श्रीरघुपति उपाध्याय मैथिल देशीय ब्राह्मण थे। ये बिहार प्रदेश में दरभंगा ज़िले के सीतामढ़ी महकुमार के अन्तर्गत तिरहुत नाम के स्थान पर आविर्भूत हुये थे। श्रीपरमानन्दपुरी पाद का आविर्भाव स्थान भी तिरहुत ही है। श्री रघुपति उपाध्याय ने भक्ति पूर्ण अनेक श्लोकों की रचना की थी। श्रील रूप गोस्वामी ने स्वरचित पद्यावली में श्री रघुपति उपाध्याय के कुछ श्लोकों का उल्लेख किया है। श्रीमन् महाप्रभु इनके द्वारा रचित श्लोकों को सुनकर प्रेमाविष्ट हो गये थे। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में वर्णन किया है –

हेनकाले आइला रघुपति उपाध्याय।
तिरुहिता1 पंडित बड़ वैष्णव महाशय॥
आसि तेँहों कैल प्रभुर चरण वन्दन।
कृष्णे मति रहु’ बलि प्रभुर वचन॥

अर्थात् : उसी समय तिरहुत देश के पण्डित रघुपति पण्डित महाशय , जो कि बड़े वैष्णव थे, वहाँ आये और उन्होंने आते ही श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरणों की वन्दना की तो श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीकृष्ण चरणों में मति रहे – कहते हुए आशीर्वाद दिया।

श्रीमन् महाप्रभु जिस समय प्रयाग धाम में श्री बल्लभाचार्य के घर में ठहरे थे तो उसी समय ये आकर महाप्रभु से मिले थे। श्रीमन् महाप्रभु ने जब इनसे हरिकथा सुनने के लिए आग्रह प्रकट किया तो इन्होंने स्वरचित एक श्लोक पढ़कर सुनाया –

श्रुतिमपरे स्मृतिमितरे भारतमन्ये भजन्तु भवभीताः।
अहमिह नन्दं वन्दे यस्यालिन्दे परंब्रह्म॥

‘इस संसार रूपी भवसागर से भयभीत तमाम व्यक्तियों में से कोई श्रुति का, कोई स्मृति का और कोई महाभारत का भजन करता है, किन्तु मैं तो नन्दमहाराज की वन्दना करता हूँ जिनके बरामदे में परब्रह्म कृष्ण खेलते रहते हैं।’

महाप्रभु श्लोक सुनकर प्रेमाविष्ट हो गये और उन्होंने और कुछ सुनने की इच्छा व्यक्त की तो रघुपति उपाध्याय ने दण्डवत् प्रणाम करते हुये कहा-

कम्प्रति कथयितुमीशे सम्प्रति को वा प्रतीतिमायात।
गोपति-तनयाकुंजे गोपवधूटी-विटं ब्रह्म॥

गोपति-तनयाकुंजे (गोपतिः सूर्यः तस्य तनया कालिन्दी तस्याः तटस्थ कुंजे) लीला परायणं गोपवधूटीविटं (गोपवट्यः तरूण्यः स्वलपवयस्काः गोपरामाः, क्षुद्रार्थे टीप्, तासां विटं लम्पटं) (परं) ब्रह्म (श्रीकृष्णः विराजते इति) सम्प्रति कं (जनं) प्रति कथयितुम् ईशे (समर्थो भवामी), कः वा प्रतीतिं (विश्वासम्) आयातु (स्थापयेत्)
(श्रील श्रीभक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी द्वारा कृत अन्वय)

श्रीमन् महाप्रभु द्वारा पुनः पुनः कृष्ण-लीला उद्दीपक श्लोक सुनने की इच्छा प्रकट करने पर जब रघुपति उपाध्याय ने एक-एक करके श्लोक पढ़ने प्रारम्भ किये तो महाप्रभु में उत्तरोत्तर अद्भुत प्रेम के विकार जागृत होने लगे । जिन्हें देखकर रघुपति उपाध्याय चमत्कृत हो उठे और उन्होंने निश्चय कर लिया कि ये श्रीकृष्ण ही हैं। महाप्रभु ने उपाध्याय से पूछा कि भगवान के अनेक रूप हैं किन्तु उनमें से कौन सा श्रेष्ठ है? इस पर उपाध्याय ने कहा – श्याममेव परं रूपं। महाप्रभु ने फिर पूछा कि श्रीकृष्ण के धामों में से कौन सा धाम श्रेष्ठ है?

उपाध्याय ने कहा – पुरी मधुपुरीवरा’ । इसी प्रकार कृष्ण की अवस्थाओं में कौन सी अवस्था श्रेष्ठ है के उत्तर में उपाध्याय ने कहा कि ‘वयः कैशोरकं ध्येयं’ एवं रसों में ‘आद्य एवं परो रसः’ अर्थात श्रृंगार रस को उन्होंने उत्तम बताया। पद्यावली में उद्धृत श्लोक इस प्रकार है –

श्यामेव परं रूपं पुरीमधुपुरी वरा।
वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य एव परोरसः॥

महाप्रभु द्वारा प्रेमावेश में रघुपति उपाध्याय को आलिंगन करने पर वे प्रेम में मत्त होकर नृत्य करने लगे। रघुपति उपाध्याय के सौभाग्य को देखकर बल्लभ भट्ट और उनके घर के सभी सदस्य विस्मित हो उठे।

1 – तिरुहिता (तिरुटिया या तिरहुटिया) वर्तमान में सारण, चम्पारण, मुजःफरपुर, दरभंगा ये चार जिले तिरहुत विभाग के अन्तर्गत है। इस प्रदेश के आदिवासियों को ‘तिरुटिया’ कहते हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से