श्रीमन्महाप्रभु ने दक्षिण भारत के जीवों का उद्धार करने के लिये पुरूषोत्तमधाम से वैशाख मास में दक्षिण की यात्रा की थी। श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु की विशेष प्रार्थना से उन्होंने सेवकरूप में कृष्णदास विप्र को भी साथ ले लिया था । कृष्णप्रेम बांटते -बांटते श्रीमन्महाप्रभु कूर्म स्थान1 में जा पहुंचे, जहाँ पर उन्होंने ‘कूर्म’ नामक वैदिक ब्राह्मण पर कृपा की थी। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने अपने रचित श्रीचैतन्यचरितामृत की मध्यलीला के सातवें परिच्छेद में कूर्म विप्र का नाम उल्लेख किया है । उसके इलावा उनके परिचय आदि के सम्बन्ध में कुछ भी लिखा नहीं है । श्रीभगवत् लीला की पुष्टि करने के लिये जो सब भगवत् पार्षद जगत में आते हैं, उनका स्वरूप अप्राकृत होने के कारण अक्सर उनके प्राकृत जगत का परिचयादि अज्ञात रहता है । जागतिक ऐतिहासिकगण चेष्टायुक्त होने पर जो उनक पिता -माता का परिचयादि जान पायें, ऐसी सम्भावना कम है । महाप्रभु के पार्षदों का जागतिक बाह्य परिचय जानने के लिये अधिक उत्कंठित न होकर उनके पूत चरित्र का शिक्षणीय विषय ही हमारे ग्रहण करने योग्य है।

कूर्म विप्र की प्रगाढ़ भक्ति से वशीभूत होकर श्रीमन्महाप्रभु ने उनकी सभी सेवाओं को ग्रहण किया था। विप्र को यह सौभाग्य मिला कि वे श्री महाप्रभु को अपने घर लाये और उनके श्रीचरणकमलों को जल से धोकर वह धौत जल सपरिवार पान किया तथा उनको अति प्रीति के साथ भोजन कराकर उनका अवशेष प्रसाद पाया ।

कूर्म नामे सेइग्रामे वैदिक ब्राह्मण ।
बहु श्रद्धाभक्तये कैल प्रभुर निमन्त्रण॥
घरे आनि प्रभु कैल पादप्रक्षालन ।
सेइ जल वंश सहित करिल भक्षण॥
अनेक प्रकार स्नेह भिक्षा कराइल ।
गोसाञिर प्रसादान्न सवंशे खाइल ॥

विप्र ने स्तव -स्तुति द्वारा महाप्रभु को प्रसन्न किया और उनका विरह सहन करने में असमर्थ होने के कारण प्रभु के साथ जाने की उत्कण्ठा प्रकट की। लेकिन श्रीमन्महाप्रभु ने ऐसी आकांक्षा का समर्थन न करके उनको घर में रहकर निरंतर कृष्णनाम करने एवं आचार्यरूप से सबको कृष्णनाम कराने का आदेश किया।

प्रभु कहे- ऐछे बात कभु ना कहिना।
गृहे वसि कृष्णनाम निरन्तर लैवा॥
यारे देख-तारे कह कृष्ण उपदेश।
आमार आज्ञाय गुरु हैया तार एइ देश॥
कभु ना बाधिवे तोमार विषय- तरंग।
पुनरपि एइ ठाञि पावे मोर संग॥

अर्थात् : श्रीमहाप्रभु ने कहा – “ऐसी बात कभी नहीं कहना । घर में रहकर निरन्तर श्रीकृष्ण नाम-संकीर्तन करो एवं जिसे देखो उसे ही श्रीकृष्ण नाम का उपदेश करो । मेरी आज्ञा से गुरु बन कर इस देश का उद्धार करो । इस प्रकार तुम कभी भी विषय- तरंगों के बन्धन में न आओगे । मैें फिर तुम्हें इसी स्थान पर आकर मिलूंगा। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीमन्महाप्रभु के उक्त आदेश के तात्पर्य विषय को अपने रचित अनुभाष्य में लिखा है-

“श्रीमन्महाप्रभु के लिये जो अपना सब कुछ त्यागकर एकान्त भाव से उनका आश्रय लेकर सेवा करने का संकल्प लेता है, भगवान् श्रीगौरसुन्दर भी उसके भजन को स्वीकार कर यह शिक्षा देते हैं कि घर में रहकर अर्थात् ‘उत्कट- भजन-परायण’ अभिमान को छोड़कर गृहवास रूपी दीनता के साथ निरन्तर कृष्णनाम ग्रहणरूपी आचरण करके शुद्धकृष्णनाम का भजन और प्रचार करो । ‘मैं सर्वोत्तम वैष्णव हूँ, इस अभिमान से शिष्य करने से, मैं कृष्णदास हूं यह शुद्ध अभिमान नष्ट हो जाता है । इसलिए मैं सर्वोत्तम वैष्णव हूं इस अभिमान को त्यागकर दीनता के साथ शुद्ध नाम का प्रचार और आचरण करने से जड़ अभिमान रूपी विषय की तरंग बढ़ नहीं सकती । श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीजीव और श्रीरघुनाथ दास आदि पार्षद महात्माओं ने ग्रन्थ लिखकर जो उपदेश – प्रदान किया है तथा श्रीमन् नरोत्तम, श्रील मध्व -रामानुजादि ने जो बहुत से शिष्य बनाये हैं उसको भक्त्यंग का बाधक और विषय- तरंग कहकर कल्पना करने वाले अनेक निर्वोध लोक वास्तविक अकिंचन भक्तों के चरणों में अपराध कर बैठते हैं। इसलिये इन हरिविमुख व्यक्तियों के प्रति प्रतिशोध की भावना को न दिखाकर अपने भजन में वृद्धि के लिए प्रयास करें, जगद्गुरु आचार्य के रूप में श्रीगौरांग महाप्रभु की यही शिक्षा है।

इसी कूर्मक्षेत्र में ही श्रीमन्महाप्रभु कुष्ठी2 वासुदेव विप्र की अनन्य भक्ति और आर्ति से आकृष्ट हुये थे तथा उसका उद्धार करने के लिये उसको गले लगाकर परमसुन्दर किया था साथ ही प्रसन्न होकर आश्वासन दिया कि सुन्दर शरीर पाकर उनको किसी प्रकार का अभिमान नहीं होगा, कृष्णनाम के उपदेश द्वारा सभी जीवों के उद्धार के लिये भी उनको आदेश किया था । कृष्णबहिर्मुख जीवों की दुर्दशा देखकर उनके उद्धार के लिये भगवान तथा भगवान के निजजनों का कैसा असीम स्नेह और करूणा है वह श्रीमन्महाप्रभु की उक्ति और श्रील सरस्वती गोस्वामी ठाकुर की उक्ति से स्पष्टरूप से प्रतीत होती है श्रीमन्महाप्रभु के कूर्मक्षेत्र से प्रस्थान करने पर कूर्म विप्र और वासुदेव विप्र दोनों एक दूसरे को आलिंगन करके महाप्रभु के गुण और महिमा का कीर्तन करते-करते प्रेमाविष्ट हो गये।

1 कूर्मस्थान – दक्षिण पूर्व रेल लाइन से गंजाम ज़िला में श्रीकाकुलम रोड’ स्टेशन से 8 मील पूर्व की ओर ही ये कुर्मांचल या श्रीकूर्म नामक स्थान है। ये तैलेंगदेशीय व्यक्तियों का सर्वोत्तम तीर्थ है। प्रपन्नामृत में ऐसा कहा है कि जब पुरुषोत्तम धाम में श्रीरामानुजाचार्य ने श्रीजगन्नाथ देव जी के सेवकों को भक्ति-सदाचार की शिक्षा देने का प्रयास किया तो श्री जगन्नाथ देव जी ने श्रीरामानुजाचार्य को रात के समय उठाकर कूर्मक्षेत्र में गिरा दिया।

2 बहु स्तुति करि’ कहे शुन दयामय।
जीवे एइ गुण नाहिं तोमाते एइ हय॥
मोरे देखि मोर गन्धे पलाय पामर।
हेन मोरे स्पर्श तुमि, – स्वतंत्र ईश्वर॥
किन्तु आछिलाङ भाल अधम हइया।
एबे अहंकार मोर जन्मिबे आसिया॥
चै.च.म. 7/144-46

वासुदेव विप्र के चरित्र द्वारा भगवान् जगत् वासियों को यह शिक्षा दे रहे हैं कि वे केवल अनन्यभक्ति द्वारा ही जीते जा सकते हैं। लौकिक किसी भी प्रकार के गुण द्वारा नहीं जीते जाते। अनन्य भक्त की बाहरी कोई भी कुरूपता या नीच अवस्था भगवान नहीं देखते हैं।