आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्न संज्ञके।
गौरगणोद्देशदीपिका – 74

श्रीप्रद्युम्न मिश्र को भी उनका आवेश जानना होगा।

श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में ऊपर कहे गये श्लोक को उड़ीसावासी श्रीप्रद्युम्न मिश्र के सम्बन्ध में प्रयोग न करके श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में प्रयोग किया है। श्री गौड़ीय वैष्णव अभिधान में भी गौरगणोद्देशदीपिका का 74वां श्लोक श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में प्रयुक्त हुआ है, उनको ‘गौर का आवेश’ कहा गया है।

साक्षात् दर्शन आर, योग्य भक्त-जीवे।
आवेश करये काहाँ, काहाँ आविर्भाव॥

श्रीप्रद्युम्न नृसिंहानन्द के आगे प्रभु आविर्भूत हुए एवं अनेक जीवों का निस्तार कर दिया। (श्रीभगवान् इस प्रकार विविध उपायों से जीवों का क्यों निस्तार करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि जीवों का निस्तार करना श्री भगवान का स्वभाव अर्थात स्वरूप धर्म ही है।)

प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला आविर्भाव।
लोक निस्तारिव – एइ ईश्वर स्वभाव॥
चै.च.अ. 2/4-6

श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी में नृसिंहावेश लक्ष्य करके श्रीमन्महाप्रभु ने उनका नाम रखा था – ‘श्रीनृसिंहानन्द’। श्रीचैतन्य शाखा में उनका भी नाम है।

श्रीनृसिंह – उपासक – श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी।
प्रभु ताँर नाम कैल ‘नृसिंहानन्द’ करि॥
चै.च.आ. 10/35

श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी श्रीनृसिंह भगवान के उपासक थे, श्रीमहाप्रभु ने उनका नाम श्रीनृसिंहानन्द रखा।

प्रद्युम्न ब्रह्मचारी, ताँर निज नाम।
नृसिंहानन्द’ नाम ताँर कैल गौरधाम॥
चै.च.अ. 2/53

वास्तव में इनका नाम श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी था, श्रीमहाप्रभु ने इनका नाम श्रीनृसिंह ब्रह्मचारी रखा था।

श्रीप्रयुयुन्न ब्रह्मचारी नृसिंहेर दास।
याँहार शरीरे श्रीनृसिंहेर प्रकाश॥
कीर्तने विहरे नरसिंह न्यासी रूपे।
जानिया रहिला आसि प्रभुर समीपे॥
चै.भा.अ. 3/186-87

अर्थात श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी नृसिंहदेव के सेवक थे। उनके शरीर में नृसिंहदेव का प्रकाश था। कीर्तन-विहारी श्रीप्रभु को सन्यासी रूप में नृसिंहदेव समझकर उनके समीप रहने लगे। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर ने श्रीचैतन्य भागवत में जो लिखा है उसे पढ़ने से पता चलता है कि प्रद्युम्न ब्रह्मचारी श्रीनृसिंहदेव के साथ साक्षात् रूप से बातें करते थे। रथयात्रा का दर्शन करने के लिये भक्तों के साथ नीलाचल में जाने के समय श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी का उक्त विषय के सम्बन्ध में उल्लेख हुआ है।

चलिल प्रद्युम्न ब्रह्मचारी महाशय।
साक्षात नृसिंह याँर संगे कथा कय॥
चै.भा.अ. 8/12

जो भगवान के स्वरूप को काल्पनिक व मायिक समझते हैं, भगवान की माया से मोहित वे नास्तिक लोग इन सब घटनाओं को अजीब समझकर ऐसे कटाक्ष करते हैं मानो वे बड़े ज्ञानी हों। ईश्वर विश्वासहीन, दुर्भाग्यशाली व्यक्ति अपने वास्तविक मंगल से वंचित हैं, उनको तो जन्म-मृत्युरूपी संसार का आवागमन रूप चक्र ही प्राप्त होता है।

जब श्रीमन्महाप्रभु ने कटवा में संन्यास लेने के बाद वृन्दावन की ओर यात्रा शुरु की तो श्रीनित्यानन्द प्रभु ने बड़ी कुशलता के साथ से उनका रास्ता बदल दिया और वे बड़े कौशल के साथ महाप्रभु को गंगा के किनारे पर बसे शान्तिपुर में ले आये। शान्तिपुर से श्रीमन्महाप्रभु जब पुरी पहुंचे तो उनके साथ थे – श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर पण्डित और श्रीमुकुंद दत्त। पुरी से फिर श्रीमन्महाप्रभु दक्षिण भारत गये थे। दक्षिण भारत से आकर श्रीमन्महाप्रभु ने गौड़देश होकर वृन्दावन जाने का संकल्प किया। श्रीमन्महाप्रभ गौड़देश में पहुंचकर विद्यानगर में श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य के भाई श्रीविद्यावाचस्पति के घर रहे, कुलिया ग्राम में श्रीदेवानन्द पण्डित और श्रीगोपाल चापाल को अपराध से मुक्त किया तथा रामकेलि ग्राम में श्रीरूप सनातन को मिले। श्रीरूप सनातन से साक्षात्कार करके जब महाप्रभु ने वृन्दावन जाने के लिये यात्रा शुरु की, तब श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी (श्रीनृसिंहानन्द) ने ध्यान द्वारा कुलिया नगर से वृन्दावन तक का जो रास्ता है, उसको रत्नों के साथ सुसज्जित करना शुरु कर दिया, जिससे श्रीमन्महाप्रभु को किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो, किन्तु गौड़ के निकटवर्ती ‘कानाई की नाट्यशाला’ तक तो सब ठीक था परन्तु उससे आगे के रास्ते को वे सुसज्जित न कर पाये तथा उनका ध्यान भंग हो गया। तभी श्रीनृसिंहानन्द समझ गये कि इस बार भी महाप्रभु कानाई की नाट्यशाला तक जाकर वापस आ जायेंगे, उनका वृन्दावन जाना नहीं होगा। द्रव्यमय सेवा से मानसिक सेवा श्रेष्ठ है। इसका पौराणिक दृष्टान्त भी है – प्रतिष्ठानपुर के गरीब ब्राह्मण ने मानसिक सेवा से शरीर सहित ही वैकुण्ठधाम में श्रीनारायण के पादपद्मों को प्राप्त किया था।

श्रीनृसिंहानन्द के प्रेम से आकृष्ट होकर श्रीमन्महाप्रभु कुमारहट्ट में श्रीशिवानन्द सेन के घर प्रकट हुये थे। श्रीचैतन्यचरितामृत में श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने अन्त्यलीला के दूसरे परिच्छेद में इस प्रसंग को सुन्दर रूप से वर्णन किया है। श्रीवृन्दावन से पुरुषोत्तम धाम में वापस आकर श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीशिवानन्द सेन के भानजे श्रीकान्त को निर्देश दिया कि वह गौड़देश में जाकर सब भक्तों को यह बता दे कि इस बार पौष मास में वे स्वयं ही गौड़देश आ रहे हैं, इसलिये वहां के भक्तों को इस बार पुरी में आने की जरूरत नहीं है। जब यह समाचार श्रीकान्त ने गौड़देश में आकर भक्तों को सुनाया तब सब के सब आनन्दित हो उठे। किन्त पौष मास के लगभग बीत जाने पर भी भक्तों ने देखा कि महाप्रभु आये नहीं। महाप्रभु के न आने पर श्रीशिवानन्द सेन और श्री जगदानन्द पण्डित हताश और दुःखित हो उठे। अचानक क्या हुआ कि श्रीनृसिंहानन्द उनके पास आ गये और उनको दुःखी देखकर तथा उनके दुःख का कारण जानकर उनको आश्वासन दिया और कहा कि वे और दुःख न करें, आज से तीसरे दिन वे महाप्रभु को यहां प्रकट करा देंगे। श्रीनृसिंहानन्द के प्रभाव को शिवानन्द और जगदानन्द पण्डित भली भांति जानते थे, इसलिये उन्होंने उनकी बात पर विश्वास कर लिया। दो दिन तक ध्यानमग्न रहने के बाद श्रीनृसिंहानन्द ने शिवानन्द से कहा कि महाप्रभु पानिहाटी तक आ गये हैं, कल दोपहर को वे कुमारहट्ट होते हुए आपके घर आयेंगे। अगले दिन श्रीनृसिंहानन्द ने रसोई बनाने के लिए सामान देने के लिए कहा। शिवानन्द सेन ने रसोई का सब सामान दे दिया। श्रीनृसिंहानन्द ने नाना प्रकार के अन्न-व्यंजन व खीर आदि बनाकर श्रीचैतन्य महाप्रभु , श्री जगन्नाथदेव और श्रीनृसिंहदेव के उद्देश्य से तीन अलग अलग भोग निवेदन किये। भोग निवेदन करके श्रीनृसिंहानन्द ध्यान कर ही रहे थे कि उसी क्षण श्रीचैतन्य महाप्रभु वहीं प्रकट हो गये तथा उन्होंने तीनों भोगों को ग्रहण कर लिया। यह देखकर कि महाप्रभु ने सब खा लिया श्री नृसिंहानन्द जी आनन्द से विह्वल हो उठे।

यद्यपि नृसिंहानन्द के हृदय में प्रसन्नता तो हुई कि महाप्रभु ने तीनों भोग ग्रहण कर लिये तथापि बाहर से कुछ दुःख प्रकाश करते हुये कहने लगे कि महाप्रभु और जगन्नाथ जी एकतत्व होने के कारण महाप्रभु ने दोनों भोग ग्रहण कर लिये, यह तो बात ठीक हुई, परन्तु श्रीनृसिंहदेव का भोग उन्होंने क्यों ग्रहण किया। आज तो फिर श्रीनृसिंहदेव को भूखा रहना पड़ेगा। श्रीमन्महाप्रभु, श्रीजगन्नाथदेव और श्रीनृसिंहदेव एक ही तत्व हैं, इस तत्व को समझाने के लिये ही महाप्रभु ने इस प्रकार की भोजनलीला की। महाप्रभु भोजन पाकर पानिहाटी चले गये। श्रीनृसिंहानन्द जब दुःख प्रकट कर रहे थे तो श्रीशिवानन्द सेन ने उनसे पूछा कि आपके दुःख का क्या कारण है? जवाब में श्रीनृसिंहानन्द ने कहा कि महाप्रभु अकेले ही तीनों भोग पा गये, श्रीजगन्नाथदेव और श्रीनृसिंहदेव तो उपवासी ही रह गये। श्रीशिवानन्द सेन के चित्त में सन्देह हो गया। श्रीनृसिंहानन्द की इच्छा से शिवानन्द सेन ने फिर से रसोई का सब सामान दिया। नृसिंहानन्द ने दोबारा रसोई तैयार करके श्रीनृसिंहदेव को भोग अर्पण किया।

वर्ष की समाप्ति पर जब श्रीशिवानन्द सेन भक्तों के साथ नीलाचल में महाप्रभु के पादपद्यों के पास पहुंचे तो महाप्रभु ने पौष मास में उनके घर जाकर श्रीनृसिंहानन्द द्वारा दिये भोग को पाने की बात सबको बताई। यह सुनकर सभी विस्मित हो उठे।

एक दिन सभाते प्रभु बात चालाइला।
नृसिंहानन्देर गुण कहिते लागिला॥
गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन।
कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्ठान्न व्यञ्जन॥
शुनि भक्तगण मने आश्चर्य मानिल।
शिवानन्देर मने तबे प्रत्य जन्मिल॥
चै.च.अ. 2/77-79

अर्थात् एक दिन श्री महाप्रभु ने सभा में कुछ बात चलाई एवं श्रीनृसिंहानन्द ब्रह्मचारी के गुण बखान करने लगे और कहने लगे – ‘गत वर्ष पौष मास में श्रीनृसिंहानन्द ने मुझे जो भोजन कराया वैसे मिष्ठान्न एवं व्यञ्जन मैंने कभी नहीं खाये हैं।’ प्रभु की यह बात सुनकर सब भक्तों को आश्चर्य हुआ कि प्रभु गतवर्ष तो नीलाचल से बाहर कहीं गये ही नहीं, ये क्या कह रहे हैं – किन्तु श्रीशिवानन्द के मन में जो संदेह था, वह नष्ट हो गया।