शैव्या यासीद्व्रजे चण्डी स दामोदर पण्डितः।
कुतश्चित् कार्यतो देवी प्राविशत्तं सरस्वती॥
गौ.ग. 159
(श्रीकृष्ण लीला के समय) ब्रज में जो प्रखरा शिव्या था, वही इस गौरलीला में श्रीदामोदर पण्डित के रूप में आये थे।
श्रीदामोदर पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभु के गणों में गिने जाते हैं।
दामोदर पण्डित शाखा प्रेमेते प्रचण्ड।
प्रभुर उपरे येंहो कैल वाक्यदण्ड॥
दण्ड्कथा कहिब आगे विस्तार करिया।
दण्डे तुष्ट प्रभु ताँरे पाठाइल नदीया॥
चै.च.आ. 10 /31-32
काटोया में संन्यास ग्रहण करने के पश्चात श्रीमन्महाप्रभु को, नित्यानन्द प्रभु चतुराई से जिस समय शान्तिपुर में अद्वैताचार्य के घर ले आये थे, उस समय वहां महाप्रभु के दर्शनों के लिए आये नवद्वीपवासी भक्तों में श्रीदामोदर पण्डित भी थे। उस समय महाप्रभु 10 दिन तक शान्तिपुर में रहे थे। शचीमाता की इच्छा के अनुसार महाप्रभु जब शान्तिपुर से नीलाचल धाम की ओर जाने लगे उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीमुकुन्ददत्त और श्रीजगदानन्द पण्डित के अतिरिक्त श्रीदामोदर पण्डित भी महाप्रभु के साथ थे। नीलाचल धाम में प्रथम बार शुभागमन कर श्रीजगन्नाथ के दर्शन करते समय महाप्रभु मूर्च्छित होकर गिर पड़े थे तब वासुदेव सार्वभौम महाप्रभु को अपने घर ले आये थे। वासुदेव सार्वभौम मायावाद विचारों के थे किन्तु बाद में महाप्रभु के संग के प्रभाव से मायावाद विचारों का परित्याग कर शुद्ध भक्त हो गये थे। उसी समय उन्होंने श्रीमन्महाप्रभु की महिमा सूचक दो श्लोक ‘वैराग्य विद्या निज भक्त योग …..’ ‘कालान्नष्टं भक्तियोगं निजं यः…..’ तालपत्र पर लिखकर श्रीजगदानन्द पण्डित और श्री दामोदर पण्डित को दिये थे महाप्रभु को दिखाने के लिये। मुकुन्द दत्त ने महाप्रभु को देने से पहले तालपत्र के दोनों श्लोक बाहर दीवार पर लिख लिये थे। महाप्रभु को देने पर उन्होंने उन्हें पढ़ा और फाड़ कर फेंक दिया। बाहर दीवार पर लिखकर रखने के कारण श्लोक संरक्षित रह गये और भक्तों ने उन्हें याद कर लिया।
माघमास के शुक्लपक्ष में सन्यास ग्रहण कर प्रभु फाल्गुन मास में नीलाचल में आये। चैत्रमास में वासुदेव सार्वभौम जी का उद्धार किया । वैशाख मास में जब महाप्रभु ने अकेले दक्षिण भारत की यात्रा पर जाने का विचार कर नित्यानन्दादि भक्तों को कहा तो सभी भक्त विरह-सन्तप्त हो उठे। जब नित्यानन्द प्रभु ने भी साथ जाने की इच्छा व्यक्त की तो महाप्रभु ने निन्दा के छल से श्री नित्यानन्द प्रभु, श्री जगदानन्द पण्डित और श्री दामोदर पण्डित के गुणों का व्याख्यान किया था।
आमि त संन्यासी, दामोदर ब्रह्मचारी।
सदा रहे आमार उपर शिक्षादण्ड धरि॥
इहार आगे आमि ना जानि व्यवहार।
इंहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार॥
लोकापेक्षा नाही इँहार कृष्ण कृपा हैते।
आमि लोकापेक्षा कभु ना पारि छाड़िते॥
चै .च.म. 7/25-27
अर्थात् श्रीदामोदर तो ब्रह्मचारी हैं और मैं हूं सन्यासी, वह मेरे ऊपर सदा शिक्षादण्ड पकड़े रहता है। उसके सामने किसके साथ कैसा व्यवहार करना है यह मैं नहीं जान सकता और उसे मेरा स्वाधीन चरित्र भी अच्छा नहीं लगता और श्रीदामोदर पर श्रीकृष्ण कृपा है, जिससे वह लोकापेक्षा नहीं रखते अर्थात् जगत की निन्दा स्तुति की परवाह वे नहीं करते, परन्तु मैं तो लोकापेक्षा को नहीं त्याग सकता।
जिस समय महाप्रभु कृष्णदास (कालाकृष्ण दास) के साथ दक्षिण भारत का भ्रमण करने के पश्चात् अलालनाथ पहुंचे उस समय कृष्णदास को भेज कर नित्यानन्दादि भक्तों को अपने आने का सन्देश भेजा। कृष्णदास से महाप्रभु के आगमन का समाचार सुनकर श्रीनित्यानन्द, श्रीजगदानन्द, श्रीमुकुन्द दत्त आदि भक्तों के साथ श्रीदामोदर पण्डित भी महानन्द से आगे आकर महाप्रभु से मिले थे।
प्रभुर आगमन शुनि नित्यानन्दराय।
उठिया चलिया, प्रेमे थोह नाहिं पाय।
जगदानन्द, दामोदर – पण्डित, मुकुन्द।
नाचिया चलिला, देहे न धरे आनन्द॥
चै.च.म. 9 / 339-340
अर्थात श्रीमहाप्रभु का आगमन सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभु तो प्रेम से अस्थिर हो उठे और प्रभु के दर्शनों को चल दिये। श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर, श्रीमुकुन्द पण्डित फूले न समा रहे थे, सब नृत्य करते प्रभु के पास चले।
दक्षिण भारत से वापस आकर महाप्रभु ने कृष्णदास के आचरण के सम्बन्ध में वासुदेव सार्वभौम को कहा। दक्षिण भारत में कालाकृष्णदास भट्टथारि स्त्रियों के प्रलोभन में फंस कर महाप्रभु का साथ छोड़कर चला गया था। महाप्रभु ने किसी प्रकार स्त्रियों के चंगुल से उस का उद्धार किया था । इसलिये अब काला कृष्णदास को साथ में न रखकर उसे विदा देकर जहां चाहे वहां जाने की आज्ञा दे दी। महाप्रभु द्वारा त्याग देने पर काला कृष्णदास क्रन्दन करने लगा। अब काला कृष्णदास के सम्बन्ध में क्या किया जाये, इस विषय में सोच विचार कर श्रीनित्यानन्द, श्रीजगदानन्द व श्रीमुकुन्द के साथ श्रीदामोदर पण्डित ने एक योजना सोची जिस के अनुसार नवद्वीप में शचीमाता, अद्वैताचार्य आदि भक्तों को महाप्रभु के दक्षिण भारत से पुरी वापस आने का समाचार भेजने के लिये समाचार – वाहक रूप से कृष्णदास को भेजने का प्रस्ताव महाप्रभु के सामने रखा। महाप्रभु द्वारा मान लेने पर कृष्ण दास को गौड़देश में भेज दिया गया। श्रीअद्वैताचार्य आदि गौरभक्त कालाकृष्ण दास से महाप्रभु के दक्षिण भारत से पुरी आने का समाचार सुनकर परम आनन्दित हुये थे। बाद में पुरी से गौड़देश पहुंचकर श्रीदामोदर पण्डित भी काला कृष्णदास से मिले थे।
महाप्रभु की दामोदर पण्डित के प्रति सम्मानयुक्त प्रीति थी किन्तु श्रीदामोदर पण्डित के छोटे भाई शंकर के प्रति गौरवहीन शुद्ध प्रीति थी। श्रीदामोदर पण्डित के सामने स्वच्छन्द व्यवहार सम्भव नहीं था ये जानकर छोटे भाई के हित के लिये श्रीमहाप्रभु ने शंकर पण्डित की देख रेख का भार श्रीदामोदर पण्डित के ऊपर सौंपा था।
शंकरे देखिया प्रभु कहे दामोदरे।
सगौरव -प्रीति आमार तोमार उपरे॥
शुद्ध केवल- प्रेम शंकर उपरे ।
अतएव तोमार संगे राखह शंकरे॥
चै. च. म. 11/ 146-47
अर्थात श्रीदामोदर के छोटे भाई शंकर को देखकर प्रभु ने कहा – ‘दामोदर! मुझे तुम पर तो गौरव सहित प्रीति है, किन्तु मेरी शुद्ध प्रीति तो इस शंकर पर है, इसलिए इसे मेरे पास रहने दो।’
अन्तिम लीला में शंकर पण्डित महाप्रभु के सामने रहते थे एवं रात को महाप्रभु के पास ही शयन करते थे। किसी-किसी दिन महाप्रभु शंकर पण्डित के शरीर पर श्रीचरण रख कर शयन करते थे।
श्रीदामोदर पण्डित पुरी में सिद्ध बकुल हरिदास ठाकुर के पास नामाचार्य से मिलकर परमानन्दित हुये थे। एक दिन महाप्रभु ने अपने आवास में भक्तों को भोजन करवाने के लिये स्वयं परिवेशन करना आरम्भ किया। महाप्रभु द्वारा परिवेशन करने पर भी भक्त लोग प्रसाद सेवन न कर हाथ ऊँचे करके बैठे रहे। श्रीस्वरूप दामोदर द्वारा प्रार्थना करने पर जब महाप्रभु नित्यानन्द प्रभु के साथ प्रसाद सेवन करने के लिये बैठ गये तब भक्तों ने निसंकोच प्रसाद सेवन किया। तब श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीदामोदर पण्डित व श्रीजगदानन्द पण्डित ने प्रसाद परिवेशन की सेवा की थी।
दक्षिण भारत से महाप्रभु के पुरी में वापस आने पर राजा प्रतापरुद्र ने महाप्रभु के दर्शनों के लिये अत्यन्त हृदय की व्याकुलता प्रकट करते हुये कहा कि दर्शन न मिलने पर मैं राज्य छोड़कर भिखारी बन जाऊँगा। महाप्रभु के प्रति गजपति महाराज की प्रगाढ़ भक्ति को देखकर सभी विस्मित हो गये। महाराज को महाप्रभु से मिलवाने के लिये वासुदेव सार्वभौम ने श्रीनित्यानन्द आदि भक्तों के साथ मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने राजा को उनके साथ मिलने की बात न बता कर राजा के व्यवहार और राजा की प्रगाढ़ भक्ति की बात ही महाप्रभु को बतायी। श्रीनित्यानन्द प्रभु ने जब राजा के राज व्यवहार की ओर उसकी प्रगाढ़ भक्ति की बात महाप्रभु के समक्ष निवेदन की तो महाप्रभु अन्दर से तो द्रवीभूत हो गये किन्तु उन्होंने बाहर से कठोर वाक्यों का प्रयोग करते हुए श्रीदामोदर पण्डित के सम्बन्ध में इस प्रकार कहा था –
तोमा सबार इच्छा एइ, आमारे लैया ।
राजा के मिलह इह कटकेते गिया॥
परमार्थ, थाकुक, लोके करिबे निन्दन।
लोके रहू, दामोदर करिव भर्त्सन॥
तोमा सभार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे।
दामोदर कहे यबे मिलि तबे ताँरे ॥
(चै .च .म .12/23-25)
‘आप सब की इच्छा यही है कि हम सब यहां से कटक चलकर राजा को मिलें। (सन्यासी यदि राजा का दर्शन करे तो उसका संन्यास धर्म नष्ट होता है।) मेरा परमार्थ (सन्यास धर्म) जाता है तो जाने दो, लोग भी तो मेरी निन्दा करेंगे (कि अपने स्वार्थ के लिए राजा को जाकर मिले हैं) और फिर लोगों की निन्दा की बात रहने दीजिए दामोदर भी तो मेरा तिरस्कार करेंगे। (श्री दामोदर स्पष्ट – वक्ता थे और प्रभु को भी कहने-सुनने में वे कोई संकोच न करते थे) इसलिए मैं तुम सब की बात मानकर राजा से मिलूंगा नहीं, हां यदि दामोदर कह दें तो उनसे मिल सकता हूं।’
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने इस पयार के अमृत प्रवाह भाष्य में इस प्रकार लिखा है कि महाप्रभु सब को कहते हैं कि मैं केवल आपकी आज्ञा से राजा के साथ साक्षात्कार नहीं कर सकता, यदि दामोदर मिलने के लिये बोलें तो मिल सकता हूं। प्रभु के इस वाक्य का बहुत गूढ़ अर्थ है। दामोदर की भक्ति के वशीभूत होने पर भी उनका वाक्दण्ड कई बार महाप्रभु के लिए अयोग्य हो जाता था। इसलिये दामोदर को अपनी ये प्रवृत्ति छोड़नी होगी।
महाप्रभु के वाक्य सुनकर दामोदर पण्डित अभिमान से भर कर बोले – महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं, कर्तव्य अकर्तव्य वे सब जानते हैं। मैं साधारण क्षुद्र जीव इस विषय में उन्हें क्या ज्ञान दूंगा। वे तो स्नेह के वशीभूत हैं और राजा उनसे स्नेह करते हैं। एक दिन अवश्य ही राजा के साथ मिलन होगा। पुरी में रथयात्रा के समय श्रीदामोदर पण्डित भी महाप्रभु के साथ थे। श्रीजगन्नाथ के रथ के आगे जो सात संकीर्तन मण्डलियां नृत्यकीर्तन कर रही थीं, उनमें से पहली मण्डली के कीर्तन में दामोदर पण्डित भी एक थे। मूल कीर्तन करने वाले स्वरूप दामोदर एवं अद्वैताचार्य नर्तक थे।
तीसरे वर्ष गौड़ देश के भक्त अपनी पत्नियों के साथ आये थे। भक्तों को विदा कर महाप्रभु ने जब गौड़देश से होकर वृन्दावन जाने का संकल्प लिया और नीलाचल से चल पड़े तो उस समय महाप्रभु के साथ चलने वालों में से श्रीदामोदर पण्डित भी थे। अवश्य ही उस वर्ष भी महाप्रभु रामकेलि ग्राम में सनातन गोस्वामी द्वारा कही बात को स्मरण कर कानाई नाटशाला तक जाकर वापस आ गये, वृन्दावन नहीं गये।
श्रीमन् महाप्रभु उत्तर भारत, वृन्दावन धाम भ्रमण करने के बाद जब बलभद्र के साथ दुबारा झाड़ीरवण्ड के रास्ते से आठारानाला में वापस आये तो ये संवाद सुनकर भक्त लोग आनन्द से विह्वल हो उठे और नरेन्द्र सरोवर पर आकर महाप्रभु से मिले। महाप्रभु ने अत्यन्त प्रेम से सब को आलिंगन किया। जो सम्बन्ध में बड़े थे, उनके चरणों की वन्दना की । उस समय महाप्रभु ने श्रीदामोदर पण्डित को भी आलिगन किया था। पुरुषोत्तम धाम में उड़ीसा की एक सुन्दर विधवा ब्राह्मणी का एक रूपवान पुत्र था। वह बालक प्रतिदिन महाप्रभु के पास आता था, महाप्रभु को प्रणाम करता एवं महाप्रभु के साथ बहुत प्रेम से बातें करता था। महाप्रभु उस लड़के के प्राणस्वरूप हो गये थे। धीरे-धीरे ऐसा हो गया कि वह महाप्रभु को देखे बिना रह नहीं सकता था। महाप्रभु भी उस लड़के को प्रेम करते थे। श्रीदामोदर पण्डित को उस लड़के के साथ महाप्रभु की ये घनिष्ठता अच्छी नहीं लगी। बार-बार मना करने पर भी लड़का महाप्रभु से मिलने के लिये आता था। महाप्रभु भी उससे महाप्रीति करते थे। बालक का स्वभाव होता है कि जहां प्रेम हो गया वहां जायेगा ही। सहन न कर पाने के कारण श्रीदामोदर पण्डित एक दिन सीधा-सीधा महाप्रभु से कह बैठे -आप दूसरों को उपदेश करते समय तो पंडित बनते हैं और सभी आपको गोसाईं-गोसाईं कहते हैं। अब गोसाईं का गुण जब सब लोग गान करेंगे तब नीलाचल में गोसाईं जी की ख्याति होगी।
अन्योपदेशे पंडित कहे गोसाञि ठाई ।
गोसाईं गोसाईं एवे जानिमु गोसाईं॥
एवे गोसाईंर गुण सब लोके गाइवे।
गोसाईं – प्रतिष्ठा सब पुरुषोत्तमे हइवे॥
चै.च.अ. 3/11-12
महाप्रभु ने जब पण्डित की इस बात का तात्पर्य जानना चाहा तो दामोदर पण्डित ने विषय को खोलकर कहा – कि आप तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं। जैसा चाहो वैसा आचरण कर सकते हो। किन्तु इस मुखर (बोलीबाज) जगत के लोगों का मुख कौन बन्द करेगा? आप विद्वान होते हुये भी न जाने क्यों विचार नहीं करते? विधवा ब्राह्मणी के बालक के साथ क्यों इतना प्रेम करते हैं? यद्यपि वह तपस्विनी और सती नारी है तथापि वह एक सुन्दर युवती है। इधर आप भी परमयुवा एवं परमसुन्दर हैं। आप लोगों को कानाफूसी करने का अवसर ही क्यों देते हैं? इतना कहकर श्रीदामोदर पण्डित चुप खड़े हो गये और महाप्रभु अन्दर-अन्दर अत्यन्त सन्तुष्ट होकर बोले –
इहारे कहिये शुद्ध प्रेमेर तरंग।
दामोदर सम नहीं मोर अन्तरंग॥
अर्थात इसे ही प्रेम की शुद्धतरंग कहते हैं। अर्थात जिस प्रेम के प्रभाव से भक्त अपने प्रभु के अपयश आदि की आशंका करके अपने प्रभु का भी शासन करता है वही प्रेम ही शुद्ध प्रेम है। एक दिन महाप्रभु ने श्रीदामोदर पण्डित को एकान्त में बुलाकर उन्हें शचीमाता के पास जाकर उनकी देखरेख का भार लेने के लिये कहा।
तोमा बिना ताँहार रक्षक नाहि आन।
आमाके ओ जाते तुम कैला सावधान॥
तोमा सम निपरेक्ष नाहि मोर गणे।
निरपेक्ष नहिले धर्म न याय रक्षणे॥
चै.च.अ. 3/22-23
मेरे भक्तों में तुम जैसा निरपेक्ष और कोई नहीं है। इसलिए तुमने मुझे सावधान कर दिया। हे दामोदर! निरपेक्ष न होने पर अपने धर्म की रक्षा कोई भी नहीं कर सकता।
महाप्रभु ने श्रीदामोदर पण्डित को शीघ्र ही शचीमाता के पास नवद्वीप में जाने के लिये कहा और फिर दिलासा दिया कि बीच-बीच में पुरी में आकर मेरे से मिलते रहना, और कहा कि दामोदर ! जाकर शचीमाता को मेरा कोटि-कोटि नमस्कार कहना। महाप्रभु ने कहा कि माता को सुख प्रदान करने के लिये एक गूढ़ बात उन्हें बताना कि महाप्रभु बार-बार आपके घर में आता हैं और आपके द्वारा दिये मिष्ठान्न व्यंजनों का भोजन कर जाया करता हैं। किन्तु शचीमाता इसे स्वप्न ही समझती हैं। माता को बताना कि माघी संक्रान्ति को आप बार बार भोग लगाती थीं और महाप्रभु सब खा जाते थे। किन्तु खाली पात्रों को देख विरह दशा में भ्रान्तिवश सोचती थीं कि मैंने भोग लगाया ही नहीं। दुबारा फिर स्थान साफ कर भोग देतीं और महाप्रभु फिर वह भोजन कर लेते थे। शुद्ध प्रेम से आकर्षित होने के कारण महाप्रभु हमेशा ही आपके पास विराजित हैं।
महाप्रभु ने दामोदर पण्डित को श्रीजगन्नाथ जी का प्रसाद दिया व नवद्वीप में जाकर शचीमाता और सब भक्तों में बांटने के लिये कहा। श्रीदामोदर पण्डित ने महाप्रभु की आज्ञा ज्यों की त्यों पालन की। श्रीदामोदर पण्डित के सामने भक्त डर के मारे संकोच से चलते थे। श्रीदामोदर पण्डित के सामने कोई भी मनमुताबिक व्यवहार नहीं कर सकता था। प्रभु के गणों में से किसी की थोड़ी सी मर्यादा उल्लंघन होती देखते ही दामोदर पण्डित वाक्यदण्ड द्वारा उसे स्थापित करते थे।
एइ त’ कहिल दामोदरेर वाक्यदण्ड।
याहार श्रवणे भागे अज्ञान पाषण्ड॥
चै. च. अ. 3/46
जिन सब गौरपार्षदों के प्रचार के फलस्वरूप कृष्णनाम-प्रेम का जगत में प्रचार हुआ था, उनमें से श्रीदामोदर पण्डित भी एक थे। महाप्रभु ने उनकी महिमा गुणगान करते समय इस प्रकार कहा है :-
कृष्णनाम – प्रेम कैला जगते प्रचार।
इहा सवार संगे कृष्णभक्ति ये आमार॥
चै. च. अ. 7/50
भक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में श्री नरहरि चक्रवर्ती महोदय ने श्रीमायापुर धाम में श्रीदामोदर पण्डित के साथ श्रीनरोत्तम ठाकुर के मिलन की बात कही है। श्रीनरोत्तम ठाकुर ने दामोदर पण्डित के दर्शन कर अधीर होकर उन्हें प्रणाम किया था।
तथा दामोदर पण्डितेर दरशने।
हइया अधैर्य प्रणमिला से चरणे॥
भ. र. 8/93