श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
१८/४३ माल रोड, कानपुर;
ई० १।२।२७
[ अमानी मानद जगद्गुरु का अपने भक्त के प्रति श्रीभक्तिविनोद-मनोऽभीष्ट-पूर्ति की प्रार्थना के बहाने शिष्य को कर्तव्य-शिक्षा — नित्यसिद्ध परममुक्त का विप्रलम्भ — ‘अपराधी ज्ञानी ही स्वयं को जीवन्मुक्त समझता है’ — रामचन्द्र पुरी द्वारा महामुक्त-शिरोमणि श्रील माधवेन्द्रपुरीपाद की चित्तवृत्ति के प्रति विरोध को जगत से दूर करने के लिए तथा मुक्ति-गंध-युक्त विद्धभक्त-सम्प्रदाय को कृष्ण-सेवामय विप्रलम्भ की महिमा समझाने हेतु महामुक्त प्रभुपाद की उक्ति — कर्मजड़ा प्राकृत-नीति और कृष्ण-सुख-तात्पर्यमयी अप्राकृत-भक्तिनीति। ]
स्नेहविग्रहेषु—
बहुत दिनों से आपका कोई समाचार नहीं मिला। आशा है, भगवत्-कृपा से आप सकुशल होंगे।
श्रीभक्तिविनोद ठाकुर के अभीष्ट की पूर्ति तथा उनकी इच्छानुसार श्रीमद्भागवतोद्दिष्ट कीर्तन-कार्य में ही मैं सदा-सदा व्रती रहूँ, ऐसा आशीर्वाद दीजिएगा। कुरुक्षेत्र में—विप्रलम्भरस के अधिष्ठान-क्षेत्र में श्रीगौरसुन्दर विराजित हुए हैं; नैमिषारण्य में—भागवत-व्याख्यान के क्षेत्र में भी श्रीगौरहरि की सेवा आरंभ हो चुकी है; वाराणसी के शिव-क्षेत्र में भी श्रीगौरहरि का सेवाधिष्ठान आपने प्रत्यक्ष देखा ही है। श्रीवृन्दावन में श्रीगौरसुन्दर आगामी वर्ष प्रतिष्ठित हो सकते हैं। पुष्कर, द्वारका, गोपीसरोवर, प्रभास, सुदामापुरी और अवन्तीपुरी के दर्शन करने से सप्त-मोक्षदायिका पुरियों के दर्शन हो गए—ऐसा विचार करके आप लोगों की सेवा न करने के कारण मेरी मुक्ति नहीं हो पा रही है। मुक्त होकर कृष्ण-सेवा करने की इच्छा सर्वथा नहीं है, ऐसी बात भी नहीं है।
गीता के “अपि चेत् सुदुराचारो भजते“, “सर्वधर्मान् परित्यज्य“, “यत् करोषि यदश्नासि“, “या प्रीतिरविवेकिनां” तथा “जन्माद्यस्य” आदि श्लोक एवं आपकी बातें आज स्मरण होने के कारण आपको कष्ट देने के उद्देश्य से यह पत्र लिखा।
ऐथिकल प्रिंसिपल्स (Ethical Principles) या मोरल रूल्स (moral rules — सांसारिक नीतियाँ) लौकिक विचार में इस प्रपंच में सर्वोत्तम हैं, इस विषय में मेरा कोई मतभेद नहीं है। किंतु कृष्ण-प्रेम सबसे बढ़कर उपादेय होने के कारण, उसकी तुलना में नैतिक नियम (moral rules) कृष्ण की अपेक्षा श्रेष्ठ या उपादेय नहीं हो सकते। मथुरा में कृष्ण द्वारा बलपूर्वक वस्त्र धोने वाले (रजक) का वध करके माला-वस्त्र आदि ग्रहण करने को बहुत से लोग उचित नहीं मानते। वे अप्राकृत परकीय-विचार के आश्रित निष्कपट प्रेमी भक्तों को ‘लेस ऐथिकल’ (less ethical — कम नैतिक) मान सकते हैं, किंतु हरि-प्रीति में ऐसा आश्चर्यजनक सामर्थ्य है कि उसके सम्मुख परमोपादेय नैतिक आदर्श (moral standard) भी निष्प्रभ हो जाता है।
यदि ‘कर्तव्य-बुद्धि’ कृष्ण-सेवा में बाधा बन जाए, तो उसका परित्याग करके सेवा-कार्य में उन्मत्त हो जाने पर जो सुदुराचार परिलक्षित होता है, वह भी समादरपूर्वक वरणीय है। आप स्वयं इस विषय पर विचार करके यदि एक निबंध लिखें, तो मुझे प्रसन्नता होगी। क्योंकि कीर्तन करने वाला भी यदि विवेकशील और विचारवान न हो, तो भक्ति प्राप्त नहीं होती; और भक्ति के बिना सांसारिक कर्तव्य-बुद्धि अथवा अविश्वास-प्रवणता (disbelieving temper) दूर नहीं होती। शीघ्र ही कलकत्ता लौटने की इच्छा है।
श्रीहरिजनकिंकर
श्रीसिद्धान्तसरस्वती