श्रीचैतन्य चरितामृत और श्रीचैतन्य भागवत इन दोनों ग्रन्थों के वर्णनानुसार इस प्रकार जाना जाता है कि श्रीनन्दनाचार्य के पिता श्रीचतुर्भुज पण्डित थे तथा ये विष्णु दास, नन्दन और गंगादास तीन भाई थे।

चतुर्भुज पण्डित-नन्दन गंगादास।
पूर्वे याँ’र घरे नित्यानन्देर विलास॥ 1
(चै. भा. अ. 5/745)

विष्णुदास, नन्दन, गंगादास, तिन भाई।
पूर्वे याँर घरे छिल ठाकुर निताइ॥2
(चै. च. आ. 11/43)

ये नवद्वीपवासी भट्टाचार्य थे। विष्णुदास और गंगादास भी नीलाचल में कुछ दिन महाप्रभु के पास रहे थे। श्रीनन्दनाचार्य के घर नवद्वीप में श्रीमन्महाप्रभु, श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु जी ने छिप कर रहने की लीला की थी। श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु नवद्वीप में नन्दनाचार्य के घर में रहे थे।

ननन्द आचार्य शाखा जगते विदित।
लुकाइया याँ’र घरे दुइ प्रभु स्थित॥3
(चै. च. आ. 10/39)

श्रीगौड़ीय वैष्णव-अभिधान (शब्दकोश)में नन्दनाचार्य के पितृ परिचय और वंश परिचय में अन्तर देखा जाता है। उसमें इस प्रकार लिखा है कि श्रीनन्दन आचार्य के घर में एक गृह-विप्र थे उनका नाम भी श्रीनन्दनाचार्य था, श्रीनन्दनाचार्य जी के पिता का नाम श्रीलक्ष्मीनारायण था, जिनके श्रीनन्दन और श्रीभगवान् अधिकारी सार्वभौम नामक दो पुत्र थे। सर्वज्ञ और ज्योतिष शास्र में अद्वितीय पण्डित होने के कारण श्रीलक्ष्मीनारायण जी की काफी प्रसिद्धि थी। उन्होंने श्रीमन्महाप्रभु जी की जन्म लीला का भी दर्शन किया था। श्रीनन्दनाचार्य चैतन्य शाखा में गिने जाते हैं। ये लंगड़े थे श्रीमन्महाप्रभु जी के दक्षिण भारत भ्रमण के पश्चात् वापस पुरी में प्रस्थान करने पर सभी उल्लसित हुये। श्रीनन्दनाचार्य ने लंगड़े होते हुये भी अधिक उत्फुल्लित होकर सब से आगे जाकर महाप्रभु जी की पूजा की थी।

नन्दन आचार्य आसे गाढ़ अनुरागे।
खोंड़ा बटे तबुओ आसे सकलेर आगे ॥

[श्रीनन्दन आचार्य जी का महाप्रभु जी से अत्यन्त प्रेम है। इसीलिये लंगड़े होते हुए भी वे सब से आगे रहते हैं।]

श्रीनन्दनाचार्य के पूर्व पुरुष शाकद्वीपी पराशरात्मज शान्तिमुनि वंश में पैदा हुये थे। वात्स्य गोत्र, राढ़ीय भरत शाखा का वंश है। इन्होंने कुछ दिन तारकेश्वर के पास बहिर्खण्ड ग्राम में वास किया था तथा बाद में नवद्वीप के दक्षिण मोहल्ले में रहे। गौड़ीय वैष्णव अभिधान में और भी लिखा है:– “श्रीचैतन्य चरितामृत में उल्लिखित जो विष्णुदास, नन्दन, गंगादास नाम के तीन भाई हैं, तीनों भाईयों के अन्तर्गत जो नन्दन जी हैं वे अलग हैं, अर्थात् वे नन्दनाचार्य नहीं हैं। कारण, इनकी गिनती तो नित्यानन्द शाखा में होती है, यह नन्दन तो एक पद कर्त्ता थे। इनका अन्य परिचय भी अज्ञात ही है।”

श्रीनन्दन आचार्य भवन में श्रीनित्यानन्द प्रभु:–
श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु ने गृह त्याग दिया और अत्यन्त व्याकुल हृदय से अवधूत वेष धारण करके विभिन्न तीर्थों में कृष्ण का अन्वेषण करने के लिये निकल पड़े। अन्वेषण करते –2 वृन्दावन पहुंचने पर आपको मालूम पड़ा कि नन्दनन्दन श्रीकृष्ण मायापुर में श्रीशचीनन्दन गौरहरि के रूप में प्रकट हुये हैं तो श्रीबलदेवाभिन्न स्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप में आकर श्रीनन्दनाचार्य जी के घर में गुप्त रूप से रहने लगे।श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जी की सेवा प्राप्त कर श्रीनन्दन आचार्य धन्यातिधन्य हो गये। इधर श्रीमन्महाप्रभु जी ने स्वप्न में श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जी का आगमन देखा और सभी भक्तों को अपने स्वप्न की बात बतायी तथा श्रीहरिदास ठाकुर एवं श्रीवास पण्डित को नित्यानन्द की खोज के लिये भेजा गया। सारे नवद्वीप में अन्वेषण करने पर भी उन्हें नित्यानन्द प्रभु जी की कोई खबर न मिली।

हरिदास ठाकुर और श्रीवास पण्डित से यह सुनकर कि नवद्वीप में नित्यानन्द प्रभु नहीं हैं, महाप्रभु जी हल्का सा मुस्कराये और थोड़ी देर के पश्चात् भक्तों को साथ लेकर स्वयं नन्दनाचार्य के घर में उपस्थित हुये। करोड़ सूर्यों के समान कान्ति वाले एक अपूर्व पुरुष को देखकर भक्त अत्यन्त विस्मित हुये। श्रीनित्यानन्द प्रभु के स्वरूप को प्रकाश करने के लिये श्रीमन्महाप्रभु जी ने श्रीवास पण्डित को कृष्ण लीला की उद्दीपना करवाने वाला श्लोक बोलने के लिये इशारा किया। महाप्रभु जी का इशारा पाकर श्रीवास पण्डित ने भागवत का बर्हापीड़ं नटवर वपुः… ..प्रविशदगीतकीर्त्तिः(भा 10/21/5) श्लोक का उच्चारण किया। श्लोक सुनने मात्र से श्रीनित्यानन्द प्रभु ‘हा कृष्ण’ पुकार कर मूर्छित होकर गिर पड़े व उनके अंगों में अष्टसात्विक विकार प्रकटित होने लगे। श्रीमहाप्रभुजी भी अनेक दिनों से श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु जी को मिलने के लिये व्याकुल थे, सो आज सब के सामने नित्यानन्द तत्त्व को प्रकाशित कर महाप्रभु जी ने उनको गोद में ले लिया—

श्रीनन्दन आचार्य परम भाग्यवान।
देख श्रीनिवास एइ भवन ताहान।
भक्त गोष्ठी सह प्रभु लिया, ए भवने।
देखे नित्यानन्द बसि आछये धेयाने॥
निरूपम नित्यानन्द अंगेर माधुरी।
दाँड़ाइया भक्त गण देखे नेत्र भरी॥
(भक्ति रत्नाकर 12/2422-4)

[श्रीनन्दन आचार्य परम भाग्यवान हैं। श्रीनिवास! देखो, यह उसका घर है। भक्तों के साथ मिल कर श्रीमन्महाप्रभु उस भवन में गये। वहाँ जाकर देखा कि नित्यानन्द जी ध्यान में बैठे हैं। श्रीनित्यानन्द के अंगों की मधुरता कही नहीं जा सकती। सब भक्त खड़े होकर रुदन करते हुए नेत्र भर कर उनकी माधुरी के दर्शन करते हैं।]

श्रीनन्दन आचार्य के भवन में श्रीअद्वैताचार्य प्रभु का गुप्त अवस्थान।
श्रीवासांगन में श्रीव्यास पूजा की समाप्ति के पश्चात् श्रीमन्महाप्रभु जी श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु और अन्यान्य भक्तों के साथ संकीर्त्तनानन्द में मग्न हो गये। एक दिन महाप्रभु जी ने ईश्वरावेश में श्रीवास पण्डित के छोटे भाई श्रीरामाई पण्डित (श्रीराम पण्डित) को श्रीअद्वैताचार्य जी से अपने प्रकटित होने की बात बताने के लिये भेजा। श्रीरामाई पण्डित को साथ यह भी कह दिया कि अद्वैताचार्य जी ने जिन गोलोकपति श्रीहरि को धराधाम में अवतीर्ण करवाने के लिये गंगाजल और तुलसी से पूजा करते हुये आवाहन किया था वे स्वयं ही प्रकटित हो चुके हैं। अतः अद्वैताचार्य अपनी स्री, पुत्रादि परिवार तथा समस्त पूजा की सामग्री के साथ श्रीवासांगन में जल्दी ही महाप्रभु के पास पहुँचें। महाप्रभु जी के निर्देशानुसार रामाई पण्डित अद्वैताचार्य के पास पहुँचे।

सब कुछ जानते हुए भी अद्वैताचार्य ने उनके आने का कारण पूछा तो उत्तर में रामाई पण्डित ने महाप्रभु जी के प्रकट होने की बात बतायी। रामाई से श्रीमन्महाप्रभु जी के प्रकाश की बात सुनकर श्रीअद्वैताचार्य, उनकी पत्नी श्रीसीता देवी और पुत्र श्रीअच्युतानन्द एवं अन्य-अन्य अनुचर सभी प्रेम में विह्वल हो उठे तथा उनके नेत्रों से अश्रुवर्षा होने लगी। महाप्रभु जी के चरणों में उपस्थित होने के लिये वे घर से ही समस्त पूजा उपकरणों को लेकर चल दिये परन्तु महाप्रभु जी की परीक्षा लेने के लिये वे रास्ते में ही श्रीनन्दनाचार्य के घर पर ठहर गये और रामाई को उनके (अद्वैताचार्य के) नन्दनाचार्य के घर पर रुके रहने की बात न बताने को कहा और बोला कि आप महाप्रभु जी से कहना अद्वैताचार्य ने कहा है कि वे नहीं आयेंगे। सर्वान्तर्यामी विश्वम्भर महाप्रभु जी ने रामाई से अद्वैताचार्य के न आने की बात सुनी तथा सर्वज्ञ होने के कारण अद्वैताचार्य के संकल्प को समझ लिया और विष्णु सिंहासन पर सबके सामने अपना ऐश्वर्य रूप प्रकट करने लगे। श्रीमन्महाप्रभु के इशारे से श्रीमन्नित्यानन्द प्रभु ने महाप्रभु जी के मस्तक पर छत्र फैला दिया साथ ही गदाधरादि भक्त नानाविध सेवाओं में नियोजित हो गये। महाप्रभु जी ने सब के सामने अद्वैताचार्य जी के मनोभावों को व्यक्त करते हुये कहा कि अद्वैताचार्य मेरी परीक्षा लेने के लिये पूजा सामग्री सहित नन्दनाचार्य के भवन में छिप कर बैठा है। महाप्रभु जी ने अद्वैताचार्य को यह बताने के लिये कि महाप्रभु जान गये हैं कि तुम वहां छिपे हो तथा उन्हें वहाँ से लिवा लाने के लिए रामाई को पुनः वहाँ भेजा।

महाप्रभुजी का पुनः साक्षात् आदेश प्राप्त कर अद्वैताचार्य प्रभु आनन्द में विभोर होकर अपनी स्री के साथ महाप्रभु जी के पास उपस्थित हुये तथा दूर से ही महाप्रभु जी के पादपद्मों में दण्डवत् प्रणति ज्ञापन करते हुये स्तव करने लगे। महाप्रभु जी का अपूर्व महैश्वर्य स्वरूप दर्शनकर अद्वैताचार्य जी स्तम्भित हो गये तथा सभी के सामने श्रीगौरहरि की असमोर्ध्व दया की महिमा का गान करने लगे। बाद में श्रीमन्महाप्रभु जी के पादप्रक्षालन कर पन्चोपचार से पूजा कर के अद्वैताचार्य जी ने:–

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मण हिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥
(चै.च.म. 13/77)

इत्यादि श्लोकों का उच्चारण करते हुये श्रीगौरसुन्दर को प्रणाम किया। महाप्रभु जी द्वारा अद्वैताचार्य जी को नृत्य के लिये आदेश करने पर उन्होंने अपूर्व नृत्य आरम्भ कर दिया। संकीर्त्तनानन्द में अद्वैताचार्य प्रभु के भावविह्वल नृत्य को देख भक्तगण प्रेमानन्द में निमज्जित हो गये।

श्रीनन्दनाचार्य भवन में महाप्रभु जी की गुप्त रूप में स्थिति:–
पाखण्डी लोग महाप्रभु जी की विद्या प्रतिभा से परास्त होकर षड़यन्त्र रचने लगे। उन्होंने वहाँ के शासक के पास महाप्रभु जी के विरोध में शिकायत की। महाप्रभु जी ने अपने घर वापस लौटकर पाखण्डियों के पाखण्डी विचारों का विनाश करने के लिये भक्तों के साथ मिलकर संकीर्त्तन आरम्भ किया, किन्तु संकीर्त्तन में पहले के समान भाव प्रकटित न होते देखकर महाप्रभु जी दुःख प्रकाश करने लगे। प्रेमोन्मत्त अद्वैताचार्य प्रभु जी ने इसके कारण की ओर निर्देश करते हुये कहा कि महाप्रभु जी ने नित्यानन्द प्रभु को प्रेम का भण्डारी बनाया है जबकि मुझे और श्रीवास को प्रेम से वन्चित किया हुआ है और दूसरी तरफ तिली, माली-यहां तक कि तेली को भी प्रेम दान दिया है। इसलिये महाप्रभु जी के प्रेम को मैंने शोषण कर लिया है, संकीर्त्तन में भाव न होने का यही कारण है। यह सुनकर, महाप्रभु जी ने प्रेमशून्य निष्फल शरीर को त्याग करना ही अच्छा समझा और ऐसा समझ कर वे गंगा जी में कूद पड़े। नित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर जी ने महाप्रभु जी को गंगा जी से उठाया। श्रीमन् महाप्रभु जी नन्दनाचार्य जी के घर में गुप्त रूप से रहेंगे, इस संकल्प के बारे में उन्होंने सिर्फ नित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर जी को बताया था उहोंने यह बात बाकी भक्तों से गुप्त रखने के लिए कहा।

महाप्रभु जी से न मिल पाने के कारण सभी भक्त तीव्र विरह से क्रन्दन करने लगे। अद्वैताचार्य प्रभु तो उपवासी रहे। परन्तु इधर नन्दनाचार्य भवन में महाप्रभु जी के विष्णु आसन पर आसीन होने से नन्दनाचार्य परमोल्लास से विविध सेवा कार्यों में व्यस्त हो गये। महाप्रभु जी द्वारा नन्दन आचार्य को अपने गुप्त रहने के विषय में आदेश देने पर नन्दनाचार्य बोले आप भक्तों के हृदय के धन हैं, भक्त ही आपको प्रकाशित करते हैं इसलिये आप भला भक्तों से छिप कर कैसे रह सकेंगे? और हुआ भी ऐसा ही अर्थात भक्तों के विरह में स्थिर न रह सकने के कारण महाप्रभु जी ने श्रीवास पण्डित को बुलाने के लिए नन्दनाचार्य को भेजा। श्रीवास पण्डित जी ने आकर जब अद्वैताचार्य जी की विरह कातरता और उपवास के बारे में बताया तो तुरन्त महाप्रभु जी अद्वैताचार्य जी के पास पहुँचे एवं उन्हें मूर्च्छित देखकर अपने आप को अत्यन्त अपराधी समझने लगे। प्रेम मूर्च्छा से उठकर अद्वैताचार्य जी महाप्रभु जी से अपनी कुमति के लिये पुनः-2 क्षमा प्रार्थना करने लगे और नित्य दास्यभाव से उनके श्रीचरणों में रहने के लिये आर्ति ज्ञापन करने लगे।

महाप्रभु जी की विभिन्न लीलाओं के संगी:–
काटोया में संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् नित्यानन्द प्रभु की चातुरी के कारण महाप्रभु जी ने जब शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के गृह पर शुभागमन किया था तो उस समय शचीमाता और नवद्वीपवासी भक्त जो महाप्रभु जी से मिलने आये थे, उनमें नन्दनाचार्य भी एक थे। चातुर्मास्य में महाप्रभु जी की सेवा के लिये जिस समय राघव पण्डित झाली (झोली) लेकर एवं महाप्रभु जी के अन्यान्य भक्त अनेक प्रकार के खाद्य द्रव्य लेकर पुरुषोत्तम धाम गये तो महाप्रभु जी ने अत्यन्त प्रीति के साथ उन्हें ग्रहण किया था, उस समय नन्दन आचार्य जी ने भी अपने लाये हुये द्रव्यों से महाप्रभु जी की सेवा की थी। श्रीअद्वैताचार्यादि जिन सब भक्तों के घर में महाप्रभु जी ने भोजन का निमन्त्रण स्वीकार किया था उनमें नन्दनाचार्य भी थे। सार्वभौम भट्टाचार्य ने राजा प्रताप रुद्र को गौड़ीय वैष्णवों का परिचय देते समय भी नन्दनाचार्य जी का नाम उल्लेख किया था।

राघव पण्डित, इँह आचार्य नन्दन।
श्रीमान् पण्डित एइ, श्रीकान्त, नारायण॥
(चै. च.म.11/89)

श्रीनन्दनाचार्य श्रीवास आंगन में और काज़ी दमन के समय महाप्रभु जी के कीर्त्तन में एवं श्रीधर-आंगन में, श्रीपुरुषोत्तम धाम में, श्रीगुण्डिचा मन्दिर मार्जन लीला में तथा इन्द्रद्युम्न सरोवर में स्नान लीला के समय, आइ टोटा उपवन में, महाप्रसाद भोजन लीला में एवं श्रीरथयात्रा आदि के समय श्रीमन् महाप्रभु जी के साथी थे। श्रीश्रीनन्दनाचार्य की आविर्भाव और तिरोभाव तिथि अज्ञात है।

श्रीनन्दन आचार्य भवन:–
उक्त स्थान की स्मृति में श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ प्रतिष्ठान के प्रतिष्ठाता परमाराध्य श्रीगुरुपादपद्म नित्यलीला प्रविष्ट ऊँ 108 श्रीश्रीमद् भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज विष्णुपाद जी के ज्येष्ठ सतीर्थ श्रीगौड़ीय संघपति नित्य लीला प्रविष्ट ऊँ 108श्रीश्रीमद् भक्ति सारंग गोस्वामी महाराज जी ने श्रीमायापुर ईशोद्यान में श्रीनन्दनाचार्य भवन और श्रीगौर नित्यानन्द जी के विग्रहों की प्रतिष्ठा की है।


1 श्रीचतुर्भुज पण्डित, श्रीनन्दन, श्रीगंगादास तीन भाई हैं, जिन के घर पहले श्रीनित्यानन्द जी की लीला हुई है।
2 श्रीविष्णुदास, श्रीनन्दन, श्रीगंगादास पहले जिनके घर में निताई ठाकुर रहते थे।

3 श्रीनन्दन आचार्य जी की शाखा जगत में प्रसिद्ध है, जिन के घर में दोनों प्रभु छिप कर लीला किया करते थे।