श्रीमलाकरः पिप्पलाइनाम्नासीद्यो महाबलः।
(गौर गगोद्देश दीपिका 128)

व्रज में द्वादश गोपालों में से अन्यतम जो “महाबल” थे, वे ही गौरलीला में नित्यानन्द जी के पार्षद कमलाकर पिप्पलाई के रूप में अवतीर्ण हुए।

कमलाकर पिप्पलाई-अलौकिक रीत।
अलौकिक प्रेम ताँर भुवने विदित॥
(चै.च.आ. 11/24)

महाबल गोपाल ये छिल वृन्दावने।
कमलाकर पिपलाई सेई से एखाने।
दिवा रात्रि करे राधा-कृष्ण गुणगान।
नित्यानन्द प्रभु शाखा वैष्णवेर प्राण॥
गंगार पश्चिमतीरे माहेशे रहिल।
जगन्नाथ प्रतिमूर्ति सेवा कैल॥
(वैष्णव विचार दर्पण)

आक्ने माहेशे जन्म जागेश्वरै स्थित।
कमलाकर पिप्पलाई एइ ये लिखित॥
(श्रीपाट पर्यटन)

श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान में कमलाकर पिप्पलाई का आविर्भावकाल 1414 शक सम्वत् निर्देशित हुआ है। उनके पिता एक धनवान ज़मींदार थे। आपका आविर्भाव स्थान सुन्दरवन में खालिजुलि गाँव में था। आपके छोटे भाई का नाम श्रीनिधिपति पिप्पलाई था। आप राढ़ीय श्रेणी के शौक्र ब्राह्मण कुल में आविर्भूत हुए थे।

खालिजुलि गाँव में आविर्भूत होकर भी हुगली जिले के अन्तर्गत, श्रीरामपुर रेलवे स्टेशन से ढाई मील दूर ‘माहेश’ नामक गाँव में इन्होंने वास किया था। माहेश के ” श्रीजगन्नाथ” विग्रह इन्हीं द्वारा प्रतिष्ठित हैं। पहले माहेश ग्राम में जंगल ही जंगल था। श्रीकमलाकर पिप्पलाई के शुभागमन के पश्चात् यह सुन्दर गाँव के रूप में बदल गया तथा इनके आने के बाद ही इस गाँव की प्रसिद्धि हुई।

श्रीभक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में कमलाकर पिप्पलाई के सम्बन्ध में दो कहावतों का उल्लेख किया है—

1. श्रीकमलाकर पिप्पलाई के छोटे भाई श्रीनिधिपति पिप्पलाई ने अपने बड़े भाई की बहुत स्थानों पर खोज की। ढूँढते-ढूँढते अन्त में माहेश गाँव में जाकर उन्हें अपने बड़े भाई के दर्शन हुए। बहुत चेष्टा करने पर भी जब वे अपने बड़े भाई को वापिस न ला सके तो स्वयं ही परिवार के सदस्यों के साथ वहाँ जाकर वास करने लगे। अब भी माहेश ग्राम में कमलाकर पिप्पलाई के वंशजों के बीस घर हैं।

2. ‘ध्रुवानन्द’ नामक एक उदासीन वैष्णव पुरुषोत्तम क्षेत्र में गए थे। उनको अपने हाथ से बना कर श्रीजगन्नाथ देव को भोग लगाने की प्रबल इच्छा हुई। श्रीजगन्नाथ देव ने स्वप्न में उनको गंगा किनारे “माहेश” जाकर उनकी (श्रीजगन्नाथ की) प्रतिष्ठा कर अपने हाथ से रसोई करके भोग लगाने का निर्देश दिया। ध्रुवानन्द जी ने माहेश जाकर देखा कि श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव और श्रीसुभद्रा जी जल में तैर रहे हैं। वे गंगाजल से उन्हें निकाल कर गंगा के किनारे एक कुटिया बना कर उनकी सेवा करने लगे। इनके अप्रकट हो जाने के बाद कौन व्यक्ति श्रीजगन्नाथ जी की सेवा सुचारु रूप से करेंगे—इस विषय में चिंतामग्र होने पर श्रीजगन्नाथ जी ने उनको स्वप्न में दर्शन देकर कहा—”सुन्दरवन के निकट खालिजुलि ग्राम में कमलाकर पिप्पलाई नामक हमारे एक भक्त वैष्णव हैं। वे हमारे द्वारा स्वप्न में आदेश प्राप्त कर तुम्हारे पास आवेंगे। तुम उन्हें यह सेवा समर्पित कर देना।”

दूसरे दिन कमलाकर पिप्पलाई स्वप्न द्वारा निर्देश प्राप्त करके वहाँ आए। ध्रुवानन्द जी ने उनको श्रीजगन्नाथ, श्रीबलदेव और श्रीसुभद्रा जी की सेवा प्रदान कर दी। श्रीकमलाकर पिप्पलाई को श्रीजगन्नाथ की सेवा का अधिकार मिलने के कारण, अधिकारी की उपाधि मिली। उसी समय से उनके वंश में अधिकारी उपाधि प्रचलित हुई। राढी़य श्रेणी के शौक्र ब्राह्मणों में पचपन प्रकार के ग्रामीणों में पिप्पलाई सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्त भगवान की सेवा के लिए सदा उत्कण्ठित व व्याकुल रहते हैं, इसीलिये भगवान भक्त को सेवा के लिए निर्देश देते हैं, अभक्त को नहीं देते। कमलाकर पिप्लाई श्रीजगन्नाथ देव के आदेश को प्राप्त करते ही स्वयं को कृतकृतार्थ समझते हुये उसी समय पारिवारिक जनों का त्याग कर माहेश की ओर चल दिये।

स्थूल-सूक्ष्म इन्द्रिय तर्पण में रुचि रखने वाले कामातुर बद्धजीव विष्णु और वैष्णवों की सेवा के नाम से ही डर जाते हैं। सदा उस को बोझ समझते हैं। वे नाना उपायों से सेवा से अलग रहने की चेष्टा करते हैं। वे विष्णु वैष्णव की सेवा प्राप्ति को भी एक प्रकार का धन नहीं समझते। विषयी लोग जैसे धन कहने से विषय भोग को ही समझते हैं तथा उसे ही सुख व लाभ समझते हैं, उसी प्रकार भक्त लोग विष्णु वैष्णवों की सेवा की प्राप्ति को ही परम धन बताते हैं। दुनियाँ की नज़रों में भक्त गृहस्थ आश्रम में रहने की लीला करने पर भी, वे साधारण विषयी गृहस्थों की भाँति नहीं होते। भगवत् इच्छानुसार गृहस्थाश्रम में रहने पर भी भक्तों के चित्त हमेशा भगवत्-विरह की तन्मयता को प्राप्त किए रहते हैं। भगवान का निर्देश प्राप्त होते ही वे परमोल्लास के साथ सांसारिक सम्बन्धों को परित्याग करके भगवत् सेवा में लग सकते हैं। इस प्रकार के भक्तों के द्वारा संसार का त्याग ज्ञानियों व योगियों की भान्ति कष्टदायक नहीं होता, यह तो स्वाभाविक और स्वतः स्फूर्त होता है।

कमलाकर जी के पुत्र का नाम चतुर्भुज था। चतुर्भुज के दो पुत्रों का नाम श्रीनारायण और श्रीजगन्नाथ था। श्रीनारायण के पुत्र थे—श्रीजगन्नाथ जी तथा जगन्नाथ जी के जगदानन्द और श्रीजगदानन्द के पुत्र श्रीराजीव लोचन थे। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने इस प्रकार उनके वंश के कई पुरुषों का वर्णन किया है। श्रीकमलाकर पिप्पलाई जी के जीवनकाल में श्रीजगन्नाथ देव की सेवा के लिए पहले काफी अधिक कठिनता थी। परन्तु धीरे-धीरे माहेश के जगन्नाथ जी की महिमा चारों ओर फैलने लगी। महिमा प्रचारित होने से ढाका के नवाब वालिश सा (सूजा) ने बंगाब्द 1060 में श्रीजगन्नाथ देव को 1185 बीघा ज़मीन दान की। माहेश के 1 कोस पश्चिम में श्रीजगन्नाथपुर ग्राम में उक्त ज़मीन है। श्रीजगन्नाथ जी नाम से ही उक्त गाँव का नाम श्रीजगन्नाथपुर हुआ।

श्रीनित्यानन्द जी के वंश विस्तार ग्रन्थ में इस प्रकार लिखा हुआ है—

माहेश निवासी एक विप्र शुद्ध चित्त।
विष्णु वैष्णव पूजा कर नित्यकृत्य॥
सुधामय नाम पिप्पलायेर जामाता।
विद्युन्माला नाम हय तार वनिला॥

कमलाकर पिप्पलाई की कन्या विद्युन्माला के साथ माहेश निवासी श्रीसुधामय चट्टोपाध्याय का विवाह हुआ। उनकी कन्या नारायणी देवी थीं, जिसके साथ श्रीवीरभद्र प्रभु का विवाह हुआ। माहेश के अधिकारियों के मतानुसार कन्या का नाम राधारानी था।
(गौड़ीय वैष्णव अभिधान)

श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर जी ने श्रीवीरभद्र प्रभु के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है-हुगली ज़िले के अन्तर्गत झामटपुर ग्राम के निवासी यदुनाथाचार्य व विद्युन्माला (लक्ष्मी) की अपनी कन्या श्रीमति तथा उनके द्वारा पालित कन्या श्रीमति नारायणी से श्रीवीरभद्र प्रभु जी ने विवाह किया।

श्रीयदुनन्दन, शुद्धचित्त हन नानाविध गुणालय,
भार्या विद्युन्माला, लक्ष्मीसम लीला।
पिता याँर पिप्पलाई,
माहेश निवास, जगन्नाथे आश॥
अन्य आशा किछुइ नाइ,
श्रीकमलाकर, याहार श्वशुर।
जामाता यदुनन्दन।
(वैष्णवाचार दर्पण)

श्रीकमलाकर पिप्पलाई 1839 शकाब्द में पाणिहाटि के दण्ड महोत्सव, खेतरी महोत्सव और काटोया के दास गदाधर जी द्वारा प्रदत्त महोत्सव में उपस्थित थे—

कमलाकर पिप्पलाई बड़ भावेर उद्दाम।
नित्यानन्द दिला याँरै पाणिहाटि ग्राम॥
(विजय खण्ड)

खड़दह से अपने गणों के साथ श्रीजाह्नवा देवी जब खेतुरी उत्सव में योगदान करने के लिए गयी थीं, उस समय कमलाकर पिप्पलाई भी उनके साथ उपस्थित थे। श्रीभक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में (10/375) लिखा है—

श्रीशंकर, कमलाकर पिप्पलाई।
नृसिंह, चैतन्य, जीव, पण्डित कानाई॥

वैष्णवाचार दर्पण के मतानुसार कन्या के विवाह कर देने के बाद ये वृन्दावन धाम चले गए थे एवं वहीं पर उन्होंने अपनी अप्रकट लीला की। माहेश के अधिकारी कहते हैं कि श्रीकमलाकर पिप्पलाई का तिरोधान 1485 शकाब्द की चैत्री शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था। तब श्रीकमलाकर पिप्पलाई 71 वर्ष के थे।

स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से