ये श्री नित्यानन्द शाखा में गिने जाते हैं तथा ये श्रीसंकर्षण के व्यूह हैं।

अमूं प्राविशतां कार्यात् सहजौ निशठोल्मुकौ।
मीनकेतन-रामादिर्व्यूहः संकर्षणोऽपरः॥
गौरगणोद्देश – 68

श्रीकृष्ण लीला के निशठ और उल्मुक नामक दोनों भाइयों ने इस नित्यानन्द व्यूह में प्रवेश किया था। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीला में ये दोनों ही मीनकेतन एवं रामदास के नाम से विख्यात हैं। श्रीगौरगणोद्देश दीपिका नामक ग्रन्थ में मीनकेतन और रामदास दोनों को अलग-अलग व्यक्ति के रूप में निर्देश किया गया है। किन्तु श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी एवं भक्त्तिरत्नाकर के रचयिता श्री नरहरिसरकार ठाकुर के वर्णन में स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है कि मीनकेतन रामदास एक ही व्यक्ति का नाम है। ऐसा भी हो सकता है कि जो बलदेव जी की लीला में निशठ – उल्मुक थे। श्रीनित्यानन्द की लीला में वे मीनकेतन रामदास नामक एक ही व्यक्ति में प्रविष्ट हो गये हों।

श्रीमीनकेतन रामदास के माता-पिता, आविर्भाव सन् और स्थान इत्यादि सांसारिक परिचय अविदित ही है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि श्रीचैतन्य चरितामृत के वर्णन करने वाले श्रील कविराज गोस्वामी के श्रीपाट झामटपुर के पास ही मीनकेतन रामदास का श्रीपाट (जन्मस्थान) था।

खेतुरी उत्सव में श्रीनित्यानन्द शक्ति श्रीजाह्नवा देवी के साथ जो नित्यानन्द के जो-जो पार्षद गये थे। उनमें से मीनकेतन रामदास भी एक थे। श्री भक्तिरत्नाकर ग्रन्थ को पढ़ने से मालूम होता है कि रामदासादि वैष्णवों के दर्शन से त्रिभुवन पवित्र हो जाता है –

संगेते चलिला महाभागवतगण ।
याँ सवार दर्शने पवित्र त्रिभुवन॥
श्रीमीनकेतन रामदास1 मनोहर ।
मुरारी चैतन्य, ज्ञानदास, महीधर॥
श्रीशंकर , श्रीकमलाकर पिप्लाई ।
नृसिंह, चैतन्य, जीव, पण्डित कानाई॥
भक्तिरत्नाकर 10/372, 374-75

‘श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी स्वरचित श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थ के आदि लीला के पांचवें परिच्छेद में श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु की महिमा वर्णन करने में ही मस्त हो गये और उसी मस्ती में उन्होंने नित्यानन्द के पार्षद मीनकेतन रामदास की महिमा भी वर्णन की है। अवधूत नित्यानन्द प्रभु की तरह नित्यानन्द के पार्षद मीनकेतन रामदास भी अवधूत की तरह ही विचरण करते रहते थे। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने ‘अवधूत’ शब्द के तात्पर्य के सम्बन्ध में लिखा है:- भा. 3/1/99 श्लोक की टीका में श्रीधर स्वामीपाद ने ‘अवधूत’ शब्द का अर्थ ‘असंस्कृत देह’ लिखा है। अवधूत नित्यानन्द के शिष्य भी महाभागवत परमहंस एवं वर्णाश्रमातीत नित्यसिद्ध थे। इसलिये उनके शरीर पर वर्णाश्रम का कोई चिह्न नहीं था। यही कारण था कि ये असंस्कृत शरीर में व्रज भाव में मस्त रहते थे।’

श्री मीनकेतन रामदास आमन्त्रित होने के कारण झामटपुर में श्रील कविराज गोस्वामी के घर में एक दिन सारी रात चलने वाले संकीर्तन में योगदान देने के लिये आये थे। उनके महाप्रेममय शरीर और अलौकिक भावों को देखकर सभी ने उनके चरणों की वन्दना की। प्रेम में विभोर होकर वे कभी किसी को वंशी तो किसी को थप्पड़ मारते थे। यहां तक कि कभी- कभी तो वे प्रेम में विभोर होकर किसी के कन्धों पर चढ़ बैठते थे। नदी की धारा के समान उनके दोनों नयनों से निरन्तर अश्रु प्रवाहित होते देखकर सबका मन और आंखें भर आयीं। अद्भुत अलौकिक अष्टसात्त्विक विकार उनके श्रीअंगों पर प्रकटित हो रहे थे। उनके द्वारा प्रेमोन्मत्त अवस्था में ‘नित्यानन्द’ का नाम लेकर हुंकार करने के कारण सबके हृदय दिव्य आनन्द से आनन्दित हो उठे। गुणार्णव मिश्र नामक एक विप्र श्रील कविराज गोस्वामी के घर पर श्रीमूर्ति की सेवा करता था। गुणार्णव मिश्र कनिष्ठाधिकारी वैष्णव होने के कारण अर्च्चा विग्रह की श्रद्धा के साथ सेवा करता था किन्तु भगवद् भक्तों को सम्मान प्रदान करने में उसका इतना आग्रह नहीं था। मीनकेतन रामदास ने लोकशिक्षा के लिए क्रोध दिखाते हुये कहा –

एइ त द्वितीय रोमहर्षण सूत।
बलदेव देखि ये न कैल प्रत्युद्गम।

नैमिषारण्य में ऋषियों की इच्छा से ही रोमहर्षण सूत भागवत पाठ करने के लिए व्यास आसन पर बैठे थे। उस समय जब बलदेव वहां पहुचे तो सभी ऋषि उन्हें देख उनके सम्मान हेतु आसन छोड़ खड़े हो गये किन्तु रोमहर्षण के ऐसा न करने पर बलदेव जी ने उन्हें सजा दी थी। दाम्भिक व्यक्ति का भागवत पाठ करने का व श्रीमूर्ति की पूजा करने का अधिकार नहीं है। भागवत साक्षात् श्री कृष्णाभिन्न स्वरूप है। पुजारी ब्राह्मण ने मीनकेतन रामदास के शासन को स्वीकार किया। वे उनकी मीठी डांट से असंतुष्ट नहीं हुये। उनके करने योग्य जो सेवा थी उन्होंने सभी की। किन्तु उत्सव समाप्त होने के पश्चात पुजारी के चले जाने पर कविराज गोस्वामी के भाई का मीनकेतन रामदास के साथ कुछ वाद-विवाद हो गया। कविराज गोस्वामी के भाई की श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्रति सुदृढ़ श्रद्धा थी किन्तु नित्यानन्द प्रभु के प्रति उनकी श्रद्धा नहीं थी। ये पता लगने पर कि इनकी नित्यानन्द के प्रति श्रद्धा नहीं है, मीनकेतन रामदास अत्यन्त दुःखी हुये और क्रोधित होकर उन्होंने अपनी वंशी तोड़ दी तथा तुरन्त वहां से चले गये। मीनकेतन के प्रति इस व्यवहार से कविराज गोस्वामी के भाई का सर्वनाश हो गया। कविराज गोस्वामी ने इस घृणित कार्य के लिये अपने भाई को मीनकेतन रामदास का पक्ष लेकर बहुत डांटा। कृष्ण दास के इस थोड़े से गुण से संतुष्ट होकर नित्यानन्द प्रभु ने कविराज गोस्वामी को स्वप्न में अपने स्वरूप के दर्शन दिये और उन्हें वृन्दावन धाम का वास प्रदान किया।

उपरोक्त घटना से ज्ञात होता है कि मीनकेतन रामदास नित्यानन्द प्रभु के कितने प्रिय थे। नित्यानन्द प्रभु की तरह नित्यानन्द पार्षद भी पतितपावन हैं तथा तमाम प्रकार के अभीष्ट प्रदान करने में समर्थ हैं।

1 – मीनकेतन रामदास – मीनकेतन रामदास और रामदास श्री अभिराम दोनों नित्यानन्द पार्षद होने पर भी एक ही व्यक्ति नहीं हैं। रामदास तो द्वादश गोपालों में से एक ‘श्रीदामसखा’ हैं । श्रीअभिराम ठाकुर का श्रीपाट खानाकूल – कृष्णनगर में है। इन्होंने ऐसी लकड़ी को अकेले उठा कर वहन किया था जिसे 32 आदमी मिल कर उठा सकें – गौरगणोद्देश दीपिका – 126

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से