कवि कर्णपूर श्रीचैतन्य शाखा में गिने जाते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रिय पार्षद श्री शिवानन्द सेन इनके पिता हैं। कवि कर्णपूर ने स्वरचित गौरगणोद्देशदीपिका में अपने पिता का परिचय इस प्रकार दिया है –
पुरा वृन्दावने वीरादूती सर्वाष्च गोपिकाः।
निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जनको मम।
व्रजे बिन्दुमती यासीदद्य सा जननी मम।
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पहले अर्थात श्रीकृष्ण लीला में जो वृन्दावन की वीरादूती थीं, जो सब गोपियों को श्रीकृष्ण के पास ले गयी थीं, वही इस समय, अर्थात गौरलीला में मेरे पिता शिवानन्द सेन हैं। और जो व्रज में बिन्दुमती थीं, इस समय वही मेरी जननी हैं, परन्तु वहाँ पर कवि कर्णपूर ने अपना परिचय प्रदान नहीं किया। उनके द्वारा दिये गये अपने माता-पिता के परिचय से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वह भी स्वरूप से व्रजलीला में कृष्णलीला के पार्षद ही होंगे। वे सन् 1527 ई. में कान्चन ग्राम (कांचनपाड़ा) में आविर्भूत हुये थे। इनका माता- पिता जी द्वारा दिया गया नाम श्रीपरमानन्द दास (श्री परमानन्द सेन) या पुरीदास था। शिवानन्द सेन के तीन पुत्रों में से कवि कर्णपूर सब से छोटे थे। शिवानन्द के बड़े पुत्र का नाम श्रीचैतन्य दास और बीच के पुत्र का नाम श्रीरामदास था।
चैतन्य दास, रामदास आर कर्णपूर ।
तीन पुत्र शिवानन्देर प्रभु भक्त सूर।
चै.च.आ. 10/62
श्री शिवानन्द सेन जी के सम्बन्ध से उनकी पत्नी और तीनों पुत्रों ने श्रीमन्महाप्रभु की अपार कृपा प्राप्त की थी। महाप्रभु का साक्षात् आदेश था कि जितने दिन शिवानन्द सेन, उनकी पत्नी व परिवार के अन्यान्य लोग पुरी में रहेंगे । उतने दिन मेरा अवशेष पात्र अर्थात थाली में बचा प्रसाद उन्हें मिलेगा।
शिवानन्द सेन और उनके पारिवारिक लोग महाप्रभु के कितने प्रिय थे, ये महाप्रभु के इस निर्देश से ही जाना जा सकता है।
शिवानन्देर प्रकृति पुत्र यावत एथाय।
आमर अवशेष पात्र तारा येन पाय॥
चै.च.अ. 12/53
श्रीमन् महाप्रभु के निर्देशानुसार ही शिवानन्द के छोटे पुत्र का नामकरण हुआ था महाप्रभु ने ही उसका नाम परमानन्द दास रखा था । महाप्रभु उपहास में बालक को पुरी दास कह कर बुलाते थे। श्री जगन्नाथ पुरी में श्रीमन्महाप्रभु के आशीर्वाद से शिवानन्द सेन के अन्तिम या कनिष्ठ तृतीय पुत्र के होने पर श्रीमन् महाप्रभु द्वारा उसका नाम पुरीदास रखा गया था, ऐसा भी कहा जाता है।
छोट पुत्रे देखि प्रभु नाम पुछिला ।
परमानन्ददास’ नाम सेन जानाइला॥
पूर्वे यबे शिवानन्द प्रभु स्थाने आइला।
तबे महाप्रभु तांरे कहिते लागिला॥
एबार तोमार येइ हइबे कुमार।
‘पुरीदास’ बलि नाम धरिह ताहार॥
तबे मायेर गर्भे हय सेइ त’ कुमार।
शिवानन्द घरे गेल जन्म हैल ताँर॥
प्रभु आज्ञाय धरिल नाम ‘परमानन्ददास’।
पुरीदास बलि प्रभु करेन उपहास॥
चै.च.अ. 12 /45-49
अर्थात् : सबसे छोटे लड़के को देखकर श्री महाप्रभु ने उसका नाम पूछा, श्री सेन ने बताया कि इसका नाम परमानन्ददास’ है।
पहले जब श्री शिवानन्द प्रभु दर्शन करने नीलाचल में आये थे, तब श्रीमहाप्रभु ने इनसे कहा था कि ‘शिवानन्द! अब के जो तुम्हारे घर पुत्र पैदा होगा, उसका नाम तुम ‘पुरीदास’ रखना। उस समय यही बालक माँ के गर्भ में था, जब श्री शिवानन्द सेन अपने देश को लौट कर गए, तब इसका जन्म हुआ था। श्री शिवानन्द ने प्रभु की आज्ञानुसार इसका नाम ‘परमानन्ददास’ (परमानन्ददास पुरी) रख दिया था। अब इस लड़के का नाम सुनकर श्रीमहाप्रभु ने इसे ‘पुरीदास’ नाम से पुकार कर उपहास किया।
शिवानन्द सेन जब पुरी दास को महाप्रभु के पास लाये तो अत्यन्त स्नेह से भर कर महाप्रभु ने अपने पैर का अंगूठा उस छोटे से बालक के मुख में दे दिया। पुरीदास की आयु जब मात्र 7 वर्ष की थी तो उसी समय उसका अद्भुत कवित्व देखकर श्रीमहाप्रभु ने उसका नाम ‘कविकर्णपूर’ रखा था।
श्रीचैतन्य चरितामृत में कविराज गोस्वामी ने अन्त्य लीला के 16वें परिच्छेद में ये प्रसंग इस प्रकार से वर्णन किया है –
जिस वर्ष श्रीशिवानन्द सेन अपनी पत्नी को साथ में लेकर पुरी आये थे, उस वर्ष छोटे पुत्र पुरीदास को भी साथ में लाये थे। शिवानन्द सेन पुत्र के साथ महाप्रभु के पास आये और उन्होंने अपने उस छोटे से पुत्र से महाप्रभु की चरण वन्दना करवायी। तब महाप्रभु ने स्नेहाविष्ट होकर उसे ‘कृष्ण’ कहो, ‘कृष्ण’ कहो – बार बार कहा परन्तु बार बार कहने पर भी बालक ने कृष्ण नाम का उच्चारण नहीं किया। पिता के बहुत तरह से प्रयास करने पर भी वे बालक के मुख से कृष्ण नाम उच्चारण नहीं करवा सके। इस पर महाप्रभु ने आश्चर्यचकित होकर कहा – मैंने सारे जगत के लोगों से कृष्ण नाम करवाया है, यहाँ तक कि पेड़-पौधों तक को भी मैंने कृष्ण नाम करवाया है किन्तु इस छोटे बालक को मैं कृष्ण नाम नहीं करा पा रहा हूं। आखिर बात क्या है ? स्वरूप दामोदर ने इसका कारण बताते हुए कहा कि मैं तो ये समझता हूं कि आपने इसको कृष्ण नाम मन्त्र दिया है। मन्त्र उच्चारण करना मना है, इसलिये यह मन-मन में जप कर रहा है। पुरीदास को इतनी छोटी उम्र में इस बात का ज्ञान है कि मन्त्र उच्चारण करना निषेध है, जानकर महाप्रभु प्रसन्न हुये। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में लिखा है कि श्रीगुरुदेव से प्राप्त मन्त्र का दूसरे के सामने उच्चारण करने से उसका वीर्य नष्ट हो जाता है अर्थात शक्ति नष्ट हो जाती है। श्रीगदाधर पण्डित के आख्यान से हमें पहले ही यह मालूम हो चुका है। इसी कारण से श्रीपुरीदास ने श्रीमन् महाप्रभु द्वारा दिये गये कृष्ण नाम का उच्चारण नहीं किया। महाप्रभु ने पुरी दास का मौन भंग करने के लिए उसे ‘पुरीदास पढ़ो’ कहकर पाठ करने के लिये कहा। इस पर पुरीदास ने अपने मौन को भंग कर एक श्लोक कहा –
श्रवसोः कुवलयमक्ष्णो रन्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥
जो कर्णो के नीलकमल, चक्षुओं के अंजन, वक्षस्थल के महेन्द्रमणिदाम और वृन्दावन की रमणियों के अखिल भूषण हैं उन श्री हरि की जय हो ।
वहाँ पर उपस्थित सभी ये सोचकर चमत्कृत हो उठे कि मात्र सात वर्ष का शिशु, इतनी छोटी उम्र में इसने कुछ अध्ययनादि किये बिना ही किस तरह इस श्लोक का उच्चारण किया। श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा को तो ब्रह्मादि देवगण भी नहीं समझ सकते तब साधारण जीव की तो बात ही क्या है। जबकि कवि कर्णपूर ने महाप्रभु से कृष्ण नाम- मन्त्र के अनुशीलन करने का आदेश प्राप्त किया, तथापि उन्होंने सामाजिक प्रथा के अनुसार अद्वैत शाखा में श्रीनाथ पण्डित से मन्त्र ग्रहण किया था। कवि कर्णपूर ने स्वरचित ‘श्रीआनन्द वृन्दावन चम्पू’ ग्रन्थ के प्रारम्भ में श्रीनाथ पण्डित की वन्दना की है। श्रीमन्महाप्रभु श्रीशिवानन्द की सारी गोष्ठी को अपना ही समझते थे। कवि कर्णपूर ने महाप्रभु को ‘कुलाधिदैवत’ कह कर प्रणाम किया है। कवि कर्णपूर के गुरुदेव श्रीनाथ विप्र द्वारा स्थापित कृष्णदेव विग्रह अभी भी कुमारहट्ट (किसी-किसी के अनुसार कांचनपाड़ा) में विराजित है।
कवि कर्णपूर ने जिन-जिन ग्रन्थों की रचना की उनमें से उल्लेखनीय हैं – श्रीचैतन्य चरितामृत महाकाव्य, आनन्द वृन्दावन चम्पू, अलंकार कौस्तुभ, श्रीचैतन्यचन्द्रोदय नाटक, श्रीगौरगणोद्देश दीपिका, वृहद्गणोद्देश दीपिका, आर्यशतक, दशमस्कन्ध श्रीमद्भागवत की टीका, श्रीचैतन्य सहस्त्र नाम और केशवाष्टक । 1498 शकाब्द तक इन्होंने ग्रन्थादि की रचना की।
प्रभु प्रिय कवि कर्णपूर ग्रन्थ कैला।
सनातने ये प्रमाद ताहा जानाइला॥
-भ.र. 1/657
गुणचूड़ा सखी हन कवि कर्णपूर।
कांचनपाड़ाय वास चैतन्य शाखा शूर॥
वृद्ध- पदांगुष्ठ याँरे मुखे दिला।
पुरी दास नाम बलिशक्ति संचारिला॥
– वैष्णवाचार दर्पण
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से