श्रीगौरगणोद्देशदीपिका ग्रन्थ में श्रीकालिदास का पूर्व परिचय देते हुए “पुलिन्दकन्या मल्ली”। इस रूप से उल्लिखित किया है।

पुलिन्द तनया मल्ली कालिदासोऽधुनाभवत्
– गौः ग.दी . 190 ।

श्रीमन्महाप्रभु के भक्त श्री कालिदास कायस्थकुल में आविर्भूत हुए थे। श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी की आविर्भाव स्थली (कृष्णपुर ग्राम, हुगली ज़िला में सप्तग्राम के अन्तर्गत) से तीन मील दक्षिण में एवं बैण्डल जन्कशन से एक मील पश्चिम में ‘भेदो’ या ‘भदोया’ ग्राम में श्रीकालिदास – भुईंमाली कुल में आविर्भूत हुए । श्रीझड़ू ठाकुर का जन्म पाट भी “भेदोग्राम” में हैं। श्रीपाट का डाकघर देवानन्दपुरग्राम है । श्रीकालिदास के सेवित विग्रह पहले शंखनगर में विराजित थे । अभी वे विग्रह त्रिवेणी में सेवत हो रहे हैं। झड़ू ठाकुर के सेवित विग्रह श्रीमदन भदुया ग्राम में ही पूजित हो रहे है ।श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्रीकालिदास और श्रीझड़ू ठाकुर की महिमा स्वरचित “श्रीचैतन्य चरितामृत” के अन्त्यलीला के सोलहवें परिच्छेद में वर्णन की है । उसमें उन्होंने श्रीकालिदास का पूर्व परिचय भी लिखा है। श्री कालिदास श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी के चाचा थे।

रघुनाथदासेर तिँहों हय ज्ञाती खूड़ा ।
वैष्णवेर उच्छिष्ट खाईते तेँहों हुइला बूड़ा॥
चै.च.अ. 16/8

महाभागवत श्रीकालिदास हमेशा कृष्ण नाम करते थे । व्यवहार में भी “हरे कृष्ण” नाम उच्चारण करना उनका सभी कार्यों में संकेत था। वैष्णव का उच्छिष्ट (जूठा) ग्रहण करके श्रीकालिदास ने स्वयं भगवान महाप्रभु की जिस प्रकार कृपा लाभ की थी, उसको अद्भुत ही कहना होगा ।

वैष्णव में विश्वास और वैष्णव उच्छिष्ट ग्रहणकारी व्यक्ति होने के नाते भगवान उन पर इतने प्रसन्न हुए कि इनको भगवान ने न देने वाली वस्तु को भी दे दिया: –

ताते वैष्णवेर झूठा, खाओ छाड़ी, घृणा लाज ।
याहा हैते पाइवा वान्छित सब काज॥
कृष्णेर उच्छिष्ट हय ‘महाप्रसाद’ नाम ।
‘भक्तशेष’ हइले ‘महामहाप्रसादाख्यान’॥
भक्तपदधूली आर भक्तपदजल ।
भक्त भुक्त शेष, – एइ तिन साधनेर बल॥
एई तिन सेवा – हैते कृष्णप्रेमा हय ।
पुनः पुनः सर्वशास्त्रे पुकारिया कय॥
ताते बार बार कहि, – सुन भक्त गण ।
विश्वास करिया कर ए-तिन सेवन॥
तिन हैते कृष्णनाम- प्रेमेर उल्लास ।
कृष्णेर प्रसाद, ताते साक्षी कालिदास॥
– चै.च.अ. 16/ 58-63

गौड़ देश में रहते समय श्रीकालिदास उच्च और निम्न वर्ण के समस्त वैष्णवों का उच्छिष्ट ग्रहण करते थे। वे उत्तम वस्तु लेकर भक्तों के घर जाकर उसे उनकी सेवा के लिए प्रदान करते थे। भक्तों के आहार कर लेने के पश्चात उनका उच्छिष्ट प्रसाद प्रार्थना करके लेते थे । जो अपना उच्छिष्ट देने की इच्छा नहीं करते , उनका उच्छिष्ट वे छिपकर ग्रहण करते थे। भक्त लोग आहार करने के पश्चात जहाँ पत्ता इत्यादि फेंकते थे, छिपकर वहाँ जाकर उक्त उच्छिष्ट प्रसाद चाट कर खाते थे । जिस किसी कुल में आविर्भूत होने से भी वैष्णव सर्व पूज्य हैं । वैष्णव गुणातीत, जाति और वर्ण के अन्तर्गत नहीं हैं। वैष्णव में जाति-बुद्धि करने से नरक-गति होती है। श्रीझड़ू ठाकुर भुँईकुल में आविर्भूत होते हुए भी परम वैष्णव थे। एक दिन श्रीकालिदास उनके घर में गये और उनको तथा उनकी सहधर्मिणी को प्रणाम व वन्दना करके उन्हें सुस्वादिष्ट आम भेंट किये । श्रीझड़ू ठाकुर ने श्रीकालिदास को सर्वोत्तम अतिथि जानकर उनका बहुत सम्मान किया एवं अत्यन्त दैन्यभाव से कहने लगे। मैं नीच जाति का हूँ, किस प्रकार से आपकी सेवा कर सकता हूँ ? आप आज्ञा कीजिए ब्राह्मण-घर में आपकी रसोई की व्यवस्था कर दूँ ? आप के वहाँ प्रसाद ग्रहण करने से मैं कृतार्थ हो जाऊँगा । श्रीकालिदास श्रीझड़ू ठाकुर के वैष्णवोचित् दैन्य भरे वाक्य सुनकर कहने लगे, ‘मैं अत्यन्त पतित और अधम हूँ। बहुत सौभाग्य से आपका दर्शन करके कृतार्थ हुआ हूँ। आप कृपा पूर्वक अपनी पादपद्म-धूलि मेरे मस्तक पर अर्पण कर दें। श्रीझड़ू ठाकुर ये सुनकर और भी संकुचित और लज्जित होकर श्रीकालिदासजी को वैष्णव महिमा सूचक कुछ श्लोक पाठ करके सुनाने लगे । ‘न मेऽभक्तश्चतुर्वेद………’, विप्रादद्विषड – गुणयुताद……..’, अहोवत श्वपचोऽतो……….’ इत्यादि। शास्त्रों के इन श्लोकों को सुनकर श्रीकालिदास दीनता पूर्वक कहने लगे कि शास्त्रों के यह वचन सत्य हैं पर यह उन पर लागू नहीं होते क्योंकि वह वैष्णव नहीं हैं। इसके बाद श्रीकालिदास ने श्रीझड़ू ठाकुर को प्रणाम करके विदाई ली और श्रीझड़ू ठाकुर उनका कुछ दूर तक अनुगमन करके वापस आ गए। श्रीकालिदास ने संयोग पाकर श्रीझड़ू ठाकुर के चरणचिन्ह जहाँ -जहाँ पड़े थे, वहाँ की धूलि को अपने सब अंगों में लगाया । श्रीझड़ू ठाकुर का उच्छिष्ट (जूठा) ग्रहण करने की लालसा से श्रीकालिदास एक स्थान पर छिपकर खड़े हो गए । श्रीझड़ू ठाकर ने घर आकर भक्त कालिदास के आमों को काटकर केले के पत्ते के ऊपर रख कर मन-मन में कृष्ण को अर्पण किया। श्रीझड़ू ठाकुर की पत्नी ने कृष्ण में अर्पित आम के फलों को केले के पत्ते से उठाकर पति को दिया । श्रीझड़ू ठाकुर ने परम सन्तोष के साथ उन आमों को चूस कर उनकी गुठलियों को पत्ते पर रख दिया। सती साध्वी वैष्णव स्त्री ने पति के जूठे को ग्रहण किया, बाद में उन जूठे आमों की गुठलियों व छिलकों को पत्ते पर रखकर बाहर फेंक दिया । छिपे हुए श्रीकालिदास उन फेंके हुए आम की गुठलियों और छिलकों को चूसने लगे । वैष्णव के जूठे को ग्रहण करके श्रीकालिदास प्रेम में विभोर हो गए । इस प्रकार गौड़देश के सभी वैष्णवों को वे प्रणाम करते एवं उनका उच्छिष्ट प्रसाद ग्रहण किया करते ।

हर साल गौड़ देश के भक्त रथ-यात्रा के उपलक्ष में ‘पुरी’ जाते । भक्त श्रीकालिदास भी दूसरे साल गौड़ देश के भक्तों के साथ नीलाचल गए । सर्व – अन्तर्यामी श्रीमहाप्रभु ने श्रीकालिदास की वैष्णव – प्रीति की कथा जानकर उन पर भरपूर कृपा की। प्रतिदिन महाप्रभु जब जगन्नाथ दर्शन करने जाते थे तो गोविन्द महाप्रभु का कमण्डलु वहन करते थे। सिंहद्वार के उत्तरी दरवाज़े के अन्तराल में 22 सीढ़ियों के नीचे जल निकलने का एक स्थान है। श्रीजगन्नाथ दर्शन को जाने से पहले श्रीमन् महाप्रभु वहाँ रोज़ चरण धोते थे । गोविन्द को महाप्रभु का कठोर निर्देश था कि कोई भी उनके पदजल को स्पर्श न करने पाए । इसलिए महाप्रभु के पदजल को स्पर्श करने का किसी का भी साहस नहीं होता था। केवल मात्र अन्तरंग भक्तगण बड़ी कुशलता से पद जल को ग्रहण कर लेते थे । एक दिन महाप्रभु जब वहाँ चरण धो रहे थे तो उसी समय श्रीकालिदास ने आकर उक्त चरण धोया हुआ जल ग्रहण करने के लिए हाथ बढ़ाया। महाप्रभु के सामने ही एक अंजलि, दो अंजलि तथा तीन अंजलि जल पीने के बाद महाप्रभु ने पादोदक जल ग्रहण करने के लिए निषेध किया।

सर्वज्ञ शिरोमणि चैतन्य ईश्वर ।
वैष्णवे ताँहार विश्वास, जानेन अन्तर॥
सेई गुण लईया प्रभु ताँरे तुष्ट हइला ।
अन्येर दुर्लभ प्रसाद ताँहारे करिला॥
चै.च.अ. 16/48-49

वैष्णवेर शेष भक्षणे एतेक महिमा ।
कालिदासे पाओयाइल प्रभुर कृपा सीमा॥
ताते वैष्णवेर जूठा खाओ छाड़ि घृणा लाज ।
जाहा हैते पाइवा बांच्छित सब काज॥
चै.च.अ. 16/57-58

अर्थात् वैष्णवों के पत्तल में बचे हुए महा-महाप्रसाद को खाने की इतनी महिमा है कि इसी के द्वारा कालिदास ने महाप्रभु की असीम कृपा प्राप्त की। श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं कि इसलिए मैं कहता हूँ कि घृणा वा लज्जा का परित्याग करके वैष्णव की जूठन खानी चाहिए; इससे आपकी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो जाएँगी।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से