गौराविर्भावभूमेस्त्वं निर्देष्टासज्जन प्रियः
वैष्णव सार्वभौम श्रीजगन्नाथाय ते नमः ।।

वैष्णव समाज में सिद्ध महाजन के रूप में पूजे जाने वाले वैष्णव प्रिय, वैष्णव सार्वभौम श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी को मैं प्रणाम करता हूं जिन्होंने अपने दिव्य दर्शनों से श्रीगौरांग जी की आविर्भाव स्थली का निर्देश किया है।

सारी पृथ्वी में ही सारस्वत प्रत्येक वैष्णव प्रतिदिन गुरु परम्परा में (भागवत – परम्परा) में श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जी को स्मरण करता है तथा उनकी कृपा प्रार्थना करता है।

“विश्वनाथ भक्तसाथ बलदेव जगन्नाथ,
ताँर प्रिय श्रीभक्ति विनोद।

महाभागवत वर, श्रीगौर किशोरवर,
हरि भजनेते याँर मोद।।।

श्रीवार्षभानवी वरा सदा – सेव्यसेवापरा
ताँहार दयित दास नाम।”

संस्कृत भाषा में जो गुरु परम्परा का कीर्तन किया जाता है उसमें इस प्रकार लिखा है :-

वैष्णव सार्वभौमः श्रीजगन्नाथ प्रभुस्तथा।
श्रीमायापुर धाम्नस्तु निर्देष्टा सज्जन प्रियः ।।

श्रीगौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय में चार बार अन्धकारयुग आने की बात सुनी जाती है। 1) श्रीमन्महाप्रभु जी के आविर्भाव से पहले 2) श्रीषड़गोस्वामियों के अप्रकट होने के बाद 3) श्री श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर, श्रीश्यामानन्द प्रभु और श्रीरसिकानन्द मुरारी प्रभु जी के अप्रकट के पश्चात 4) श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर और श्रील बलदेव विद्याभूषण प्रभु जी के अप्रकट होने के पश्चात । अन्धकार युग की बात से ऐसा नहीं समझना चाहिये कि श्रीब्रह्म माध्व गौड़ीय धारा या श्रीरुपानुग धारा बीच में रुक गयी थी। आचार्य परम्परा में कभी विविक्तानन्दी तो कभी गोष्ठानन्दी आचार्यो के आविर्भाव के कारण केवल प्रचार में अप्रबलता और प्रबलता देखी जाती है। श्रीगुरुपरम्परा या भागवत परम्बरा में श्रीबलदेव विद्याभूषण (जिनका दूसरा नाम ‘गोविन्ददास’ था) जी के बाद उद्धरदास या उद्धव दास, उनसे आगे फिर उद्धव दास तथा उनसे आगे उनके अनुगत श्रीमधुसूदन बाबा जी (जो सूर्यकुण्ड में सिद्ध बाबाजी’ के नाम से प्रसिद्ध थे)। श्री मधुसूदन दास बाबा जी महाराज जी से परमहंसवेश लेने वाले शिष्य हैं श्रील जगन्नाथदास बाबा जी महाराज । श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद जी ने इस प्रकार लिखा है कि “भाष्यकार (श्रील बदलेव विद्याभूषण जी) के अनुगत श्रीउद्धर दास या श्रीउद्धव दास जी, उनके शिष्य श्री उद्धव दास तथा उनसे आगे उनके शिष्य श्रीमधुसूदन और श्रीजगन्नाथ दास बाबाजी महाराज जी ने परमहंस पथ के पथिक रूप से शुद्ध भक्ति धर्म का प्रचार किया था। यही गौड़ीय वैष्णवों के लिए परम श्रद्धा का विषय है। श्रील प्रभुपाद जी के इन वाक्यों के द्वारा इस प्रकार ज्ञात होता है कि श्रीउद्धर दास, श्रीउद्धव दास, श्रीमधुसूदन दास व श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जी ने केवल विविक्तानन्दी परमहंस का आदर्श नहीं दिखाया बल्कि उन्होंने आचार्य की लीला भी प्रकाशित की थी।

वर्द्धमान ज़िले के प्रान्तवर्ती पुरुणियावासी श्रील रास बिहारी गोस्वामी जी श्रील जगन्नाथ दास बावा जी के दीक्षित शिष्य थे और स्वाधीन त्रुिपरा के अधिपति स्वधाम गत ईशानचन्द्र माणिक्यबहादुर जी श्रीरासबिहारी गोस्वामी जी के शिष्य थे। त्रिपुरा महाराज जी के राजमहल में श्रीरासबिहारी गोस्वामी जी के उपास्य श्रीरासबिहाजी जी आज भी सेवित हो रहे हैं।

बाबा जी महाराज आज से 214 साल पहले बंगलादेश के मैमनसिंह ज़िले के टांगाइल महकुमार (वर्तमान में टांगाइल ज़िले) के किसी ग्राम में किसी उच्च वंश में आविर्भूत हुये थे। किसी-किसी के मतानुसार वे पावना जिले के अन्तर्गत तड़ास ग्राम में वारेन्द्र कायस्थ कुल को पावन करते हुए आविर्भूत हुये थे। उनके माता-पिता का परिचय अपरिज्ञात है। जिस समय श्रील बाबा जी महाराज परमहंस का वेश धारण कर तीव्र भजन का आदर्श दिखा रहे थे, उस समय वे तत्कालीन वैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ वैष्णव के रूप में पूजे जाते थे। काफी लम्बे समय (लगभग 150 वर्ष) तक उन्होंने प्रकट लीला की। उन्होंने श्रीराधाकुण्ड में श्रीरूपानुग भजन पद्धति का अनुसरण कर श्रीश्रीराधागोविन्द जी की अष्टकालीय प्रेम सेवा की थी। इस प्रकार की एक घटना सुनी जाती है कि वे जब वृन्दावन में भजनानन्दी महात्माओं के साथ भजन कर रहे थे उसी समय काटोया से एक प्रसिद्ध पैसे लेकर पाठ करने वाला भागवत – पाठक वृन्दावन में जाकर श्रीमद्भागवत की व्याख्या करके अपनी जीविका निर्वाह करने के लिये पैसे और प्रतिष्ठा अर्जन करने के लिये चेष्टा कर रहा था। उसके द्वारा उत्तम रूप से भागवत पाठ करने पर भी जब उसने भजनानन्दी वैष्णवों को अपना पाठ सुनने को उत्सुक न देखा तो उसने इसका कारण पूछा। तब श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज जी और अन्यान्य वैष्णवों ने उसे समझाया कि (भगवान की प्रसन्नता के लिये न करके) किसी और उद्देश्य से किये गये पाठ को भागवत पाठ नहीं कहते। उससे न तो अपना और न ही दूसरे किसी का कल्याण होता है। महाभागवत बाबा जी महाराज जी की कृपा से उस पैसे लेकर भागवत पाठ करने वाले वैष्णव का सारा जीवन ही बदल गया था। जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज और वैष्णवों की कृपा से उसका जाति-वर्ण व पाण्डित्य का जो अभिमान था वह सारा दूर हो गया। वह गाय, कुत्ते, गधे व चाण्डाल तक को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करता व उनकी कृपा प्रार्थना करता और इस तरह वह परम वैष्णव बन गया।

यद्यपि बाबाजी महाराज तीव्र भजनानन्दी वैष्णव थे तब भी उन्होंने अनाधिकारी अनर्थयुक्त शिष्यों, जो विष्णु व वैष्णवों की सेवा से बचने के लिए हरिनाम भजने में लगे थे, की इस कपट भावना को आश्रय नहीं दिया। उन्होंने उन अनाधिकारी वेशधारियों के प्रति कृपा परवश होकर उनको अपनी कुटिया के पास ही श्री विष्णु-वैष्णव सेवा के लिये लगायी गयी शाक-सब्जी के बगीचे की सेवा में लगा दिया था। जब तक इन्द्रियां और इन्द्रियार्थ, देह सम्बन्धी व्यक्तियों में लगे रहते हैं तब तक उन्हीं में आसक्ति होना मजबूरी है। मैं भगवान का हूँ इस भाव में प्रतिष्ठित होकर इन्द्रियां व उनके विषय – भक्त और भगवान की सेवा में नियोजित रहने से उनके प्रति ही प्रीति और ममता बढ़ेगी।

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी का श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी के साथ प्रथम साक्षात्कार वृन्दावन में सन् 1880 में हुआ था। सन् 1891 में वर्द्धमान जिले के आमलाजोड़ा नामक स्थान पर बाबा जी महाराज जी के साथ भक्ति विनोद ठाकुर जी का दूसरी बार मिलन हुआ था। आमलाजोड़ा में भक्ति विनोद ठाकुर जी ने हरिवासर तिथि (एकादशी) का दिन व रात बाबाजी के साथ गौर कृष्ण कथा में बितायी थी। यहां पर श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी ने भक्ति विनोद ठाकुर जी को श्रीगौरांग महाप्रभु जी के नाम और उनके धाम का प्रचार करने के लिये उत्साह दिया था। आमलाजोड़ा में श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज के साथ सारी रात जागरण करके हरिसंकीर्तन करते हुये एकादशी व्रत के पालन के प्रसंग के सन्बन्ध में ठाकुर भक्ति विनोद जी ने सज्जनतोषणी पत्रिका में इस प्रकार लिखा है कि एकादशी की सारी रात जागरण के साथ बिताने के बाद अगले दिन लगभग 8 बजे गांव के सभी भक्त महासमारोह के साथ कीर्तन करते हुये बाहर निकले। परमपूज्यपाद सिद्ध श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाशय को आगे करके सभी संकीर्तन करते हुए प्रपन्नाश्रम में पहुंचे। वहां पर कीर्तन के समय बाबाजी महाराज जी के जो भाव उदित हुये उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। 100 साल से ज्यादा उम्र में प्रेमानन्द के साथ सिंह की तरह नृत्य करना और बीच-2 में ‘निलाई कि नाम एनेछे रे। नाम एनेछे नामेर हाटे श्रद्धामुल्ये नाम दितेछे रे।। इत्यादि… बोलते हुए उनके द्वारा निरन्तर क्रन्दन एवं भूमि पर लोटपोट होते समय जो अद्भुत दृश्य देखने को मिला था वह और कहीं देखने को नहीं मिलता। बाबाजी महाशय के भावों को देखकर सभी ने अश्रुपुलक से परिपूर्ण और भाव से गद्गद् होकर नृत्य किया था। श्रीलभक्ति विनोद जी के ‘आत्मचरित’ को पढ़ने से मालूम होता है कि सन् 1893 में श्रीगोदुम के संकीर्त्तन उत्सव में एवं श्रीमायापुर दर्शन उत्सव में श्रीलजगन्नाथ दास बाबा जी ने बहुत से वैष्णवों के साथ योगदान दिया था। सन् 1892 के माघमास में बाबा जी महाराज ने कुलिया नवद्वीप से अपने पार्षदों के साथ भक्ति विनोद ठाकुर जी की भजनस्थली गोदुम में स्थित सुरभि कुन्ज में शुभागमन किया था। 27 माघ बुधवार को वहां पर अपूर्व हरिसंकीर्तन महोत्सव हुआ था। श्री बिहारी दास बाबा जी नामक एक बलवान व्रजवासी श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी के सेवक थे। वे जगन्नाथ दास बाबा जी को टोकरी में उठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। अतिवृद्ध होने पर भी उनकी दृष्टि शक्ति बड़ी तेज थी। केवल नीचे लटकती हुयी भौहें उनकी आंखों को ढक लेती थीं, भौहें ऊपर उठाने पर ही वे देख पाते थे। ऐसा सुना जाता है कि बिहारीदास बाबा जी जब बाबा जी महाराज को टोकरी में बिठाकर महाप्रभु जी की आविर्भाव स्थली में लाये थे तब महाराज जी ने ‘जय शचीनन्दन गौरहरि’ बोलते हुये उदण्ड नृत्यकीर्तन किया था। वृद्ध बाबा जी को इस प्रकार उद्दण्ड नृत्यकीर्तन करते हुये देख कर सभी विस्मित हो गये थे। बाबा जी महाराज ने अपने दिव्य दर्शन से पहले श्रीमन्महाप्रभु जी के जन्मस्थान तथा बाद में खोल – भांगा- डांगा में श्रीवास – अंगन का स्थान निर्देशित किया था। सन् 1892 में श्रीमन्महाप्रभु जी के आविर्भाव के दिन 20 फाल्गुण वृहस्पतिवार को बाबा जी महाराज कुलिया नवद्वीप से संकीर्तन शोभायात्रा के साथ श्रीमायापुर योगपीठ में आये थे और इस समय ही उन्होंने महाप्रभु जी के आविर्भावस्थान अर्थात श्रीजगन्नाथ मिश्र के घर के निश्चित स्थान के बारे में बताया था।

श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जी ने अपनी सज्जनतोषणी पत्रिका में इस प्रकार लिखा है कि 20 फाल्गुण, वृहस्पतिवार को 11 बजे पश्चिम पार नवद्वीप के भक्त तीन नावों में भर कर गंगा पार हुये। भक्तश्रेष्ठ महेन्द्र बाबू उन्हें पार करवाकर लाये थे। परम भागवत जगन्नाथ दास बाबा जी को पालकी में बिठा कर लाया गया। तब मायापुर में इतने यात्री थे कि गणना नहीं की जा सकती थी। मायापुर के पास पहुँच कर सबने देखा कि भक्त प्रवर श्रीद्वारिका बाबा, श्री मन्महाप्रभु जी के जन्म स्थान पर एक संकीर्तन मंडली के साथ बहुत सी पताकाओं को लहराते हुये महानन्द के साथ बाबा जी महाशय आदि की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सारे भक्त जन्म स्थान टीले पर चढ़कर नृत्य कीर्तन करने लगे। उस संकीर्तन के द्वारा सारे नवद्वीप की जो अद्भुत शोभा हुयी थी, ऐसा लगता है कि ऐसी शोभा आने वाले चार सौ वर्षों में भी नहीं होगी। सब वैष्णवों ने बैठ कर ये निश्चय किया कि महाप्रभु के जन्म स्थान और श्री वासांगन की भूमि पर सेवा की जाए। श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाश्य ने ये अभिप्राय प्रकट किया कि जन्म स्थान पर श्रीजगन्नाथ मिश्र और शचीदेवी – दोनों एक घर में स्थापित हों एवं दूसरे घर में श्रीविष्णुप्रिया और लक्ष्मी देवी और बीच में महाप्रभु जी की किशोर अवस्था की मूर्ति स्थापित हो तथा श्रीवास – आंगन में पंचतत्त्व की स्थापना हो। (सज्जनतोषणी नामक पत्रिका के खंड 4 के 235 पृष्ठ पर वर्णित आविर्भावोत्सव नामक लेख से उद्धृत)।

श्रीमन्महाप्रभु जी की आविर्भाव स्थली पर एक कदम्ब का वृक्ष विराजित था। कभी कभी श्रीबाबा जी महाराज वहाँ आकर नृत्य करते थे। श्रीगौर किशोर दास बाबा जी महाराज इस कदम्ब के वृक्ष के नीचे भजनानन्द में एवं हरिकीर्तनानन्द में निमग्न रहते थे। श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज कई बार कुलिया नवद्वीप में भजन कुटीर नामक स्थान पर रहते थे। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने इस भजन कुटीर का प्रांगण निर्माण करवाया था। उस भजन कुटीर के प्रागंण में अभी बाबा जी महाराज जी की समाधि है। बाबा जी महाराज श्रीभक्तिविनोद ठाकुर जी से मिलने कलकत्ता के रामबाग में स्थित भक्ति भवन में जाते थे तथा श्रील सरस्वती ठाकुर जी के प्रति प्रचुर स्नेह का प्रदर्शन करते थे। जब बाबा जी महाराज जी ने श्रील सरस्वती ठाकुर जी की ज्योतिष शास्त्र में पारंगत होने की बात सुनी तो उन्होंने इन्हें वैष्णव सिद्धांत के अनुसार पंचांग प्रकाशित करने का निर्देश किया। इसलिए श्रीचैतन्य मठ से श्रील प्रभुपाद जी के द्वारा नवद्वीप पत्रिका प्रकाशित हुयी। अपने जीवन काल की अन्तिम अवस्था में श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज पीठ में आयी कुब के कारण बड़े झुक से गये थे परन्तु जब वे संकीर्तन में उन्मत्त होकर नृत्य करते थे तब वे महाप्रभु जी जैसे आजानुलम्बित भुजा, वट वृक्ष की भांति भरा भरा शरीर तथा चार हाथ लम्बे पुरुष दिखायी देते थे। वे एक छलांग में पांच छः हाथ ऊँचे उठ जाते थे। कीर्तन आनन्द में उनके अद्भुत भाव प्रकट होते थे।

श्रीजगन्नाथ दास जी 25 फरवरी सोमवार 1895 ई0 में शुक्ला प्रतिपदा तिथि को दिन में 10 बजे अप्रकट हुये। इस विषय में ठाकुर भक्ति विनोद जी ने सज्जनतोषणी में लिखा है कि भक्तों के वृद्ध सेनापति, श्रीजगन्नाथ महाशय श्रीनवद्वीप मंडल के अन्तर्गत कोलद्वीप में स्थित भजन कुटीर में श्रीधाम को प्राप्त हो गये। सिद्ध बाबा जी गौर भूमि में अन्धकार कर चिज्जगत में प्रवेश कर गये। अब हम अपने जड़ नयनों से उनके आनन्द जनक नृत्य और नहीं देख पायेंगे। वे चिज्जगत में रहते हुये हम पर कृपा करें। (सज्जनतोषणी पत्रिका वर्ष 2, पृष्ठ 2)

श्री श्रील जगन्नाथष्टकम्

रूपानुगानां प्रवरं सुदान्तं श्रीगौर चन्द्रप्रिय भक्तराजम्।
श्रीराधिका माधवचित्तरामं वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।।1

श्री सूर्यकुण्डाश्रयिनः कृपालोर्विद्वद्वर श्रीमधुसूदनस्य।
प्रेष्ठस्वरूपेण विराजमानं वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।। 2

श्रीधामवृन्दावनवासिभक्त नक्षत्रराजिस्थित सोमतुल्यम्।
एकान्त नामाश्रित संघपाल वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।।3

वैराग्यविद्या हरिभक्तिदीप्तं दौर्जन्य कापट्यवि भेदव्रजम्
श्रद्धायुतेष्वादरवृत्तिमन्त वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यं ।। 4

सं प्रेरिता गौरसुधांशुना यश्चक्रे हि तज्जन्मगृहप्रकाशम्।
देवैर्नुतं वैष्णव सार्वभौमं वन्दे जग नाथ विभुं वरेण्यम् ।। 5

सन्चार्य सर्व निजशक्तिराशिं यो भक्तिपूर्ण च विनोददेवे
तेने जगत्यां हरिनामवन्यां वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।।6

श्रीनाम धाम्नोः प्रबल प्रचारे ईहापरं प्रेमरसाब्धिमग्नम्।
श्रीयोग पीठे कृतनृत्यभंग वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।।7

मायापुरे धामनि सक्त चित्तं गौरप्रकाशेन च मोदयुक्तम्।
श्रीनामगानैर्गलदश्रुनेत्र वन्दे जगन्नाथ विभुं वरेण्यम् ।।8

हे देव। हे वैष्णव सार्वभौम ! भक्त्या पराभूत महेन्द्रधिषण्य।
त्वदेगात्र विस्तारकृतिं सुपुण्यां वन्दे मुहर्भक्ति विनोद धाराम् ।।

वैष्णव सार्वभौम श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज के अलौकिक चरित्र के जितने भी जानने योग्य और शिक्षणीय विषय जो ‘श्रीसरस्वती जयश्री’ ग्रन्थ में प्रकाशित हुये हैं एवं श्रील सरस्वती गोस्वामी ठाकुर जी की स्वप्न समाधि में जो

अनुभव हुये हैं, उनके सम्बन्ध में श्रीचैतन्य वाणी के सम्पादक संघपति श्रीभक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी द्वारा लिखित विवृत्ति, जिज्ञासु पाठकों के उत्साह के लिये नीचे दी गयी है।

वैष्णव सार्वभौम सिद्ध बाबा जी महाराज जी ने श्रीमन्महाप्रभु जी के मुःख से निकले सोलह नाम बत्तीस अक्षर के महामंत्र नाम को छोड़कर और किसी आधुनिक स्वकपोलकल्पित सिद्धान्त विरुद्ध रसाभास दोष से युक्त दुष्ट नामापराध को ग्रहण करने के लिए प्रश्रय नहीं दिया।

परम पूज्य पाद श्री श्रील बाबा जी महाराज किसी को भी अपनी फोटो खींचने नहीं देते थे। हमने सुना है कि एक समय श्री श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी ने माणिकतला भक्ति भवन में उनकी फोटो खींचने की व्यवस्था की थी तो बाबा जी महाराज लकड़ी के एक ऊँचे आसन पर अपने नित्य सेव्य श्री श्री गिरिधारी जी को गोद में लेकर बैठे हुये हैं, इसी अवस्था में उनकी फोटो खींची गयी थी। बाबा जी महाराज श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी को बहुत ही प्रेम करते थे। हमने सुना है कि बाबा जी महाराज ठाकुर भक्ति विनोद जी को अपने नित्य सेव्य गिरिधारी जी को समर्पण कर गये थे। अभी भी भक्ति भवन में गिरिधारी जी की सेवा हो रही है।

श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी यदि बाबा जी महाराज की फोटो खींच कर नहीं रखते तो हम लोग उनकी श्रीमूर्ति के दर्शन से हमेशा के लिए वंचित हो जाते।

कलकत्ता, बागबाज़ार में स्थित श्रीगौड़ीय मठ से सन् 1314 बंगाब्द (लगभग सन् 1934) में प्रकाशित ‘सरस्वती जयश्री’ ग्रन्थ के वैभवपर्व प्रथम खंड के 27वें वैभव के प्रारम्भ में ही मिलता है कि परमाराध्यतम श्रील प्रभुपाद जी कलकत्ता श्रीगौड़ीय मठ के वार्षिक उत्सव के पश्चात शारदीय पूजा के ठीक पहले अर्थात 28 सितम्बर सन् 1922 को रात की ट्रेन से यात्रा करते हुये 30 सितम्बर शनिवार श्री माध्वाविर्भाव तिथि और विजयदशमी के दिन प्रातः काल श्रीवृन्दावन धाम पहुँचे। डा० श्री बलहरि दास महाशय जी की चेष्टा से लाला बाबू जी की ठाकुर बाड़ी के सामने घोष बाबू जी की बाड़ी में प्रभुपाद जी के ठहरने की व्यवस्था हुयी थी। 3 अक्तूबर को श्रीरूपानुग श्रेष्ठ प्रभुपाद जी ने श्रीरूप गोस्वामी जी के प्राणधन श्रीश्रीराधा गोविन्द विग्रह के दर्शन किये। वृन्दावन में श्रीचैतन्य मठ की एक शाखा की प्रतिष्ठा के अभिप्राय से प्रभुपाद जी ने भक्तों के साथ कुछ स्थान भी देखे। प्रभुपाद जी के वृन्दावन आगमन का संवाद मिलने पर उसी दिन शाम को श्रीराधारमण घेरा के श्री गोपाल भट्टगोस्वामी परिवार के पंडित मधुसूदन गोस्वामी सार्वभौम महाशय जी प्रभुपाद जी से मिलने आये। प्रभुपाद जी ने लगभग दो घन्टे तक उनके साथ नानाविध शास्त्रों के विषय में विचार विर्मश किया एवं बाद में गोस्वामी महाशय को नवप्रकाशित ‘गौड़ीय साप्ताहिक’ पत्रिका के पहले वर्ष के कुछ खंड उपहार में दिये। ‘गौड़ीय’ के समान उच्च विचार पूर्ण पारमार्थिक पत्रिका को देखकर गोस्वामी जी ने विशेष आनन्द प्रकाशित करते हुये कहा कि ये ‘गौड़ीय’ (पत्रिका) ही एक दिन समग्र गौड़ीय समाज की नियामक होगी।

4 अक्तूबर को प्रभुपाद जी श्रीसनातन गोस्वामी जी के प्राणधन श्रीश्रीराधामदनमोहन जी के दर्शनों के लिये गये। उसी दिन श्रील प्रभुपाद जी दीवार से घिरे बगीचे में राधावल्लभी सम्प्रदाय के मन्दिर के पास श्रीश्रीमदन मोहन जी के ठोर में पंडित श्रीयुत रामकृष्ण दास बाबा जी से मिले। उनके साथ भी प्रभुपाद जी की अनेक शास्त्रीय विषयों पर चर्चा हुई। पंडित जी ने कहा कि श्रीनाम संकीर्तन अन्य 2 भक्ति अंगों के समान ही है एवं आजकल आधुनिक कल्पित रसाभास से दूषित जो भजन सुनने को मिलता है वह सब भी नाम संकीर्तन के समान ही है। उन्होंने और भी कहा कि न्यायशास्त्र में पारंगत न होने से वेदान्त में अधिकार नहीं होता तथा प्राकृत और अप्राकृत विषयों की आलोचना की विशेष आवश्यकता नहीं है।

इस पर श्रीलप्रभुपाद जी ने श्रीमन्महाप्रभु और श्री रूपसनातन गोस्वामी आदि प्रमुख 2 महाजनों के सिद्धान्तों का उल्लेख करते हुये कहा कि श्रीमन्महाप्रभु जी के उपदेश में नाम संकीर्तन ही मुख्य साधन और साध्य है। कीर्तन करते हुये स्वाभाविक अप्राकृत स्मरण हो आता है। यही गोस्वामियों का सिद्वान्त है।

हर समय अप्राकृत्त विचारों में प्रतिष्ठित नहीं रहने से प्राकृत सहज चित्तवृत्ति हरि भजन का रूप धारण कर के स्वयं को व लोगों को धोखा देती है।

श्री रूपानुग श्रील जगन्नाथ दास बाबा जी महाराज की शिक्षा के अनुसार तो रसाभास युक्त संसार सम्बन्धी गीतों और किसी प्रकार के भी नामापराधों से युक्त नाम को शुद्धनाम या श्रीनाम कीर्तन पद नहीं कहा जा सकता। अवहेलना से और श्रद्धा से नाम लेना एक अलग बात है और नामापराध को न त्यागकर या फिर नामापराध को ही शुद्ध हरिनाम समझने के ज्ञात व अज्ञात विचार को लेकर दस प्रकार के नामापराधाों में से किसी को पाल कर हरिनाम करते हुये ये भावना रखना कि हरिनाम ठीक ही हो रहा है, ये एक प्रकार की आत्मवंचना है जो कि ऊपर कहे गये श्रद्धा या अवहेलना से लिये हरिनाम से बिल्कुल पृथक है।

‘सरस्वतीजयश्री’ ग्रन्थ से

ॐ विष्णु पाद श्रीजगन्नाथ दास बाबा जी महाराज ने श्रीमद् भक्तिविनोद ठाकुर जी को यही बात बतलायी थी कि श्रीपन्चमी या माघी शुक्ला पंचमी ही श्री श्री विष्णुप्रिया देवी जी की आविर्भाव तिथि है। तब से वर्तमान जगत में व वैष्णव समाज में हर जगह इसी तिथि को श्रीविष्णुप्रिया देवी की आविर्भाव तिथि पूजा का प्रचलन हुआ है।

श्रील प्रभुपाद जी ने श्रीविष्णुप्रिया जी के आविर्भाव के दिन श्री श्री विश्व वैष्णवराजसभा की पुनः स्थापना करने की इच्छा की और उसी के अनुसार हरि-संकीर्तन करते हुये वह सभा पुनः 5 फरवरी, 1919 को प्रतिष्ठित हुई।

श्रील प्रभुपाद जी ने विश्ववैष्णव राजसभा का प्राचीन इतिहास सुनाया। श्री भक्ति विनोद आसन में श्रीविष्णु प्रिया – महोत्सव और श्री विश्ववैष्णव राजसभा के पुनः स्थापन के सम्बन्ध में 10 फरवरी, 1919 के दिन दैनिक अमृत बाज़ार पत्रिका में इस प्रकार प्रचारित हुआ था।

“On Wednesday last (5th instant) was celebrated with great eclat the Advent Ceremony of Sree Sree Vishnupriya Devi at the same Asana (1, Ultadanga Junction Road) The occasion was solemnised by the reinstitution of Sree Viswa-vaishnava Raj Sabha as inaugurated by no less a personage than Sree Jeeva Goswami Himself eleven years after the passing of Sree Sree Mahaprabhu and was given a fresh impetus by Sree Bhakti Vinod Thakur, 33 years ago.

श्रीसज्जनतोषणी’ के 21 वें वर्ष की 9वीं संख्या में श्रीविश्ववैष्णव राजसभा के संक्षिप्त इतिहास का एक पुराना लेख ‘श्री विश्ववैष्णव राज सभा’ नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

श्रील प्रभुपाद जी की स्वप्न समाधि

श्री श्रील ठाकुर भक्ति विनोद और श्री श्रील गौर किशोर दास गोस्वामी महाराज की अप्रकट लीला के पश्चात श्री श्रील प्रभुपाद जी श्रीधाम में बड़े व्यथित हृदय से रह रहे थे। मायापुर – व्रजपत्तन में वे सोच रहे थे ‘मैं अपने गुरुवर्ग के मनोऽभीष्ट स्वरूप शुद्ध श्रीचैतन्य वाणी को पुनः प्रचार करने में कैसे समर्थ हो सकूँगा? मेरे पास कोई जन बल नहीं है, उपयुक्त धन बल नहीं है, दुनिया के लोगो को मोहित करने वाली विद्या नहीं है और जागतिक किसी प्रकार की सम्पदा भी नहीं है। मेरे द्वारा क्या ये महान प्रचार रूपी कार्य सम्पन्न होगा? गुरुवर्ग के मनोऽभीष्ट के अनुसार में प्रचार नहीं कर पाया, ये बातें सोचकर श्रील प्रभुपाद अत्यन्त विमर्ष चित्त से रह रहे थे। भक्तिग्रन्थों का प्रचारादि कार्य भी उनसे सम्भव नहीं हो पाया, ऐसा विचार कर वे हताश व्यक्ति की तरह लीला कर रहे थे। श्रील रूप’ गोस्वामी जी के ‘उपदेशामृत’ के ग्यारह श्लोकों में से आठ श्लोकों की अनुवृत्ति रचना का कार्य जो वे कर रहे थे, वह भी उन्होंने रोक दिया। उसी समय एक दिन प्रभुपाद जी ने रात्रि के समय स्वप्न समाधि योग से देखा कि श्रीधाम मायापुर योगपीठ के नाट्य मन्दिर (सत्संग भवन) के पूर्व दिशा की ओर पंचतत्त्वात्मक श्री श्रीगौरसुन्दर संकीर्तन मंडली के साथ अपनी आविर्भाव भूमि पर विचरण कर रहे हैं। साथ में गोस्वामी आचार्यवृन्द एवं वैष्णव सार्वभौम श्रील जगन्नाथ, श्रील भक्ति विनोद ठाकुर, श्रील गौरकिशोर इत्यादि सभी गुरु-वर्ग दिव्य रूप से उदित होकर श्रील प्रभुपाद जी को प्रत्यक्ष रूप से आश्वासन देते हुये कह रहे हैं, “तुम क्या सोच रहे हो ! शुद्ध भक्ति को संस्थापन करने का कार्य शुरु करो, सर्वत्र गौरवाणी का प्रचार करो गौरधाम – गौरनाम और गौरकाम की सेवा का विस्तार करो। हम सभी नित्य पर्तमान रहकर तुम्हारी सहायता करने के लिये तैयार हैं। तुम्हारे इस शुद्ध भक्ति प्रचार कार्य में तुम्हें हमेशा हमारी सहायता मिलेगी। तुम्हारे पीछे असंख्य जनबल, अगणित धन-बल, असामान्य पाण्डित्य इत्यादि अपेक्षा कर रहें हैं, जब जो आवश्यक होगा, तभी वह सब आकर तुम्हारे भक्ति प्रचार कार्य में दास रूप में नियुक्त हो जायेगा। सर्वत्र श्रीमन्महाप्रभु जी द्वारा प्रचारित विमल प्रेम धर्म की बातों का प्रचार हो। जागतिक किसी भी प्रकार की विपत्ति तुम्हारे इस काम में विघ्न नहीं डाल सकेगी। हम हमेशा ही तुम्हारे साथ हैं।”

स्वप्न को देखने के अगले दिन ही श्रील प्रभुपाद जी ने अतीव आनन्द से मुझे (परमानन्द प्रभु कह रहे हैं) एवं और भी कुछ विशिष्ट श्रद्धावान् व्यक्तियों को इस स्वप्न प्रसंग के बारे में बताया। उसी समय से श्रील प्रभुपाद जी करोड़ गुना अधिक उत्साह का प्रदर्शन करते हुए जगत में श्रीमन्महाप्रभु जी की शिक्षाओं का प्रचार कर रहे हैं। इसके पश्चात ही प्रभुपाद जी की अनुवृत्ति का शेष भाग भी सम्पन्न हुआ तथा उन्होंने भक्तिग्रन्थों का प्रकाशन और प्रचार विपुल रूप से आरम्भ कर दिया। आज उसी शुद्ध प्रचार की बाढ़ समग्र भारत के सेवोन्मुख जीवों के हृदय क्षेत्र को तो प्लावित कर ही रही है बल्कि इसकी कुछ धाराएँ पाश्चात्य देशों को भी अपने इस रस में डुबो रही हैं। इसीलिये मैं समझता हूँ कि आज श्रील प्रभुपाद कलियुग पावनादतारी श्रीश्रीगौरसुन्दर जी की यह वाणी हर समय सभी को बता रहे हैं

“यारे देख, तारे कह कृष्ण उपदेश ।
आमार आज्ञाय गुरु हइया तार एइ देश ।।
इहाते न बाधिवे तोमार विषय तरंग ।
पुनरपि एइ ठाञि पावो मोर संग ।।

– चैच. म 7/128-129

अर्थात तुम जिसे देखो, उसे ही श्रीकृष्ण नाम का उपदेश करो, मेरी आज्ञा से गुरु बन कर इस देश का उद्धार करो, इस प्रकार करने से विषय तरंग तुम्हें कभी भी नहीं बांध पायेगी, दुबारा फिर यहीं आने पर तुम मुझे यहीं खड़ा पाओगे।