गोपीनाथ पट्टनायक भवानन्द राय के दूसरे पुत्र थे। श्रीगौरलीला में जो राय भवानन्द हैं, वे कृष्णलीला में पाण्डु तथा उनके पांच -पुत्र पांच पाण्डव थे। श्रीचैतन्यचरितामृत की आदिलीला का जो 10वां परिच्छेद है, उसमें राय भवानन्द के सम्बन्ध में श्रीमन्महाप्रभु ने कहा है ‘तुम पाण्डु और पांच पाण्डव तुम्हारे ही पुत्र है।’ राय भवानन्द के पांचो पुत्र महाप्रभु के प्रिय पात्र थे।
रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ।
कलानिधि, सुधानिधि नायक वाणीनाथ।
एइ पंचपुत्र तोमार – मोर प्रिय पात्र।
रामानन्दसह मोर देह-भेद मात्र ॥
चै.च.आ. 10/133-134
अर्थात् श्रीरामानन्दराय, श्रीगोपीनाथ पट्टनायक, श्रीकलानिधि, श्रीसुधानिधि तथा श्रीवाणीनाथ नायक – ये जो तुम्हारे पांचों पुत्र हैं – ये सब मेरे प्रिय भक्त हैं। इनमें राय रामानन्द तो मेरा ही स्वरूप हैं, केवल देहमात्र का ही भेद है।
उड़ीसा के पुरी शहर के पश्चिम में 6 कोस की दूरी पर पुरी ज़िला में ही ब्रह्मगिरि -अलालनाथ है। ब्रह्मगिरि अलालनायथ से थोड़ी सी दूरी पर ही वेन्टपुर ग्राम है । इस ग्राम में राय भवानन्द ज़िमींदार के रूप में रहते थे। अभी तक भवानन्द राय के वंशधर पट्टनायक पदवी पर विख्यात होकर वेन्टपुर ग्राम में रह रहे हैं। गोपीनाथ पट्टनायक महाराज प्रतापरुद्र के अधीन भालजाठ्या दण्डपाट नामक (वर्तमान मेदिनीपुर) राज्यखण्ड के तहसीलदार थे। वह राजा को 2 लाख काहण कर आदि वसूल कर के देते थे। उस पर राजा को दो लाख काहण देना बाकी बचता था। उड़िया भाषा में महाराज के ज्येष्ठ पुत्र अर्थात युवराज को ‘बड़ – जाना’ कहते हैं। उस समय यदि कोई बहुत बड़े दण्ड का भागी होता तो उस व्यक्ति को मंच पर चढ़ा दिया जाता था और उस मंच के निचले भाग में लगे एक बहुत बड़े खड्ग के ऊपर गिराकर उसके प्राणों का अन्त कर दिया जाता था। कर से प्राप्त धन न देने के कारण ‘बड़ – जाना’ ने महाराज प्रतापरुद्र को गोपीनाथ पट्टनायक को चांग पर उठाकर नीचे खड्ग के ऊपर फेंककर उसकी हत्या करने का परार्मश दिया था। गोपीनाथ पट्टनायक के प्राणों को ऐसे संकट में देखकर राय भवानन्द के सम्बन्ध से जो उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले व्यक्ति थे, उन्होंने उसके प्राणों की रक्षा के लिये महाप्रभु से निवेदन किया। महाप्रभु ने जब दण्ड के आदेश का कारण जानना चाहा तो महाप्रभु के पास आये व्यक्तियों ने कहा – ‘गोपीनाथ पट्टनायक का राजा के पास दो लाख काहण कर देना बाकी पड़ा है, वे कौड़ी नहीं दे पायेंगे, अपनी वस्तुओं को बेचकर धीरे – धीरे ही उतार सकेंगे, इसलिए वे राजा के पास 10-12 घोड़े लेकर आये थे। महाराज ने अपने योग्य राजपुत्र को घोड़ों की कीमत तय करने के लिए भेजा था। राजपुत्र ने घोड़ों की कीमत बहुत कम बतायी, जिससे गोपीनाथ पट्टनायक को गुस्सा आ गया। जो राजपुत्र घोड़ों की कीमत निश्चित करने के लिए आया था उसकी एक बुरी आदत थी कि वह गर्दन उठाकर बार-बार ऊपर की ओर देखता था। इसलिए गोपीनाथ पट्टनायक ने क्रोध से राजपुत्र के प्रति कटाक्ष करके कहा कि यह बात ठीक है कि उसका घोड़ा गर्दन ऊपर की ओर उठाता है परन्तु ऊपर की ओर ताकता नहीं रहता, (अर्थात जैसे तुम्हें ऊपर ताकते रहने की आदत है वैसे मेरे घोड़ों को नहीं है)।
इसलिए उसकी कीमत कम नहीं हो सकती, अर्थात राजपुत्र की तुलना में गोपीनाथ पट्टनायक के घोड़ों की कीमत ज्यादा है। इस व्यंग्य से राजपुत्र को गुस्सा आ गया। उसने जाकर राजधन लेने के लिए महाराज को ऐसा समझाया कि गोपीनाथ को चांग पर चढ़ाने की अनुमति ले ली। वे अब गोपीनाथ को चांग पर उठाकर नीचे खड्ग पर फेंककर उसके प्राणों का अन्त कर देंगे। इस बात का हल्ला चारों और फल गया है। श्रीमन्महाप्रभु ने यह सारा वृतान्त सुनकर निरपेक्षता से प्रणयरोष से कहा कि राजधन नहीं दे सकता है तो इसमें राजा का क्या दोष है, दोषी व्यक्ति को तो दण्ड होगा ही, इसमें वे क्या कर सकते हैं? किन्तु भवानन्द राय की सारी गोष्ठी को बांधकर ले गये हैं इत्यादि बातों के द्वारा बार बार आवेदन आते रहने से तथा स्वरूप दामोदर आदि भक्तों के भी प्रार्थना करने पर महाप्रभु ने जो कर्त्तुमकर्त्तुमन्पथाकर्तुं करने में समर्थ हैं उन श्रीजगन्नाथदेव के श्रीपादपद्मों में शरण लेने का उपदेश दिया। श्रीमन्महाप्रभु की अन्तर्यामी रूप से प्रेरणा द्वारा प्रतापरुद्र के सेवक श्रीहरिचन्दन पात्र ने महाराज को शुरु से अन्त तक सारी घटना जैसे की तैसे कह सुनायी तथा गोपीनाथ पट्टनायक की मौत की सजा को माफ करवाने के लिये निवेदन किया। वास्तविक घटना से अवगत होने के कारण राजा ने मृत्युदण्ड माफ करने का आदेश दे दिया।
गोपीनाथ पट्टनायक रामानन्द भ्राता।
राजा मारितेछिल प्रभु हैल त्राता।।
चै.च.म. 1/2651
ये प्रसंग श्री चैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला के 9वें परिच्छेद में वर्णित हुआ है।
वाणीनाथ पट्टनायकादि सब को जब बांध कर लाया गया तब वाणीनाथ ने क्या किया था-जब महाप्रभु ने यह जानना चाहा तो संवाददाता ने कहा –
से कहे, वाणीनाथ निर्भये लय कृष्णनाम।
‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण’ कहे अविश्राम॥
संख्या लागि दुइ हाते अंगुलिते लेखा।
सहस्रादि पूर्ण हैले अंगे काटे रेखा॥
शुनि महाप्रभु हैल परम आनन्द।
के बुझिते पारे गौरेर कृपा छद्म बंध॥
चै.च.अ. 9/56/58
वाणीनाथ तो निर्भय होकर श्रीकृष्ण नाम का उच्चारण कर रहा था। “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हो राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” – वह इस महामन्त्र का निरन्तर जप करता हुआ जा रहा था। संख्या के लिये वह अपनी अंगुलियों पर गिनता जाता था। सहस्रादि पूर्ण होने पर वह अपने शरीर पर रेखा खींच देता था” यह बात सुनकर श्री महाप्रभु को परम आनन्द हुआ। भला, उनकी कृपा की भंगियों को कौन जान सकता है? भवानन्द राय के वंशधारियों द्वारा राज -धन का बेइन्साफी से खर्च एवं उसके कारण राजदण्ड से छुटकारा पाने के लिये बार-2 आने की बात राजपुरोहित काशी मिश्र को बताते हुये महाप्रभु ने अलालनाथ जाने की इच्छा व्यक्त की। श्रीकाशी मिश्र ने बहुत समझा कर महाप्रभु को ऐसा न करने के लिये मना लिया। काशी मिश्र से उपरोक्त वृतान्त जानकर श्रीमहाप्रभु के संतोष के लिए महाराज प्रतापरुद्र ने गोपीनाथ को न केवल राजदण्ड से मुक्त कर दिया अपितु उसे सारे ऋण से भी मुक्त कर दिया और उसका वेतन भी दुगुना कर दिया। श्रीगोपीनाथ पट्टनायक ने श्रीमन्महाप्रभु की कृपा से मुक्त होकर राजसम्मानोचित राज- पगड़ी को धारण किये हुये महाप्रभु के चरणों में इस प्रकार निवेदन किया।
बाकी कौड़ि बाद आर द्विगुण वर्त्तन कैला।
पुनः ‘विषय’ दिया ‘नेतधटी’ पराइला ।
काहाँ चांगेर उपर सेइ मरण- प्रमाद।
कहां ‘नेतधटी’ पुनः, ए सब प्रसाद॥
चांगेर उपरे तोमार चरण’ ध्यान कैलुं ।
चरण-स्मरण – प्रभावे एइ फल पाइलुं।
लोके चमत्कार मोर ए सब देखिया।
प्रशंसे तोमार कृपा-महिमा गाइया॥
किन्तु तोमार स्मरणेर नहे एइ ‘मुख्य फल’ ।
फलाभास एइ – याते विषय चञ्चल ॥
रामराये वाणीनाथे कैला ‘निर्विषय’।
सेइ कृपा आमाते नाहि याते ऐछे हय॥
शुद्ध कृपा कर, गोसाञि, घुचाह विषय
निर्विण्ण हड्नु, मोते ‘विषय’ न हय॥
अर्थात् पिछला सब धन राजा ने माफ कर दिया है। मेरा वेतन दुगुना कर दिया है एवं पुनः राजाधिकार देकर मुझे अपने हाथों से यह राज पगड़ी पहनाई है । प्रभु! कहां तो राजा मुझे प्राण दण्ड देने के प्रमाद में था, कहां अब यह राज पगड़ी मुझे देकर इतनी मुझ पर कृपा कर दी है। प्रभो! सूली पर मैंने आपके चरणों का ध्यान किया था, उस आपके चरण स्मरण का यह सब फल मुझे प्राप्त हुआ है। मेरी इस घटना को देखकर सब लोक चमत्कृत हो उठे हैं और प्रभो! आपकी कृपा के गुण गान कर रहे हैं।
श्रीगोपीनाथ जी ने आगे कहा -“प्रभु! किन्तु आपकी कृपा का यह मुख्य फल नहीं है। ये विषय सुख चञ्चलता विधान करने वाला है और आपकी कृपा के फल का आभास मात्र है। आपने जैसी कृपा राय रामानन्द पर की है, वाणीनाथ पर की है जिससे वे विषयों से परे हो गये हैं, वैसी कृपा आपने मुझ पर नहीं की है, तभी तो मुझे यह विषय प्राप्त हुए हैं। हे गोस्वामी ! आप मुझ पर अपनी शुद्ध कृपा कीजिये जिससे आप के चरणों की प्रीति प्राप्त हुआ करती है और मेरे इन विषयों को छुड़ाइये।
गोपीनाथ पट्टनायक के हृदय का दुःख सुनकर श्रीमन्महाप्रभु ने इस प्रकार कृपा उपदेश किया : –
महाविषय कर, किंवा विरक्त उदास ।
जन्मे जन्मे तुमि पञ्च मोर निज दास॥
किन्तु मोर करिह एक आज्ञा पालन।
व्यय न करिह किछु राजार मूलधन॥
राजार मूलधन दिया ये किछु लभ्य हय।
सेई धन करिह नाना धर्म – कर्मेव्यय॥
असद्व्व्यय ना करिह, याते लोक याय॥
(चै.च.अ. 9/141-144)
तुम लोग चाहे महासुख सम्पत्ति का भोग करो, चाहे विरक्त उदासीन होकर रहो, तुम पांचों जन्म-जन्म के मेरे दास हों। श्रीमहाप्रभु ने कहा – ‘गोपीनाथ! किन्तु एक मेरी आज्ञा का सदा पालन करना। वह यह है कि राजा के मूल-धन को कभी खर्च नहीं करना। राजा का मूलधन चुका कर, जो धन बाकी बचे उस धन को अनेक धर्म -कर्म में ही लगाना। ऐसे असद्कर्म नहीं करने चाहिए कि जिन से इहलोक और परलोक दोनों बिगड़ते हैं।