इनका नाम भी श्रीचैतन्य शाखा में है। यह श्रीधाम नवद्वीप के वासी हैं। महाप्रभु ने जो संकीर्तनलीला की थी, यह उस संकीर्तनलीला के पार्षदों में से एक हैं। श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जब नवद्वीप आये थे तो पहले इनके ही घर में रहे थे।
सदाशिव पण्डित याँर प्रभुपदे आश ।
प्रथमे नित्यानन्देर याँर घरे वास॥
चै.च.आ. 10/34
एक सदाशिव पण्डित थे, जो सदा श्रीमहाप्रभु के चरणों का चिन्तन करते थे । नवद्वीप में आकर श्री नित्यानन्द सबसे पहले इनके घर में रहे थे।
सदाशिव पण्डित चलिल शुद्धमति ।
याँर घरे पूर्वे नित्यानन्देर वसति॥
(चै.च.आ.8 /19)
श्रील वृन्दावनदास ठाकुर द्वारा रचित श्रीचैतन्यभागवत – ग्रन्थ के मध्यवण्ड के 8वें अध्याय में आया है कि नवद्वीप में जो श्रीमन् महाप्रभु का कीर्तनविलास हुआ था, उस कीर्तनविलास के समय जो पार्षद रूप से महाप्रभु के साथ थे, उनमें सदाशिव पण्डित का नाम भी आया है ।
गोपीनाथ, जगदीश श्रीमान, श्रीधर।
सदाशिव, वक्रेश्वर, श्रीगर्भ, शुक्लाम्बर ॥
चै.भा.म. 8/115
अर्थात् : गोपीनाथ, जगदीश, श्रीमान, श्रीधर, सदाशिव, वक्रेश्वर, श्रीगर्भ, शुक्लाम्बर आदि सब वहां कीर्तन में सम्मिलित होते । जिस समय श्रीमन्महाप्रभु ने गंगा में अपने निज पार्षद भक्तों के साथ जलकेलि की, उस समय भी श्रीसदाशिव पण्डित उन साथियों में से एक थे। जब श्रीमन्महाप्रभु गया से नवद्वीप लौटे, तब महाप्रभु ने कृष्ण विरह में जो अलौकिक प्रेमविकार प्रकट किया उसको देखकर सदाशिव पण्डितादि तो आश्चर्यचकित हो उठे। श्रीहरि केवलमात्र भक्ति से ही वशीभूत होते हैं, किसी प्रकार के जागतिक गुणों के द्वारा नहीं । इसकी शिक्षा देने के लिये श्रीमन् महाप्रभु ने गरीब भिक्षुक की लीला का अभिनय करने वाले शुक्लाबर ब्रह्मचारी के भिक्षा के झोले से जोर पूर्वक तण्डुल (चावल) छीन लिये थे। श्रीचैतन्यभागवत-ग्रन्थ में जो वर्णन है उससे पता चलता है कि श्रीमन्महाप्रभु ने सदाशिव पण्डित आदि भक्तों को अपने प्रिय श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर में इकठ्ठे होने का आदेश किया था ।
कालि सबे शुक्लाम्बर – ब्रह्मचारी- घरे ।
तुमि आर सदाशिव आसिह सत्वरे॥
-चै.भा. म. 1/40
अर्थात् : कल सब शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर सदाशिव के साथ शीघ्र ही आईये । [‘तुमि’ श्रीमान पण्डित]
सदाशिव, मुरारि, श्रीमान्, शुक्लाम्बर।
मिलिला सकल जत प्रेम अनुचर॥
चै.भा.म. 1/81
अर्थात् : सदाशिव, मुरारि गुप्त, श्रीमान् आदि प्रेमी भक्तजन शुक्लाम्बर से मिले ।
श्रीसदाशिव पण्डित श्रीमन्महाप्रभु के कितने प्रिय थे, वह श्रीमन्महाप्रभु द्वारा कहे वचनों से पता चलता है।
श्रीमन्महाप्रभु ने सदाशिव पण्डित के पास अपने हृदय का दुख बताकर सुख प्राप्त किया था ।
तुमि आर सदाशिव पण्डित मुरारि ।
तोमा सबा स्थाने दुःख करिव गोहारि॥
अर्थात् : सदाशिव पण्डित तुम और मुरारि गुप्त आकर मिलना, तुम सबको मैं अपना दुःख सुनाऊँगा । श्रीनवद्वीप में श्रीचन्द्रशेखर आचार्य के घर श्रीमन्महाप्रभु ने ब्रजलीला का अभिनय किया था । जब श्रीमन्महाप्रभु ने अभिनय और नाचने की इच्छा प्रकट की तो कौन क्या-क्या वेश धारण करेगा, महाप्रभु ने वैसी ही वेशभूषा तैयार करने का निर्देश दिया था श्री सदाशिव पण्डित और बुद्धिमन्त खान को । महाप्रभु का ऐसा आदेश पाकर श्रीसदाशिव पण्डित प्रेमानन्द से विह्वल हो उठे ।
सदाशिव बुद्धिमन्त खानेरे डाकिया ।
बलिलेन प्रभु काच सज्ज कर गिया॥
चै.भा.म. 18/7
आज्ञा शिरे करि’ सदाशिव बुद्धिमन्त ।
गृहे चलिलेन आनन्देर नाहि अन्त॥
चै. भा. 18/14
सदाशिव बुद्धिमन्त खान दुइजने ।
नानावेश द्रव्य सज्ज कैल एइखाने॥
लक्ष्मी आदि काचे नाचिवेन गौरराय।
हृइये कीर्तन याते जगत माताय ॥
भक्ति रत्नाकार 12/2903-4
[एइ खाने अर्थात : चन्द्रशेखर आचार्य – भवन में।]