श्रीईशान ठाकुर की गणना श्रीचैतन्य महाप्रभु की शाखा में होती है।
श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान।
श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त, मिश्र भगवान्॥
(चै.च.आ. 10/110)
ईशान ठाकुर श्रीजगन्नाथ मिश्र के घर में नौकर थे। स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभु जी के घर में नौकर के रूप में सेवा का सौभाग्य, श्रीमन्महाप्रभु के पार्षद के बिना किसी और का हो ही नहीं सकता। भगवान अपने प्रिय भक्त से ही सेवा ग्रहण करते हैं। ईशान ठाकुर महाप्रभु जी को बाल्यकाल से ही गोदी में लेकर घूमा करते थे।
महाप्रभु जी की साक्षात सेवा उन्हें मिली थी, इससे मालूम पड़ता है कि वे महाभाग्यशाली थे। वे निमाई की सब कालोचित शरारतें सहते हुए उनकी सभी ज़िद्दें पूरी करते थे।
निमाई भी ईशान1 को छोड़ कर पल भर नहीं रह पाते थे—
ओहे बापू कहिते कि जानि क्रिया तान।
निमाई चान्देर अति प्रिय ये ईशान॥
ईशानेर प्राण शचीनन्दन निमाई।
ईशान विहने ना यायेन शुन ठाँइ॥
बाल्यकाले निमाई चंचल अतिशय।
ये आखूंटि करे ता ईशान समाधय॥
(भक्ति रत्नाकर 12/95-97)
श्रीगौरांग महाप्रभु जी के साथ, श्रीबलभद्र जी के अभिन्न विग्रह श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की सेवा का सुयोग भी उनको प्राप्त हुआ था। शची माता के घर में जब श्रीगौर हरि जी और नित्यानन्द जी भोजन के लिए बैठते थे तो भोजन में बैठने से पहले ये ईशान ठाकुर जी उनके चरण-कमलों को धोने के लिए जल देते थे—
ईशान दिलेन जल धुईते चरण।
नित्यानन्द गैला करिते भोजन॥
ईशान चूँकि श्रीभगवान् के पार्षद थे इसलिए वे जानते थे कि भगवान् की पूजा से भी भक्त की पूजा श्रेष्ठ होती है। यह तत्त्व जानकर ही वे बड़े प्यार के साथ श्रीयशोदा माता जी की अभिन्न रूपा श्रीशची माता के घर की तमाम सेवा किया करते थे। शची देवी जी का स्नेह पाकर वे धन्य हो गये थे। भक्तों के माध्यम से ही भगवान् कृपा करते हैं। भगवत् कृपा, भक्त कृपा की अनुगामिनी होती है। वैष्णव वन्दना में ईशान दास की महिमा इस प्रकार वर्णित हुई है—
बन्दिव ईशान दास कर जोरी करि।
शची ठाकुराणी जारे स्नेह कैल बड़ि॥
(भक्ति रत्नाकर 12/94)
विप्र कहे एइ देखी आइलुं ईशाने।
कि बलिव, केवा ना झूरये ताँर गुणे॥
सर्वतत्त्व ज्ञाता तेंहो सर्वत्र विदित।
श्रीशची देवीरे सेविला यथोचित॥
सेविलेन सर्वकाले आइरे ईशान।
चतुर्दश लोक मध्ये महाभाग्यवान्॥
शची देवी ईशाने यतेक स्नेह कैल।
कहिते कि जानि ताहा साक्षाते देखिल॥
(भक्ति रत्नाकर 12/90-93)
श्रीमन्महाप्रभु द्वारा संन्यास ग्रहण करने के बाद, उनके घर में माँ और उनकी पत्नी श्रीविष्णु प्रिया देवी की देखभाल का भार ईशान पर पड़ा था। श्रीचैतन्य भागवत के मध्य खण्ड के आठवें अध्याय में लिखा है कि—
ईशान करिला सब गृह उपस्कार।
यत छिल अवशेष—सकल ताँहार॥
(चै.भा.म. 8/73)
73वें पयार के गौड़ीय भाष्य में श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी ने लिखा है—
श्रीमन्महाप्रभु जी के घर के नौकर ईशान ने घर में इधर-उधर बिखरे चावलों को इकट्ठा किया और घर साफ कर दिया। ईशान के भाग्य की सीमा नहीं, वे असीम भाग्यशाली हैं। उन्होंने महाप्रभु जी के सेवा का कार्य करते-करते अपना सारा जीवन व्यतीत किया। महाप्रभु जी के संन्यास ग्रहण के बाद, भृत्य श्रीईशान, उनकी माता और पत्नी दोनों की सेवा करके, जगत् के अन्य नौकरों में परम धन्य तथा धन्य-अति-धन्य हो गए थे—
ईशान ठाकुर दीर्घकाल तक प्रकट रहे। श्रीविष्णु प्रिया देवी तथा नवद्वीप में महाप्रभु जी के समस्त भक्तों के अन्तर्धान होने के बाद ही वे अप्रकट हुए। उन्होंने श्रीनिवासाचार्य प्रभु, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीरामचन्द्र कविराज को श्रीमन्महाप्रभु जी की लीला स्थलियाँ भी दिखलायी थीं। ईशान ने जिस समय वह लीला स्थलियाँ दिखलायी थीं, उस समय वे पूर्णरूपेण जरा-जीर्ण अवस्था में थे। इसी से अनुमान होता है कि वे कितने दीर्घ जीवी थे—
प्राय नवदीपे गुप्त हइल सकले।
प्रभुर ईशान मात्र आछेन एकले ॥
(भक्ति रत्नाकर 11/721)
श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीरामचन्द्र कविराज जी नवद्वीप धाम में ईशान ठाकुर का स्नेहाशीर्वाद व उनका आलिंगन लाभ कर, उनसे विदा लेकर जब श्रीखण्ड में श्रीरघुनन्दन जी से मिलने आए तो उनको सन्देश मिला कि ईशान ठाकुर जी ने अन्तर्धान कर लिया है—
पथे आसि लोक मुखे करिनु श्रवण।
ईशान ठाकुर हइल संगोपन॥
(भक्ति रत्नाकर 13/21)
श्रीमन्महाप्रभु और शची माता की अंतर्धान लीला के बाद श्रीवंशी वदनानन्द ठाकुर जी ने श्रीविष्णु प्रिया देवी तथा श्रीईशान ठाकुर की सेवा की थी।
1 ईशान:- श्रीमन महाप्रभु के गृह-सेवक थे, इस ईशान के इलावा, ईशान नाम के कुछ और भी भक्त थे।
1. श्रील सनातन गोस्वामी के नौकर का नाम भी ईशान था।
2. वृन्दावनवासी गौड़ देशीय भक्त का नाम भी ईशान था। जिस समय श्रील रूप गोस्वामी जी मथुरा के विट्ठलेश्वर के घर, गोवर्धनधारी गोपाल देव जी के दर्शन करने गये थे, उस समय उनके काफी भक्त थे। उन भक्तों में ईशान नाम के भी एक भक्त थे। श्रीनिवासाचार्य प्रभु, नरोत्तम ठाकुर और श्यामानन्द प्रभु, जिस समय गोस्वामियों के ग्रन्थ लेकर, वृन्दावन से गौड़ देश को आए थे, उस समय इन्हीं ईशान ने उनको आशीर्वाद दिया था।
3. गौड़ीय वैष्णव कोष में ईशान आचार्य नामक एक भक्त का नाम लिखा है, जिन्हें ब्रज की यौन मंजरी के रूप में निर्देशित किया गया है।
4. अद्वैत प्रकाश ग्रन्थ के रचयिता भी श्रीईशान नागर जी हैं
स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से