श्रीगोपालगुरु गोस्वामी उड़ीसा के एक ब्राह्मणकुल में आविर्भूत हुये थे । श्रीमुरारि पण्डित इनके पिता थे। माता जी परिचय अज्ञात है। गोपालगुरु गोस्वामी के पिता ज ने जो पहले नाम दिया था – वह था श्रीमकरध्वज पण्डित । श्रीमकरध्वज पण्डित ने श्रीगौरांग महाप्रभु के सेवक श्रीगोविन्द के साथ रहकर बचपन से ही श्रीमन्महाप्रभु की सेवा का सौभाग्य प्राप्त किया था । श्रीमन्महाप्रभु स्नेहवशतः उसको ‘गोपाल’ कह कर बुलाते थे । श्रीचैतन्यचरितामृत और श्रीचैतन्यभागवत में गोपालगुरु के नाम का उल्लेख नहीं हुआ है। श्रीमन्महाप्रभु के पार्षद श्रीक्षेत्रवासी भक्तों में, जिन्होंने श्रीमन्महाप्रभु की अन्तरंग सेवा की थी, उनमें से एक हैं – श्रीवक्रेश्वर पण्डित। श्रीमकरध्वज पण्डित के दीक्षागुरु श्रील वक्रेश्वर पण्डित गोस्वामी हैं।

श्रील मकरध्वज पण्डित को श्रीमन्महाप्रभु ने जो नाम दिया, वह ‘गोपाल’ है, फिर उसके साथ ‘गुरु’ नाम कैसे जुड़ा ? उसकी एक बात लोगों में सुनी जाती है । घटना कुछ इस प्रकार की है कि एक नाम भजनकारी सज्जन ने इस प्रकार से भजन का अभ्यास किया था कि उसकी जिह्वा से स्वतः ही निरन्तर हरिनाम स्फूर्त्त होता रहता था । पुरुषोत्तमधाम की बात है कि उसी नामभजनकारी ने मलत्याग के समय अपनी जिह्वा को पकड़कर रखा था, जिससे अपवित्र काम के समय हरिनाम उच्चारित न हो । दैववश गोपाल उधर ही था । बालक गोपाल ने इस प्रकार से जिह्वा को पकड़कर रखने का कारण समझकर उस से कहा – अरे ! आप यह क्या कर रहे हैं ? हरिनाम करने में स्थान, काल, व्यवहारिक पवित्र – अपवित्र आदि का विचार नहीं है, सभी अवस्थाओं में ही हरिनाम किया जा सकता है । बाहर जाने के समय यदि आप हरिनाम बन्द रखें और अचानक उसी समय मृत्यु हो जाये, तब आपका कैसे मंगल होगा ? बालक गोपाल का सुसिद्धान्तपूर्ण वाक्य सुनकर महाप्रभु सन्तुष्ट हो गये तथा उन्होंने भक्तों के पास घोषणा की कि गोपाल ने गुरु का काम किया है । उस दिन से ही मकरध्वज पण्डित या श्री गोपाल ‘गोपाल गरु’ नाम से विख्यात हो गये । वास्तव में गोपाल गुरु आचरण द्वारा प्रचार करने के कारण आचार्य या गुरु पद पर अधिष्ठित हैं । सर्वत्र गोपालगुरु की ख्याति फैल जाने से एक बार अभिराम ठाकुर उसकी परीक्षा लेने के लिये परुषोत्तमधाम में आये थे। अभिराम ठाकुर की इस प्रकार महिमा थी कि यदि विष्णुशिला – असली शालग्राम या विष्णु जी की प्राण प्रतिषि्ठत मूर्ति नहीं होगी तो उसको प्रणाम करने से वह साथ ही साथ विदीर्ण या चूर्ण हो जाती थी।

शुद्ध वैष्णव को छोड़कर कोई भी उनका प्रणाम सहन नहीं कर सकता था, उसी क्षण उसकी मृत्यु हो जाती थी। परन्तु जब यह सुना कि अभिराम ठाकुर गोपालगुरु की परीक्षा लेने आ रहे हैं, तब वैष्णवगण चिन्तित हो उठे । वैष्णवों की चिन्ता का कारण समझकर महाप्रभु ने गोपाल के मस्तक पर अपने पादपद्म अर्पण करके उसे प्राकृति तिलक कर दिया। गोपाल बहुत दुःखी चित्त से महाप्रभु की गोद में जा बैठा । जिससे अभिराम ठाकुर का प्रणाम गोपालगुरु का कुछ भी नुकसान न कर सका । तब से गोपालगुरु के अनुयायी श्रीहरिपदाकृति तिलक धारण करते हैं गोपाल के सम्बन्ध में ‘वक्रेश्वर चरित’ ग्रन्थ में ऐसा वर्णित है –

चन्द्रशेश्वर, शंकरारण्य आचार्य एइ दुइजन ।
गोविन्दानन्द, देवानन्द नाहिक कथन ॥
गोपालगुरु गोस्वामीर गुणेर नाहि लेखा ।
वक्रेश्वर पण्डितेर एइ पंच शाखा ॥

महाराज प्रतापरूद्र के पिता श्रीपुरुषोत्तम देव कांची से अन्यान्य मूर्त्तियों के साथ श्रीराधाकान्त जी की मूर्त्ति भी लाये थे। श्रीजगन्नाथदेव के छत्रभोग मन्दिर के पश्चिम -उत्तर कोने में एक मन्दिर है, जिसमें पहले कभी श्रीराधाकान्त की मूर्त्ति अधिष्ठित थी । महाराज प्रतापरुद्र से उनके गुरुदेव श्रीकाशी मिश्र महोदय ने पूजा के लिये श्रीराधाकान्त विग्रह को माँग लिया था। श्रीकाशी मिश्र ने श्रीमन्महाप्रभु के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पण किया था । चूंकि वे सन्तान हीन थे इसलिय श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीश्रीराधाकान्त विग्रह की सेवा और उसके साथ लगता बगीचा गोपालगुरु को दे दिया था । श्रील वक्रेश्वर पण्डित प्रभु ने श्री राधाकान्त गठ की गद्दी पर बैठकर आचार्य का काम नहीं किया। वे महाप्रभु के साथ नृत्यकीर्त्तनादि में ही प्रमत्त रहते थे । माघी शुक्ला द्वादशी तिथि में गोपालगुरु को श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीराधाकान्त जी की सेवा और आचार्य की गद्दी प्रदान की । उस तिथि में आचार्याभिषेक-उत्सव तब से अब तक होता ही आ रहा है। गोपालगुरु के सम्बन्ध में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की लिखित विकृति से ज्ञात होता है – ‘श्रीपुरुषोत्तम में श्रीकाशी मिश्र भवन में श्रीमन्महाप्रभु की गद्दी पर आजकल श्रीवक्रेश्वर के शिष्य श्रीगोपालगुरु गोस्वामी विराजमान हैं। श्रीस्वरूप गोस्वामी की शिक्षा तो उनके बिल्कुल कण्ठस्थ है। श्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामीपाद की रसोपासना की एक धारा श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी से श्रील कृष्णदास गोस्वामी में प्रवाहित है, श्रीस्वरूप गोस्वामीपाद की रसोपासना की अन्य धारा वक्रेश्वर पण्डित गोस्वामी से होकर गोपालगुरु गोस्वामी में संचारित है । ‘स्मरण क्रम पद्धति’ या ‘सेवास्मरण पद्धति’ श्रीगोपालगुरु गोस्वामी द्वारा बताई गई है । उन्होने ‘श्रीगौरगोविन्दाच्र्चन – पद्धति’ की भी रचना की है। गोपालगुरु के शिष्य हैं – श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी । गोपालगुरु गोस्वामी के समय से ही श्रीकाशी मिश्र भवन, श्रीराधाकान्त मठ के नाम से प्रचारित हो गया था। श्रीकाशी मिश्र के समय वहां केवल मात्र श्रीकृष्ण का विग्रह विराजित था । गोपालगुरु गोस्वामी ने श्रीराधाकान्त के बाईं ओर श्रीराधा तथा दाहिनी ओर ललिता देवी के विग्रहों की भी प्रतिष्ठा की तथा साथ ही बायें और श्रीगौरांग और दाहिनी ओर श्रीनित्यानन्द के श्री विग्रहों की प्रतिष्ठा भी की ।

उड़ीसा में मन्दिर के मध्यस्थल पर स्थित क्षुद्र घर को ‘गम्भीरा’ कहते हैं । श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने लिखा है- ‘बरामदे के बाद बना पक्का मकान व उसके अन्दर बने छोटे के कमरे को ‘गम्भीरा’ कहते हैं। अर्थात् भवन से अलग आंगन में बने छोटे से परन्तु पक्के कमरे को गम्भीरा कहते हैं। काशीमिश्र के भवन में स्थित ‘गम्भीरा’ भी श्रीमन्महाप्रभु का भजन स्थान या विश्राम करने के स्थान के रूप में निर्दिष्ट था । गोपालगुरु गोस्वामी के समय से ही गम्भीरा में श्रीमन्महाप्रभु की ‘पादुका’ तथा श्रीजगदानन्द पण्डित द्वारा रचित किसी-किसी के मतानुसार स्वरूप दामोदर द्वारा रचित ‘कन्था’ शिष्य परम्परा से पूजित हो रहा है । श्रीमन्महाप्रभु द्वारा व्यवहार किया गया व्रजरज से निर्मित कमण्डलु भी वहां पर संभाल कर रखा गया है । जबकि लकड़ी से बना एक कमण्डलु बाद में रखा गया है। श्रीराधाकान्त मठ से प्रकाशित ‘श्रीगुरु प्रणाली’ ग्रन्थ में गोपालगुरु गोस्वामी प्रभु को श्रीमंजुमेधा’ सखी के रूप से निर्देशित किया गया है । गोपालगुरु गोस्वामी के समय 1460 शकाब्द, से 1470 शकाब्द तक श्रीराधाकान्त मन्दिर का फिर से संस्कार हुआ है।

गोपालगुरु गोस्वामी के सम्बन्ध में कुछेक अलौकिक घटनाएं सुनी जाती हैं –

श्रीगोपालगुरु गोस्वामी ने बूढ़े होने पर अपने शिष्य श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी को श्रीराधाकान्त मन्दिर की सेवा समर्पित कर दी थी । समर्पण के बाद गोपालगुरु द्वारा अप्रकट- लीला करने से श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी विरह से व्याकुल हो गये। श्रीगोपालगुरु के श्रीअंगों का अन्तिम संस्कार करने के लिये उसे स्वर्गद्वार पर लाया गया । इधर क्या हुआ कि शासन विभाग के राजपुरुषों ने यह दोष प्रदर्शित कर दिया कि सरकार की अनुमति के बिना ही श्रीराधाकान्त मठ की गद्दी समर्पित हुई है जिस कारण राधाकान्त मठ को चारों ओर से घेर लिया गया । ध्यानचन्द्र गोस्वामी ने जब यह समाचार सुना तो वे रोते – रोते स्वर्गद्वार पर शमशान में श्रील गुरुदेव के पादपद्मों में आकर गिर पड़े । श्रील गोपालगुरु अपने प्रिय शिष्य की कातर प्रार्थना सुनकर शमशान से ही उठकर संकीर्त्तन करते-करते वापस आ गये। राजपुरुष इस अलौकिक घटना की बात को पहले ही जान गये और गोपालगुरु गोस्वामी के आने से पहले ही श्रीराधाकान्त का मन्दिर खोलकर वहां से भाग गये । श्रीगोपालगुरु गोस्वामी ने ध्यानचन्द्र गोस्वामी को गद्दी पर सुदृढ़ रूप से प्रतिष्ठित किया और पुनः कार्त्तिकी नवमी तिथि में तिरोधान लीला की।

श्रीगोपालगुरु गोस्वामी के तिरोधान के अगले साल रथ यात्रा के बाद जब व्रजवासी वैष्णवगण पुरी से ब्रज में लौट आये तो वे वंशीवट के पास पाकुड़वृक्ष के नीचे गोपालगुरु गोस्वामी को भजन करते देखकर विस्मित हो उठे। उन्होंने पुरी में ध्यानचन्द्र गोस्वामी को यह संवाद सुनाया । ध्यानचन्द्र गोस्वामी यह समाचार सुनते ही तेज़ी से वृन्दावन पहुँचे और श्रीगुरुपादपद्म में निपतित हुये । श्रील गुरुदेव को रोते- रोते प्रार्थना करने पर भी गोपालगुरु ने पुरी में वापस जाने के लिये अपनी अनिच्छा प्रकाश की । उन्होंने कहा तुम्हारा यदि मेरे लिये इतना ही विरह होता है, तब नीम लकड़ी से मेरी मूर्त्ति बनाओ और उसे गर्भ मन्दिर के सामने रखकर उसकी पूजा करो ।’ तब से श्रीगोपालगुरु गोस्वामी की श्रीमूर्ति श्रीमन्दिर के सामने बरामदे में रखी हुई है । श्रीनीलाचल में श्रीनरोत्तम ठाकुर के साथ श्रीगोपालगुरु का साक्षात्कार हुआ था ऐसा भक्ति – रत्नाकर ग्रन्थ का पढ़ने में जाना जाता है ।

नरोत्तम गेला काशीमिश्रेर भवन।
श्रीगोपालगुरु सह हइल मिलन ॥
श्रीगोपालगुरु अति अधैर्य हियाय।
नरोत्तमे कोले लइया कान्दे उभराय॥
-भक्तिरत्नाकर 3/382,389

कार्त्तिकी शुक्ला नवमी तिथि में ही श्रीगोपालगुरु गोस्वामी की तिरोधान तिथि मनायी जाती है।

श्रील गोपालगुरु गोस्वामी प्रभु का परिचय देने वाला भजन –

आरे मोर गोपालगुरु भक्ति कल्पतरू,
मकरध्वज नाम याँहार ।
श्रीकृष्णचैतन्य याँके, ‘गोपाल’ बलिये डाके,
देखि’ शिशु-चरित्र उदार॥
गौरांगेर सेवारसे, सदाइ आनन्दे भासे,
गोरा बिनु नाहि जाने आन॥
तिलेक ना देखि जाँरे, धैरय धरिते नारे,
गोरा येन गोपालेर प्राण॥
गोपाल-शिशुर प्रति, शिक्षा दिल एक रीति,
प्रभु प्रेमावेशे ढुलि’ ढुलि’॥
कहे सबे – ‘आरे आरे, आजि हैते गोपालेरे
डाकिबा ‘गोपाल- गुरु’ बलि’॥
गोपाले करुणा देखि’, सबार सजल आँखि,
सुखेर समुद्र उछलिल ।
सबे कहे अनुपाम, ‘श्रीगोपालगुरु’ नाम,
प्रभु- दत्त जगते व्यापिल॥
गोपालेर गुरुभक्ति, कहिते नाहिक शक्ति,
सदाइ प्रसन्न वक्रेश्वर ।
महामत्त निजगीते, नाहिक उपमा दिते,
सर्व- चित्ताकर्षक कलेवर॥
देखिल सकल ठाँइ, एमन दयालु न इ,
केवा ना जगते यश घोषे॥
सबे कैल प्रेमपात्र, हइल वंचित मात्र
नरहरि- निज- कर्म दोषे ॥