श्रीबिजली खान जाति से पठान मुसलमान होने पर भी श्रीमन्महाप्रभु से कृपा प्राप्त करके प्रसिद्ध वैष्णव हो गये थे। ये श्रीमन्महाप्रभु के समकालीन (15वीं या 16वीं शताब्दी के अन्तर्गत) हुये। इनके पिता राजा के समान धनी थे। इन्होंने श्रीमन्महाप्रभु के दर्शन एवम् कृपा प्राप्त की थी। इन्होंने महाप्रभु की कृपा किस प्रकार प्राप्त की थी, इसका वर्णन श्रीलकृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में मध्यलीला के 18वें परिच्छेद में किया है। वर्णन इस प्रकार से है कि जिस समय श्रीमन्महाप्रभु ने श्रीरथयात्रा का दर्शन करने के पश्चात पुरी से झाड़ीखण्ड के निर्जन रास्ते से श्रीवृन्दावन की ओर यात्रा की थी, उस समय श्रीरायरामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदर ने श्रीमन् महाप्रभु के साथ श्री बलभद्र भट्टाचार्य और एक ब्राह्मण सेवक को भी भेजा था। वृन्दावन जाने के रास्ते में महाप्रभु का प्रेमावेश नीलाचल से सौ गुना अधिक हो गया तथा मथुरा धाम पहुंचने पर उससे हज़ार गुणा एवं ब्रजमण्डल में महाप्रभु जी जब बारह वनों में भ्रमण कर रहे थे तब तो वह प्रेम अपनी पराकाष्ठा में अर्थात लाख गुणा बढ़ गया था।

व्रजमण्डल में बारह वनों का भ्रमण करते-2 महाप्रभु जब अक्रूर घाट पर पहुंचे तो वहां आकर उन्होंने यमुना में छलांग लगा दी और काफी लम्बे समय तक पानी में ही डूबे रहे। काफी लम्बे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण राजपूत वैष्णव कृष्णदास, जो कि वृन्दावन में महाप्रभु को देख कर आकृष्ट हो साथ ही आ गये थे, चीख उठे। उनकी चीख सुनकर बलभद्र भट्टाचार्य शीघ्र ही वहां आये और उन्होंने महाप्रभु को जल से उठाया। महाप्रभु के इस प्रकार के प्रेम के विकारों को देख कर बलभद्र भट्टाचार्य डर गये। इसलिये उन्होंने श्रीमाधवेन्द्र पुरी पाद के शिष्य – सनोड़िया ब्राह्मण के साथ इस सम्बन्ध में परामर्श किया । परामर्श करने के पश्चात मकर पन्चदशी पूर्णिमा को स्नान योग की बात कहकर वे महाप्रभु को वृन्दावन से गंगा के किनारे- किनारे सौरों क्षेत्र से होते हुये प्रयाग जाने का निश्चय किया | राजपूत कृष्ण दास और मथुरा के ब्राह्मण गंगा के उस रास्ते के विषय में जानते थे, सो वे भी महाप्रभु के साथ हो लिए। रास्ते की थकावट के कारण महाप्रभु विश्राम के लिये एक वृक्ष के नीचे बैठे थे कि उस वृक्ष के पास ही बहुत सी गऊओं को विचरण करते हुये देखकर महाप्रभु को व्रजलीला की स्मृति हो आयी । अकस्मात् किसी गोप द्वारा वंशीध्वनि करने पर महाप्रभु महाप्रेमावेश में मूर्छित हो गये। प्रेम के विकार होने के करण उनके मुख से झाग निकलने लगी और श्वास बंद हो गया। उसी समय पठान बिजली खान दस घुड़सवारों की सेना लेकर वहां आ पहुंचा। महाप्रभु की ऐसी अवस्था देखकर बिजली खाँन ने सोचा कि शायद इस सन्यासी के पास बहुत सा सोना व धनादि रहा होगा और वह सारा इन चारों1 ने इसको धतूरा खिलाकर व इसे मार कर लूट लिया है। पठान बिजली खान जब चारों को बांधकर मारने को हुआ तो दोनों गौड़ीय डर से कांपने लगे किन्तु राजपूत कृष्ण दास और मथुरा के ब्राह्मण नहीं डरे बल्कि उन्होंने अपनी प्रस्तुत बुद्धि से काम लिया।

मथुरा ब्राह्मण ने बिजली खान को समझाते हुए कहा कि मैं मथुरा का ही ब्राह्मण हूं और जो ये सन्यासी मूर्च्छित हुये पड़े हैं वे मेरे गुरु हैं। हमारे बादशाह के पास एक सौ लोग हैं और व्याधि ग्रस्त ये सन्यासी कभी मूर्च्छित होता है तो कभी ठीक हो जाता है। यदि आपको हम पर विश्वास नहीं है तो आप हम लोगों को बांधकर कुछ समय प्रतीक्षा कर लीजिये। जब सन्यासी की मूर्च्छा दूर होगी तब इनसे हमारे बारे में पूछ लेना। इनसे पूछने पर ही वास्तविक सत्य बात तुम्हें मालूम पड़ेगी। पठान ने कहा, ठीक है, आप लोगों की बात तो समझ में आ गयी परन्तु ये दोनों बंगाली भय से कांप क्यों रहे हैं, निश्चय ही यही दोषी होंगे। राजपूत कृष्णदास समय की मुसीबत को समझ गये और पठान को दमदार आवाज में डराते हुए कहने लगे – देखो, मेरा घर इसी गांव में है, पास में ही मेरे दो सौ सैनिक हैं, 100 तोपें हैं। अभी एक आवाज़ लगाने से सभी आ जायेंगे और तुम्हारा सब कुछ लूट लेंगे। ये बंगाली लुटेरे नहीं हैं, बल्कि तुम लुटेरे हो। तीर्थवासियों को लूटना ही तुम्हारा काम है। इस प्रकार निर्भीक वाक्य सुनकर पठान मन-मन में भयभीत्त और चिन्तित हो उठा। इसी बीच महाप्रभु की मूर्च्छा दूर हुयी और वे महाप्रेमावेश में उच्चस्वर में ‘हरि’, ‘हरि’ बोलकर हुंकार करते हुए नृत्य करने लगे । महाप्रभु की हुंकार सुनकर और उनका अद्भुत नृत्य देखकर भयवश पठानों ने चारों को छोड़ दिया। महाप्रभु अपने गणों का बन्धन देख नहीं पाये। बलभद्र भट्टाचार्य महाप्रभु को धीरे-धीरे सामान्य अवस्था में लाये और उन्होंने नृत्य करते हुए महाप्रभु को शान्त रूप से बिठाया। बैठते ही महाप्रभु ने सामने उन पठान मुसलमानों को देखा। पठान मुसलमानों को सामने देख उनको बाह्यज्ञान हुआ। पठान महाप्रभु की अपूर्व श्रीमूर्ति और प्रेमोन्मत्त भाव को देखकर उनकी ओर आकृष्ट हो गये तथा आकृष्ट हो कर अपने सन्देह की बात कहने लगे कि हमें सन्देह हुआ था कि इन चारों ने आपको धतूरा खिलाकर पागल कर दिया है और आपका सब सामान लूट लिया है। तब महाप्रभु ने पठानों को समझाया कि मैं तो सन्यासी हूँ। मेरे पास तो कोई धन वगैरह नहीं है और ये चारों मेरे साथी हैं। मिर्गी की बीमारी से कभी -कभी मैं मूर्च्छित हो जाता हूँ । ये चारों दया करके मेरी रक्षा और मेरा पालन करते हैं। पठान के सेवकों में से कालेवस्त्र पहने एक पठान ने पीर के रूप में अपना परिचय दिया और महाप्रभु के दर्शनों से प्रसन्न होकर कुछ शास्त्र विचार किया। उसने अपने शास्त्रों का प्रमाण देकर निर्विशेष ब्रह्मवाद की स्थापना की।

महाप्रभु ने भी उनके ही शास्त्रों का प्रमाण देकर निर्विशेष-परक व्याख्या का खण्डन करके पहले भगवान के सविशेषत्व की बात कही तथा बाद में कर्म ज्ञान व योग विचारादि सब विचारों का खण्डन कर भगवद्प्रेम ही जीव का सर्वोत्तम प्रयोजन है, इसकी स्थापना की। पठान तो महाप्रभु को देखने मात्र से ही आनन्दित हो गये थे और फिर उनसे साध्य-साधन विषय में यथार्थ सिद्धान्त सुनकर और भी आकर्षित हुये। शास्त्रविचारक पठान की जिह्वा पर स्वतःस्फुर्त कृष्ण नाम का उदय हुआ। महाप्रभु ने पीर (पठान) के मुख से कृष्ण नाम सुनकर प्रसन्नता से कहा – इसके कोटि-कोटि जन्मों के पाप ध्वंस हो गये हैं और अब यह पवित्र हो गया है । महाप्रभु द्वारा सभी को कृष्ण नाम करने के लिए कहने पर सभी कृष्ण नाम करने लगे । शास्त्र विचारक पठान को कृष्णनाम का उपदेश देने के पश्चात् महाप्रभु ने उसका नाम रामदास रखा। राजकुमार बिजली खान अपने सेवक पठान का ऐसा सौभाग्य देख स्वयं भी कृष्ण-कृष्ण कहता हुआ महाप्रभु के चरणों में गिर पड़ा तो महाप्रभु ने उस पर भी कृपा की।

ताँ – सबारे कृपा करि’ प्रभु त’ चलिला।
सेइ त’ पाठान सब वैरागी हइला॥
‘पाठान – वैष्णव बलि’ हइल तार ख्याति।
सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्ति॥
सेइ बिजलि खान् हैल महा भागवत।
सर्वतीर्थे हैल ताँर परम महत्व॥
चै.च.म. 18/210-12

उन सब पठानों पर इस प्रकार कृपा करके श्रीमहाप्रभु वहाँ से चल दिये और वे सब पठान तभी से वैरागी हो गए। वे सब ‘पठान – वैष्णव’ नाम से विख्यात हुए। वे सर्वत्र श्रीमन्महाप्रभु की कीर्ति का गान करते रहते थे। पठान बिजली खान तो परम भागवत हो गये और सर्वतीर्थों में उसकी महिमा फैल गई।


1 कृष्णदास राजपूत 2. माधवेन्द्र पु रीपाद जी का शिष्य सनोड़िया विप्र 3. बलभद्र भट्टाचार्य और बलभद्र भट्टाचार्य का साथी ब्राह्मण।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से