आचार्य भगवान् खन्ज कला गौरस्य कथ्यते ।
गौ.ग. 74

भगवान आचार्य को श्रीगौरांग महाप्रभु की कला (अंश का अंश) कहते हैं अर्थात ये महाप्रभु के अंश के अंग है। इनकी गिनती श्रीचैतन्य शाखा में होती है। ये 24 परगना जिले के अन्तर्गत हालिशहर के रहने वाले थे। श्रीचैतन्य चरितामृत में श्रीचैतन्य शाखा का वर्णन करते हुए श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने श्रीभगवान आचार्य के नाम का भी उल्लेख किया है –

भगवान आचार्य, ब्रह्मानन्दाख्य भारती।
श्रीशिखि माहिति, आर मुरारी माहिति ॥
चै.च.आ. 10/136

श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान में ऐसा उल्लेख है कि भगवान आचार्य का आविर्भाव स्थान तो श्रीधाम नवद्वीप है किन्तु थे ये हालिशहर निवासी। इनके पिता श्री शतानन्द खान थे जो कि बहुत ही धनी एवं विषयी थे; जबकि यह स्वयं परम वैष्णव,सुपण्डित और श्रीभगवान के साथ सख्य भाव रखने वाले थे। श्रीस्वरूप दामोदर के साथ भी इनका सखा जैसा व्यवहार था। इन्होंने एकान्त रूप से श्रीचैतन्य महाप्रभु के श्री पादपद्मों का आश्रय लिया था। ये बीच – बीच में श्रीचैतन्य महाप्रभु को अकेले भोजन करवाने के लिए निमन्त्रण करके घर पर बुलाते थे और उन्हें बहुत प्रकार के व्यन्जन परोसते थे। श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्य लीला के द्वितीय परिच्छेद में ये विषय इस प्रकार से वर्णित हुआ है।

पुरुषोत्तमे प्रभु – पाशे भगवान् – आचार्य।
परम वैष्णव तेँहों सुपण्डित आर्य॥
सख्यभावाक्रान्त – चित्त् गोप – अवतार।
स्वरुप – गोसाञि – सह सख्य – व्यवहार॥
एकान्त भावे आश्रियाछेन चैतन्यचरण।
मध्ये मध्ये प्रभुर तेँहों करेन निमन्त्रण॥
घरे भात करि’ करे विविध व्यञ्जन।
एकले गोसाञि लञा करान भोजन॥

अर्थात् : नीलाचल में श्रीमहाप्रभु के पास एक परम वैष्णव श्रीभगवानाचार्य रहते थे, जो बहुत शास्त्रज्ञ एवं अति सरल थे। वे श्रीकृष्ण के एक गोप का अवतार थे। उनके चित्त में श्रीभगवान् का सख्य भाव था। श्रीस्वरूप गोस्वामी के साथ भी उनका सखा- भाव था। वे श्रीमहाप्रभु में एकान्त- निष्ठा रखते थे। कभी- कभी वे प्रभु को अपने घर निमन्त्रण भी करते थे। अपने घर में अनेक प्रकार के व्यञ्जन तैयार करते एवं अकेले श्रीमहाप्रभु को ले जाकर भोजन कराते।

श्रीभगवान आचार्य कभी भी इन्द्रियों का तर्पण करने वाली विषयों की बातें नहीं सुनते थे। आप हमेशा श्रीकृष्ण के नाम – रूप- गुण-लीलादि श्रवण करते रहते थे। नीलाचल में श्रीवासुदेव सार्वभौम का उद्धार करने के पश्चात् महाप्रभु जिन सब भक्तों के साथ मिले थे उनमें से श्रीभगवान आचार्य भी एक थे।

भगवान आचार्य आइला महाशय।
श्रवणेओ यारे नाहि परशे विषय॥
चै.भा.अ. 3/188

नीलाचल में श्रीअद्वैताचार्य के आगमन का समाचार मिलने पर श्रीमन्महाप्रभु , श्रीनित्यानन्द एवं गदाधर आदि जिन-जिन भक्तों को साथ लेकर अद्वैताचार्य के सम्मान के लिये गये थे उन भक्तों में श्रीभगवान आचार्य भी एक थे।

काशीश्वर पण्डित, आचार्य भगवान।
श्री प्रद्युम्न मिश्र प्रेमभक्ति प्रधान॥
चै.भा.अ. 8/57

इसके अतिरिक्त एक दिन समुद्र में जाते समय चटक पर्वत को गोवर्धन के रूप में देखकर श्रीमन्महाप्रभु महाभावावेश में जब उसकी ओर दौड़ पड़े थे तो उस समय महाप्रभु को पकड़ने के लिए जो भक्त उनके पीछे भागे थे उनमें श्री भगवान आचार्य भी एक थे।

पुरी भारती गोसाञि आइला सिन्धुतीरे।
भगवान आचार्य खन्ज चलिला धीरे-धीरे॥
चै.च.अ. 14/90

जब गौड़ीय वैष्णवों को ये संवाद मिला कि श्रीमन्महाप्रभु दक्षिण यात्रा करने के पश्चात नीलाचल आ गये हैं तो सभी नीलाचल आकर महाप्रभु से मिले तो उस समय भी भगवान आचार्य अपने सब काम छोड़कर महाप्रभु के चरणों में रहने के लिए आ पहुँचे थे।

रामभद्राचार्य, आर भगवान आचार्य।
प्रभुपदे रहिला दुँहे छाड़ि सर्व कार्य॥
चै.च.म. 10/184

रामभद्राचार्य और भगवान आचार्य दोनों सब कार्य छोड़कर महाप्रभु के चरणों में रहे।

भगवान आचार्य लंगड़े थे एवं उन्होंने गृहस्थ जीवन अपनाया था। इनके पुत्र थे – श्रीरघुनाथ आचार्य । जब श्रीजाह्नवी देवी अपने गणों के साथ खड़दह से खेतुरीधाम में गईं तो उन भक्तों में श्री भगवान आचार्य के पुत्र श्री रघुनाथ आचार्य भी थे।

खंज भगवानात्मज रघुनाथ आचार्य।
आसिया मिलिला तेँहो सर्वगुणे आर्य॥
– भक्ति रत्नाकर 10/382

सब गुणों में श्रेष्ठ रघुनाथ आचार्य, जो कि लंगड़े भगवान आचार्य के पुत्र थे वह भी साथ आ मिले। श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान में श्रीभगवान् आचार्य का चरित्र पढ़ने से ऐसा जाना जाता है कि न्याय शास्त्र में विशेष पारदर्शिता होने के कारण उन्होंने न्यायाचार्य की उपाधि प्राप्त की थी।

इनका वैराग्य देखकर इनके पिता ने नवद्वीपवासी मधुसूदन घटक की कन्या के साथ इनका विवाह करवा दिया या। इतना होने पर भी ये संसार के तमाम बाधा विघ्नों को लाँघकर श्रीमहाप्रभु के पादपद्मों में नीलाचल में आकर उपस्थित हो गये थे। महाप्रभु द्वारा उनको संसार में वापस जाने का आदेश करने पर ये दुबारा घर वापस आ गये। इनके दो पुत्र थे – रघुनाथ और रमानाथ। किन्तु संसार से विरक्त श्री भगवान आचार्य बाद में पुत्रों और पत्नी को साले और शिष्यों की देख रेख में छोड़कर हर समय महाप्रभु के पादपद्मों में अवस्थान करने के लिय संसार का परित्याग करके नीलाचल चले गये। शाखा निर्णय में लिखा है –

आचार्य भगवन्तं तु तेजोमयकलेवरम्।
यस्य स्मरण मात्रेण गौरप्रेम प्रजायते।

श्रीभगवान आचार्य का अन्तःकरण अत्यन्त सरल था। सरलता के कारण ही वे श्रीमहाप्रभु के विशेष स्नेह- पात्र बन गये थे। श्रीचैतन्य चरितामृत में उनकी सरलता के सम्बन्ध में एक घटना का उल्लेख है। भगवान आचार्य का छोटा भाई श्रीगोपाल भट्टाचार्य वेदान्त पढ़ने के लिये काशी गया था। वेदान्त अध्ययन करने के पश्चात जब वह वापस आया और उसने अपने बड़े भाई श्रीभगवान आचार्य को अपने वेदान्त अध्ययन में पारंगत होने की बात बतायी तो भगवान् आचार्य प्रसन्न होकर उत्साह के साथ उसे महाप्रभु के पास ले गये। अन्तर्यामी महाप्रभु गोपाल भट्ट के मायावाद विचारों की बात जानकर प्रसन्न नहीं हुये किन्तु बाहर से उन्होंने अवश्य ही थोड़ा प्रेम दिखाया। श्रीभगवान आचार्य एक बार फिर अपने छोटे भाई को श्रीस्वरूप दामोदर के पास लाये और निवेदन किया कि मेरा छोटा भाई गोपाल अच्छी तरह वेदान्त पढ़ कर आया है इसलिये आप सभी उससे वेदान्त भाष्य सुनें। श्रीस्वरूप दामोदर ने सरल अन्तःकरण श्रीभगवान् आचार्य की इस प्रकार बात सुनकर प्यार से सनी क्रोधित वाणी में उनके भाई का तिरस्कार करते हुये इस प्रकार कहा –

बुद्धि भ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर संगे।
मायावाद शुनिवारे उपजिल रंगे॥
वैष्णव हइया येबा शारीरक – भाष्य शुने।
सेव्य – सेवक – भाव छाड़ि’ आपनारे ‘ईश्वर’ माने॥

महाभागवत येइ, कृष्ण प्राणधन याँर।
मायावाद श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर॥
चै.च.अ. 2/94-96

अर्थात् : श्रीस्वरूप गोस्वामी ने कहा- “भगवानाचार्य ! गोपाल के संग से तुम्हारी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी लगती है, तभी तुम माँयावाद को सुनना चाहते हो। वैष्णव होकर जो प्राकृत भाष्य सुनता है, वह सेव्य – सेवक के भाव को त्यागकर अपने को ईश्वर मानने लगता है। जो महाभागवत हैं, जिनके श्री कृष्ण ही प्राणधन हैं, मायावाद सुनने से उनके मन में भी अवश्य विपरीत भाव की उत्पत्ति होने लगती है ।

इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर द्वारा तिरस्कृत होने के पश्चात श्रीभगवान आचार्य ने कहा – कि उनका मन तो कृष्णनिष्ठ है, इसलिये शारीरिक भाष्य सुनकर वे भक्ति पथ से गिरेंगे नहीं। इस पर श्रीस्वरूप दामोदर ने और दृढ़ता के साथ समझाया कि हृदय विदारक मायावाद कथा श्रवण करना शुद्ध भक्त के लिये अप्रयोजनीय है।

स्वरूप कहे, तथापि मायावाद – श्रवणे ।
चिद् ब्रह्म माया मिथ्या – एइमात्र शुने ।
जीव – ज्ञान कल्पित, ईश्वरे सकल अज्ञान ।
याहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन प्राण ॥
चै.च.अ. 2/18-19

श्रीस्वरूप गोस्वामी ने कहा – “आचार्य! तुम्हारी बात सत्य है कि मायावाद कृष्ण निष्ठायुक्त चित्त को विचलित नहीं कर सकता। फिर भी मायावाद सुनने से लाभ ही क्या है? उसके सुनने में वृथा समय ही नष्ट करना है और उसके सुनने में एक बार भी तो श्रीकृष्ण नाम सुनने को नहीं मिलता केवल चित्त, ब्रह्म, माया, मिथ्या” – यही तो शब्द सुनने को मिलते हैं। “जीव ने अज्ञानवश ईश्वर की कल्पना कर ली है। जो भगवान् के साकार सगुण सच्चिदानन्द स्वरूप की कल्पना करते हैं – वे सब अज्ञानी हैं” – यही तो शांकर भाष्य का मत है – “इस बात के सुनने से तो कृष्ण – भक्तों के प्राण फटने लगते हैं। श्रीस्वरूप दामोदर की उपदेश वाणी के तात्पर्य को समझ कर श्री भगवान आचार्य ने लज्जित और भयभीत होकर छोटे भाई को गाँव भेज दिया। एक और घटना श्री चैतन्य चरितामृत में अन्त्यलीला, पंचम परिच्छेद में वर्णित है –

पूर्व बंग वासी एक विप्र कवि ने महाप्रभु के सम्बन्ध में एक नाटक की रचना की थी। विप्र श्री भगवान आचार्य को जानता था। इसलिये उस विप्र कवि ने अपना रचित नाटक पहले श्री भगवान आचार्य को सुनाया तब साथ ही अन्य-अन्य वैष्णवों ने भी सुना। सभी ने नाटक की प्रशंसा की। वैष्णवों की इच्छा हुयी कि महाप्रभु को ये नाटक सुनाया जाये। ‘रसाभासदोष’ और ‘सिद्धान्त विरुद्ध’ बातों से महाप्रभु को सन्तोष नहीं होता था। इसलिये स्वरूप दामोदर के अनुमोदन के पश्चात् ही महाप्रभु सुनते थे। श्री भगवान आचार्य के आग्रह करने पर श्रीस्वरूप दामोदर विप्र कवि का नाटक सुनने के लिये मान गये। विप्र कवि द्वारा नाटक के मंगलाचरण के श्लोक और उनकी व्याख्या सुनाने पर सब वैष्णवों के प्रसन्न होने पर भी श्रीस्वरूप दामोदर सुखी नहीं हुये। उन्होंने श्लोक में दो स्थानों पर अपराध रूपी दोष दिखाया। विप्र कवि द्वारा श्लोक की व्याख्या इस प्रकार की :-

कवि कहे, – जगन्नाथ सुन्दर शरीर।
चैतन्यगोसाञि ताते शरीरी महाधीर।
सहजे जड़ जगतेर चेतन कराइते।
नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते॥
चै.च.अ. 5/114 -115

अर्थात् : विप्र कहने लगा – “श्रीजगन्नाथ का सुन्दर विग्रह तो शरीर है और श्रीचैतन्यदेव महाधीर उसके शरीरी हैं। यह समस्त जगत् स्वभावत: जड़ (प्राकृत) है। इस जड़ जगत के जीवों में चेतनता ( कृष्णोन्मुखता) उत्पन्न करने के लिए श्रीकृष्णचैतन्य देव नीलाचल में आविर्भूत हुए हैं”। इस व्याख्या को सुनकर सबका मन आनन्दित हुआ।

श्रीस्वरूप दामोदर जी द्वारा दोष दिखाना –

आरे मूर्ख! आपनार कैलि सर्वनाश ।
दुइ त’ ईश्वरे तोर नाहिक विश्वास॥
पूर्णानन्द – चित्स्वरूप जगन्नाथ – राय ।
ताँरे कैलि – जड़ – नश्वर – प्राकृतकाय॥
पूर्ण षडैश्वर्य चैतन्य-स्वयं भगवान ।
ताँरे कैलि क्षुद्र – जीव स्फुलिंग-समान॥
दुइ ठाञि अपराधे पाइवि दुर्गति ।
अतत्त्वज्ञ तत्त्व वर्णे तार एइ गति॥
चै.च.अ. 5/117-20

अर्थात् : श्रीस्वरूप गोस्वमी ने कहा – “अरे मूर्ख! तुमने तो अपना सर्वनाश कर दिया । श्रीजगन्नाथ एवं श्रीकृष्ण चैतन्यदेव इन दोनों ईश्वर स्वरूपों में तुम्हारा विश्वास या तत्त्व ज्ञान नहीं है। श्रीजगन्नाथ का विग्रह पूर्ण आनन्दमय है – अखण्ड आनन्द स्वरूप है एवं यह स्वरूपतः चिदानन्दमय है, तुमने उस चिदानन्दमय विग्रह को जड़ नाशवान् प्राकृत – देह कह कर वर्णन कर दिया। और श्री चैतन्य देव जो पूर्ण हैं, षडैश्वर्युक्त स्वयं श्रीभगवान् हैं, उन्हें तुमने एक क्षुद्र जीव जो चिंगारी के समान है, बता दिया । तुमने दोनों ईश्वरों के प्रति अपराध किया है, तुम्हारी दुर्गति होगी। तत्त्व के अज्ञाता जब तत्त्व वर्णन करते हैं तो उनकी यही गति होती है, अर्थात दुर्गति होती है।

आर एक करियाछ परम प्रमाद।
देह- देही- भेद ईश्वरे कैले अपराध॥
ईश्वरेर नाहिक कभु देह – देही – भेद ।
स्वरूप, देह – चिदानन्द नाहिक विभेद॥
चै.च.अ. 5/121-22

अर्थात् : आपने इसमें एक और महाप्रमाद किया है। कारण, आप ईश्वर में देह – देही – भेद रूपी अपराध कर बैठे हो, जबकि ईश्वर में देह – देही का भेद नहीं है।

ईश्वर में देह – देही का भेद समझना ही भ्रम हे और इसी भ्रम के कारण ईश्वर को भी बद्ध जीव समझा जाता है, जबकि उनका स्वरूप व उनकी देह सभी चिदानन्दमय हैं। इसमें कोई विभेद नहीं है। श्रीमद्भागवत को शुद्ध भक्त वैष्णवों से श्रवण करना चाहिये।

याह भागवत् पड़ वैष्णवेर स्थाने ।
एकान्त आश्रय कर चैतन्य चरणे॥
चैतन्येर भक्तगणेर नित्यकर संग ।
तवे त’ जानिया सिद्धान्त समुद्र – तरंग॥
चै.च.अ. 5/131- 32

विप्र कवि के विस्मित, लज्जित और भयभीत हो जाने पर श्रीस्वरूप दामोदर ने उसके दुःख को दूर करने के लिये कहा कि शुद्ध सरस्वती द्वारा निन्दासूचक वाक्यों की भी कृष्ण महिमा प्रकाशक व्याख्या हो सकती है। उनके द्वारा इस विषय को विस्तृत रूप से समझाने पर विप्र कवि ने भक्तों के चरणों में आत्मसमर्पण कर दिया। एक बार श्री भगवान आचार्य ने महाप्रभु को घर में उत्तम रूप से भोजन करवाने की इच्छा से छोटे हरिदास को सुगन्धित बारीक चावल मांग लाने के लिये शिखी माहिती की बहन माधवी देवी के पास भेजा था। भोजन के समय महाप्रभु को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने छोटे हरिदास का त्याग कर दिया। वैरागी के लिये स्त्री के साथ वार्तालाप विष खाने से भी ज्यादा खराब है – यह शिक्षा देने के लिये ही महाप्रभु ने ऐसी कठोरता का प्रदर्शन किया था। प्रभु कहे –

वैरागी करे प्रकृति सम्भाषण।
देखिते ना पारों आमि ताहार वदन॥
चै.च.अ. 2/117