आविर्भावो गौरहरेर्नकुल-ब्रह्मचारिणि॥73
आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसंज्ञके॥ 74
(गौर गणोद्देश दीपिका)

नकुल ब्रह्मचारी में गौरहरि जी का आविर्भाव और प्रद्युम्न मिश्र जी में भी उनका आवेश जानना होगा। श्रील भक्ति सिध्दान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की आदि लीला के दशम परिच्छेद के अपने अनुभाष्य में महाप्रभु जी के पार्षद श्रीप्रद्युम्न मिश्र को उड़ीसा निवासी लिखा है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर जी ने भी श्रीचैतन्य भागवत् में श्रीप्रद्युम्न मिश्र को उड़ीसा निवासी कहा है-

ये ये पार्षदेर जन्म उत्कले हइला।
ताहाराओ अल्पे अल्पे आसिया मिलिला॥
मिलिला प्रद्युम्न मिश्र-प्रेमेर शरीर।
परमानन्द, रामानन्द—दुइ महाधीर॥
(चै. भा. अ. 3/183-84)

[अर्थात जिस-जिस पार्षद का जन्म उत्कल में हुआ था, वे भी धीरे-धीरे आकर महाप्रभु जी से मिले। प्रद्युम्न मिश्र, परमानन्द और रामानन्द जो तीनों महाधीर हैं, महाप्रभु जी से मिले।]

गौड़ीय वैष्णव अभिधान के वर्णन के अनुसार ये पहले श्रीहट्टवासी थे तथा बाद में उड़ीसा निवासी हो गये थे। श्रीप्रद्युम्न मिश्र चैतन्य शाखा में गिने जाते हैं। ये महाप्रभु जी को कितने प्यारे थे, यह श्रीचैतन्यचरितामृत में कविराज गोस्वामी के और श्रीचैतन्य भागवत् में श्रीवृन्दावन दास ठाकुर के वर्णन से जाना जाता है—

प्रद्युम्नमिश्र इँह वैष्णव प्रधान।
जगन्नाथेर महा-सोयार इँह ‘दास’ नाम॥
(चै. च. म. 10/43)

[अर्थात् प्रद्युम्न मिश्र जी प्रधान वैष्णव हैं। यह श्रीजगन्नाथ जी के लिये रसोई बनाने वालों में प्रधान हैं]

श्रीप्रद्युम्नमिश्र-कृष्ण-प्रेमेर सागर।
आत्म-पद याँ’रे दिला श्रीगौरसुन्दर॥
(चै. भा. अ. 5/211)

[श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीकृष्ण प्रेम के सागर हैं। श्रीगौरसुन्दर जी ने इन्हें आत्मपद प्रदान किया।]

काशीश्वर-पण्डित, आचार्य-भगवान्।
श्रीप्रद्युम्नमिश्र-प्रेमभक्ति प्रधान॥
(चै. भा.अ. 8/57)

[श्रीकालेश्वर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य व श्रीप्रद्युम्न मिश्र—ये सभी प्रेम-भक्ति के प्रधान हैं।]

काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र, राय भवानन्द।
याँहार मिलने प्रभु पाइला आनन्द।
(चै.च.आ.10/131)

[ये श्रीकाशी मिश्र, और प्रद्युम्न मिश्र, श्रीराय भवानन्द, ऐसे भक्त हैं, जिनको मिलने से श्रीमहाप्रभु जी को बहुत आनन्द होता है।]

जय जय श्रीप्रद्युम्न-मिश्रेर जीवन।
जय श्रीपरमानन्दपुरी-प्राण-धन॥
(चै. भा. आ. 14/2)

[श्रीप्रद्युम्न मिश्र के जीवन की जय हो जय हो। श्रीपरमानन्द पुरी के प्राणधन की जय हो जय हो।]

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी जब दक्षिण भारत से पुरी धाम में वापस आये तो श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जी ने महाप्रभु जी को एक-एक करके सभी पुरीवासी भक्तों का परिचय दिया। परिचय देते समय भट्टाचार्यजी ने श्रीप्रद्युम्न मिश्र का एक प्रधान वैष्णव के रूप में परिचय दिया था।

श्रीमन्महाप्रभु जी की आज्ञा से श्रीप्रद्युम्न मिश्र जी ने राय रामानन्द जी से श्रीकृष्ण कथा सुनी थी। इस प्रसंग का श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्य लीला के पाँचवें परिच्छेद में विस्तृत रूप से वर्णन हुआ है। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीचैतन्य भागवत् की आदि लीला के चौथे परिच्छेद के दूसरे पयार के गौड़ीय भाष्य में इस प्रकार लिखा है –

उड़ीसा के ही एक ब्राह्मण कुल में श्रीप्रद्युम्न मिश्र जी का जन्म हुआ था। इनका एक आदर्श गृहस्थोचित पुण्यमय जीवन था। साथ ही समाज में भी इनकी अच्छी मर्यादा थी। ब्राह्मण कुल में जन्म, आदर्श गृहोचित पुण्यमयजीवन व इनकी सामाजिक उच्च मर्यादा को देखकर अथवा ये सब सफल करने के उद्देश्य से ही महाप्रभुजी ने इन्हें भगवान् श्रीहरि व उनके भक्तों की सेवा में नियुक्त किया था तथा इसी उद्देश्य से महाप्रभुजी ने इन्हें अशौक्र विप्रकुल में अवतीर्ण कृष्णभक्तिरस शिक्षक चूड़ामणि महाभागवतवर- वैष्णवाचार्य श्रील रायरामानन्द जी के पास भेजा था। इन्होंने भी एक शिष्य रूप में वैष्णवाचार्य श्रीरायरामानन्द जी से श्रीकृष्ण कथा व कीर्त्तन श्रवण करके उनकी अहैतुकी कृपा प्राप्त की थी।

घटना इस प्रकार है कि श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीमन्महाप्रभु जी से श्रीकृष्ण कथा सुनने के लिये व्याकुल हो उठे तो महाप्रभुजी ने उनको राय रामानन्दजी के पास भेज दिया। श्रीराय रामानन्द जी पुरी में श्रीजगन्नाथ बल्लभ उद्यान में रहते थे। श्रीजगन्नाथ देव की प्रसन्नता के लिये जो कार्य श्रीराय रामानन्द जी करते थे वे मनुष्यों की तो बात क्या ऋषि– मुनियों के लिये भी दुर्लभ था। वे श्रीजगन्नाथ देव के निकट नृत्य और गीत आदि के द्वारा सुख विधान करने के लिए दो युवतियों (देवदासियों) को सुसज्जित करके उन्हें नृत्य-गीत आदि की शिक्षा देते थे। जिस समय वे इस कार्य में लगे होते थे, उस समय बाहर के लोगों को वहाँ दाखिल होने का अधिकार नहीं होता था।

एक दिन जब वे इस सेवा में लगे थे कि उसी समय महाप्रभु जी के निर्देश से श्रीप्रद्युम्न मिश्र श्रीकृष्ण कथा सुनने के लिए वहाँ उपस्थित हुये। राय रामानन्दजी के सेवा कार्य में व्यस्त होने के कारण सेवकों ने श्रीप्रद्युम्न मिश्र को थोड़ी प्रतीक्षा करने के लिए कहा। अन्दर का सारा सेवा कार्य जब समाप्त हो गया तब राय रामानन्द जी बाहर आए। काफी देर बाद बाहर आने पर उन्हें मालूम पड़ा प्रद्युम्न मिश्र के बारे में कि वे काफी देर से उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

उन्होंने श्रीप्रद्युम्न मिश्र महोदय का यथोचित्त सम्मान करते हुये, देर से आने के कारण हुए अपराध के लिए क्षमा चाही। क्योंकि प्रतीक्षा करते-करते प्रद्युम्न मिश्र को काफी समय हो गया था इसलिए उस दिन उन्हें बिना कथा सुने ही वापस जाना पड़ा। फिर कुछ दिन बाद, श्रीप्रद्युम्न मिश्र की महाप्रभु जी से भेंट होने पर महाप्रभु जी ने श्रीरामानन्द राय की कृष्ण कथा किस प्रकार रही, इस विषय में जिज्ञासा की। श्रीप्रद्युम्न मिश्र के सन्देह पूर्ण मन से व मौनभाव से खड़े रहने पर, सर्वान्तर्यामी महाप्रभु जी सब कुछ जान गये।

श्रीमिश्र का संशय दूर करने के लिये उन्होंने श्रीरामानन्द जी राय के अलौकिक चरित्र का जो वर्णन किया, श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्यलीला के पांचवें परिच्छेद में उसे लिखा है, वह प्रसंग इस प्रकार से है—

आमि त’ सन्यासी, आपनारे विरक्त करि’ मानि।
दर्शन रहु दूरे, ‘प्रकृतिर’ नाम यदि शुनि॥
तबहिँ विकार पाय मोर तनु –मन।
प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन??॥
रामानन्द-रायेर कथा शुन, सर्वजन।
कहिवार नहे, जाहा आश्चर्य-कथन॥
एके देवदासी, आर सुन्दरी तरुणी।
ताहादेर सब सेवा करेन आपनि॥
स्नानादि कराय, पराय वास-विभूषण।
गुह्य अङ्ग जत, तार दर्शन-स्पर्शन॥
तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन।
नाना भावोद्गम तारे कराय शिक्षण॥
निर्विकार देह-मन—काष्ठ-पाषण सम।
आश्चर्य,—तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन॥
एक रामानन्देर हय एइ अधिकार।
ताते जानि अप्राकृत-देह ताँहार॥
(चै. च. अ. 5/35-42)

महाभागवत श्रीराय रामानन्द कृष्ण कथा कीर्तन के अधिकारी हैं। ऐसा कहकर श्रीमन्महाप्रभु जी ने प्रद्युम्न मिश्र को राय रामानन्द के पास कृष्ण कथा सुनने के लिए दोबारा भेजा। तब प्रद्युम्न मिश्र जगन्नाथ बल्लभ उद्यान में पहुँचे। वहाँ जाकर उन्होंने राय रामानन्द को दण्डवत् प्रणाम करके उनका सम्मान किया तथा रामानन्द राय जी को श्रीकृष्ण कथा सुनाने के लिए महाप्रभु जी के आदेश से अवगत कराया। दक्षिण के विद्यानगर में सम्बन्ध अभिधेय व प्रयोजनात्मक विषय में कृष्ण कथा प्रसिद्ध हुई थी अर्थात् जब महाप्रभु जी दक्षिण भारत की यात्रा में गये थे, उस समय उनकी रामानन्द जी से भेंट हुई थी व उस भेंट में जीवों के सम्बन्ध, अभिधेय व प्रयोजन के विषय में कथा हुई थी। महाप्रभु जी से सुनी हुई वही सब कथा राय रामानन्द जी ने प्रद्युम्न मिश्र को पूरी की पूरी सुना दी। कृष्ण कथा के श्रवण कीर्तन में प्रेमाविष्ट होकर वक्ता और श्रोता दोनों आत्मविस्मृत हो गये। इस प्रकार कृष्ण कथा में सारा दिन बीत गया। बाद में प्रद्युम्न मिश्र जब महाप्रभु जी से मिले तो उन्होंने कृतकृतार्थ होकर अपूर्व कृष्ण कथा श्रवण करने के सौभाग्य के विषय में परमोल्लास से भरकर सारी बात महाप्रभु के चरण-कमलों में निवेदन की थी।

इस प्रसंग में श्रील भक्ति सिध्दान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में इस प्रकार लिखा है—

ब्राह्मण तीनों वर्णों के गुरु हैं जबकि संन्यासी ब्राह्मण के भी गुरु हैं।

प्रद्युम्न मिश्र जी के दुनियावी अभिमान को तोड़ने की इच्छा से ही श्रीमन् महाप्रभु जी ने लौकिक दृष्टि से सबसे निम्न, जिसे शूद्र कहा जाता है, से प्रद्युम्न मिश्र को उपदेश प्रदान करवाया अर्थात महाप्रभु जी ने शौक्र ब्राह्मण कुल के प्रद्युम्न मिश्र को शूद्र कहलाने वाले गृहस्थ राय रामानन्द जी से उपदेश दिलवाया तथा स्वयं संन्यासी होकर भी महाप्रभु जी ने राय रामानन्द जी द्वारा प्रचारित धर्म को अंगीकार किया था।

स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से