श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी विरचित श्रीचैतन्य चरितामृत की मध्यलीला के 17वें और 18वें परिच्छेद में सनोड़िया विप्र के प्रसंग में उनके साथ श्रीमन्महाप्रभु का मिलन संक्षिप्त रूप से वर्णित हुआ है। सनोड़िया विप्र का जन्मस्थान तथा पिता- माता का परिचय प्राप्त नहीं है। श्रीसनोड़िया विप्र के साथ श्रीमन्महाप्रभु के वार्तालाप और व्यवहारादि से जो शिक्षणीय है, वही हमारे लिये ग्रहण करने योग्य है।
जब श्रीमन्महाप्रभु काशी से होते हुये प्रयाग के रास्ते मथुरामण्डल में आये तब वहां भ्रमण करते-करते मथुरा के विश्रामतीर्थ पर पहुंचे । महाप्रभु ने वहां पर स्नान किया तथा स्नान के बाद श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर गये, जहां ‘आदिकेशव’ का दर्शन करते ही वे प्रेम में उन्मत्त होकर नाचने लगे। महाप्रभु के इस अद्भुत नृत्य को देखकर सभी दर्शनार्थी आश्चर्यचकित और चमत्कृत हो उठे। उसी समय क्या हुआ कि एक विप्र श्रीमन्महाप्रभु के पादपद्मों में उपस्थित हुआ। उसने महाप्रभु को प्रणाम किया और उनके साथ नाचने लगा। महाप्रभु के साथ नाचते-नाचते वह प्रेम में विभोर हो गया और प्रेमाविष्ट होकर गिर पड़ा। नाचने के आवेश में दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया और हाथ ऊपर उठाकर ‘हरि’ ‘कृष्ण’ के नामों का ऊँचे स्वर से कीर्तन करने लगे, जिसे देखकर दर्शनार्थी भी उनका अनुसरण करते हुए ऊँचे स्वर से कीर्तन करने में उन्मत्त हो गये। ‘आदिकेशव’ मन्दिर में भीषण कोलाहल सा मच गया। कीर्तन समाप्त होने के बाद उस ब्राह्मण को एकान्त में ले जाकर महाप्रभु ने पूछा –
आर्य सरल तुमि वृद्ध ब्राह्मण।
काहाँ हइते पाइले तुमि एइ ‘प्रेमधन’॥
अर्थात् आर्य! आप वृद्ध ब्राह्मण हो एवं बहुत सरल हो; तुमने यह ‘प्रेमधन’ कहाँ से पाया है।
बूढ़े ब्राह्मण ने उसके उत्तर में कहा कि जब श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद जी भ्रमण करते-करते यहां मथुरा नगर में आये थे तब उन्होंने अनुग्रहपूर्वक मेरे घर में शुभपदार्पण किया था। उन्होंने मुझको मन्त्र देकर शिष्य बनाया तथा उन्होंने मेरे द्वारा पकाया हुआ भोजन भी ग्रहण किया था। उन्होंने गोपालदेव जी को प्रकट करके उनकी सेवा को प्रकाशित किया था जोकि आज भी गोवर्धन में पूजित हो रहे हैं। उस बूढ़े ब्राह्मण का परिचय पाते ही महाप्रभु ने साथ-ही-साथ उसकी चरण- वन्दना की। महाप्रभु के ऐसे व्यवहार से बूढ़ा ब्राह्मण डर गया और वह भी महाप्रभु के पादपद्मों में गिर पड़ा। ‘गुरुदेव के गुरुभाई श्रीगुरु की भांति पूज्य हैं’ – इसकी शिक्षा देने के लिए महाप्रभु ने बूढ़े विप्र से कहा –
‘आप गुरु होकर क्यों मेरे जैसे तुच्छ शिष्य को प्रणाम कर रहे हो, यह ठीक नहीं है।’ बूढ़े विप्र ने विस्मित होकर दीनता प्रकाश करते हुये कहा- ‘आप तो संन्यासी हैं, संन्यासी के लिए मेरे जैसे दीन हीन कंगाल को प्रणाम करना उचित नहीं है। महाप्रभु के प्रेम विकार को देखकर बूढ़े ब्राह्मण ने अनुमान लगाया कि निश्चय ही इनका श्रीमाधवेन्द्र पुरीपाद के साथ सम्बन्ध है। श्रीबलभद्र भट्टाचार्य से महाप्रभु के गुरुदेव का परिचय जानकर बूढ़ा ब्राह्मण महोल्लास से नाचने लगा। ब्राह्मण की प्रार्थना और आग्रह से महाप्रभु उसके घर गये। ब्राह्मण को भी महाप्रभु की साक्षात् सेवा पाने का सौभाग्य मिला। महाप्रभु जब उस ब्राह्मण के घर पहुंचे तो पहले ब्राह्मण ने मन-मन में यह निश्चय किया था कि वे महाप्रभु को दोपहर में भोजन कराने के लिये अपने हाथों से रसोई न बनाकर भट्टाचार्य के द्वारा बनवायेंगे। परन्तु महाप्रभु ने लोकशिक्षा के लिए बूढ़े विप्र से कहा – ‘पुरी गोसाञि ने आपके घर में भोजन किया है अतः मुझे भी अपने हाथों से रसोई बनाकर भिक्षा कराओ, यही उनकी शिक्षा है। बूढ़े विप्र का जन्म तो सनोड़िया कुल में हुआ था जबकि संन्यासी लोग सनोड़िया विप्र के घर भोजन नहीं करते हैं। किन्तु श्रीमाधवेन्द्रपुरीपाद ने सनोड़िया विप्र की वैष्णवता देखकर उसको शिष्य बनाया था और फिर उसके घर भोजन किया। इधर बूढ़े विप्र ने चिन्ता की कि उस समय की सामाजिक प्रथानुसार संन्यासी यदि उनके घर भोजन कर लेगा तो मूर्ख लोग संन्यासी की निन्दा कर सकते हैं, इसलिये वे महाप्रभु को भोजन कराने के लिये संकुचित हो गये। महाप्रभु ने पुनः समझाया कि श्रुति-स्मृति और ऋषियों में मत का पार्थक्य है; किन्तु धर्मसंस्थापन हेतु साधुओं के आचरण को समझकर उसके अनुसार चलना ही वास्तविक धर्म है। महाप्रभु की इच्छा थी कि ब्राह्मण उन्हें अपने घर पर भोजन करवाये अतः महाप्रभु की इच्छा पूरी करने के लिए सनोड़िया विप्र ने अपने हाथों से रसोई बनाकर महाप्रभु को अर्पित की।
नीलाचल से वृन्दावन की ओर जाने वाले रास्ते में महाप्रभु का प्रेमावेश सौ गुणा हो जाता था और मथुराधाम में पहुंचने पर वह हज़ार गुणा तथा व्रजमण्डल के बारह वनों में घूमते समय वह लाख गुणा बढ़ जाता था। श्रीक्षेत्र से झाड़िखण्ड के निर्जन वन के रास्ते से वृन्दावन की ओर यात्रा के समय महाप्रभु की सेवा के लिये श्रीरायरामानन्द और श्रीस्वरूप दामोदर ने श्रीबलभद्र भट्टाचार्य तथा उनके साथ एक ब्राह्मण को सेवक रूप से दिया था। बारह वनों की यात्रा के समय ‘कृष्णदास’ नाम का एक राजपूत वैष्णव भी महाप्रभु के प्रति आकृष्ट होकर उनका साथी हो गया था। जब महाप्रभु अक्रूरघाट पर आये तो प्रेमोन्मत्त होकर उन्होंने यमुना में छलांग लगा दी और बहुत देर तक उसमें डूबे रहे। यह देखकर कृष्णदास तो डर के मारे चिल्ला उठा। बलभद्र भट्टाचार्य ने उसी क्षण आकर महाप्रभु को जल से बाहर किया। महाप्रभु के प्रेमविकार देखकर बलभद्र भट्टाचार्य भी डर गये। उन्होंने श्रील माधवेन्द्रपुरीपाद के शिष्य श्रीसनोड़िया विप्र के साथ परामर्श करके निश्चित किया कि महाप्रभु को श्रीव्रजमण्डल में और ज्यादा भ्रमण के लिए रखना उचित नहीं होगा। माघ मास की मकर – पंचदशी पूर्णिमा स्नान के योग की बात कहकर वृन्दावन से गंगातट के पथ द्वारा सौरों- क्षेत्र होकर महाप्रभु को प्रयाग में ले जाना होगा। राजपूत कृष्णदास और माथुर विप्र (सनोड़िया विप्र) गंगातट के मार्ग के विषय में अनुभवी थे। श्रीमन्महाप्रभु सनोड़िया विप्र को अपने गुरुदेव के गुरु भाई मानकर पूज्यबुद्धि रखते थे जिस कारण महाप्रभु ने विप्र के परामर्श को मान लेने में कोई आपत्ति नहीं की। हर समय कृष्णप्रेम में निमग्न रहने के कारण वृन्दावन से स्थूलतः बाहर आने पर भी क्या होगा। महाप्रभु सर्वत्र कृष्णमय देखने लगे तथा पुनः उनमें प्रेम के विकार प्रकट हो गये। महाप्रभु को रास्ते में कुछ थकावट हुई तो वे रास्ते में ही एक वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गये। जब वे वृक्ष के नीचे बैठे थे तो उन्होंने वहां कुछ गायों को घूमते हुए देखा ।
बस, उनको देखते ही महाप्रभु को व्रजलीला याद आ गई। तभी अकस्मात किसी गोप ने वंशीध्वनि कर दी, बस फिर क्या था उस वंशीध्वनि को सुनते ही महाप्रभु महाप्रेमावेश में मूर्च्छित हो कर गिर पड़े। प्रेम के विकारों के कारण उनके मुख से झाग निकलने लगी और श्वास का आना जाना भी कुछ रुक सा गया। जब यह घटना हुई तो उसी समय पठान मुसलमान बिजली खान, दस अश्वारोही सैनिकों को लेकर वहां उपस्थित हो गया। महाप्रभु की ऐसी अवस्था देखकर बिजली खान ने समझा कि शायद इस संन्यासी के पास बहुत सा धन था और इन चार लुटेरों ने इसको धतूरा खिलाकर मार डाला है और सारा धन लूट लिया है। वे उन चारों को बांधकर जब मारने लगे तो उनमें से दो व्यक्ति जो बंगाल से आये थे (बलभद्र भट्टाचार्य और उनके साथी) भय से कांपने लगे। लेकिन राजपूत कृष्णदास तथा मथुरा के सनोड़िया विप्र ने निर्भीक भाव से उपस्थित बुद्धि का प्रयोग किया। सनोड़िया विप्र ने बिजली खान को समझाते हुये कहा – ‘आप जिस सन्यासी को मूर्च्छित पड़ा देख रहे हैं, मैं इसका गुरु हूं। बीमारी की वजह से यह संन्यासी कभी मूर्च्छित हो जाता है तो कभी स्वस्थ हो जाता है। यदि विश्वास न हो तो आप हमें बांधकर रख दो। थोड़ी देर में जब इसे होश आ जाएगा तो आप इससे पूछ लेना। तब तुम लोग वास्तविक बात जान पाओगे। हम लोग जहां से आ रहे हैं, उस बादशाह के पास एक सौ आदमी हैं। बिजली खान ने माथुर ब्राह्मण को निर्भीक भाव से बात बोलते देखकर सन्देह चित्त से कहा –
‘तुम्हारी भाषा सुनकर मैं समझ गया हूं कि तुम तो मथुरा के ब्राह्मण हो, किन्तु यह दोनों यहां के लोग नहीं हैं, देखो न, भय से कांप रहे हैं। निश्चय ही यह दोषी होंगे।’ कृष्णदास इस आई विपद को भाप लिया तथा दिमाग से काम लिया तथा बड़ी चतुरता से पठान को भय दिखाते हुए कहा – ‘हमारा घर यहां पास के ही ग्राम में है। हमारे दो सौ सैनिक हैं, एक सौ तो तोपें ही हैं। एक आवाज़ लगाने के साथ- साथ अभी आकर वे तुम्हारा सब कुछ छीन लेंगे । ये गौड़ीय लोग ठग हैं या तुम लोग ठग हो।’
राजपूत के निर्भीक वाक्यों को सुनकर पठान डर गया। इसी बीच महाप्रभु को चेतना आ गयी और वे महाप्रेमावेश में ऊँचे स्वर से ‘हरि’, ‘हरि’ पुकारते हुये नाचने लगे। महाप्रभु के अत्यद्भुत कीर्तन को सुनकर और नृत्य देखकर पठानों ने भय पाकर उन चारों को बन्धन से मुक्त कर दिया। महाप्रभु अपने जनों को बन्धन में देख न पाये। पठान भी महाप्रभु की अपूर्व श्रीमूर्त्ति और प्रेमोन्मत्त भाव देखकर उनकी ओर आकृष्ट हो उठे। उन्होंने जब अपने सन्देह की बात बतायी तो महाप्रभु ने कहा कि व्याधि से अगर कभी मैं अचेतन होकर गिर जाता हूं तो यह चारों व्यक्ति ही मुझ पर दया करके मेरी रक्षा और पालन करते हैं।
सौंरोंक्षेत्र में आकर महाप्रभु ने गंगा स्नान किया व बाद में गंगातट के मार्ग से प्रयाग जाने की इच्छा व्यक्त की। सनोड़िया विप्र और राजपूत कृष्णदास को महाप्रभु ने कहा “आप रास्ता दिखाने के लिए मथुरा से मेरे साथ काफी कष्ट सहते हुए आये हैं। आप लोगों को और ज्यादा कष्ट देने की मेरी इच्छा नहीं है। आप यहीं से वापस चले जायें ।” सनोड़िया विप्र और राजपूत कृष्णदास ने महाप्रभु को समझाते हुये कहा – “आपका संग न जाने फिर कब हमारे भाग्य में होगा, यह हम नहीं जानते हैं। यही नहीं, म्लेच्छ देश होने के कारण रास्ते में अनेक प्रकार के उत्पातों की सम्भावना है। बलभद्र आचार्य यहां की भाषा नहीं जानते हैं। इसलिये हम लोग आपके साथ प्रयाग तक जाने की इच्छा करते हैं।” सनोड़िया विप्र तथा राजपूत कृष्णदास की बात को सुनकर महाप्रभु ने मुस्कराते हुये उनकी बात का अनुमोदन कर दिया।