा करना भक्ति के प्रतिकूल होता है। साधकों को चाहिए कि वे दूसरों के दोषों को ढूंढने के स्वभाव को परित्याग करके अपनी कमियों की ओर ध्यान दें। ऐसा करने से ही वे संशोधित होकर भजन के रास्ते में अग्रसर हो पायेंगे।
यदि वैष्णव- अपराध उठे हाती माता।
उपाड़े वा छिण्डे तार शुखि याय पाता॥
अर्थात् : यदि वैष्णव अपराध रूपी मतवाला हाथी आ जाये तो वह भक्तिलता को उखाड़ फेंकता है जिससे वह सूख जाती है। श्रील रूप गोस्वामी को अवलम्बन करके महाप्रभु की ये शिक्षा शुद्धभक्ति चाहने वाले साधकों को हमेशा याद रखनी चाहिए।
2. सद्गुरु के चरणाश्रित सभी शिष्य एक बराबर नहीं होते। बाहरी रूप से गुरु पदाश्रय करते हुए मन्त्र ग्रहण करने से ही उसकी गिनती वास्तविक शिष्यों में अथवा सद्शिष्य के रूप में नहीं होती है। स्निग्ध व सेवापरायण शिष्य पर ही गुरु कृपा करते हैं या यूं कह सकते हैं कि स्निग्ध व सेवापरायण शिष्य ही गुरु कृपा प्राप्त कर सकते हैं। अपना निश्चित कल्याण चाहने वाले साधकों को चाहिए कि वे श्रील रूप गोस्वामी द्वारा निर्देशित चौंसठ प्रकार के भक्ति अंगों में से ‘विश्रम्भेन गुरोः सेवा’ रूपी भक्ति के अंग का विशेष रूप से चिन्तन करें। 3. गुरु वैष्णवों की मर्यादा लंघन करना भक्ति साधन-पथ के प्रतिकूल है। ‘मर्यादालंघन प्रभु सहिते ना पारेन’ – अर्थात कोई अपने से बड़ों की मर्यादा का उल्लंघन करे, यह महाप्रभु को सहन नहीं होता -इसे स्मरण रखें। दुर्भाग्य से ही अनर्थयुक्त जीव भगवान की माया से मोहित होकर अपने आपको श्रेष्ठ व ज्ञानी मानता है तथा इसी घमण्ड से गुरु – वैष्णवों को सुधारने व उन्हें उपदेश देने की धृष्टता करता है।
4. ठीक तरह से भक्ति में उन्नति करने की जिनकी इच्छा है वे स्निगध तथा स्वजातीय वैष्णवों का संग करेंगे या उनकी सेवा करेंगे।
स्वजातीयाशये स्निग्धे साधौ संगः स्वतो वरे
विष्णु- वैष्णव सेवा परायण साधु के संग से ही विष्णु – वैष्णव सेवा की प्रवृत्ति बढ़ती है।
5. गुरुदेव का सम्बन्ध धारण करने वाले गुरु के गुरुभाई भी गुरु की तरह पूज्य हैं। उन्हें हमेशा मर्यादा प्रदान करना ही कर्तव्य है। उनका आदेश व निर्देश उचित न लगने पर भी उनके साथ रूखा व्यवहार नहीं करना चाहिए और न ही उन पर शासनात्मक वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए। स्वयं श्रीमन्महाप्रभु ने ये आचरण करके शिक्षा दी।
गोरार आमि, गोरार आमि मुखे बलिले नाहि चले।
गोरार आचार गोरार विचार लइले फल फले॥
अर्थात् : मैं गौरांग महाप्रभु का हूं, मैं गौरांग महाप्रभु का हूं – सिर्फ मुंह से बोलने से नहीं चलेगा। श्रीगौरांग महाप्रभु का जो आचरण है व श्रीगौरांग महाप्रभु के जो विचार हैं उन पर अमल करने से ही सही रूप में उनका हुआ जायेगा।
श्रीरामचन्द्रपुरी के पिता – माता के बारे में कहीं भी मालूम नहीं पड़ता। वे श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद के दीक्षित शिष्य थे – उनका ये परिचय ही प्रसिद्ध है। श्रील कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्यलीला में रामचन्द्रपुरी के बारे में वर्णन किया है।
श्रीरामचन्द्रपुरी श्रीलमाधवेन्द्र पुरीपाद के दीक्षित शिष्य थे, ऐसा कहकर श्रीमन्महाप्रभु और श्रील परमानन्द पुरीपाद उन्हें मर्यादा दिया करते थे। श्रीरामचन्द्र पुरी श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद के शिष्य होने पर भी शुष्क ज्ञानी सम्प्रदायी लोगों के संग में रहने के कारण भक्ति-विरुद्ध सिद्धान्तों में रुचि रखते थे।
श्रीमन्महाप्रभु के पार्षद श्री जगदानन्द पंडित ने पुरुषोत्तम धाम में श्रीमन् महाप्रभु, श्रील परमानन्दपुरी व श्रील रामचन्द्रपुरी को आपस में दण्डवत् प्रणाम करते देखकर व उन्हें आपस में बैठकर विचार विमर्श करते देखकर उन्हें अपने यहां भोजन के लिए निमन्त्रण दिया। उनके द्वारा निमन्त्रण स्वीकार करने पर जगदानन्द ने भगवान श्रीजगन्नाथ जी का प्रसाद लाकर सभी की सेवा की। प्रसाद पाने के बाद श्रीरामचन्द्र पुरी ने श्रीजगदानन्द को बचा हुआ प्रसाद पाने के लिए निर्देश दिया और स्वयं बार-बार आग्रह कर करके उन्हें प्रसाद परिवेशन कर-करके खिलाया। जब जगदानन्द ने श्रीरामचन्द्र पुरी के बार-बार आग्रह करने पर कुछ ज्यादा प्रसाद खा लिया तो वे श्रीचैतन्य महाप्रभु के गणों को कटाक्ष करते हुए कहने लगे-
शुनि, चैतन्यगण करे बहुत भक्षण।
सत्य ऐइ वाक्य साक्षात् देखिलु एखन॥
संन्यासीरे एत खोआइया करे धर्म नाश।
वैरागी हइया एत खाय वैराग्येर नाहि भास॥
अर्थात् सुना था कि श्रीचैतन्य महाप्रभु के भक्त बहुत ज्यादा खाते हैं परन्तु आज उस वाक्य की सत्यता को मैंने अपनी आंखों से देख लिया। इतना खाना तो सन्यासी के संन्यास धर्म को नाश कर देगा। ये वैरागी होकर इतना खाते हैं। वैराग्य की ज़रा सी गन्ध भी इनमें नहीं है।
गुरु के चरणों में अपराध करने से ही दूसरों के दोष देखना, दूसरों की निन्दा करने व शुष्क ज्ञान का उपदेश करने की प्रवृत्ति होती है। श्रील माधवेन्द्रपुरीपाद जब रेमुणा में रहते थे तो अपने अन्तर्धान से पहले वे उस प्रकार के भावों में विभावित होकर रो रहे थे, जिस प्रकार व्रजधाम से श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनके साक्षात् दर्शन न पाकर श्रीमती राधारानी जी की विरह – कातर अवस्था हुई थी :
अयि दीनदयार्द्रनाथ! हे मथुरानाथ्! कदावलोक्यसे।
हृदय त्वदलोककातर दयित भ्राम्यति कि करोम्यहम्॥
श्रील माधवेन्द्रपुरीपाद जब इस प्रकार की विरह कातर अवस्था में क्रन्दन कर रहे थे तो उस समय श्रीरामचन्द्रपुरी और श्रीईश्वरपुरी भी वहां उपस्थित थे। अपने गुरुदेव को रोते देखकर, उनके हृदयगत भावों को न समझकर व उन्हें साधारण मरणशील मनुष्य मानकर श्रीरामचन्द्र पुरी ने उनकी मर्यादा को उल्लंघन करते हुए, उन्हें उपदेश देने की धृष्टता की थी। माधवेन्द्र पुरीपाद को उपदेश देते हुए रामचन्द्रपुरी ने कहा था -‘आप स्वयं पूर्ण ब्रह्म व पूर्णानंद स्वरूप हो, ऐसा समझकर अपने आपका स्मरण करो। ब्रह्म के तत्त्व को जानते हुए भी आप रो क्यों रहे हैं? रामचन्द्रपुरी के अज्ञान से भरे धृष्टतापूर्ण वाक्यों को सुनकर जनसाधारण को शिक्षा देने के लिए श्रील माधवेन्द्रपुरीपाद क्रोधित से होते हुए कहने लगे –
दूर, दूर, पापिष्ठ बलि भर्त्सना करिल।
‘कृष्ण कृपा’ ना पाइनु, ना पाइनु, मथुरा।
आपन-दुःखे मरो – एइ दिते आइल ज्वाला।
मोरे मुख ना दिखावि तुई, याओ यथि तथि।
तोरे देखि’ मैले, मोर हवे असद्गति।
कृष्ण ना पाइनु, मरों आपनार दुःखे।
मोरे ‘ब्रह्म’ उपदेशे एइ छार मूर्खे॥
अर्थात् : श्रीरामचन्द्रपुरी की भर्त्सना करते हुए श्रील माधवेन्द्र पुरी कहने लगे – पापिष्ठ! तू मेरी नजरों से दूर हो जा। मुझे श्रीकृष्ण के दर्शन न मिले और न ही मथुरा की ही मुझे प्राप्ति हुई, मैं पहले से ही अपने इस दुःख में दुःखी हूं, तू और ज्वाला बढ़ाने आया है। तू मेरी नजरों से दूर हो जा। खबरदार! तू मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना। तू अभी चला जा यहां से, चाहे जहां मर्जी चला जा। तुझे देखकर मरने से तो मेरी असद्गति होगी। मुझे श्रीकृष्ण की प्राप्ति नहीं हुई, इस कारण में पहले से परेशान हूं तो ऊपर से ये निरा मूर्ख मुझे ब्रह्म का उपदेश देने चला है।
माधवेन्द्र पुरीपाद के चरणों में अपराध करने के कारण रामचन्द्र पुरी गुरुकृपा से वंचित हो गये तथा उनके अन्दर सांसारिक-वासना जाग उठी। यही नहीं, कृष्ण – सम्बन्धहीन शुष्क ज्ञानी बनकर वे तमाम लोगों की निन्दा करने में ही प्रवृत हो गये।
इस सम्बन्ध में श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने लिखा है कि श्रीरामचन्द्रपुरी अपने गुरु श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद को श्रीकृष्ण विरह कातर अवस्था में देखकर भी उनकी अप्राकृत विप्रलम्भ-स्फूर्ति को समझ न पाये। यही कारण था कि उन्होंने माधवेन्द्र पुरीपाद को एक साधारण मरणशील मनुष्य समझकर उन्हें किसी दुनियावी अभाव के कारण शोक करता हुआ समझा तथा इसी कारण वे उन्हें निर्विशेष ब्रह्म की अनुभूति करवाने लग पड़े।
इधर ईश्वर पुरीपाद ने अपने गुरुदेव (श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद) की शारीरिक सेवा, वाणी सेवा व उनकी हर प्रकार की सेवा निष्ठा के साथ की। उसके फलस्वरूप अपने गुरुदेव के कृपा -आशीर्वाद से कृष्ण-प्रेम में निमज्जित हो गये। महात्मा माधवेन्द्र पुरी से ईश्वर पुरी को बड़ा अनुग्रह प्राप्त हुआ था। जबकि रामचन्द्र पुरी को केवल मात्र निग्रह (दण्ड) प्राप्त हुआ। लोकशिक्षा के लिए ईश्वर पुरीपाद और श्रीरामचन्द्र पुरी गुरु-वेष्णवों की कृपा व दण्ड प्राप्ति के दो उदाहरण हैं।
महदनुग्रह- निग्रहेर साक्षी दुईजने।
एइ दुइ द्वारे शिखाइला जगजने॥
गुरु कृपा से वंचित होकर श्रीरामचन्द्र पुरी संन्यासी लोग कहां-कहां रहते हैं, क्या-क्या करते हैं व कितना- कितना भोजन खाते हैं, बस यही हर समय देखते रहते व उनके दोष निकालते रहते थे। भक्त लोग अलग-अलग दिनों में महाप्रभु को भोजन के लिए अपने-अपने घरों में निमन्त्रण देते थे। यदि कोई अपने घर भोजन न करा पाता तो उस समय की प्रथा के अनुसार चार पण कौड़ी दिया करता था। श्रीरामचन्द्रपुरी महाप्रभु को दुनिया का मनुष्य समझते थे और इसी भाव से वह उनके गुणों को न देखकर उनके रहने, उनके रिवाज, उनका खाना, उनका सोना व उनका चलना-फिरना आदि सभी क्रिया कलापों में दोष ढूंढने लगे। संन्यासियों को मिठाई खाता देखकर वह कटाक्ष करते हुए सबको कहते कि ऐसी भोग प्रवृत्ति से कभी भी इन्द्रिय संयम नहीं हो सकता। निन्दा करने का स्वभाव होने पर भी वे प्रतिदिन महाप्रभु का दर्शन करने के लिए आते थे। महाप्रभु भी उन्हें गुरुवर्ग रूप से काफी मर्यादा दिया करते थे।
एक दिन प्रातःकाल रामचन्द्रपुरी महाप्रभु के पास आये और कटाक्ष करते हुए कहने लगे – ज़रुर रात को यहां गुड़ रहा होगा, इसीलिए यहां आस – पास चीटियां धूमती-फिरती दिखायी दे रही हैं। देखो विरक्त सन्यासियों में भी कैसी इन्द्रिय लालसा है। वैसे तो चीटिया सभी जगह घूमती हैं, तब भी रामचन्द्र पुरी जो का ये कटाक्षात्मक वाक्य सुनकर महाप्रभु को बहुत संकोच सा हुआ। इसी संकोच के कारण महाप्रभु ने अपने भोजन की मात्रा बहुत कम कर दी। यदि कोई प्रेमपूर्वक जबरदस्ती निश्चित परिमाण से ज्यादा खाने को कहता तो महाप्रभु यह कहकर सभी को डर दिखलाते कि यदि मुझे बार- बार खाने के लिए कहोगे तो में यहां से कहीं और चला जाऊँगा। श्रीरामचन्द्रपुरी व महाप्रभु के इस व्यवहार को सुनकर भक्तों को बड़ा धक्का लगा। उन्हें तो ऐसा अनुभव हुआ मानो उनके सिर पर वज्रपात हो गया हो। सभी भक्त रामचन्द्र पुरी के इस व्यवहार से बड़े मर्माहत हुए। महाप्रभु एवं गोविन्द को आधी मात्रा में भोजन करता देख, किसी किसी भक्त ने तो दुःख से भोजन करना ही छोड़ दिया। महाप्रभु ने अपना भोजन आधा कर दिया है तथा सभी भक्त दुःखी हैं; ये सुनकर रामचन्द्रपुरी महाप्रभु के पास आये और कहने लगे –
संन्यासीर धर्म नहे इन्द्रिय तर्पण।
यैछे तैछे करे मात्र उदर भरण॥
तोमारे क्षीण देखि शुनि कर अर्द्धाशन।
एइ शुष्क वैराग्य नहे संन्यासीर धर्म॥
यथायोग्य उदर भरे ना करे विषय भोग।
संन्यासीर तबे सिद्ध हय ज्ञान योग॥
अर्थात् : इन्द्रिय तर्पण करना सन्यासी का धर्म नहीं है। वे लोग तो जैसे-तैसे खाकर सिर्फ अपना पेट भरते हैं। आपका शरीर जब मैंने थोड़ा कमजोर सा देखा तो कुछ भक्तों से मैंने उसका कारण पूछा, उन्होंने बताया कि आपने अपने भोजन की मात्रा को आधा कर दिया है। देखो, ये शुष्क वैराग्य वैरागी का धर्म नहीं है। जितनी जरूरत है उतना खाकर अपना पेट भरो। हां, विषयभोग मत करो। ऐसा करने से ही सन्यासी का ज्ञान-योग सिद्ध हो पायेगा।
धीरे-धीरे महाप्रभु तक भी बात पहुंच गयी कि सभी भक्तों ने अपने भोजन की मात्रा आधी कर दी है। एक दिन भक्तों को साथ लेकर श्रीपरमानन्दपुरी महाप्रभु के पास आये और दीनतापूर्वक महाप्रभु को समझाते हुए कहने लगे कि ‘रामचन्द्रपुरी स्वभावेते निन्दुक।’
अर्थात् : रामचन्द्र पुरी तो स्वभाव से ही निन्दक है आपने उसके कहने पर अपना अन्न खाना बन्द करके उचित नहीं किया है। उसका तो ऐसा खराब स्वभाव है कि जो खाना नहीं चाहता, वह उसे जबरदस्ती खिलाएगा और बाद में निन्दा करेगा कि ये इतना ज्यादा खाता है।
परस्वभाव कर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत।
विश्वमेकात्म कं प्रश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च।
रामचन्द्र पुरी का स्वभाव ये है कि अगर किसी में सौ गुण हैं तो पुरी उसके गुणों को न देखकर उसके दोषों को देखेगा और दोष न होने पर उसके गुणों को ही दोष के रूप में प्रस्तुत करेगा। मैं तो ये सोचता हूं कि रामचन्द्रपुरी के कहने पर भोजन छोड़ना उचित नहीं है। आप कृपा करके पहले की तरह ही भोजन ग्रहण करें। जवाब में लोक शिक्षक के रूप में महाप्रभु ने कहा -रामचन्द्र की बातों से नाराज़ होने की तो कोई बात नहीं। सचमुच संन्यासी के लिए जिह्वा की लालसा अन्याय ही है। उन्होंने ठीक ही कहा है कि सिर्फ प्राणों की रक्षा के लिए ही आहार ग्रहण करना चाहिए।
सभी भक्तों ने एक साथ मिलकर बड़े यत्न के साथ जब महाप्रभु को अपना संकल्प छोड़ देने के लिए आग्रह किया तो महाप्रभु1 ने चार पण कौड़ी की जगह दो पण कौडी तक का भोजन करना स्वीकार कर लिया। महाप्रभु के भोजन ग्रहण करने की नीति के वैशिष्ट्य के सम्बन्ध में श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने लिखा है।
अभोज्यान्न विप्र यदि करेन निमन्त्रण।
प्रसाद मुल्य लैते लागे कौड़ी दुईपण॥
भोज्यान्न विप्र यदि निमन्त्रण करे।
किछु प्रसाद आने किछु पाक करे घरे॥
अर्थात् अभोज्यान्न विप्र यदि महाप्रभु को भोजन के लिए निमन्त्रण करता था तो वह प्रसाद के बदले दो पण कौड़ी खर्च करके जगन्नाथ जी का प्रसाद लेकर आता था। जबकि भोज्यान्न विप्र यदि महाप्रभु को भोजन के लिए अपने घर पर निमन्त्रण करता था तो वह कुछ प्रसाद तो जगन्नाथ मन्दिर के बाजार से खरीदकर लाता तो कुछ अपने घर पर रसोई करता था। श्रील गदाधर पण्डित गोस्वामी, श्रीभगवान आचार्य व श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य यदि निमन्त्रण के दिनों में निमन्त्रण करते तो महाप्रभु उनकी इच्छा के अनुसार भोजन कर लेते थे, जरा भी संकोच नहीं करते थे।
श्रीमन् महाप्रभु ने श्रीरामचन्द्र पुरी को भी लौकिक मर्यादा तो दी परन्तु कभी-कभी थोड़ी सी घास के तिनके के बराबर उपेक्षा भी की। मंगलमय श्रीहरि का आचरण हरेक अवस्था में ही मंगलप्रद और सुन्दर होता है।
कभु रामचन्द्रपुरीर हय भृत्यप्राय।
कभु ताँरे नाहि माने देखे तृणप्राय॥
ईश्वर – चरित्र प्रभुर वुद्धिर अगोचर।
यबे येई करेन-सेइ हय मनोहर।
नीलाचल में कुछ दिन रहकर श्रीरामचन्द्रपुरी तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़े। रामचन्द्रपुरी के चले जाने की खबर सुनकर सभी भक्तों ने राहत की सांस ली। उनके चले जाने से भक्तों को ऐसा लगा जैसे उनके सिर से बहुत बड़े पत्थर का बोझा ज़मीन पर उतर गया हो।
रामचन्द्रपुरी के चले जाने से सभी भक्तों को पहले की तरह महाप्रभु की सेवा मिलने लगी। महाप्रभु की पुनः सेवा पाकर सभी भक्त उल्लसित हो गये। गुरु-अवज्ञा का अपराध भगवान के चरणों तक जा पहुंचता है।
गुरु उपेक्षा करिले एच्छे फल हय।
क्रमे ईश्वर पर्यन्त अपराधे ठेकय॥
यद्यपि गुरुबुध्ये प्रभु ताँर दोष ना लइल।
तार फल द्वारा लोके शिक्षा कराइल॥
अर्थात् अपने गुरु की उपेक्षा करने से बड़ा भयानक फल होता है। यह भयंकर अपराध भगवान तक जाता है। यद्यपि गुरुवर्ग की भावना के कारण महाप्रभु ने रामचन्द्रपुरी का अपराध नहीं लिया तथापि लोकशिक्षा के लिए उन्होंने रामचन्द्रपुरी के जीवन में उसका फल भी दिखाया।
श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने स्वरचित चैतन्य भागवत में उल्लेख किया है कि वाराणसी में श्रीमन्महाप्रभु दो महीने श्रीरामचन्द्र पुरी के घर में छिपकर रहे थे।
रामचन्द्रपुरीर मठेते लुकाइया।
रहिलेन दुईमास वाराणसी गिया॥
चै.भा.म. 19/105
श्रीगौरसुन्दर वाराणसी में श्रीचन्द्रशेखर के घर पर ठहरे थे। शूद्र चन्द्रशेखर जाति से वैद्य थे। श्रीचैतन्य भागवत के लेखक वृन्दावन दास ठाकुर वाराणसी में श्रीमन्महाप्रभु द्वारा श्रीरामचन्द्रपुरी के मठ में गुप्त रूप से रहने के बारे में अवगत थे। रामचन्द्रपुरी श्रीमाधवेन्द्र पुरी के एक कपटी शिष्य थे। इनका मायावाद के प्रति बहुत झुकाव था। रामचन्द्रपुरी के यहां ठहरने की बात का केवल प्रचार करके महाप्रभु कृष्ण भक्तों के साथ कहीं और रहते थे। श्रीरामचन्द्र पुरी साम्प्रदायिक सन्यासी थे और मठ में रहते थे। इसलिए उनके सन्यासी जीवन में महाप्रभु द्वारा उनके मठ में वास करने से दुनियावी दोषारोपण का कोई अवसर न था।
– श्रीलभक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी
1 नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
श्रीमद्भगवद् गीता 6/16-17
हे अर्जुन, ज्यादा भोजन करने से योग नहीं होता और बिल्कुल भोजन न करने से भी योग में सिद्धि नहीं मिलती। खाना-पीना, घूमना – फिरना व सोना-जागना इत्यादि सभी क्रियाएं यदि उपयुक्त मात्रा में नियमानुसार की जाए तब जाकर तमाम दुःखों को नाश करने वाला ‘योग’ पूर्ण होता है।