पुरा वृन्दावने वीरादूती सर्वाश्च गोपिकाः।
निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जनको मम॥
(गौ. ग. दी. 176 श्लोक)
श्रीशिवानन्द सेन के पुत्र श्रीपरमानन्द सेन (पुरीदास) ने गौरगणोद्देश दीपिका के 176वें श्लोक में अपने पितृदेव का परिचय इस प्रकार से दिया है-व्रजलीला में जो वीरादूती नामक गोपी थी, वही गौरलीला की पुष्टि करने के लिये शिवानन्द सेन जी के रूप में अवतीर्ण हुई। 24 परगना ज़िले के अन्तर्गत कुमारहट्ट (वर्तमान में जिसका नाम हालि शहर है, जो कांचन पाड़ा के पास है) में श्रीशिवानन्द सेन जी का जन्मस्थान है। श्रीईश्वर पुरीपाद जी ने भी इसी पवित्र भूमि पर आविर्भाव-लीला की थी। श्रीमन्महाप्रभु जी जब यहाँ पधारे थे तो उन्होंने यहाँ की मिट्टी को उठाया और साथ ले लिया। उस समय से ही भक्तों द्वारा वहाँ से मिट्टी लेते रहने से वहाँ पर एक खड्डा हो गया जो कि बाद में एक छोटे से तालाब के रूप में परिवर्तित हो गया। अब यह स्थान ‘चैतन्य डोबा’ के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीमन्महाप्रभु जी के संन्यास ग्रहण कर लेने पर श्रीवास पण्डित जी को महाप्रभु जी की लीला भूमि नदिया में रहना असहनीय हो गया था, अतः वे सपरिवार कुमारहट्ट में आकर रहने लगे। श्रीवासुदेव दत्त ठाकुर, खन्ज1 भगवान् आचार्य इत्यादि गौर भक्तों का निवास स्थान भी कुमारहट्ट ही है। श्रीशिवानन्द सेन जी द्वारा प्रतिष्ठित गौरगोपाल विग्रह काँचनपाड़ा स्थित श्रीकृष्ण राय मन्दिर में अभी भी सेवित हो रहे हैं।
वैष्णव किसी भी कुल में आविर्भूत हो सकते हैं। वैद्य कुल को धन्य करने के लिये शिवानन्द सेन जी ने वैद्य कुल में आविर्भाव की लीला की। शिवानन्द सेन जी के तीन पुत्र थे—श्रीचैतन्यदास श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द (कविकर्णपूर)।
श्रीमन्महाप्रभु जी से मिलने के लिये गौड़ीय भक्तगण प्रतिवर्ष रथ यात्रा के समय पुरुषोत्तम धाम में आते थे। श्रीमन्महाप्रभु जी की इच्छा-अनुसार गौड़देश के भक्तों का पथ प्रदर्शन करते हुये उन्हें पुरी में लाना, उनके खाने-पीने व ठहरने आदि की व्यवस्था तथा यातायात आदि का सारा खर्चा शिवानन्द सेन की देखरेख में ही होता था –
ईश्वर आज्ञाय प्रति वत्सरे वत्सरे।
सबे आइसेन रथयात्रा देखिवारे॥
चलिला मुकुन्ददत्त कृष्णेर गायन।
शिवानन्दसेन-आदि लैया आप्तगण॥ 2
(चै.भ.अ.8/5, 15)
शिवानन्द-सेन करे घाटि समाधान।
सबारे पालन करि’ सुखे लैञा यान॥
सबार सर्वकार्य करेन, देन वासा-स्थान।
शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान॥3
(चै. च. म. 16/19-20)
तृतीय वर्ष जिसमें कि वैष्णव-गृहणियाँ भी श्रीमन्महाप्रभु जी के दर्शनों के लिये पूरी आ रही थीं, उस समय शिवानन्द सेन अपनी पत्नी और पुत्र चैतन्यदास को भी साथ लाये थे। श्रीचैतन्य चरितामृत में इस प्रकार उल्लिखित हैं –
श्रीवास-पण्डित-सङ्गे चलिला मालिनी।
शिवानन्द-सङ्गे चले ताँहार गृहिणी॥
शिवानन्देर बालक, नाम—चैतन्य-दास।
तिंहो चलियाछे प्रभुरे देखिते उल्लास॥
(चै.च.म. 16/22-23)
[श्रीवास पण्डित जी के साथ श्रीमती मोहिनी देवी भी चल पड़ीं और श्रीशिवानन्द के साथ उनकी धर्मपत्नी जा रही थीं। शिवानन्द का पुत्र जिसका नाम चैतन्यदास था, वे भी महाप्रभु जी के दर्शनों की उत्कण्ठा से उनके साथ जा रहा था।]
शिवानन्द-सेन करे सब समाधान।
घाटियाल प्रबोधि ‘देना सबारे वासा-स्थान॥
भक्ष्य दिया करेन सबार सर्वत्र पालने।
परम आनन्दे यान प्रभुर दरशने॥
(चै.च.म. 16/26-27)
[श्रीशिवानन्द सेन सब प्रबन्ध करते थे। रास्ते में सबको रहने का स्थान देते, घाट पर नौकाओं का किराया आदि देते, सभी की भोजनादि की व्यवस्था करते। इस प्रकार बिना किसी असुविधा के सभी भक्त परमानन्द के साथ महाप्रभु के दर्शनों के लिए जाते हैं।]
श्रीमन्महाप्रभु जी ने अत्यन्त उदार स्वभाव वाले तथा अपने अतिप्रिय चट्टग्राम निवासी वासुदेव दत्त ठाकुर का अधिक खर्चीला स्वभाव देखकर उसके व्यय को कम करने के लिये शिवानन्द जी को उनकी देखभाल करने के लिये नियोजित किया था। गृहस्थियों को अपने कुटुम्ब के भरण –पोषण के लिये अवश्य ही कुछ संचय करना चाहिये-इस प्रकार के लौकिक कर्त्तव्यों का निर्देश भी महाप्रभु जी ने दिया था –
शिवानन्द सेने कहे करिया सम्मान।
वासुदेव-दत्तेर तुमि करिह समाधान॥
परम उदार इँहो, जे दिन जे आइसे।
सेई दिने व्यय करे, नाहि राखे शेषे॥
‘गृहस्थ’ हयेन इँहो, चाहिये सञ्चय।
सञ्चय ना कैले कुटुम्ब-भरण नाहि हय॥
इहार घरेर आय व्यय, सब तोमार स्थाने।
‘सरखेल’ ह्ञा तुमि करिह समाधाने॥
(चै.च.म.15/93-96)
[श्रीमन्महाप्रभु जी शिवानन्द सेन को सम्मान पूर्वक कहते हैं कि वासुदेव दत्त का आप ध्यान रखना। वह बहुत ही उदार हृदय वाला है, दिन भर में जो भी धन इस के पास आता है उसी दिन खर्च कर देता है, बचाता कुछ भी नहीं, ये तो गृहस्थी है, इसे कुछ धन अवश्य ही बचा कर रखना चाहिए क्योंकि यदि गृहस्थ धन इकट्ठा नहीं करेगा तो कुटुम्ब का भरण-पोषण नहीं होगा। इनके घर की आमदनी और खर्च के हिसाब का भार सब आप पर है, इसलिये इस तरफ भी आप ध्यान देना।]
श्रीचैतन्य चरितामृत में शिवानन्द सेन के साथ आये एक कुत्ते का भी अलौकिक चरित्र वर्णन हुआ है। हुआ कुछ ऐसा कि जब शिवानन्द सेन जगन्नाथ पुरी जा रहे थे तो एक सुकृतिवान कुत्ता साथ हो लिया। शिवानन्द पुरी जी ने भी उसके लक्षण देखकर व उसे भक्त जानकर साथ रख लिया और खाना इत्यादि देकर वे उसकी भी रक्षा करते। जाते समय नदी पार होने के लिये उड़िया माझी द्वारा कुत्ते को नौका पर चढ़ाने के लिये अनिच्छा प्रकट करने पर शिवानन्द सेन ने दस पण कड़ि4 देकर कुत्ते को पार करवाया। रास्ते में एक दिन सेवक कुत्ते को खाना देना भूल गया, और बाद में जब कुत्ते को खाना देने के लिये ढूँढने लगे तो वह न मिला। कुत्ते के न मिलने से दुःखी होकर शिवानन्द भी उस दिन भूखे रहे।
नीलाचल में पहुँचकर सब लोगों ने पहले की तरह अति उत्कण्ठित होकर महाप्रभु जी व जगन्नाथ जी के दर्शन किये। श्रीमन् महाप्रभु जी ने भक्तों के साथ बैठकर प्रसाद पाया तथा प्रसाद-सेवा करने के पश्चात् महाप्रभु जी ने सभी को अपने-अपने वास स्थान पर भेज दिया। दूसरे दिन जब भक्त महाप्रभु जी के दर्शन करने के लिये उनके पास आये तो वहाँ पर उसी कुत्ते को देख आश्चर्यचकित हो उठे। महाप्रभु जी ने हँसते-हँसते कुत्ते को नारियल प्रसाद दिया और ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘हरि’-कहने को कहा। महाप्रभु जी के कहने पर कुत्ता अनेक बार ‘कृष्ण”कृष्ण’ उच्चारण करते हुये महाप्रभु जी द्वारा दिया खाद्य खाने लगा। इस प्रकार की अलौकिक घटना देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गये। शिवानन्द सेन ने कुत्ते को दण्डवत् प्रणाम किया और दण्डवत् करते हुये बड़ी दीनता के साथ अपने अपराध के लिये क्षमा याचना की। इस घटना के पश्चात् वह कुत्ता अन्तर्हित हो गया। श्रीमन्महाप्रभु जी की कृपा से वह कुत्ता सिद्ध देह प्राप्त कर वैकुण्ठ को चला गया –
आर दिन केह तार देखा ना पाइला।
सिद्ध-देह पाञा कुकुर वैकुण्ठेते गेला॥
ऐछे दिव्यलीला करे शचीर नन्दन।
कुकुरके ‘कृष्ण’ कहाञा करिला मोचन॥5
(चै. च. अ. 1/32-33)
यवनों के राजत्त्व काल में वर्धमान ज़िले के अन्तर्गत कालना नगर के साथ वाले ‘अम्बिका’ नामक गाँव में एक मुलुक अर्थात तहसील-कचहरी थी, उस समय चलती भाषा में इस स्थान को ‘अम्बिका मुलुक’ कहते थे। वर्तमान में यह ‘प्यारीगंज’ के नाम से प्रसिद्ध है , उसी स्थान पर ‘नकुल ब्रह्मचारी’ नामक एक परम वैष्णव रहते थे। गौड़देश के अधिवासियों के उद्धार के लिये महाप्रभु जी द्वारा नकुल के हृदय में प्रवेश करने पर नकुल प्रेमाविष्ट होकर प्रेताविष्ट 6 व्यक्ति की तरह हँसते, रोते, नाचते और हुँकार करते रहते। यहाँ तक कि उनका प्रेमावेश व देह का वर्ण भी महाप्रभु जी की तरह हो गया था। इस अद्भुत घटना को सुनकर लोग चारों तरफ से उनको देखने के लिये आते। नकुल महाप्रभु जी के भाव में सबको ‘कृष्ण’ नाम करने के लिये कहते। उनको देखकर सबके अन्दर कृष्ण प्रेम उदित हो जाता। उक्त घटना को सुनकर शिवानन्द को पहले तो एकाएक विश्वास न हुआ और सन्देह युक्त होकर वे उनकी परीक्षा लेने को आये। उन्होंने विचार किया कि वे दूर ही रहेंगे, यदि नकुल के अन्दर वास्तव में महाप्रभु का आवेश होगा, तो वे स्वयं ही उसे बुलायेंगे और उसका इष्ट मन्त्र कौन सा है, बता देंगे। असंख्य लोगों की भीड़ में नकुल ब्रह्मचारी ‘शिवानन्द”शिवानन्द’ कहकर पुकारने लगे। लोगों के द्वारा शिवानन्द को खोजने पर शिवानन्द नकुल ब्रह्मचारी के पास आ गये और प्रणाम करके उनके पास बैठ गये –
‘ब्रह्मचारी बले—“तुमि करिला संशय।
एक मना हैञा ताहा शुनह निश्चय॥
‘गौरगोपाल-मन्त्र’ तोमार चारि-अक्षर।
अविश्वास छाड़, जेई कैराछ अन्तर॥
(चै. च. अ. 2/30-31)
[ब्रह्मचारी कहने लगे—”आपने मेरे आवेश पर संशय किया है। मन लगाकर सही बात सुनो। तुम्हारा चार अक्षर वाला ‘गौर गोपाल’ मन्त्र है। अत: संदेह को छोड़ दो, इसी ने हम दोनों में अन्तर कर दिया है।”]
शिवानन्द जी को पक्का निश्चय हो गया कि नकुल ब्रह्मचारी में महाप्रभु जी का आवेश हुआ है। तब उन्होंने ब्रह्मचारी जी के सन्मुख दण्डवत् प्रणामादि द्वारा बहुत श्रद्धा भक्ति जतलाई। श्रीमहाप्रभु जी की अचिन्त्य शक्ति का यह एक नमूना है।
एक साल शिवानन्द जी का भान्जा श्रीकान्त सेन महाप्रभु जी के दर्शनों की उत्कण्ठा से अकेला ही जगन्नाथपुरी चला गया, महाप्रभु जी ने उसके प्रति स्नेह दिखाते हुये उसे दो मास तक अपने साथ रखा तथा तत्पश्चात् वापस गौड़देश जाने के लिये आदेश दिया और कहा कि वह वहाँ जाकर भक्तों को बता दे कि इस वर्ष वे पुरी न आयें। पौष मास में वे (महाप्रभु जी) स्वयं ही वहाँ पर आकर भक्तों से मिलेंगे और जगदानन्द के घर पर भोजन ग्रहण करेंगे। श्रीकान्त द्वारा गौड़देश जाकर सबको यह सन्देश सुनाने पर कि इस वर्ष स्वयं महाप्रभु ही उनके पास आ रहे हैं, सब आनन्द से विह्वल हो उठे। शिवानन्द जी व जगदानन्द जी प्रतीक्षा में बैठे हैं कि महाप्रभु जी आयेंगे। पौषमास आया तथापि महाप्रभु जी न आये। महाप्रभु जी के नहीं आने पर वे बहुत दुःखी हुये परन्तु अकस्मात् श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी जी (जिनका महाप्रभु द्वारा प्रदत्त नाम श्रीनृसिंहानन्द है) वहाँ आये और उनसे उनके दुःख का कारण पूछने लगे। वे बोले, महाप्रभु जी गौड़देश में आयेंगे ऐसा कहकर भी वे क्यों नहीं आये, यही उनके दुःख का कारण है। यह सुनकर प्रद्युम्न ब्रह्मचारी जी ने आश्वासन दिया कि वे तीन दिन के अन्दर महाप्रभु जी को ले आयेंगे। वे प्रद्युम्न ब्रह्मचारी के अलौकिक प्रभाव को जानते थे। अत: उन्हें विश्वास हो गया। प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ने दो दिन ध्यान अवस्था में बैठकर देखा कि महाप्रभु जी पाणिहाटि में पहुँचे चुके हैं तथा अगले दिन मध्यान्ह्न काल में शिवानन्द सेन के घर में आ पहुँचेंगे। कुछ भी सन्देह न कर उन्होंने शिवानन्द जी को रसोई की व्यवस्था करने के लिये कहा। स्वयं नृसिंहानन्द जी ने भी काफी मेहनत करके सुबह से बहुत प्रकार के व्यंजन तैयार करने प्रारम्भ कर दिये तथा उन्होंने श्रीजगन्नाथ, श्रीमहाप्रभु और श्रीनृसिंह देव जी के तीन अलग-अलग भोगों की व्यवस्था की। भोग निवेदन करने के पश्चात् वे ध्यान करने ही लगे थे कि महाप्रभु जी ने वहाँ पहुँचकर तीनों भोग ही ग्रहण कर लिये। कुछ भी अवशेष न बचा। यह देख प्रद्युम्न ब्रह्मचारी आनन्द से विह्वल हो गये। यद्यपि जगन्नाथ-नृसिंह-श्रीचैतन्य महाप्रभु में, तत्त्व की दृष्टि से कोई भेद नहीं है फिर भी इष्टनिष्ठा का प्रदर्शन करने के लिये वे मज़ाक करते हुये कहने लगे कि ‘नृसिंह देव जी तो आज भूखे ही रह गये।‘
प्रद्युम्न ब्रह्मचारी से यह बात सुनकर शिवानन्द सेन को सन्देह हो गया कि श्रीमन् महाप्रभु जी आये थे और तीनों थालियों में सजा नैवेद्य ग्रहण कर गये। अपने सन्देह की बात प्रद्युम्न ब्रह्मचारी से कहने पर उन्होंने उसके जवाब में कहा:-
तिनजनार भाग तेंहो एकेला खाइला।
जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला॥
(चै. च. अ. 2/71)
[महाप्रभु जी ने तीन जनों का भोजन अकेले ही खा लिया है। इसलिए श्रीजगन्नाथ देव और श्रीनृसिंह देव दोनों भूखे ही रह गये हैं।]
प्रद्युम्न ब्रह्मचारी जी ने शिवानन्द जी से पुनः भोग की सामग्री मंगवा कर, रसोइ तैयार करके नृसिंह देव जी को भोग अर्पण किया परन्तु शिवानन्द सेन का संशय नहीं गया।—– एक साल के बाद जब शिवानन्द भक्तों को साथ लेकर नीलाचल गये तो एक दिन महाप्रभु जी सब भक्तों के सामने नृसिंहानन्द जी के गुणों का वर्णन करते हुये कहने लगे कि:–
गतवर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन।
कभु नाहि खाई ऐछे मिष्ठान्न-व्यञ्जन॥
(चै. च. अ. 2/77)
(अर्थात् पिछले साल पौष मास में जो तुमने भोजन करवाया था, वैसे मिष्ठान तो मैंने कभी नहीं खाये।)
यह सुनकर सब भक्त आश्चर्यान्वित हो गये और शिवानन्द जी का सन्देह भी दूर हो गया। शिवानन्द प्रभु जी के प्रति श्रीमहाप्रभु जी की कृपा का यह एक और उदाहरण है।
शिवानन्द सेन जी एक बार पतितपावन श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जी की अशेष कृपा के भी पुत्र हुये थे। श्रीमन्नित्यानन्द जी ने स्नेहाविष्ट होकर पदाघात (लात मारने) के बहाने ब्रह्मादि देवताओं के लिये भी सुदुर्लभ पादपद्म शिवानन्द जी के मस्तक के ऊपर स्थापित किये थे। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी जी ने श्रीचैतन्य चरितामृत में अन्त्य लीला के द्वादश परिच्छेद में इस प्रसंग का वर्णन किया है—
हरिदास ठाकुर जी के निर्याण के पश्चात् महाप्रभु जी के प्रेमविकारों का प्राकट्य रात-दिन बढ़ने लगा। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी गौड़देश के भक्तगण पुरी में आने के लिये उद्यत हुये तथा नवद्वीप में आकर इकट्ठे हुये। महाप्रभु जी द्वारा मना करने पर भी नित्यानन्द प्रभु जी ने भक्तों के साथ पुरी की यात्रा की। शिवानन्द सेन अपनी पत्नी और तीन पुत्रों को लेकर चल पड़े। उड़ीसा के रास्तों की जानकारी होने के कारण शिवानन्द सेन सब को आराम से ले जाते थे। घाटी का टैक्स देने के लिए वे स्वयं रुक जाते तथा सबको भेजकर आप सबसे बाद में आते थे। एक दिन सब कुछ करने के पश्चात् शिवानन्द के आने में विलम्ब हो गया। काफी विलम्ब हो जाने के कारण गाँव में रहने का कोई स्थान न पाकर सभी भक्त वृक्ष के नीचे बैठ गये। श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु अप्राकृत व्रजबालक के आवेश में इस प्रकार हो गये मानों भूख से व्याकुल हो गये हों, ऐसी लीला प्रकाश करते हुये वे बनावटी क्रोध का प्रदर्शन करते हुये बोले:–
तिन पुत्र मरूक शिवार, एखन न आइल।
भोके मरि’ गेनु, मोरे वासा ना देओयाइल॥
(चै. च. अ. 12/20)
(अर्थात् शिवानन्द के तीनों पुत्र मर जायें। एक तो मैं भूख से मर गया और दूसरा मेरे ठहरने के लिये स्थान भी नहीं बताया।)
नित्यानन्द जी का अभिशाप सुनकर शिवानन्द सेन की पत्नी रोने लगी, कर देने के पश्चात् शिवानन्द ने वापस आकर अभिशाप हेतु क्रन्दन करती हुई अपनी पत्नी को सान्त्वना प्रदान की तथा श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जी के पादपद्यों में उपस्थित हुये। शिवानन्द को देखते ही नित्यानन्द प्रभु जी ने उनके सिर पर लात मार दी। शिवानन्द सेन नित्यानन्द प्रभु जी के पादपद्मों का आघात रूपी सौभाग्य प्राप्त कर आनन्दित हो उठे और शीघ्र ही किसी ग्वाले के घर जाकर उन्होंने नित्यानन्द प्रभु के ठहरने की व्यवस्था कर दी। श्रीनित्यानन्द प्रभु जी के पादपद्यों में प्रार्थना करते हुये वे उन्हें निर्दिष्ट वास स्थान में ले आये तथा प्रसन्न चित्त से श्रीशिवानन्द जी ने नित्यानन्द जी की इस प्रकार से स्तुति की:–
आजि मोरे भृत्य करि’ अङ्गीकार कैला।
येमन अपराध भृत्येर, योग्य फल दिला॥
‘शास्तिछले कृपा कर,—ए तोमार ‘करुणा’।
त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे कोन् जना?॥
ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्रीचरण-रेणु।
हेन चरण-स्पर्श पाइल मोर अधम तनु॥
आजि मोर सफल हैल जन्म, कुल, कर्म।
आजि पाइनु कृष्णभक्ति, अर्थ, काम, धर्म॥
(चै. च. अ. 12/27-30)
[अर्थात आपने आज मुझे अपना दास मानकर अंगीकार किया है। मुझ सेवक का जिस प्रकार का अपराध था, उस अनुरूप ही आपने फल दिया है। यह आपकी करुणा है कि शासन का बहाना करते हुए आपने मुझ दास पर कृपा ही की है। इस त्रिलोकी में ऐसा कौन है जो आप की लीला को समझ सकता है? आपके जिन चरणों की रज ब्रह्मा जी को भी दुर्लभ है, ऐसे चरणों का स्पर्श मेरे शरीर ने प्राप्त किया है। आज मेरा कर्म, कुल तथा जन्म सफल हो गया है। आज मैंने धर्म, अर्थ, काम और कृष्ण-भक्ति, सभी कुछ पा लिया है।]
शिवानन्द जी का स्तव सुनकर नित्यानन्द प्रभु प्रसन्न हो गये तथा उन्होंने शिवानन्द जी का आलिंगन कर लिया। जब नित्यानन्द जी ने शिवानन्द जी के सिर पर लात मारी थी तो शिवानन्द जी का भन्जा श्रीकान्त अपने मामा जी के मस्तक पर पदाघात देखकर मन ही मन बड़ा क्रोधित हुआ था और मन ही मन सोचने लगा कि उसके मामा जी श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के पार्षद हैं और गोसाई ने उनको लात मारी? अत्यन्त उदास होकर श्रीकान्त सबको छोड़कर अकेला ही तीव्र गति से चलकर महाप्रभु जी के पास पहुँच गया था। वहाँ पहुँचने पर उसने श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को प्रणाम किया। महाप्रभु जी के सेवक गोविन्द ने श्रीकान्त को कुर्ता खोलकर प्रणाम करने के लिये कहा। अन्तर्यामी महाप्रभु जी श्रीकान्त के मनोभाव को जान गये और बोले:–
श्रीकान्त आस्याछे पाञा मनोदुःख।
किछु ना बलिह, करूक, जाते इहार सुख॥
(चै. च. अ 12/38)
[अर्थात महाप्रभु जी ने कहा कि श्रीकान्त मन में दुख पाकर आया है। अत: इसे कुछ मत कहना। ऐसा कुछ करो, जिससे इसे सुख हो।] महाप्रभु जी सर्वज्ञ हैं, यह जान श्रीकान्त शान्त हो गये और उन्होंने किसी से कुछ न कहा। भगवान् भक्त के प्रति इतने अनुराग युक्त होते हैं कि भक्त के जो रिश्तेदार होते हैं वे भी उनके अत्यन्त प्रिय हो जाते हैं।
अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।
साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः॥
(भा. 9/4/63)
शिवानन्द सेन के सम्बन्ध से उनकी स्री तथा तीनों पुत्रों ने भी महाप्रभु जी की अशेष कृपा प्राप्त की। महाप्रभु जी के निर्देश के अनुसार शिवानन्द जी के कनिष्ठ पुत्र का नाम हुआ-परमानन्द दास। महाप्रभु जी उपहास से कुमार को ‘पुरीदास’ कह कर सम्बोधन करते थे। शिवानन्द जी जब बालक परमानन्द दास को महाप्रभु जी के पास लाये थे तो महाप्रभु जी ने स्नेहाविष्ट होकर अपने पैर की अंगुली उसके मुख में दे दी थी।
शिवानन्देर भाग्यसिन्धु के पाइबे पार?
जाँर सब गोष्ठिके प्रभु कहे ‘आपनार’॥
तबे सब भक्त लञा करिला भोजन।
गोविन्देर आज्ञा दिला करि’ आचमन॥
शिवानन्देर ‘प्रकृति’, पुत्र-यावत् एथाय।
आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥
(चै. च. अ.12/51-53)
[श्रीशिवानन्द जी के भाग्य को कौन समझ सकता है कि जिसके सारे परिवार को ही महाप्रभु जी अपना कहते थे। महाप्रभु जी ने सब भक्तों को साथ लेकर भोजन किया तथा आचमन करने के पश्चात् अपने सेवक गोविन्द जी को आज्ञा दी कि श्रीशिवानन्द, उनकी पत्नी तथा उनके पुत्र जब तक यहाँ पर हैं तब तक मेरा अवशेष प्रसाद जैसे उनको मिले, ऐसी व्यवस्था करना।]
शिवानन्द जी के छोटे पुत्र पुरीदास के प्रति महाप्रभु जी की जो अशेष कृपा थी वह श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्य लीला के सोलहवें परिच्छेद में वर्णित हुई है। एक बार रथयात्रा के समय शिवानन्द सेन अपनी पत्नी और कनिष्ठ पुत्र पुरीदास को लेकर महाप्रभु जी के पास आये। महाप्रभु जी ने पुरीदास को “कृष्ण” “कृष्ण”-उच्चारण करने को कहा। बार -बार बोलने पर भी बालक ने कृष्ण नाम उच्चारण नहीं किया। शिवानन्द सेन ने भी बहुत कोशिश की परन्तु वे भी उच्चारण न करवा सके। महाप्रभु जी ने कहा—मैंने जगत में सबको, यहाँ तक कि स्थावरों (वृक्षादि)को भी कृष्ण नाम करवाया किन्तु इस शिशु को कृष्ण नाम नहीं करवा सका, इसका क्या कारण है? स्वरूप दामोदर जी ने उसके कारण की ओर निर्देश करते हुये कहा:–
तुमि कृष्णनाम-मन्त्र कैला उपदेशे।
मन्त्र पाञा कार आगे ना करे प्रकाशे।
मने मने जपे, मुखे ना करे आख्यान।
एइ इहार मनः कथा—करि अनुमान॥
(चै.च.अ. 16/71)
[अर्थात् अपने इसे कृष्ण नाम के मन्त्र का उपदेश किया है परन्तु मन्त्र लेने के पश्चात् उसे किसी के सामने प्रकाशित नहीं किया जाता इसलिये ऐसा लगता है कि यह उच्चारण न करके मन ही मन जप कर रहा है।]
श्रील प्रभुपाद जी ने इन पयारों के अनुभाष्य में लिखा है “श्रीगुरुदेव जी से प्राप्त मन्त्र को दूसरों के सामने बोलने से उसका वीर्य नहीं रहता अर्थात् उसका प्रभाव खत्म हो जाता है, ऐसा श्रीगदाधर जी के आख्यान से हम पहले ही जान चुके हैं। एक दिन फिर महाप्रभु जी ने जब पुरीदास से कुछ बोलने के लिये कहा तो पुरीदास ने अपना मौन तोड़कर ऐसा श्लोक उच्चारण किया कि सब चमत्कृत हो गये। उस समय उनकी उम्र लगभग सात साल की थी। कोई अध्ययन नहीं, बिना अध्ययन के कैसे श्लोक उच्चारण किया, यह देखकर सब चमत्कृत हो उठे। वास्तव में श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की कृपा की महिमा को ब्रह्मादि देवता भी समझ नहीं सकते। पुरीदास (कविकर्णपूर) कृत श्लोक:–
श्रवसोः कुवलयमक्ष्णो रञ्जनमुरसो महेन्द्रमणिदाम।
वृन्दावनरमणीनां मण्डनमखिलं हरिर्जयति॥7
(चै.च. अ. 16/74)
श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी जी द्वारा श्रीयदुनन्दन आचार्य की आज्ञा पालन करने का बहाना करके भाग जाने पर श्रीगोवर्धन मजूमदार ने दस व्यक्तियों को एक पत्र देकर शिवानन्द जी के पास ही भेजा था और रघुनाथ को वापस भेजने के लिये अनुरोध किया था। लेकिन वहाँ पर रघुनाथ जी का कुछ पता न लगने पर वे दसों आदमी वापस आ गये थे। चातुर्मास्य के पश्चात् शिवानन्द जी द्वारा भक्तों के साथ पुरी से गौड़देश में वापस लौटने पर, रघुनाथ जी के पिता गोवर्द्धन मजूमदार को लोगों के मुख से रघुनाथ द्वारा सिंहद्वार में भिक्षावृति करने एवं तीव्र वैराग्य के साथ भजन करने की बात मालम हई तो भक्तों के पुनः पुरी यात्रा करने पर, रघुनाथ जी के माता-पिता जी ने दुःखी होकर रघुनाथ की सेवा के लिये चार सौ मुद्रा, दो सेवक और एक ब्राह्मण को शिवानन्द सेन के साथ पुरी भेजा था किन्तु रघुनाथ गोस्वामी जी ने अपने लिये कुछ भी स्वीकार नहीं किया। शिवानन्द सेन के पुत्र कविकर्णपूर ने श्रीचैतन्य चन्द्रोदय नाटक के इसी प्रस्ताव में रघुनाथ दास गोस्वामी जी की महिमा विस्तृत भाव से वर्णन की है।
कुमारहट्ट में जिस समय श्रीवास के गृह में अतिथि भक्तों के साथ श्रीमन्महाप्रभु जी ने शुभपदार्पण किया था उस समय वहां अन्य भक्तों के साथ शिवानन्द सेन भी महाप्रभु जी से मिले थे।
वासुदेव दत्त आइलेन सेइ क्षणे।
शिवानन्द सेन-आदि आप्तवर्ग-सने॥
(चै. भा. अ. 5/18)
श्रीशिवानन्द सेन जी के आविर्भाव व तिरोभाव का न तो वर्ष मालूम पड़ता है और न ही उनके माता-पिता व पत्नी का नाम ही सही-सही जाना जाता है।
1 खन्ज शब्द बंगला भाषा का है जिसका अर्थ है लंगड़ा।
2 श्रीमन् महाप्रभु जी की आज्ञा से प्रत्येक वर्ष रथयात्रा देखने के लिए साथ आते हैं। श्रीमुकुन्द दत्त श्रीशिवानन्द सेन आदि को साथ लेकर श्रीकृष्ण का गान करते हुये चल पड़े।
3 श्रीशिवानन्द सेन ही उड़ीसा के मार्गों को अच्छी तरह जानते हैं। इसलिये वे ही सभी भक्तों का मार्गदर्शन करते और नदी पार होने पर नाव का किराया इत्यादि देते थे। वे ही सब भक्तों का पालन तथा उन्हें आराम से ले जाते थे। वे सब को रहने के लिये स्थान देते तथा सब की सभी प्रकार से सहायता करते।
4दस फण कड़ि-800 कौड़ी
5उस दिन के पश्चात् उसे किसी ने नहीं देखा। वह कुत्ता सिद्ध देह प्राप्त कर वैकुण्ठ को चला गया। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन दिव्य लीलायें करते हैं। कुत्ते से कृष्ण का नाम उच्चारण कराके उन्होंने उसको भवसागर से पार लगा दिया।
6 जिसे भूत ने पकड़ लिया है।
7जो श्रवण युगल (दोनों कानों) के नीलकमल, चक्षुओं के अन्जन, वक्षस्थल के महेन्द्र मणिदाम, वृन्दावन की रमणियों के अखिलभूषण हैं, उन श्रीहरि की जय हो |
स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से